भारत के सिंधु-गंगा मैदानों से विलुप्त होती बहुमूल्य वृक्ष की प्रजाति शीशम

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जड़ों को संक्रमित करने वाली घातक बीमारी ‘डाई बैक’ के आक्रमण, ‘पाउडरीय मिल्डीव’ बिमारी के निरन्तर ...

जड़ों को संक्रमित करने वाली घातक बीमारी ‘डाई बैक’ के आक्रमण, ‘पाउडरीय मिल्डीव’ बिमारी के निरन्तर प्रकोप, निर्माण कार्यों तथा वाणिज्यिक उपयोग हेतु वृक्षों की अंधाधुंध कटाई के परिणामस्वरूप आज जलोढ़ मैदानी क्षेत्रों की शान शीशम विलुप्ति के कगार पर खड़ा है।
भारत के सिंधु-गंगा मैदानों से 
विलुप्त होती बहुमूल्य वृक्ष की प्रजाति शीशम
-डॉ0 अरविन्द सिंह

हिमालय की उत्पत्ति के फलस्वरुप सिनोजोइक युग (Coenozoic era) के तृतीयक काल (Tertiary period) में एक विशाल गर्त (Depression) का निर्माण हुआ। बाद में हिमालय की नदियों द्वारा लाये गये अवसादों के जमाव से गर्त (Depression) एक समतल भूमि में परिवर्तित हो गया जोकि सिन्धु-गंगा मैदान (Indo-Gangetic plain) के नाम से जाना जाता है। इस जलोढ़ मैदान (Alluvial plain) का निर्माण सीनोजोइक युग के क्वाटरनेरी काल (Quarternary period) में हुआ जो भारत के कुल क्षेत्रफल के 15 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करता है और सबसे बाद में निर्मित यह क्षेत्र हिमालय तथा प्रायद्वीपीय भारत (Peninsular India) के मध्य स्थित है। इसके अंतर्गत सिंधु के मैदान, पंजाब, हरियाणा के मैदान, राजस्थान के मरूस्थल गंगा के मैदान (उत्तर प्रदेश, बिहार तथा पश्चिम बंगाल) तथा असम की ब्रह्मपुत्र घाटी आती है।

Dalbergia sissoo 
सिन्धु-गंगा का विशाल मैदानी क्षेत्र पारम्परिक रूप से शीशम के विकास तथा उत्पादन के लिए सबसे उपयुक्त आवास रहा है। यह क्षेत्र दुनिया की सबसे अच्छी शीशम पट्टी (Sissoo belt) का प्रतिनिधित्व करता है। शीशम के आर्थिक महत्व को देखते हुए उत्तर प्रदेश, बिहार, पंजाब, हरियाणा, पश्चिम बंगाल तथा असम में वृहद पैमाने पर इसका रोपण किया जाता है। लेकिन शीशम वृक्षों की अकाल मृत्यु के कारण इसके रोपण में कमी आयी है।

शीशम की विशेषताएँ, वितरण एवं पारिस्थितिकी:
बहुमूल्य शीशम पुष्पीय पौधों के फैबेसी (Fabaceae) कुल का सदस्य है। शीशम का वैज्ञानिक नाम डेलबर्जिया शीशू (Dalbergia sissoo) हैं, इसका देसी नाम शीशम तथा अंग्रेजी में इसे शीशू (Sissoo) के नाम से जाना जाता है। यह एक विशाल पर्णपाती (Deciduous) वृक्ष होता है, जिसकी ऊँचाई 30 मी0 तक होती है। इसके तने की गोलाई 2.4 मी0 तक की होती है। शीशम वृक्ष के छाल का रंग भूरा होता है जिसकी मोटाई 1.0-1.5 सेमी0 होती है। पत्तियाँ संयुक्त प्रकार (Compound type) की होती है और एक पत्ती में 3-5 छोटी पत्तियाँ (Leaflets) होती है। नई पत्तियाँ फरवरी में तथा पुष्प (हल्के पीले श्वेत गुच्छों में) मार्च एवं मई महीने के बीच प्रकट होते हैं। फल ठण्डे मौसम में पकते हैं और बहुत लम्बे समय तक वृक्ष से लगे रहते हैं। बीज का रंग भूरा होता है।

शीशम का मूल निवास क्षेत्र भारत, पाकिस्तान तथा नेपाल है। भारत में यह पूरे उप-हिमालय क्षेत्र (Sub-Himalayan tract) में 1500 मी0 तक की ऊँचाई पर पाया जाता है। शीशम जलोढ़ मृदा (Alluvial soil) का आदर्श वृक्ष है जो आमतौर से नदियों के किनारों पर पाया जाता है। यह पर्याप्त नमी की आपूर्ति वाली जलोढ़ बलुई मृदा (Alluvial sandy soil) को पसन्द करता है। चीका मिट्टी में इसकी वृद्धि दर रूक जाती है, जिससे यह बौना प्रकट होता है। शीशम आमतौर से चीका मिट्टी (Clayey soil) तथा दलदली भूमि (Swamp) को नापसन्द करता है। शीशम सूखारोधी (Drought resistant) तथा तुषाररोधी (Frost resistant) के साथ-साथ पर्याप्त रौशनी की आवश्यकता वाला (Light demander) वृक्ष होता है। शीशम की ताप बर्दाश्त करने की क्षमता 4&49º सेन्टीग्रेड तक की होती है।

शीशम का आर्थिक महत्व:
पारम्परिक रुप से शीशम सिन्धु-गंगा के मैदानी क्षेत्रों में वन विभाग का पसन्दीदा वृक्ष रहा है। इसलिए उत्तर भारत के जलोढ़ मैदानों में इसका रोपण सड़कों, नहरों तथा रेल पटरियों (Railway tracks) के किनारे आम बात रही है। शीशम अत्यन्त ही आर्थिक महत्व का वृक्ष है। इसकी केन्द्रीयकाष्ठ (Heartwood) भूरे रंग की, सख्त, मजबूत तथा टिकाऊ होती है। शीशम के केन्द्रीयकाष्ठ का वर्गीकरण भारत के चार प्राथमिक काष्ठों (Primary timbers) में किया गया है।

शीशम के अतिरिक्त, सागौन (टेक्टोना ग्राण्डिस), शाखू (सोरिया रोबस्टा) तथा देवदार (सीड्रस देवदारा) अन्य प्रजातियाँ हैं। मजबूती, लचीलेपन तथा टिकाऊपन के कारण ही शीशम की लकड़ी का उपयोग निर्माण कार्यों में वृहद पैमाने पर होता है। लकड़ी का प्रयोग साज-सामग्री, इमारत, कृषि उपकरण के निर्माण आदि में होता है। इसके अतिरिक्त शीशम की लकड़ी का उपयोग रेलवे शयन-यान (Railway sleepers), वाद्य यन्त्रों (Musical instruments), चारपाई के पाँव (Charpai legs), जूतों की एड़ी (Heels of shoes), हथौड़े की बेंत (Hammer handles)तथा तम्बाकू की नली (Tobacco pipes) के निर्माण में ही होता है।

शीशम की पत्तियों को भेड़, बकरियाँ तथा ऊँट हेतु चारे के रुप में इस्तेमाल किया जाता है। सूखी लकड़ी तथा पत्तियाँ ईंधन के रूप में भी इस्तेमाल होती हैं। शीशम की लकड़ी अच्छे ईंधन के रुप में स्थापित है। शीशम के लकड़ी की बाहरी परत (Sapwood) की उष्मांक मूल्य (Calorific value) 4900 किलो कैलोरी प्रति किलोग्राम होती है जबकि केन्द्रीय काष्ठ (Heartwood) की उष्मांक मूल्य 5200 किलो कैलोरी प्रति किलोग्राम होती है। शीशम की लकड़ी चारकोल (Charcoal) हेतु भी उपयुक्त होती है।

शीशम अपने औषधीय गुणों के लिए भी जाना जाता है। पारम्परिक चिकित्सा पद्धति में पत्तियों का अर्क सूजाक (Gonorrhoea) बिमारी के इलाज हेतु दिया जाता है। जड़ में खून का थक्का बनाने का गुण पाया जाता है। शीशम की काष्ठ का शर्बत रक्त विकार के उपचार में कारगर होता है। पत्तियों का क्वाथ फोड़े-फुंसी (Pimples) के उपचार में सहायक होता है। नेत्ररोग में पत्तों का स्वरस शहद में मिलाकर 1-2 बूंद आँख में डालने से लाभ होता है। लकड़ी से रेसिन (Resin) तथा आवश्यक तेल (Essential oil) भी प्राप्त होता है। अपने कठोर स्वभाव के कारण शीशम बंजर भूमि के रोपण हेतु वृक्ष की उपयुक्त प्रजाति है। इसका रोपण क्षारीय (Alkaline) तथा लवणीय (Saline) भूमि, खदान से अव्यवस्थित भूमि (Lands disturbed by mining) एवं अपरदित भूमि (Eroded land) के उद्धार हेतु भी होता है। वृक्ष का रोपण क्षरित काष्ठभूमि (Degraded woodland) के पुर्नवास (Rehabilitation) हेतु भी होता है।

शीशम की विलुप्ति के कारण:
शीशम की निरन्तर घटती जनसंख्या के पीछे बहुत से कारण हैं। इनमें जड़ों को प्रभावित करने वाली कवकजनित ‘डाई बैक’ (Die back) बिमारी सबसे प्रमुख कारण है। यह बिमारी मृदा में उपस्थित फ्यूजेरियम सोलेनाई फार्मी स्पेसीयेलिस डेलबर्जि (Fusarium solani f. sp. dalbergiae) नामक डियूटिरोमाइसीट्स कवक (Deuteromycetous fungus) के संक्रमण से होती है। यह कवक शीशम की जड़ों पर गैनोडर्मा ल्यूसिडम (Ganoderma lucidum) नामक एक अन्य बेसीडीयोमाइसीट्स (Basidiomycetous) कवक के सहयोग से आक्रमण कर उन्हें नष्ट कर देता है परिणामस्वरुप सम्पूर्ण खड़ा वृक्ष सूखकर नष्ट हो जाता है। पिछले दो दशकों में इस बिमारी के कारण उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में सरकारी तथा निजी भूमि पर उगने वाले शीशम वृक्षों की बड़े पैमाने पर मृत्यु हुई है।

इसके अतिरिक्त ‘पाउडरीय मिल्डीव’ (Powdery mildew) नामक एक अन्य कवकजनित बिमारी के लगातार आक्रमण से शीशम के वृक्ष रूग्ण होकर अन्य प्रकार के रोगाणुओं तथा कीटों के संक्रमण के प्रति संवेदनशील (Susceptible) हो जाते हैं जो अन्ततः वृक्षों के मृत्यु का कारण साबित होते हैं। ‘पाउडरीय मिल्डीव’ बिमारी के लक्षण आमतौर से पत्तियों पर प्रकट होते हैं। यह बीमारी एस्कोमाइसीट्स कवक (Ascomycetous fungus) फाइलैक्टीनिया कोरिलिया (Phyllactinia corylea) के संक्रमण से होती है। सरकारी भूमि पर उगने वाले वृक्षों की अंधाधुंध अवैध कटाई भी शीशम की घटती जनसंख्या का प्रमुख कारण है। निजी भूमि पर उगाये गये वृक्षों की निर्माण कार्यो तथा वाणिज्यिक उपयोग हेतु अंधाधुंध कटाई भी शीशम की गिरती जनसंख्या का कारण है।

पूर्वी उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले में स्थित काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (Banaras Hindu University) के 1,300 एकड़ भूमि में फैले हरियालीयुक्त संरक्षित मुख्य परिसर में आज शीशम के गिने-चुने वृक्ष ही बचे हैं, जबकि बीसवीं शताब्दी के अस्सी तथा नब्बे के दशकों में परिसर के अन्दर सैकड़ों वृक्ष हुआ करते थे। शीशम के वृक्ष परिसर के अंदर आमतौर से सड़कों के किनारे, बाग-बगीचों, आवासीय परिसर, शैक्षणिक परिसर आदि स्थानों पर पाये जाते थे। परिसर में ‘डाई बैक’ बिमारी के प्रकोप के कारण शीशम के अधिकांश पुराने वृक्ष आज सूखकर नष्ट हो चुके हैं।

विश्वविद्यालय परिसर के अन्दर समय-समय पर चलाये जाने वाले वृक्षारोपण कार्यक्रम के तहत आज इस वृक्ष की प्रजाति लगभग उपेक्षा की शिकार है। परिसर में वर्ष 1997 के बाद से अर्जुन (Terminalia arjuna) के रोपण को विशेष प्राथमिकता दी गयी है। इसके अतिरिक्त करंज (Pongamia pinnata), ईमली (Tamarindus indica), बकेन नीम (Melia azedarach), सागौन (Tectona grandis), कचनार (Bauhinia variegata), आस्ट्रेलियन सिल्वर ओक (Grevillea robusta), चितवन (Alstonia scholaris), अमलतास (Cassia fistula), आम (Mangifera indica), नीम (Azadirachta indica), महुआ (Bassia latifolia), बहेड़ा (Terminalia bellerica), बर्मीज सेना (Cassia siamea), जामुन (Syzygium cumini) आदि का भी रोपण किया गया है।

शीशम का संरक्षण:
शीशम की उसके प्राकृतिक आवास में निरन्तर घटती जनसंख्या गंभीर चिन्ता का विषय है और इस पर तत्काल ठोस कार्यवाई की आवश्यकता है। शीशम का संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है ताकि लकड़ी, ईंधन, चारे एवं औषधीय आवश्यकताओं की पूर्ति के साथ-साथ पारिस्थितिक संतुलन भी बना रहे।

शीशम के संरक्षण के लिए ‘डाई बैक’ जैसी घातक तथा ‘पाउडरी मिल्डीव’ जैसी हानिकारक बीमारियों को तत्काल नियन्त्रित किया जाना चाहिए तथा शीशम की अवैध कटाई पर भी सख्त रोक होनी चाहिए। सामाजिक वानिकी कार्यक्रम (Social Forestry Programme) के तहत शीशम के रोपण को अनिवार्य कर देना चाहिए। शीशम की गहराई तक जाने वाली जड़ों तथा उसके नाइट्रोजन स्थिरीकरण (Nitrogen fixation) के गुण उसे कृषि वानिकी (Agroforestry) हेतु आदर्श वृक्ष बनाते हैं। इसलिए कृषि वानिकी हेतु शीशम का रोपण इस वृक्ष की प्रजाति की जनसंख्या वृद्धि में सहायक साबित होगा। शीशम का संपोषित उपयोग (Sustainable use) भी इसके संरक्षण में मददगार साबित होगा।

निष्कर्ष:
बहुउपयोगी तथा बहुमूल्य शीशम की सिन्धु-गंगा के मैदानी क्षेत्रों में दिनोंदिन घटती जनसंख्या गंभीर चिन्ता का विषय है क्योंकि पारम्परिक रूप से यह मैदानी क्षेत्र शीशम का प्राकृतिक आवास रहा है। शीशम की विलुप्ति से न केवल जैव-विविधता का क्षरण होगा अपितु पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण पर भी इसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा। अतः शीशम का उसके प्राकृतिक आवास में संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
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लेखक परिचय:

डॉ. अरविंद सिंह वनस्पति विज्ञान विषय से एम.एस-सी. और पी-एच.डी. हैं। आपकी विशेषज्ञता का क्षेत्र पारिस्थितिक विज्ञान है। आप एक समर्पित शोधकर्ता हैं और राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की शोध पत्रिकाओं में अब तक आपके 4 दर्जन से अध‍िक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। खनन गतिविधियों से प्रभावित भूमि का पुनरूत्थान आपके शोध का प्रमुख विषय है। इसके अतिरिक्त आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मुख्य परिसर की वनस्पतियों पर भी अनुसंधान किया है। आपके अंग्रेज़ी में लिखे विज्ञान विषयक आलेख 'Science Log' पर पढ़े जा सकते हैं। आपसे निम्न ईमेल आईडी पर संपर्क किया जा सकता है-
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Scientific World: भारत के सिंधु-गंगा मैदानों से विलुप्त होती बहुमूल्य वृक्ष की प्रजाति शीशम
भारत के सिंधु-गंगा मैदानों से विलुप्त होती बहुमूल्य वृक्ष की प्रजाति शीशम
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