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सेब: चिकनी सूरत पे न जाना...

* बड़े धोखे हैं इस राह में *
खूबसूरत और चिकनी चीजों को लोग ज्‍यादा पसंद करते हैं। लेकिन इसके चक्‍कर में अक्‍सर लोगों को लेने के देने भी पड जाते हैं। मजे की बात है कि ऐसा सिर्फ इंसानों के बारे में लागू नहीं होता, यह बात फलों पर भी लागू होती है और विशेषकर सेब पर।

सेब के बारे में पुरानी कहावत है "An apple a day keeps the doctor away" शायद इसी वजह से सेब के प्रति लोगों का आकर्षण ज्‍यादा रहता है, जबकि उससे ज्‍यादा सस्‍ते और फायदेमंद फल हमारे पास उपलब्‍ध हैं। शायद सेब के प्रति इसी आकर्षण का परिणाम है कि उसे और ज्‍यादा आकर्षक और सुंदर बनाने के लिए उसपर अब मोम की कोटिंग तक की जाने लगी है।

सेब पर मोम की कोटिंग:
Wax Coated Apple
गर्मी के दिनों में सेब को ज्‍यादा दिनों तक सुरक्षित रखने के लिए आजकल सेब पर मोम की कोटिंग की जा रही है। इसके लिए सेब को लेकर पिघले हुए मोम में डुबाकर निकाल लिया जाता है। फिर उसे कपडे से इस तरह से पोंछ दिया जाता है कि उसपर मोम की पर्त का पता नहीं चलता। लेकिन कपडे से पोंछने के बाद भी सेब पर मोम की महीन पर्त जमी रहती है, जो सेब को खराब होने से तो बचाती है, साथ ही उसे चमकीला और आकर्षक भी बना देती है। और मोम लगा सेब अपनी इसी चमक के कारण मंहगे दोनों पर बिकता है।

खतरनाक है मोम लगा सेब:
मोम वाला सेब पेट के लिए बेहद खतरनाक है। इसका सबसे बडा कारण है मोम का सुपाच्‍य न होना। यह गैस्ट्रिक प्राब्‍लम (gastric problem) खडी कर सकता है, पाचन तंत्र (digestive system) को खराब कर सकता है, आंतों को डैमेज कर सकता है और रक्‍त प्रवाह (blood circulation) में बाधा बनकर हार्ट अटैक (heart attack) का भी कारक बन सकता है।

इन समस्‍याओं से कैसे बचें:
सबसे पहले सेब को खरीदते समय सावधानी बरतें। बेहद चमकदार सेबों को खरीदने से परहेज करें। इम्‍पोर्टेड सेब के स्‍थान पर लोकल सेब को वरीयता दें। फिरभी यदि आपने गल्‍ती से मोम वाला सेब खरीद ही लिया है, तो उसे उपयोग में लाने से पहले से उसे गर्म पानी में डुबा कर कपडे से अच्‍छी तरह से साफ जरूर कर लें। इससे मोम की कोटिंग काफी हद तक निकल जाएगी और उसके दुष्‍प्रभावों से बच सकेंगे।

वैसे आजकल फलों पर पेस्‍टीसाइड का छिड़काव काफी अधिक मात्रा में किया जाता है, इसलिए अन्‍य फलों को भी गुनगुने पानी से धुल कर (यदि थोडी देर गर्म पानी में डुबा कर रखा जाए, तो ज्‍यादा अच्‍छा है) खाने में ही समझदारी है।
Keywords: wax coating apple, gastric problem, digestive system, blood circulation, heart attack, intestine, pesticides
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अंधविश्वास कैसे जन्म लेता है ?

अंधविश्वास कैसे जन्म लेता है इसपर लम्बी—लम्बी बहसें की जा सकती हैं। लेकिन कभी—कभी ऐसे विषयों पर रचनाकार अनजाने में ही बहुत सार्थक रचनाएं रच जाते हैं। सआदत हसन मंटो की कहानी 'करामात' एक ऐसी ही लघुकथा है।

सआदत हसन मंटो गजब के कहानीकार थे। उनकी रचनाएं समाज का आइना ही नहीं दिखातीं, अपने पैनेपन के कारण पाठकों को भीतर तक बेधती भी हैं। अपनी इसी मारक क्षमता के कारण उनकी बहुत की लघुकथाएं 'बदनाम कहानियां' के नाम से भी जानी जाती हैं।

'करामात' मंटो की एक ऐसी ही लघुकथा है, जिसमें उन्होंने अंधविश्वास के जन्म को प्रदर्शित किया है। लीजिए प्रस्तुत है लघुकथा— करामात
सआदत हसन मंटो
लूटा हुआ माल बरामद करने के लिए पुलिस ने छापे मारने शुरू किए।

लोग डर के मारे लूटा हुआ माल रात के अँधेरे में बाहर फेंकने लगे; कुछ ऐसे भी थे जिन्होंने अपना माल भी मौका पाकर अपने से अलहदा कर दिया, कानूनी गिरफ्त से बचे रहें।

एक आदमी को बहुत दिक्कत पेश आई। उनके पास शक्कर की दो बोरियाँ थीं जो उसने पंसारी की दुकान से लूटी थीं। एक तो वह जूँ-तूँ रात के अँधेरे में पास वाले कुएँ में फेंक आया, लेकिन जब दूसरी उसमें डालने लगा तो खुद भी साथ चला गया।

शोर सुनकर लोग इकट्ठे हो गए। कुएँ में रस्सियाँ डाली गईं। जवान नीचे उतरे और उस आदमी को बाहर निकाल लिया गया; लेकिन वह चंद घंटों के बाद मर गया।

दूसरे दिन जब लोगों ने इस्तेमाल के लिए कुएँ में से पानी निकाला तो वह मीठा था।

उसी रात उस आदमी की कब्र पर दीए जल रहे थे।

साभार: जीशान हैदर जैदी

Keywords: Saadat Hasan Manto, Shahadat Hsan Manto, Badnam Kahaniyan, Andhviswas kaise janm leta hai
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सफलतापूर्वक सम्‍पन्‍न हुई साइंस ब्‍लॉगिंग वर्कशाप।

मुख्‍य अतिथि डॉ0 एम0 क्‍यू0 बेग सम्‍बोधित करते हुए
'तस्‍लीम' एवं एनसीएसटीसी, नई दिल्‍ली द्वारा संयुक्‍त रूप से आयोजित 'ब्‍लॉग लेखन के द्वारा विज्ञान संचार' विषयक पांच दिवसीय कार्यशाला दिनांक 28 मई, 2013 को इस्‍लामिया कॉलेज ऑफ कॉमर्स, बक्‍शीपुर, गोरखपुर में सफलतापूर्वक सम्‍पन्‍न हुई। कार्यशाला में 49 बच्‍चों ने भाग लिया और विज्ञान लेखन एवं ब्‍लॉग निर्माण की बारीकियों को विषय विशेषज्ञों के माध्‍यम से सीखा।

कार्यशाला के समापन सत्र में मुख्‍य अतिथि डा0 एम0 क्यू0 बेग रहे। वे गोरखपुर मेडिकल कॉलेज के रेडियोलॉजी विभाग के अध्‍यक्ष हैं और कैंसर विशेषज्ञ के रूप में जाने जाते हैं। उन्‍होंने अपने सम्‍बोधन में छात्रों को सम्‍बोधित करते हुए कहा कि  आबादी के लिहाज से हमारा देश आज विश्‍व का दूसरा सबसे बड़ा देश है। यहां पर चारों ओर लोगों की भीड़ है। यही कारण है कि अधिकांश लोगों को जीवन में आगे बढ़ने का मौका नहीं मिल पाता है। ब्लॉग लेखन के द्वारा विज्ञान संचार कार्यशाला ने आपके सामने एक प्लेटफार्म उपलब्ध कराया है। आपको चाहिए कि इसका भरपूर उपयोग करें और इसके द्वारा अपने सुनहरे भविश्य की ताबीर लिखें।

प्रतिभागी को प्रमाण पत्र देते श्री शरीफ अहमद
कार्यशाला को इस्लामिया कॉलेज के प्रबंधक एवं सामाजिक कार्यकर्ता शरीफ अहमद एवं विज्ञान संचारक संजय वर्मा ने भी सम्बोधित किया। शरीफ अहमद ने अपने लघु सम्बोधन में कहा कि जीवन में कौन सी बात कौन से मौके पर कही जाए, इसका बड़ा महत्व है। यही बात ब्लॉग लेखन में भी लागू होती है। अगर आप हमेशा सोच-समझ कर लिखेंगे, तो सराहे जाएंगे और 'तस्लीम' की तरह जीवन में यश पाएंगे।

विज्ञान संचारक संजय वर्मा ने ‘तस्लीम‘ का शुक्रिया अदा करते हुए कहा कि तस्लीम ने इस कार्यशाला के माध्यम से युवाओं को उम्मीद की किरण दिखाई है। इस योगदान के लिए हम तस्लीम और एनसीएसटीसी के प्रति हृदय से आभार व्यक्त करते हैं और निवेदन करते हैं कि वे भविष्‍य में भी इसी प्रकार गोरखपुर के छात्रों का इसी प्रकार से ज्ञानार्जन करते रहेंगे।
 
समापन सत्र का एक समूह चित्र
कार्यक्रम के संचालक डॉ0 जाकिर अली रजनीश ने इस अवसर पर कार्यशला में बनाये गये ब्लॉगों की समीक्षा रिपोर्ट पढ़ते हुए कहा कि यह प्रसन्नता का विषय है कि ज्यादातर प्रतिभागियों ने विज्ञान संचार के महत्व को पहचाना है और उसके साथ ही साथ सामाजिक उत्तरदायित्व वाले महत्वपूर्ण विषयों को विज्ञान संचार से जोड़ते हुए अपनी ब्लॉग पोस्टों का सृजन किया है। इससे यह आशा बंधती हैं कि ये ब्लॉगर विज्ञान संचार की इस शमा को आगे भी रौशन रखेंगे और इंटरनेट के द्वारा विज्ञान संचार की मुहिम को अपने मकाम तक पहुंचाने में महती भूमिका निभाएंगे।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ0 एम0क्यू0 बेग ने कार्यशाला में शामिल प्रतिभागियों को सहभागिता प्रमाण पत्र प्रदान किये और उन्हें भविष्‍य के लिए शुभकामनाएं दीं।
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ब्लॉग की दुनिया से सीधा साक्षात्कार

बाएं से डॉ0 जाकिर अली रजनीश, डॉ0 अरविंद मिश्र, डॉ0 मनोज पटैरिया, श्री संजय वर्मा

ब्लॉग एक ऐसा माध्यम है, जो अभिव्यक्ति का असीम संसार उपलब्ध कराता है। ब्लॉग के द्वारा सिर्फ लिखे हुए शब्द और चित्र ही नहीं आडिया, वीडियो, पॉवर प्वाइंट यहां तक की सम्प्रेषण की समस्त शैलियां उपयोग में लाई जा सकती हैं।

उपरोक्त बातों को इस्लामिया डिग्री कॉलेज में ‘तस्लीम‘ और एनसीएसटीसी, नई दिल्ली द्वारा आयोजित ‘ब्लॉग लेखन के द्वारा विज्ञान संचार‘ कार्यशाला प्रतिभागी अपने ब्लॉग बनाते हुए स्वयं महसूस कर रहे हैं।
कार्यशाला में ब्लॉग बनाने में व्यस्त प्रतिभागी
कार्यशाला को एनसीएसटीसी के निदेशक डॉ0 मनोज पटैरिया, साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन के अध्यक्ष डॉ0 अरविंद मिश्र, तस्लीम के महासचिव डॉ0 जाकिर अली रजनीश, सोशल एक्टिविस्ट पंकज मिश्र, विज्ञान संचारक संजय वर्मा और बायोटेक्नोलॉजी एक्सपर्ट मिर्जा इमरान बेग आदि ने सम्बोधित किया। वक्ताओं ने प्रभावी लेखन के लिए सूक्ष्म अवलोकन की आवश्यकता को रेखांकित करते हुए कहा कि विज्ञान संचारक पहले किसी भी बात को तर्क की क​सौटी पर कसता है, तक उसपर विश्वास करता है। ब्लॉग लेखन में भी इस नजरिए को लागू करने की आवश्यकता है।
हम किसी से कम नहीं: कार्यशाला में शामिल छात्राएं
कार्यशाला में शामिल प्रतिभागी अब धीरे—धीरे ब्लॉग के महत्व को समझ रहे हैं और आहिस्ता—आहिस्ता उसमें अपने पांव पसार रहे हैं। हालांकि लेखन का विशेष अनुभव न होने के कारण उनके भीतर एक हल्की सी झिझक है, कम्प्यूटर फ्रैन्डली न होने के कारण अभी उन्हें उसपर कार्य करने में असुविधा सी होती है, लेकिन इसके बावजूद प्रतिभागी खटाखट अपने ब्लॉग बनाते जा रहे हैं और उसपर अपने विचार दर्ज कर रहे हैं।
नक्षत्रशाला की सैर
जीवन की व्यापकता को गहराई से महसूस कराने के उद्देश्य से कार्यशाला के पांचवे सत्र में प्रतिभागियों को नक्षत्रशाला की सैर कराई गयी। वहां पर उन्होंने ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के रहस्यों को वैज्ञानिक नजारिए से समझा। उन्होंने नक्षत्रशाला से मिले वैज्ञानिक ज्ञान के आधार पर अपने दृष्टिकोण को विकसित करने का संकल्प लिया, जिससे समाज में स्वस्थ एवं वैज्ञानिक विचारधारा का प्रचार किया जा सके और समाज को अंधविश्वासों के भंवरजाल से मुक्त बनाया जा सके।
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ब्लॉग लेखन के द्वारा विज्ञान संचार कार्यशाला का शुभारम्भ

विज्ञान को लोकप्रिय बनाने के लिए युवाओं को आगे आना होगा: डॉ0 पटैरिया


डॉ0 मनोज पटैरिया (सबसे बाएं) सम्बोधित करते हुए, साथ में श्री महेन्द्र त्रिपाठी एवं डॉ0 अरविंद मिश्र
हमारे देश में युवा शक्ति का विशाल भण्डार है। इन युवाओं के भीतर अपार हौसला है, रचनात्मकता का अथाह भंडार है, कुछ करने की चाहत है। बस जरूरत है इन्हें चैनलाइज करने की, एक दिशा देने की। अगर इन युवाओं को विज्ञान के क्षेत्र में लाया जा सके, उन्हें विज्ञान संचार के लिए प्रेरित किया जा सके, तो हम इस क्षेत्र में बडी उपलब्धि अर्जित कर सकते हैं।
कार्यशाला में शामिल प्रतिभागी
उपरोक्त विचार एन.सी.एस.टी.सी. के निदेशक डॉ. मनोज पटैरिया ने 'तस्लीम' एवं एनसीएसटीसी, नई दिल्ली द्वारा इस्लामिया कॉलेज आफ कॉमर्स, गोरखपुर में आयोजित ‘ब्लॉग लेखन के द्वारा विज्ञान संचार‘ कार्यशाला के उद्घाटन सत्र में अध्यक्ष के रूप में बोलते हुए व्यक्त किये। उन्होंने कहा कि आज के समय की आवश्यकता है कि हम स्प्रीचुअल साइंस पर ध्यान दें। उन्होंने न्यूटन का उदाहरण देते हुए कहा कि स्प्रीचुअल साइंस का आशय धार्मिक जुडाव नहीं हैं इसका आशय है वह वैज्ञानिक दृष्टि उत्पन्न करना, जिससे हम सेब को गिरता हुआ देख कर उसके कारणों की पडताल करने की उत्सुकता उत्पन्न होना। जब तक युवाओं में यह बोध नहीं उत्पन्न होगा, उनमें वैज्ञानिक दृष्टिकोण उत्पन्न नहीं हो सकता। कार्यशाला आगामी पांच दिनों तक जारी रहेगी, जिसमें बच्चों को विज्ञान संचार एवं ब्लॉग की विषेशताओं से परिचत कराया जाएगा।
हिन्दी विभाग, गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व अध्यक्ष प्रो0 रामदेव शुक्ल
कार्यशाला में मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रो0 रामदेव शुक्ल जी ने कहा कि वर्तमान में ब्लॉग लेखन न केवल एक उपयोगी कला है, अपितु अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर संचार का एक बेहतर कारक बन गया है। आज आवष्यकता है कि बेहतर लेखन कला एवं अन्ध विश्वास जैसे विषयों को राष्ट्रीय स्तर पर बेहतरी के प्रयास करने की।
कार्यशाला को सम्बोधित करती सुश्री मीनू खरे
कार्यशाला में आकाशवाणी की कार्यक्रम अधिशासी मीनू खरे ने ब्लॉग की विशेषताओं को बताते हुए कहा कि यह एक जिम्मेदारी भरा कार्य है, जो न सिर्फ आपको पाठक दिलाता है, वरन राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी पहचान दिला सकता है।

डॉ0 अरविंद मिश्र ने ‘तस्लीम‘ एवं 'सर्प संसार' ब्लॉग को मिले अन्तर्राष्ट्रीय ब्लॉग पुरस्कारों का उदाहरण देते हुए कहा कि ब्लॉग आज पहचान का मोहताज नहीं है। यदि आप किसी भी विषय में गम्भीरता से कार्य करें, तो वह एक न एक दिन आपकी पहचान बन सकता है। लेकिन इसके साथ ही साथ लेखन में विष्वसनीयता और गुणवत्ता पर भी ध्यान रखने की आवष्यकता है।
कार्यशाला के संयोजक डॉ0 जाकिर अली रजनीश ने प्रारम्भ में प्रतिभागियों को विस्तार से ब्लॉग की विधा से परिचित कराया। इस अवसर पर वरिस्ठ विज्ञान संचारक महेन्द्र कुमार त्रिपाठी एवं संजय वर्मा ने प्रतिभागियों को विज्ञान लेखन की बारिकियों के बारे में विस्तार से बताया और इसके लिए अध्ययन की आवष्यकता पर बल दिया।
तस्लीम विज्ञान गौरव सम्मान ग्रहण करते हुए डॉ0 अरविंद मिश्र

कार्यशाला के दौरान विज्ञान संचार के क्षेत्र में अतुलनीय योगदान देने के लिए 'तस्लीम' संस्था की ओर से डॉ0 अरविंद मिश्र को 'तस्लीम विज्ञान गौरव सम्मान' प्रदान किया गया। यह सम्मान उन्होंने डॉ0 मनोज पटैरिया एवं प्रो0 रामदेव शुक्ल के हाथों से ग्रहण किया।
 
कार्यशाला के आगामी सत्रों में ब्लॉग की तकनीकों और विज्ञान लेखन की गूढताओं से प्रतिभागियों को परिचित कराया जाएगा और उनके ब्लॉग बनवाकर उन्हें विज्ञान संचार के क्षेत्र में सक्रिय होने के लिए प्रेरित किया जाएगा।

साइंस ब्लॉगिंग की 03 कार्यशालाओं का आयोजन!


विज्ञान संचार को बढ़ावा देने के उद्देश्य से 'तस्लीम' आगामी दिवसों में राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद् (नेशनल काउंसिल फॉर साइंस एण्ड टेक्नालॉजी कम्युनिकेशन N.C.S.T.C., नई दिल्ली)के सहयोग से 'ब्लॉग लेखन के द्वारा विज्ञान संचार' विषयक 03 कार्यशालाओं का आयोजन करने जा रहा है। प्रस्तावित कार्यशालाओं का विवरण निम्नानुसार है:

24 मई—28 मई, 2013, गोरखपुर, उ0प्र0
27 जून—01 जुलाई, 2013, रायबरेली, उ0प्र0
27 जुलाई—31 जुलाई, 2013, शाहजहांपुर, उ0प्र0

प्रस्तावित कार्यक्रम में 4 दिन प्रशिक्षुओं को तकनीकी प्रशिक्षण प्रदान किया जाना है। कार्यक्रम के दौरान एक दिन स्थानीय भ्रमण के अंतर्गत तत्क्षण विज्ञान चिट्ठाकारिता (इवेंट साईंस ब्लागिंग) का कार्यक्रम प्रस्तावित है। कार्यशाला में भाग लेने वाले सभी प्रशिक्षुओं को सहभागिता प्रमाण पत्र भी प्रदान किया जाएगा। कार्यशाला का माध्यम द्विभाषीय (हिन्दी और अंगरेजी) होगा।

उक्त कार्यशालाओं में भाग लेने के इच्छुक व्यक्तियों के आवेदन आमंत्रित हैं। जो व्यक्ति/ब्लॉगर विज्ञान लेखन में रूचि रखते हों और उक्त प्रशिक्षण प्राप्त करना चाहते हों, वे अपना आवेदन तस्लीम के महासचिव डॉ0 ज़ाकिर अली रजनीश को ईमेल zakirlko@gmail.com द्वारा भेज सकते हैं। सभी आवेदन पत्रों में विषय में 'विज्ञान ब्लॉग लेखन कार्यशाला' अवश्य लिखें। आवेदन पत्र में आवेदक अपनी शैक्षिक योग्यता, लेखन अनुभव, 3 प्रकाशित लेख (इसमें ब्लॉग पोस्ट भी शामिल हैं), सम्पर्क सूत्र (ईमेल एवं मोबाईल नं0 सहित) का विवरण अवश्य दें। आवेदन पत्र प्राप्त होने की अंतिम तिथि 21 मई, 2013 है। इसके बाद प्राप्त होने वाले आवेदन पत्रों पर विचार करना संभव नहीं होगा। 

कार्यशाला हेतु प्रशिक्षुओं का चयन तकनीकी मूल्याँकन कमेटी के द्वारा किया जाएगा। चूँकि कार्यशाला हेतु सीमित संसाधन ही उपलब्ध हैं, इसलिए स्थानीय प्रतिभागियों को वरीयता दी जाएगी। बाहर से मात्र 10 प्रतिभागियों को चुना जाना संभव हो सकेगा। कार्यशाला हेतु चयनित बाहरी प्रशिक्षु प्रतिभागियों को स्लीपर श्रेणी (आने-जाने) के मार्ग व्यय के साथ ही उन्हें एवं सभी स्थानीय सुविधाएं नि:शुल्क प्रदान की जायेगी। कार्यशाला हेतु विशेषज्ञों का चयन एन0 सी0 एस0 टी0 सी0 के परामर्श पर किया जाएगा।


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'सर्वश्रेष्‍ठ हिन्‍दी ब्‍लॉग' बनाने का शुक्रिया -तस्‍लीम।

(डायचे वेले द्वारा 'तस्‍लीम' को सर्वश्रेष्‍ठ हिन्‍दी ब्‍लॉग-2013 चुने जाने पर त्‍वरित प्रतिक्रिया)

17 मार्च 2007 को जब डॉ0 अरविंद मिश्र की प्रेरणा से 'तस्‍लीम' ('टीम फॉर साइंटिफिक अवेयरनेस ऑन लोकल इश्यूज़ इन इंडियन मासेज') का एक स्‍वैच्छिक संगठन के रूप में गठन हुआ था, तब नहीं सोचा गया था कि इसका सफर कहां तक जाएगा। कुछ-कुछ अनिच्‍छा के साथ शुरू हुआ यह संगठन बाद में 28 फरवरी (विज्ञान दिवस), 2008 को जब ब्‍लॉग के रूप में आया, तो भी कोई स्‍पष्‍ट विजन नहीं था सामने। धीरे-धीरे डॉ0 मिश्र ने इसपर पहेलियों का प्रकाशन शुरू किया, जो काफी लोकप्रिय हुईं। उनकी लोकप्रियता का आलम यह रहा कि देखते ही देखते ब्‍लॉग जगत में चारों ओर पहेलियां ही पहेलियां छा गयीं। 

और फिर एक दिन जब पहेलियों ने अपना शतक पूरा किया, तो उस समय तक एक अरूचि सी होने लगी थी पहेलियों से, सो उस वजह से भी और छिटपुट उठने वाले विवादों के कारण भी बाद में पहेलियों का प्रकाशन बंद हो गया और 'तस्‍लीम' ने अंधविश्‍वास केन्द्रित विषयों पर अपना ध्‍यान केन्द्रित किया। चूंकि यह स्‍वर कुछ लोगों को अखर रहा था, सो इसका विरोध भी शुरू हुआ, पर तस्‍लीम अपने मूल उद्देश्‍य पर डटा रहा और अंतत: उसमें सफल हुआ। 

आज 'तस्‍लीम' की मूल पहचान उसके अंधविश्‍वास विरोधी स्‍वर के कारण ही होती है और इस सम्‍बंध में प्रकाशित सामग्री उसकी सर्वाधिक पढी जाने वाली पोस्‍टों में शामिल है। इस विषय से जुडी पोस्‍टों की लोकप्रियता का अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि इनमें से कुछ तो अब तक 50 हजार से अधिक के हिट दर्ज कर चुकी हैं और इनमें लगातार कमेंट आते रहते हैं। 

बहरहाल ऑनलाइन दुनिया में 'तस्‍लीम' आज एक स्‍पष्‍ट आवाज के रूप में जाना जाता है, जिसे यहां तक लाने में बहुत बडा योगदान डॉ0 अरविंद मिश्र का रहा है। सांगठनिक स्‍तर पर वे प्रारम्‍भ से ही उपाध्‍यक्ष के रूप में जुडे रहे हैं। हालांकि बाद में वे वैचारिक भिन्‍नता के कारण औपचारिक रूप से 'तस्‍लीम' से अलग हो गये, किन्‍तु मानसिक स्‍तर पर वे आज भी इससे सम्‍बद्ध हैं और 'तस्‍लीम' से जुड़ी प्रत्‍येक गतिविधि को अपना आशीर्वाद प्रदान करते रहते हैं। यह हमारे लिए निश्‍चय ही गर्व का विषय है।

'तस्‍लीम' न सिर्फ अपनी सामग्री के कारण वरन अपने आकर्षक स्‍वरूप(तकनीकी लेआउट) के कारण भी सराहा जाता रहा है। इसका पूरा श्रेय हमारे मित्र एवं अनन्‍य सहयोगी श्री विनय प्रजापति को जाता है। चाहे 'तस्‍लीम' से जुडी तकनीकी परेशानियां रही हों या फिर उसके SEO से जुडे मुद्दे, उनका पूरा समर्थन हमें प्राप्‍त होता रहा है। इसके लिए तस्‍लीम परिवार उनका हृदय से आभारी है। 

जैसा कि ऊपर बताया गया है कि 'तस्‍लीम' एक स्‍वैच्छिक संगठन है, इसलिए यह ब्‍लॉग जगत के बाहर भी अपनी गतिविधयों को संचालित करता रहा है। 'तस्‍लीम' द्वारा अब तक बडे पैमाने पर जो कार्यक्रम  किये गये हैं, उनमें 'विज्ञान लेखन के द्वारा ब्‍लॉग संचार' कार्यशाला, 'बाल साहित्‍य में नवलेखन' संगोष्‍ठी, 'क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान कथा लेखन' कार्यशाला एवं 'परिकल्‍पना सम्‍मान समारोह एवं अन्‍तर्राष्‍ट्रीय ब्‍लॉगर सम्‍मेलन' प्रमुख हैं। इन समस्‍त कार्यक्रमों में 'तस्‍लीम' को अब तक एनसीएसटीसी, भारत सरकार, विज्ञान प्रसार, नई दिल्‍ली, नेशनल बुक ट्रस्‍ट, नई दिल्‍ली, उत्‍तर प्रदेश हिन्‍दी संस्‍थान, लखनऊ एवं परिकल्‍पना, लखनऊ का सहयोग मिला है, जोकि किसी उपलब्धि से कम नहीं है। 

सांगठनिक स्‍तर पर 'तस्‍लीम' के साथ बहुत से पदाधिकारी एवं सदस्‍य (जिनमें श्री जीशान हैदर जैदी, सुश्री अर्शिया अली एवं डॉ0 दिनेश मिश्र का नाम प्रमुख है) जुड़े हैं, जो अपना अभिन्‍न सहयोग प्रदान करते रहते हैं। निश्‍चय ही आप सबके सहयोग के बिना यहां तक का सफर असम्‍भव था।

'बॉब्‍स' द्वारा 'हिन्‍दी का सर्वश्रेष्‍ठ ब्‍लॉग' चुने जाने पर हम अपने सभी सदस्‍यों को हृदय से बधाई देते हैं। इसे अपनी श्रेणी में 62 प्रतिशत वोट प्राप्‍त हुए हैं, जोकि अपने आपमें एक अद्भुत रिकॉर्ड है। इस ब्‍लॉग को लोकप्रियता के इस मुकाम तक पहुंचाने में निश्‍चय ही पाठकों और समर्थकों का बहुत बडा योगदान रहा है, हम उनको भी बधाई देते हैं और आभार व्‍यक्‍त करते हैं। 

इसके साथ ही साथ हम एक बार डॉ0 अरविंद मिश्र, श्री रवीन्‍द्र प्रभात, सुश्री अलका सर्वत मिश्रा एवं श्री विनय प्रजापति का पुन: आभार व्‍यक्‍त करते हैं, जिन्‍होंने इस पुरस्‍कार की वोटिंग प्रक्रिया के दौरान अपना समर्थन देकर 'तस्‍लीम' के पक्ष में जनमत बनाने में अपनी महती भूमिका निभाई। साथ ही मैं उन सभी वोट करने वाले मित्रों का भी शुक्रिया अदा करता हूं, जिन्‍होंने परोक्ष अथवा अपरोक्ष रूप से 'तस्‍लीम' के इस पुरस्‍कार के सफर को पूरा करने में अपना सहयोग दिया।

'तस्‍लीम' के सहयोगी ब्‍लॉग 'सर्प संसार' को भी बॉब्‍स अवार्ड में 'सबसे रचनात्‍मक' श्रेणी का यूजर अवार्ड प्राप्‍त हुआ है। उससे जुड़े हुए सभी लोगों को भी हार्दिक बधाईयां।

आशा है भविष्‍य में भी 'तस्‍लीम' को आप सबका स्‍नेह इसी प्रकार प्राप्‍त होता रहेगा। 
धन्‍यवाद।

डॉ0 ज़ाकिर अली रजनीश 
संस्‍थापक महासचिव - तस्‍लीम

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शुभ लग्‍न में मां बनने की सनक...

पता नहीं ये इलेक्‍ट्रानिक चैनलों में बढते ज्‍योतिषी सम्‍बंधी कार्यक्रमों का कुप्रभाव है अथवा सामाजिक विकृतियों का असर कि दिनों दिन समाज में अंधविश्‍वास की नई-नई घटनाएं सुनने को मिल रही हैं। ये घटनाएं न सिर्फ व्‍यक्ति की समझ पर बौद्धिकता पर प्रश्‍नचिन्‍ह लगाती हैं, वरन हमारी आधुनिकता और प्रगतिशीलता को भी सवालों के घेरे में खडी करती हैं। 

महानगरों में एक ऐसा ही एक नया मामला देखने को मिल रहा है- शुभ मुहूर्त निकलवा कर बच्‍चे को जन्‍म दिलाना। जैसा कि हम और आप जानते हैं किआजकल के अधिकतर डॉक्‍टर अधिक से अधिक कमाई के लिए बच्‍चों के सामान्‍य प्रसव की तुलना में ऑपरेशन पर ही जोर देते हैं। शायद इसी का लाभ उठाकर अंधविश्‍वासी अभिभावक अब बाकायदा ज्‍योतिषियों से मुहुर्त विचरवा कर तय समय में अपने बच्‍चे को जन्‍म दिलवा रहे हैं। 

ऐसा नहीं है कि इस काम के द्वारा सिर्फ ज्‍योतिषी ही अपनी जेब भरने में लगे हुए हैं, वरन बहुत से नर्सिंग होम बाकायदा शुभ मुहुर्त विचरवाने के लिए खुद ज्‍योतिषियों की व्‍यवस्‍था भी कर रहे हैं और उनके द्वारा सुझाए गये समय में बच्‍चे को जन्‍म देने के बहाने अभिभवकों से मोटी रकम की मांग कर रहे हैं। 

ऐसा सुझाव देने वाले ज्‍योतिषी और डॉक्‍टर इस बात की परवाह नहीं करते कि सही समय पर बच्‍चे का जन्‍म न होने से उसके मानसिक और शारीरिक विकास पर बुरा असर पड सकता है। वे इस बात को छिपाते हुए यह बताते हैं कि बच्‍चे का जन्‍म ऐसे समय में होना चाहिए, जब लग्‍नेश, भाग्‍येश और कर्मेश बली हों, सूर्य, गुरू स्‍वगृही मजबूत हों, 6ठा, 8वां और 12वां घर ठीक हो, कृतिका, आर्द्रा, अनुराधा व स्‍वाति नक्षत्र हो, मंगल दोष की स्थिति न हो, गण्‍ड मूल नक्षत्र, पंचक, राहुकाल, मृत्‍युबाण या भद्रा न हो। और खेद का विषय है कि बहुत से अभिभावक ज्‍योतिषियों की इन गोलमोल बातों में आ जाते हैं और अपने बच्‍चे की जिन्‍दगी तक दांव पर लगा देते हैं। 

ज्‍यादातर डॉक्‍टर मानते हैं कि यह प्रवृत्ति बेहद खतरनाक है। इससे न सिर्फ बच्‍चे के शारीरिक और मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य पर असर पड़ता है, वरन उसकी जिन्‍दगी के लिए भी खतरा उत्‍पन्‍न हो सकता है। क्‍योंकि अक्‍सर ज्‍योतिषि जन्‍म के लिए 15-20 मिनट का समय ही बताते हैं ऐसे में डॉक्‍टरों की टीम पर एक अनचाहा दबाव आ जाता है और क्रिटिकल सिचुएशन होने की दशा में बच्‍चे की जान पर भी बन सकती है। वैसे इस तरह के कुछ एक मामले सुनने में भी आए हैं, पर डॉक्‍टर अपने पेशे की बदनामी के कारण ऐसी घटनाओं को छिपाते हैं और केस बिगड जाने पर उसका ठीकरा दूसरी चीजों पर फोड देते हैं। 

बहरहाल समझदार व्‍यक्ति जानते हैं कि किसी खास समय में बच्‍चे को जन्‍म दिलवाना एक सनक भर है, इससे सिर्फ ज्‍योतिषियों और धूर्त डॉक्‍टरों का ही भला हो रहा है। अभिभावक और बच्‍चे का इससे नुकसान ही है। क्‍योंकि एक ओर जहां तय समय में जन्‍म के दबाव में ऑपरेशन प्रक्रिया में केस बिगडने की संभावना रहती है, वहीं इस प्रक्रिया से जन्‍मे बच्‍चों के शारीरिक और मानसिक स्‍वास्‍थ्‍य पर भी असर पड़ता है। और इसका खामियाजा बच्‍चे के साथ-साथ अभिभावकों को भी भुगतना पडता है।
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एक थी डायन : नारी अस्मिता के मुंह पर तमाचा!

(Ek Thi Daayan : एक थी डायन)

यूं तो कन्‍नन अय्यर निर्देशित फिल्‍म 'एक थी डायन' एक मसाला फिल्‍म है, जो लगभग 35-36 वर्ष पूर्व मुकुल शर्मा की लिखी एक लघु कथा पर आधारित है। मुकुल शर्मा यानी कि अभिनेत्री कोंकणा सेन शर्मा के पिता। इस फिल्‍म के संगीत निर्देशक विशाल भारद्वाज मुकुल शर्मा के पुराने मित्रों में से हैं। उन्‍होंने जब इस लघुकथा को पढ़ा था, तभी से उनके दिमाग में इसे लेकर फिल्‍म बनाने का आइडिया गूंज रहा था। और जब पिछले दिनों उनकी मुलाकात 'दौड़' और 'विक्‍टरी' जैसी फिल्‍मों के लेखक कन्‍नन अय्यर से हुई, तो 'एक थी डायन' के वजूद में आने का मार्ग प्रशस्‍त हो गया।

यूं तो यह फिल्‍म पूरी तरह से एक काल्‍पनिक कहानी पर आधारित है, और रूटीन फार्मूलों पर आधारित होने के कारण बोर ही करती है। फिल्‍म की कहानी का सत्‍य से कोई वास्‍ता नहीं है, और फिल्‍म के निर्देशक अय्यर ने इस तथ्‍य को स्‍वीकार भी किया है। फिल्‍म में भारतीय समाज में प्रचलित उन अंधविश्‍वासों/मिथकों का जमकर प्रयोग किया गया है, जो देश के अनेक पिछड़े इलाकों में बहु प्रचलित हैं। ये मिथ/अं‍धविश्‍वास हैं डायन का शक्तिशाली होना, उसका रूप बदलना, उसके बालों का घना होना, उसके उल्‍टे पैर होना आदि।

फिल्‍म में दिखाया गया है कि डायन की चोटी में उसकी शक्ति होती है। गौरतलब है कि इस अंधविश्‍वास के चलते झारखंड, बिहार, छत्‍तीसगढ एवं यहां तक की नेपाल में प्रतिवर्ष हजारों महिलाओं के बाल काट दिये जाते हैं और उन्‍हें गंजा कर दिया जाता है। फिल्‍म में यह भी दिखाया गया है कि डायन के पैर उल्‍टे होते हैं। इस अंधविश्‍वास की वजह से उन सैकड़ों महिलाओं को प्रताड़ना का शिकार होना पडता है, जिनके पैर पोलियो आदि के कारण पैर टेढ़े हो जाते हैं। इन अंधविश्‍वासों के चलते ऐसी महिलाओं को सरेआम प्रताड़ना का शिकार होना पडता है। अक्‍सर स्थिति यहां तक बिगड जाती है कि उनको समाज से बहिष्‍कृत कर दिया जाता है और कभी-कभी तो उनकी हत्‍या तक कर दी जाती है।

समाज में प्रचलित इन अंधविश्‍वासों को दूर करने के लिए अनेक वर्षों से अनेकानेक संस्‍थाएं समर्पण के साथ कार्य कर रही हैं, जिनमें 'तस्‍लीम' से सम्‍बद्ध डॉ0 दिनेश मिश्र की अंधश्रृद्धा निर्मूलन समिति प्रमुख है। इन प्रयासों की वजह से अब इन स्थितियों में कुछ सुधार आया है। लेकिन ऐसे में इस तरह की फिल्‍म का आना, इस सामाजिक बुराई को फिर से फैलने का सबब बन सकता है। इस वजह से अनेक स्‍थानों पर सामाजिक एवं वैज्ञानिक संस्‍थाएं इस फिल्‍म का विरोध कर रही हैं। उनका कहना है कि यह फिल्‍म अवास्‍तविक, गैर तार्किक व अंधविश्‍वास को फैलाने वाली है, इससे समाज में अवैज्ञानिक धारणाओं का प्रसार होगा और ग्रामीण महिलाओं की स्थिति खराब होगी तथा उनकी प्रताड़ना की घटनाएं बढने लगेगीं। इन दुष्‍परिणामों को दृष्टिगत रखते हुए संस्‍थाओं ने प्रदेश एवं केन्‍द्र सरकार वरन सेंसर बोर्ड, महिला आयोग तथा मानव अधिकार आयोग को भी पत्र भेजा है और फिल्‍म पर रोक लगाने की मांग की है।

समाज में वैज्ञानिक चेतना जगाने एवं अंधविश्‍वास मिटाने के लिए प्रतिबद्ध संस्‍था 'तस्‍लीम' इस फिल्‍म की भर्त्‍सना करती है और अपने पाठकों से अपील करती है कि वे समाज में नारी की स्थिति को दयनीय बनाने वाली स्थितियों को महिमामंडित करने वाली इस फिल्‍म को न सिर्फ देखने से परहेज करें, वरन अपने शुभेच्‍छुओं को भी इसके लिए प्रेरित करें। 

ध्‍यान रहे, हम हर काम के लिए सरकार पर निर्भर नहीं कर सकते, समाज को बदलने के लिए हमें स्‍वयं आगे आना होगा। जब हम बदलेंगे, हमारी सोच बदलेगी और फिल्‍म को अपेक्षित दर्शक नहीं मिलेंगे तो फिल्‍म निर्माता/निर्देशक भी इस तरह के बेसिरपैर के कथानकों पर फिल्‍म बनाने की हिम्‍मत नहीं जुटा पाएंगे।

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गर्व के साथ वोट क‍ीजिए, दुनिया को हिन्‍दी की स्‍तरीयता से परिचित कराइए...

इस समय विश्व की 14 भाषाओं (6 श्रणियों) में दिया जाने वाला 'बॉब्स अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार-2013', चर्चा में है। पुरस्‍कार के प्रथम चरण में चयनित ब्‍लॉगों के लिए ऑनलाइन वोटिंग कराई जा रही है, जिसके बाद विजेता का चयन किया जाएगा। इस प्रतियोगिता का परिणाम 07 मई को घोषित किया जाएगा और विजेताओं को ये पुरस्‍कार 18 जून 2013 को जर्मनी में प्रदान किए जाएंगे। 

प्रत्‍येक भाषा की सबसे चर्चित श्रेणी उस भाषा का सर्वश्रेष्‍ठ ब्‍लॉग है। आपको बताते हुए हमें अत्‍यंत प्रसन्‍नता हो रही है कि 'हिन्‍दी भाषा का सर्वश्रेष्‍ठ ब्‍लॉग' श्रेणी में तीन विज्ञान ब्‍लॉगों का नामांकन हुआ है: 'तस्‍लीम', 'सर्प संसार' एवं 'विज्ञान विश्‍व'। 

यह हमारे लिए गर्व का विषय है कि प्रारम्‍भ से ही 'हिन्‍दी का सर्वश्रेष्‍ठ ब्‍लॉग' श्रेणी में 'तस्‍लीम' ब्‍लॉग सर्वाधिक मतों के साथ शीर्ष पर चल रहा है। निश्‍चय ही यह आप सबके स्‍नेह एवं आशीर्वाद का सुफल है। इसके लिए हम आपके हृदय से आभारी हैं। 

मैं आपके इस अनन्‍य सहयोग के प्रति आभार व्‍यक्‍त करते हुए मैं 'तस्‍लीम परिवार' की ओर से निवेदन करती हूं कि कृपया अपना स्‍नेह/आशीर्वाद इसी प्रकार बनाए रखें और बॉब्‍स पुरस्‍कारों में 'हिन्‍दी का सर्वश्रेष्‍ठ ब्‍लॉग' (Best Blog Hindi) श्रेणी में 'तस्‍लीम' को जिता कर सार्थक एवं श्रेष्‍ठ ब्‍लॉगिंग मूल्‍यों की स्‍थापना करें। 

आपको यह बताते हुए हमें अत्‍यंत प्रसन्‍नता हो रही है कि बाब्‍स पुरस्‍कारों की एक अन्‍य श्रेणी 'सबसे रचनात्‍मक' (Most Creative & Original), जिसमें एक भाषा से एक ब्‍लॉग का चयन किया किया गया है, उसमें 'साइंटिफिक वर्ल्‍ड' परिवार का ही एक अन्‍य ब्‍लॉग 'सर्प संसार' सर्वाधिक मतों के साथ आगे चल रहा है। इसलिए तस्‍लीम के चाहने वाले सभी मित्रों से निवेदन है कि कृपया 'सबसे रचनात्‍मक' (Most Creative & Original) श्रेणी में भी 'सर्प संसार' को अपना आशीर्वाद प्रदान करें और वैश्विक स्‍तर पर भारतीय रचनात्‍मकता का परचम लहराएं। 
'तस्‍लीम' को मिला श्री बालेन्‍दु शर्मा दाधीच जी का आशीष

जैसा कि आपको पता ही होगा कि इन पुरस्‍कारों के लिए वोटिंग की सुविधा डायचे वेले की ऑफीशियल वेबसाइट https://thebobs.com/ पर दी गयी है और साइट के नियमों के अनुसार 'फेसबुक', 'टिवटर' एवं 'ओपेन आईडी' से प्रत्‍येक 24 घंटे पर वोट किया जा सकता है। 

 वोट करने का तरीका

वोट करने के लिए ब्राउजर में https://thebobs.com/ खोलें और 'फेसबुक', 'ट्विटर' एवं 'ओपन आईडी' (ब्‍लॉग यूआरएल) के एकाउंट के जरिए लॉगिन हों।
 
लॉगिन होने के बाद अपनी श्रेणी Best Blog Hindi/हिंदी का सर्वश्रेष्‍ठ ब्‍लॉग' अथवा Most Creative & Original/सबसे रचनात्‍मक' में से एक का चयन करें और 'तस्‍लीम' तथा 'सर्प संसार' को क्रमश: चुन कर 'वोट नाउ' का बटन दबाकर अपना वोट करें। एक श्रेणी में वोट करने के बाद पेज को रिफ्रेश करलें और पुन: दूसरी श्रेणी में अपना वोट दें।
 
अक्‍सर यह देखने में आता है कि साइन इन करते समय कभी-कभी दूसरी भाषा का पेज खुल जाता है, जिससे वोटिंग ऑप्‍शन पढने में नहीं आते हैं। ऐसा होने पर साइट का यूआरएल चेक करें और उसे https://thebobs.com/english/ कर लें और तदुपरांत वोट करें।

बॉब्‍स द्वारा निर्धारित वोटिंग नियमावली के अनुसार प्रत्‍येक व्‍यक्ति हर 24 घंटे के बाद  अपनी आईडी से दुबारा वोट कर सकता है, इसलिए कृपया 6 मई तक वोट करते रहें और अपनी विज्ञान ब्‍लॉगों को अपना समर्थन देते रहें।

हमें आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्‍वास है कि आप 5 मई तक नियमित रूप से 'हिन्‍दी का सर्वश्रेष्‍ठ ब्‍लॉग' (Best Blog Hindi) एवं 'सबसे रचनात्‍मक' (Most Creative & Original) श्रेणियों में क्रमश: 'तस्‍लीम' एवं 'सर्प संसार' को वोट करते रहेंगे और वैश्विक स्‍तर पर हिन्‍दी की स्‍तरीय ब्‍लॉगिंग का परचम लहराने में मदद करेंगे।

नवरात्रि की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ,
अर्शिया अली
(कोषाध्‍यक्ष-तस्‍लीम)

मित्रों,

ये मौका सिर्फ किसी ब्‍लॉग को जिताने या हराने का नहीं है। ये अवसर है हिन्‍दी की स्‍तरीयता को विश्‍व स्‍तर पर रेखांकित करने का। ध्‍यान रखें, आप जिस ब्‍लॉग को वोट करेंगे, वह वैश्विक प्‍लेटफार्म पर रखा जाएगा। विश्‍व के कोने-कोने के लोग उसे देखेंगे और जानेंगे कि हिन्‍दी में ब्‍लॉगिंग का स्‍तर कैसा है और वहां पर किस लेबल पर काम हो रहा है।

आप इस वोटिंग के जरिए सिर्फ किसी ब्‍लॉग को जिताने के लिए अपना आशीर्वाद नहीं दे रहे हैं, बल्कि अपने देश की पहचान और गरिमा को भी वैश्विक स्‍तर पर रेखांकित कर रहे हैं। इसलिए एक महान देश के जिम्‍मेदार नागरिक होने का परिचय दें और व्‍यक्तिगत हित, स्‍वार्थ, अपीलों से ऊपर उठते हुए पूरे सोच-विचार के साथ नामित ब्‍लॉगों में से भारत तथा हिन्‍दी के सर्वश्रेष्‍ठ ब्‍लॉगों को अपना वोट दें और जिम्‍मेदार नागरिक की भूमिका निभाएं। -डॉ0 ज़ाकिर अली 'रजनीश'

सेक्स: एक गुप्त ज्ञान (Secrets Of Sex)

यह किसी आश्चर्य से कम नहीं कि कामसूत्र, खजुराहो और शिवलिंग-पूजा के लिए पहचाने जाने वाले देश भारत में ‘सेक्स‘ एक टैबू के रूप में स्थापित हो गया है। यही कारण है कि हमारे समाज में सेक्स सम्बंधी चुटकुले (Sexist Jokes) खूब सुनाए जाते हैं, सेक्स से जुड़ी गालियों का खुलेआम प्रयोग होता है, सेक्स के तड़के वाली फिल्में टिकट खिड़की पर रिकार्ड तोड़ देती हैं, पर बावजूद इसके यौन शिक्षा (Sexual Literacy) की बात करना भी पाप की दृष्टि से देखा जाता है। 

यही कारण है कि हमारे समाज में यौन अशिक्षा अपने चरम पर है। इसके दुष्परिणाम स्वरूप जहां एक ओर हमें गली-गली में कुकुरमुत्तों की तरह खुले सेक्स क्लीनिक यौन शिक्षा के अभाव में देश के युवाओं की गर्दनें नाप रहे हैं, वहीं दूसरी ओर अनेक बिन ब्याही मांएं अपने ‘पाप‘ से मुक्ति पाने के नाम पर झोला छाप डॉक्टरों की भेंट चढ़कर अपनी जान से हाथ धो रही हैं। 

जाहिर सी बात है कि इन स्थितियों से निजात पाने का एकमात्र तरीका यौन शिक्षा है। लेकिन दुर्भाग्य का विषय यह है कि न तो इसकी चिन्ता हमारे नेताओं को है और न ही शिक्षा शास्त्रियों को। लेकिन प्रसन्नता का विषय यह है कि यौन शिक्षा की आवश्यकता को हमारे फिल्म जगत ने पहचाना है, जिसका सुपरिणाम है ‘सीक्रेट्स ऑफ सेक्स‘ (Secrets Of Sex) फिल्म। 

लेखक एवं निर्माता/निर्देशक कुमार आदर्श की इस फिल्म में न सिर्फ ‘सेक्स‘ से जुड़े समस्त रहस्यों से पर्दा उठाने का प्रयास किया गया है, वरन इससे जुड़ी हुई तमाम तरह की जिज्ञासाओं (Sex Curiosity) को भी सरल ढ़ंग से समझाने का प्रयास किया गया है। डॉ0 मुस्कान अग्रवाल के शोध द्वारा तैयार की गयी इस फिल्म में दो कथाएं समानान्तर क्रम में चलती हैं और यह दिखाने का प्रयास करती हैं कि सेक्स के सम्यक ज्ञान से एक ओर जहां जीवन में बहार आ सकती है, वहीं उसकी अज्ञानता के कारण जीवन कैसे नरक के समान हो जाता है। 

यूं तो यह फिल्म वर्ष 2012 के अंत में रिलीज हुई थी, पर न जाने क्यों अनजानी सी ही रह गयी। मेरे विचार में यदि आप सेक्स के समस्त रहस्यों से परिचित होना चाहते हैं, यदि आप अपने जीवन में आने वाली सभी तरह की सेक्स समस्याओं से निजात चाहते हैं, यदि आप अपने जीवन को मधुर बनाना चाहते हैं, तो आपका यह फिल्म अवश्य देखनी चाहिए। और हां, आपको यह फिल्म कैसी लगी, इस बारे में अपनी प्रतिक्रिया से अवश्य अवगत कराइएगा।




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