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आचार्य जगदीश चन्द्र बोस और उनके महान आविष्‍कार।

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भारत के महान वैज्ञा‍निक आचार्य जगदीश चन्द्र बोस की जीवनी और उनके आविष्‍कारों का सम्‍पूर्ण विवरण।

जब देश में विज्ञान शोध कार्य लगभग नहीं के बराबर थे। ऐसी परिस्थितियों में जगदीश चन्द्र बोस ने विज्ञान के क्षेत्र में मौलिक योगदान दिया। उस समय तक देश में इस तरह का काम किसी ने शुरु तक नहीं किया था। जगदीश चन्द्र बोस का योगदान दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रहा। पहला उन्होंने बहुत छोटी तरंगें उत्पन्न करने का तरीका दिखाया और दूसरा हेनरिक हर्ट्ज के अभिग्राही को एक उन्नत रुप दिया।
विज्ञान के अनन्य पथिक - आचार्य जगदीश चन्द्र बोस

-नवनीत कुमार गुप्ता

भारत के अनेक वैज्ञानिकों ने पूरे विश्व में अपने कार्यों से पहचान बनाई। ऐसे ही वैज्ञानिकों में जगदीशचन्द्र बोस का नाम भी शामिल है। जगदीशचन्द्र बोस को जे.सी. बोस के नाम से भी जाना जाता है। आचार्य जे.सी. बोस के समकालीनों में रविन्द्रनाथ टैगोर, स्वामी विवेकानन्द और राजा राम मोहन राय जैसे महान लोग थे। वह समय बौद्धिक क्रांति का था। और यही वो समय भी था जब देश में विज्ञान शोध कार्य लगभग नहीं के बराबर थे।

Jagdish Chandra Bose
ऐसी परिस्थितियों में जगदीश चन्द्र बोस ने विज्ञान के क्षेत्र में मौलिक योगदान दिया। उस समय तक देश में इस तरह का काम किसी ने शुरु तक नहीं किया था। जगदीश चन्द्र बोस का योगदान दो महत्वपूर्ण क्षेत्रों में रहा। पहला उन्होंने बहुत छोटी तरंगें उत्पन्न करने का तरीका दिखाया और दूसरा हेनरिक हर्ट्ज के अभिग्राही को एक उन्नत रुप दिया।
 
30 नवम्बर, 1858 को जन्में आचार्य जे.सी. बोस का बचपन गांव ररौली में गुज़रा, जो अब बांग्लादेश में है। जब वे छोटे थे तब उन्हें तरह-तरह के कीड़े-मकोड़ें और मछलियां पकड़ने का शौक था। उन्हें पानी में रहने वाले सांपों को भी पकड़ने का शौक था। उन सांपों को देखकर उनकी बड़ी बहन अक्सर डर जाया करती थीं। गांव के बाद अध्ययन के लिए जगदीष चन्द्र बोस कलकत्ता के सेंट जेवियर्स कॉलेज गए।

आचार्य जे.सी. बोस कलकत्ता विश्‍वविद्यालय से स्नातक और कैम्‍ब्रिज के मिल्टन कॉलेज से एम.ए. थे। उन्होंने सन् 1896 में लंदन विश्‍वविद्यालय से विज्ञान में डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त की थी। जेसी बोस अनेक संस्थाओं के सम्मानित सदस्य रहे। वह सन् 1920 में रॉयल सोसायटी के फैलो चुने गए थे। आचार्य जगदीशचन्द्र बोस ने भौतिकी और जीव विज्ञान में महत्वपूर्ण कार्य किए। हम क्रमबद्ध रूप से उनके कार्यों को समझने का प्रयास करते हैं।
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भौतिकी में जे.सी. बोस का योगदान:
उन्नीसवीं सदी के अंतिम दिनों में जे सी बोस के कार्यों ने पूरी दुनिया में भारत का नाम रोशन कराया। जनवरी 1898 में यह सिद्ध हुआ कि मार्कनी का बेतार अभिग्राही यानी वायरलेस रिसिवर (Wireless receiver) जगदीश चन्द्र बोस द्वारा आविष्कारित था। मार्कनी ने इसी का एक संशोधित अभिग्राही यन्त्र उपयोग किया था जो मर्करी ऑटो कोहेरर था, जिससे पहली बार अटलांटिक महासागर पार बेतार संकेत 1901 में प्राप्त हो सका था। और तभी इन्स्ट्यिूट ऑफ इलेक्ट्रिकल एण्ड इलेक्ट्रोनिक्स इंजीनियर्स ने जगदीष चन्द्र बोस को अपने ‘वायरलेस हॉल ऑफ फेम’ (Wireless Hall of Fame) में सम्मिलित किया। तब आचार्य जगदीश चन्द्र बोस को मार्कनी के साथ बेतार संचार के पथप्रर्दशक कार्य के लिए रेडियो का सह आविष्कारक माना गया। जेसी बोस के कार्यों का उपयोग आने वाले समय में किया गया। आज का रेडियो, टेलिविजन, रडार, भुतलीय संचार रिमोट सेन्सिग, माइक्रोवेव ओवन और इंटरनेट, आचार्य जगदीश चन्द्र बोस के कृतज्ञ हैं।

अपने 36वें जन्मदिवस पर उन्होंने एक प्रयोग द्वारा यह प्रदर्शन किया कि लघु विद्युत चुम्बकीय तरंगों के द्वारा संकेत प्राप्त हो सकते हैं। उन्होंने पहला प्रदर्शन प्रसिडेन्सी कॉलेज में किया था और फिर कलकत्ता टाउन हॉल में। अपने प्रयोग द्वारा जेसी बोस ने बताया था कि विद्युत चुम्बकीय तरंगें किसी सुदूर स्थल तक केवल अंतरिक्ष के सहारे पहुंच सकती हैं तथा यह तरंगें किसी क्रिया का किसी अन्य स्थान पर नियंत्रण भी कर सकती हैं। असल में यह रिमोट कंट्रोल सिस्टम था।

उसी समय दूसरी ओर स्कॉटलैन्ड के भौतिकविद् जेम्स क्लार्क मैक्सवेल (James Clerk Maxwell) ने अपने गणितीय सिद्धान्त से सिद्ध कर दिया कि विद्युत चुम्बकीय तंरगें होती हैं। मैक्सवेल ने दर्शाया कि विद्युत चुम्बकीय तरंग में विद्युतीय और चुम्बकीय क्षेत्र एक दूसरे के लंबवत् व संचरण की दिशा में होते हैं। सभी प्रकार की विद्युतचुम्बकीय ऊर्जा तरंगें होती हैं और तरंगों के समान इनमें आवृत्ति होती है। आवृत्ति किसी निश्चित समय में किसी निश्चित बिन्दु से तरंगों के गुज़रने की संख्या होती है।

दिलचस्प बात ये है कि विद्युत चुम्बकीय तरंगें दूसरी तरंगों से भिन्न होती हैं। विद्युत चुम्बकीय तरंगों का प्रवाह हर दिशा में हो सकता है जबकि ध्वनि तरंगें हवा में अनुदैर्घ्य तरंगों के रुप में घने और हल्के होते हुए चलती हैं। वहीं पानी की तरंगें अनुप्रस्थ तरीके से चलती हैं।

मैक्सवेल की इस महत्वपूर्ण खोज ने विद्युत और चुम्बकत्व को एक साथ देखा। फिर एक जर्मन वैज्ञानिक हेनरिक रुडॉल्फ हर्ट्ज (Heinrich Rudolf Hertz) जिन्होंने पहली बार मैक्सवेल के सिद्धान्त को अपने प्रयोगों द्वारा प्रमाणित किया। उन्होंने दिखाया कि विद्युत चुम्बकीय विकिरण पैदा भी किये जा सकते हैं और प्राप्त भी किये जा सकता है। जो आज रेडियो तरंग कहलाते है। और जिसे पहले हर्टज़ियन वेव्स (Hertzian waves) या ऐथेरिक वेव्स (Etheric waves) भी कहा जाता था।

हर्ट्ज़ ने यह भी दिखाया कि विद्युत चुम्बकीय तरंगें प्रकाशीय तरंगों की भांति परावर्तित और अपवर्तित होती हैं। लेकिन हर्ट्ज द्वारा प्राप्त सबसे छोटी तरंगदैर्घ्य 66 सेंटीमीटर की था। इन तरंगों के प्रकाशीय गुणों जैसे परावर्तन, अपर्वतन और ध्रुवण को मापने के लिए हर्ट्ज को बहुत बड़े उपकरणों का प्रयोग करना पड़ता था। लेकिन जर्मनी में हेनरिक हर्ट्ज के प्रदर्शन के सात साल बाद ही एक अनोखा कार्य हुआ हमारे देश में हुआ। 

आचार्य जे.सी. बोस वो प्रथम व्यक्ति थे जिन्होंने एक ऐसे यंत्र का निर्माण किया जो सूक्ष्म तरंगे पैदा कर सकती थीं और जो 25 मिलिमीटर से 5 मिलिमीटर तक की थीं और इसीलिए उनका यंत्र इतना छोटा था कि उसे एक छोटे बक्से में कहीं भी ले जाया जा सकता था। और यही थी सबसे चौंकाने वाली बात क्योंकि उस समय मार्कनी, आलिवर लॉज और अन्य वैज्ञानिक सैकड़ों मीटर की तरंगदैर्घ्य वाली विद्युतचुम्बकीय तरंगों द्वारा संकेत संचारण पर शोध कार्य कर रहे थे। आचार्य जे.सी. बोस ने दुनिया को उस समय एक बिल्कुल नए तरह की रेडियो तरंग दिखाई जो कि 1 सेंटीमीटर से 5 मिलिमीटर की थी जिसे आज माइक्रोवेव्स या सूक्ष्म तरंग कहा जाता है।
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हम जानते हैं कि हमारी आंखें केवल लाल से नारंगी रंग तक के तरंगदैर्घ्य को ही देख पाती हैं। लाल से परे स्पेक्ट्रम में रेडियो तरंगें होती हैं और सूक्ष्म तरंगें भी। बड़ी तरंगदैर्घ्य वाली रेडियो तरंगें पृथ्वी के ऊपर आयनमंडल से टकराकर वापस आती है और यही कारण है कि पृथ्वी के एक कोने से दुसरे कोने तक तरंगों का पहुंचना सम्भव हो पाता है, और जिससे दुनिया भर में रेडियो प्रसारण संभव हो सका। और आचार्य जे.सी. बोस ने 1 सेंटीमीटर से 5 मिलिमीटर तक की सूक्ष्म तरंगें पैदा की और जो उन्नसवीं शताब्दी के आखिरी कुछ सालों में उनकी कलकत्ता स्थित प्रयोगशाला में हासिल की गई। खास तौर पर आचार्य जे.सी. बोस ने यह दिखाया कि लघु विद्युत चुम्बकीय तरंगें एक प्रकाश पुंज की तरह परावर्तित और अपवर्तित होती है। उन्होंने विद्युत चुम्बकीय तरंगों को ध्रुवित भी कर दिखाया। आचार्य जे.सी. बोस के मिलिमीटर तरंगों पर ऐसे अग्रणी कार्यों ने भारत में प्रयोगात्मक विज्ञान की आधारशिला रखी।

उस समय एक बड़ी समस्या विद्युत चुम्बकीय तरंगों को प्राप्त करने की थी। अभी ये निश्चित होना बाकी था कि तरंगों को प्राप्त करने का सबसे अच्छा हो सकता है। जिस तरह हमारी आखें प्रकाश को देखने के लिए संसूचक या डिटेक्टर का काम करती हैं उसी तरह विद्युत चुम्बकीय विकिरण को प्राप्त करने के लिए भी एक संसूचक की ज़रुरत होती है। आचार्य जे.सी. बोस के सामने यह एक समस्या थी। प्रसारित संकेत को प्राप्त करना सन् 1900 में एक समस्या थी। उस समय डायोड तो था नहीं जिससे संकेतों को ग्रहण किया जा सके। तो फिर इसका समाधान एक अभिग्राही या संसक्तक यानी कोहेरर के रुप में मिला जो संकेतों का अभिग्रहण, एन्टिना से कर सकता था।

अभिग्राही एक ऐसा यंत्र है जिसकी सहायता से एन्टिना द्वारा रेडियो तरंगों को प्राप्त किया गया। कोहेरर का काम था कि वो एसी रेडियो फ्रिक्वेन्सी सिग्नल को डीसी में इस तरह बदल दे कि जिससे एक मोर्स प्रिंटर और इयरफोन काम करने लगे। अभिग्राही के संचालन का मूल आधार था धातु के कणों का आपस में एकत्र होना। जब रेडियो आवृत्ति उन कणों पर डाली जाती है तब विद्युतधारा का प्रवाह आसान हो जाता है।

समस्या ये थी कि अभिग्राही में धारा प्रवाह रेडियाई संकेतों के हटने के बाद भी बनी रहती थी। जबकि अभिग्राही को संकेत हटते ही अगले संकेत प्राप्त करने के लिए तैयार हो जाना चाहिये था। लगातार संकेत प्राप्त होते रहें इसलिए अभिग्राही को थोड़ा झटका देना पड़ता था। इस समस्या को सुलझाने के लिए 1890 के दौरान् फ्रांसिसि भौतिकविद् एडुआर्ड ब्रैन्ली (Edouard branly) ने अभिग्राही का आविष्कार किया था। ब्रैन्ली के बाद सर ऑलिवर लॉज ने अभिग्राही का एक उन्नत रुप बनाया। लेकिन आचार्य जे.सी. बोस की नज़रों में इसमें भी, और बेहतर की गुज़ांईश थी।

अच्छे संचार के लिए एक अच्छे संसूचक की ज़रुरत होती है। इसलिए आचार्य जे.सी. बोस ने धातु के कतरनों वाले संसूचक की जगह एक कहीं बेहतर स्पाइरल स्प्रिंग कोहेरर बनाया। इस यंत्र में छोटे-छोटे स्प्रिंग एक दूसरे के साथ परस्पर दबाव से ऐसे जुड़े हैं कि जब विद्युत चुम्बकीय विकिरण इसकी संवेदनशील सतह पर पड़ती हैं। तो इस कोहरर की प्रतिरोधक शक्ति अचानक कम हो जाती है और धारा प्रवाह को धारामापी यानी गैल्वेनोमीटर में देखा जा सकता है। स्प्रिंग पर हल्के दबाव से ही संसूचक की दक्षता बढ़ाई जा सकती है। यही कारण था कि ये संसूचक ब्रैन्ली के संसूचक से बेहतर माना गया।

फिर आया एक इससे भी उन्नत कोहेरर। आचार्य जे.सी. बोस ने सोचा तो क्यों ना गैलेना का प्रयोग किया जाय। गैलेना जो लेड सल्फाइड के क्रिस्टल्स होते हैं इसके लिए बिल्कुल उचित साबित हुए। आचार्य जे.सी. बोस ने फिर एक जोड़े गैलेना से एक संवेदनशील ‘गैलेना प्वायंट कॉन्टैक्ट’ संसूचक बनाया जिसे रेडियो तरंगों का पहला अर्धचालक अभिग्राही माना जाता है। गैलेना का प्रयोग विद्युतचुम्बकीय तरंगों को विद्युतीय स्पन्दों में बदलने के लिए किया गया। विद्युतीय स्पन्दों को एक एयरफोन द्वारा पुर्नउत्पादित कर सुने जा सकते थे। फिर भी आचार्य जे.सी. बोस ने अभिग्राही पर अपना शोधकार्य जारी रखा और अन्ततः एक ऐसा अभिग्राही प्राप्त करने में सफल भी हो गए जिसे बार-बार झटके नहीं देने पड़ते थे। 

इस उत्कृष्ट वैज्ञानिक यंत्र में धातु की एक छोटी प्याली में पारा भरा होता है जो तेल की पतली परत से ढकी होती है। जिसे आयरन मर्करी आयरन कोहेरर कहा गया। इस उपकरण के ऊपर लोहे की एक छोटी डिस्क लटकी हुई थी, जिसे एक पेंच की मदद से ऊपर नीचे किया जा सकता था और जो तेल की पतली परत से ढके हुए पारे को बस छू पाती थी। संसूचन की क्रिया तब होती थी जब रेडियो फ्रिक्वेन्सी सिग्नल, तेल की उस पतली परत को बस इतना ही भेद पाती थी कि धारा प्रवाह स्थापित हो सके।

ऐसे कोहेरर जिनको झटके नही देने पड़ते थे उन्हें स्वस्थापन कोहेरर कहा गया। और यही वह समस्या थी जिसको आचार्य जे.सी. बोस ने दुनिया के लिए हल किया। ये खास कोहेरर उन दिनों के प्रयोग होने वाले दूसरे अभिग्राहियों से कहीं बेहतर था। और यही वह ऑटो कोहेरर था जिसे एक एक टेलिफोन से जोड़कर एक ऐसा विश्‍वसनीय मज़बूत कोहेरर बना लिया गया। जिसे मार्कनी ने अपने महासागर पार बेतार संचार में प्रयोग किया।
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ऐसा नहीं था कि इतना कुछ कर लेने के बाद बोस चुपचाप बैठ गये। उन्होंने सोचा कि यह संकेत अब और ज़्यादा दूर तक क्यों नहीं पहुंच सकता, जैसे प्रेसिडेन्सी कॉलेज से उनके घर तक, जो कि एक मील दूर था। लेकिन इससे पहले कि वो ऐसा करते उन्हें ब्रिटिश एसोसिएशन के आमंत्रण पर इंग्लैेण्ड जाना पड़ा जहां उन्हें लिवरपूल सेशन में शामिल होना था।

लिवरपूल में प्राप्त ख्याति से आचार्य जे.सी. बोस को फिर रॉयल संस्थान में फ्रायडे इवनिंग लेक्चर के आमंत्रण मिले। इन्हीं व्याख्यानों के दौरान जब जे.सी. बोस ने अपने उपकरणों का खुला प्रदर्शन किया, तो कई बुद्धिजीवी हैरान रह गए। क्योंकि उन्होंने अपने आविष्कारों से व्यापार करने में कोई रुचि नहीं दिखाई।

बोस के एक अमेरीकी दोस्त साराबुल जिन्हें मिसेज़ ओले बुल (Mrs. Ole Bull) के नाम से भी जाना जाता था उन्होंने बोस को समझाया-बुझाया तब वो अपने अभिग्राही गैलेना रिसीवर के पेटेंट के लिये तैयार हो गये। अर्जी दाखिल की गयी 30 सितम्बर 1901 में और पेटेंट मिला 29 मार्च 1904 में। लेकिन बोस ने अपने अधिकारों को मानने से इन्कार किया और पेटेंट की अवधि समाप्त होने दी। आचार्य जे.सी. बोस द्वारा आविष्कारित सूक्ष्म तरंगों की तकनीक अगामी दशकों में भारत के विभिन्न क्षेत्रों में सफ़लतापूर्वक प्रयोग की गई। 

लेकिन तब से अब तक, समय बहुत गुज़र चुका है । रेडियो विज्ञान की इस परंपरा को आगे बढ़ाते हुए एक और मेधावी वैज्ञानिक एस के. मित्रा ने कलकत्ता विश्‍वविद्यालय के भौतिकी विभाग में शोध कार्य प्रारम्भ किया। प्रो. एस के. मित्रा और उनके सहयोगियों ने भारत के ऊपर एक आयनित परत का प्रायोगिक पता सन् 1930 में लगाया और यह प्रयोग कलकत्ता स्थित भारतीय राज्य प्रसारक सेवा के उपकरणों और 50 किलोमीटर दूर स्थित हरिन्घाटा के अभिग्राही यंत्रों के मदद से सम्भव हो पाया।

आचार्य जे.सी. बोस का सूक्ष्म तरंगों पर अग्रणी शोध कार्य लगभग 50 सालों तक आगे नहीं बढ़ पाया। फिर 1940 के दशक में प्रो. एस. के. चर्टजी और उनके सहयोगयों ने भारतीय विज्ञान संस्थान बेंगलुरू में सूक्ष्म तरंगों पर एक नई नज़र डाली। लेकिन सच्चाई यह है कि इन सभी के मार्गदर्शक आचार्य जे.सी. बोस ही थे। जिन्होंने ना केवल दुनिया के लिए एक नई राह रौशन की बल्कि भारत वासियों के लिए गर्व और सम्मान का एक अनोखा उदाहरण भी पेश किया।

जीव विज्ञान के क्षेत्र में जे.सी. बोस का योगदान:
कलकत्ता के प्रेसिडेन्सी कॉलेज में भौतिक विज्ञान पढ़ते हुए जगदीश चन्द्र बोस ने एक वैज्ञानिक बनने का निर्णय लिया। जैविकी से लगाव होते हुए भी जगदीश चन्द्र बोस की रुचि भौतिक विज्ञान में बढ़ने लगी और इसका मुख्य कारण था सेंट जेवियर्स कॉलेज में फादर लैफों के भौतिक विज्ञान के मज़ेदार व्याख्यान। लेकिन दिल ही दिल में जैव विज्ञान के अध्ययन की लालसा भी थी। इसीलिए जब फैसले का समय आया तो इंग्लैण्ड जाते वक्त डॉक्टरी पढ़ने की ही सोची। लंदन में एक ही साल गुज़रा था कि उन्हें बार-बार बुखार आने लगा। अपने प्रोफेसर की सलाह पर उन्होने डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ केंब्रिज में दाखिला लिया और विज्ञान पढ़ने लगे। अन्ततः उन्होंने भौतिकी को अपने शोध का केन्द्र बिन्दु बनाया क्योंकि बोस लॉर्ड रैले से बहुत प्रभावित थे। भौतिक विज्ञान में शोध करते हुए आचार्य जगदीष चन्द्र बोस देखा कि अक्रिय पदार्थों और सजीवों के व्यवहारों मे कोई न कोई रिश्‍ता ज़रूर है।

इस प्रकार 19वीं शताब्दी का अन्त होते-होते जगदीश चन्द्र बोस की शोध रुचि विद्युत चुम्बकीय तरंगों से हट कर जीवन के भौतिक पहलूओं की ओर होने लगी, जिसे आज जीव भौतिकी कहते हैं। असल में जीव विज्ञान में उनकी रुचि बचपन से ही थी। इसी कारण बाद में उनका झुकाव जीव भौतिकी की ओर हुआ। अगले तीस सालों में जगदीश चन्द्र बोस ने पादपीय कोशिकाओं पर विद्युतीय संकेतों के प्रभाव का अध्ययन किया। उनके प्रयोग इस तथ्य की ओर इशारा कर रहे थे कि सम्भवत: सभी पादपीय कोशिकाओं मे उत्तेजित होने की क्षमता होती है। ठंडक, गर्मी, काटे जाने, स्पर्ष और विद्युतीय उद्दीपन के साथ-साथ बाहरी नमी के कारण भी पौधों में क्रिया स्थितिज उत्पन्न हो सकती हैं।

असल में इस चिन्तन का आधार था उनके द्वारा अभिग्राही पर शोध कार्य। उन्होंने देखा कि अभिग्राही की दक्षता में कमी तब आती है जब वो बार-बार संकेत प्राप्त करते करते, उनके अनुसार वे थक जाते थे। और जीवों में भी ठीक ऐसा ही होता है। उन्होंने ऐसे संवेदनशील यंत्र बनाए जो पादपों के अति सूक्ष्म जैविक क्रियायों को भी रिकॉर्ड कर सकते थे चाहे वो क्रियाएं भौतिक, रासायनिक, यांत्रिक या विद्युतीय हों।

आचार्य जगदीश चन्द्र बोस द्वारा पादपों की जैविक क्रियाओं पर विद्युत चुम्बकीय तरंगों के प्रभाव पर शोध कार्य आरंभ किया। 1901 से जगदीष चन्द्र बोस ने पौधों पर विद्युतीय संकेतों के प्रभाव का अध्ययन किया और इस कार्य के लिए जिन पौधों का उन्होंने चयन किया वे थे छुई-मुई और डेस्मोंडियम गाइरेंस यानी शालपर्णी।

आचार्य जगदीश चन्द्र बोस को विश्‍वास था कि सजीवों और निर्जीवों के इस मिलन में विद्युत चुम्बकीय तरंगों का एक विशेष स्थान है। जगदीश चन्द्र बोस ने कुछ ऐसे पौधों का चयन किया जो उद्दीपन से पर्याप्त रूपेण उत्तेजित हो सकते थे। छुई-मुई को लाजवन्ती भी कहते हैं, अगर उनकी पत्तियों को छुएं तो वो एक दूसरे पर झुकने लगतीं हैं। और इस प्रतिक्रिया को तकनीकी भाषा में स्पर्शानुवर्तन कहते हैं। जिसने जगदीश चन्द्र बोस को एक गहरी सोच में डाल दिया। और वो इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि ऐसी प्रतिक्रिया क्रिया-विभव के कारण होती है। इस उपकरण पर काम करते हुए जिसे संस्पन्दन रिकार्डर कहा जाता है जगदीश चन्द्र बोस इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि की ये पत्तियां जब मुड़ती हैं तो इसका विद्युतीय प्रभाव तनों तक भी पहुंचता है और जब यह विद्युतीय संकेत ऊपर और नीचे की दिशाओं में चलते हैं तो दूसरी पत्तियां भी मुड़ने लगती है और यह देखिये विद्युतीय प्रभाव किस तरह एक धातु की बनी एक पतली कलम नुमा चीज़ से रिर्काड की जा सकती है।

आज वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया है कि क्रिया स्थितिज 20 से 30 मिलिमीटर प्रति सेकेन्ड की रफ्तार से चलती है। एक दुसरा अद्भुत पौधा शालपर्णी यानि इंडियन टेलीग्राफ प्लांट (Indian telegraph plant) यह पौधा अपनी पत्तियों में एक अद्भूत घुमाव पैदा करता है। ध्यान से देखने पर इनकी छोटी पत्तियों को हम नाचते हुए पाते हैं। जैसे छुईमुई के पौधे पर प्रयोग किया, वैसे ही आचार्य जगदीश चन्द्र बोस ने यह निश्चित किया कि विद्युतीय दोलन और स्वतः गति का मेल हम इंडियन टेलिग्राफ या डिसमोडियम गायरेन्स में देख सकते हैं। जिसकी वजह से इसकी निचली छोटी पत्तियां ऊपर से नीचे घुमती हैं। आचार्य जगदीश चन्द्र बोस ने डिसमोडियम गायरेन्स के विद्युतीय स्पंदन को जीवों के हद्य गति से तुलना करने के लिए संस्पन्दन रिकार्डर का प्रयोग किया।
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जगदीश चन्द्र बोस ने आगे बताया कि पौधों में उद्दीपन का प्रभाव, टर्गर पेशर यानी स्फीती दबाव और कोषिकाओं के फैलाव से जुड़ा हुआ है। पौधों में स्वतः गति के अध्ययन के अलावा आचार्य जगदीश चन्द्र बोस और भी आष्चर्यचकित हुए जब उन्होंने पाया कि पौधों में धीमी गति से हो रहे विकास को भी रिकॉर्ड किया जा सकता है।

औसतन एक सेकेन्ड में पौधे का एक इचं का एक सौ हज़ारवां हिस्सा बढ़ता है। तो इसे नापा कैसे जाय? यह वृद्धि दर बहुत ही कम है। आचार्य जगदीश चन्द्र बोस ने खुद ही एक अत्यन्त संवेदी यंत्र बनाया, जो कि इस धीमी गति से हो रही वृद्धि को नाप सकता था और उन्होंने उसे क्रेस्कोग्राफ (Crescograph) कहा। बोस द्वारा बनाए गए आरोहमापी यानी क्रेस्कोग्राफ का प्रतिरुप कोलकाता स्थित बोस इंस्टिट्यूट (Bose Institute Kolkata) में देखा जा सकता है। यहां वह विभिन्न प्रयोगों के लिए पौधे को लगाते थे। यह उपकरण पौधे के वृद्धि को स्वतः दस हज़ार गुना बढ़ाकर रिकॉर्ड करने की क्षमता रखता था। पौधे सीधी रेखा में नहीं बढ़ते। ये टेढ़े मेढ़े बढ़ते हैं। इसलिए इस काले कांच के टुकड़े पर बनी बिन्दुओं की लाइन सीधी नहीं बल्कि टेढ़ी है।

घर्षण को कम करने के लिए आचार्य जगदीश चन्द्र बोस ने कांच के टुकड़े को इस तरह लगाए थे कि वो आगे पीछे और दॉंए-बॉए चल सके। उस उपकरण का प्रयोग पौधों पर तापमान, और प्रकाष के प्रभाव के अध्ययन के लिए भी हुआ। उन्होंने पौधे की वृद्धि में ज़हर और विद्युतीय प्रवाह का भी असर देखा। इस उपकरण का प्रदर्शन पूरी दुनिया में आचार्य जगदीश चन्द्र बोस ने सन् 1914 से शुरु किया।

ऐसे प्रयोग जगदीश चन्द्र बोस ने कैम्ब्रिज और ऑक्सफोर्ड मे जब दिखाए तो वहां के वैज्ञानिक अचम्भित रह गए। क्योंकि दुनिया में कहीं भी किसी ने इससे पहले जीव विज्ञान में ऐसा कार्य नही किया था। इस प्रसंग में एक दिलचस्प बात हुई, जब जगदीश चन्द्र बोस ने यह दर्शाना चाहा कि पौधों में हमारी तरह दर्द का एहसास होता है, उन्हें भी तकलीफ होती है, अगर उन्हे काटा जाए और अगर उनमें जहर डाल दिया जाए तो वह मर भी सकते है। 

बहुत सारे वैज्ञानिक और जाने माने जन समूह के समक्ष जब जगदीश चन्द्र बोस ने एक पौधे मे ज़हर का एक इंजेक्‍शन लगाया और कहा कि अभी आप सभी देखेंगे कि इस पौधे की मृत्यु कैसे होती है। जगदीश चन्द्र बोस ने प्रयोग शुरू किया, जहर का इंजेक्‍शन भी लगाया लेकिन पौधे पर कोई असर नही हुआ। वह परेशान जरूर हुए लेकिन अपना संयम बरतते हुये ये कहा की अगर इस ज़हरीले इंजेक्शन का एक सजीव अर्थात इस पौधे पर कोई असर नही हुआ तो दूसरे जानदार यानि मुझपर भी कोई बुरा प्रभाव नही पड़ेगा। जैसे ही जगदीश चन्द्र बोस खुद को इंजेक्शन लगाने चले तो अचानक दर्शकों में से एक आदमी खड़ा हुआ और उसने कहा ‘मैं अपनी हार मानता हूं मिस्टर जगदीश चन्द्र बोस, मैंने ही जहर की जगह एक मिलते जुलते रंग का पानी डाल दिया था। जगदीश चन्द्र बोस ने फिर से प्रयोग शुरू किया और पौधा सभी के सामने मुरझाने लगा।

पौधों में जे. सी. बोस द्वारा रिकॉर्ड किये गए पौधों में वृद्धि की अभिरचना आज आधुनिक विज्ञान के तरिकों से भी सिद्ध हो गई है। पौधों के वृद्धि और अन्य जैविक क्रियाओं पर समय के प्रभाव का अध्ययन जिसकी बुनियाद जे. सी. बोस ने डाली थी, आज क्रोनोबायोलॉजी कही जाती है।

क्रोनोबायोलॉजी का विज्ञान जीवों पर विभिन्न प्रकार के जैविक प्रक्रियाओं के लयात्मक सामंजस्य का ऐसा अध्ययन करती है जो जीव विज्ञान को अभियांत्रिकी, स्वास्थ्य और कृषि से भी जोड़ती है। ऐसी उत्कृष्ट वैज्ञानिक खोज और अध्ययन के लिए जे. सी. बोस को 1920 में रॉयल सोसायटी का सदस्य चुना गया।

एक दूसरा अध्ययन क्षेत्र जिसने आचार्य जे.सी. बोस को आर्कषित किया, वह था पौधों में जड़ों से तने और पत्ते और फुन्गियों तक पानी का ऊपर चढ़ना। दरअसल पौधे जो पानी सोखते हैं उसमें केवल पानी नहीं बल्कि अनेक प्रकार के कार्बन तथा अकार्बनिक अवयव भी होते हैं। और यह रस का चढ़ाव कहलाता है। और यही कारण है कि इस प्रकिया को पानी का चढ़ाव अर्थात ना कहकर रस का चढ़ाव या रसारोहण कहते हैं। जाइलम पौधों के एसे ऊत्तक हैं जिनसे तरल का बहाव सम्भव है और यही कारक है तरल का चढाव का। रसारोहण का कारण होता है तरल के बहाव में सिकुड़न और फैलाव। इस नाव रुपी छलावरण को हम माइक्रोस्कोप के ज़रिये पत्तियों के नीचे छोटे छिद्र के समान देख सकते हैं। जिन्हें स्टोमेटा कहते हैं।

ये अत्यन्त सूक्ष्म खिड़कियां होती हैं जो पौधों के अन्दर क्रियाओं के हिसाब से खुलती-बन्द होती रहती हैं। असल में पौधों में खाना बनाने यानी प्रकाश संश्‍लेषण क्रिया के लिये इन्हीं रंद्रछिद्रों या स्टोमेटा से ऑक्सीजन और कार्बन डाईऑक्साइड का आदान प्रदान होता है। और यही छिद्र जड़ से फुन्गी तक पानी और मिनरल के बहाव को बनाए रखता है। स्टोमेटा की इसी क्रिया से पौधों द्वारा पानी को नली के अन्दर खींचा जाता है। इस क्रिया में केशिका बल एक अहम भुमिका निभाती है। आचार्य जे. सी. बोस का ये मानना कि पौधों में जैविक लक्ष्ण अपने विषिष्ट प्रज्ञावान रुप में अभिव्यक्त होते हैं जो कि आज स्वीकृति के पथ पर अग्रसर हैं।

विडम्बना ये है कि वर्तमान में हो रहे विकास को जे.सी. बोस ने सौ साल से कहीं पहले देख लिया था जबकि उनके जीवनकाल में बुद्धिजीवियों द्वारा इस तथ्य का स्वीकार करना कठिन हो रहा था।

1915 में प्रेसिडेन्सी कॉलेज से सेवानिवृत्ति के पष्चात जगदीश चन्द्र बोस को अपना शोध कार्य जारी रखने की अनुमति भी मिली। धीरे-धीरे अपनी प्रयोगशाला को अपने घर पर स्थानान्तरित कर दिया जो कि विज्ञान महाविद्यालय के बगल में था। दो ही साल बाद यानि 1917 में अपने घर के उत्तर दिशा में वो एक शोधशाला स्थापित करने में सफल हुए। यह शोध केन्द्र था उत्तरी कलकत्ता में जिसे अब आचार्य प्रफुल्ल चन्द्र रोड कहा जाता है। बोस इंस्टिट्युट की स्थापना 30 नवम्बर 1917 में हुई। आचार्य जगदीश चन्द्र बोस अपने जीवन की अन्तिम घड़ी तक इस संस्था के निदेशक रहे। उनका देहान्त 1937 में हुआ।

आचार्य जे. सी. बोस की तरह बोस इंस्ट्यिूट भी विभिन्न क्षेत्रों में वैज्ञानिक शोध कार्यों में संलग्न है। बोस इंस्ट्यिूट में आज जो कुछ भी हो रहा है उसकी कल्पना आचार्य जे. सी. बोस के अथक प्रयासों के बिना नहीं की जा सकती। उन्होंने ना केवल देशवासियों के लिए एक नई राह रौशन की बल्कि आगे वाली पीढ़ी के मन में विज्ञान की ललक जगाई।
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लेखक परिचय: 
नवनीत कुमार गुप्ता पिछले दस वर्षों से पत्र-पत्रिकाओं, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन आदि जनसंचार के विभिन्न माध्यमों द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पर्यावरण संरक्षण जागरूकता के लिए प्रयासरत हैं। आपकी विज्ञान संचार विषयक लगभग एक दर्जन पुस्तकें प्रकाश‍ित हो चुकी हैं तथा इन पर गृह मंत्रालय के ‘राजीव गांधी ज्ञान विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार' सहित अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। आप विज्ञान संचार के क्षेत्र में कार्यरत संस्था ‘विज्ञान प्रसार’ से संबंद्ध हैं। आपसे मेल आईडी ngupta@vigyanprasar.gov.in पर संपर्क किया जा सकता है।
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Scientific World: आचार्य जगदीश चन्द्र बोस और उनके महान आविष्‍कार।
आचार्य जगदीश चन्द्र बोस और उनके महान आविष्‍कार।
भारत के महान वैज्ञा‍निक आचार्य जगदीश चन्द्र बोस की जीवनी और उनके आविष्‍कारों का सम्‍पूर्ण विवरण।
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Scientific World
http://www.scientificworld.in/2014/11/jc-bose-biography-in-hindi.html
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