विज्ञान कथा: एक नई शुरुआत | लेखक: जाकिर अली ‘रजनीश’
प्रोफेसर रामिश और उनके सहायक माधवन के जीवन के वे अदभुत क्षण थे। उनके जीवन में आज वह होने वाला था, जो अदभुत ही नहीं असम्भव भी था। मानवता के इतिहास में आज पहली बार मानव प्रक्षेपण यंत्र का परीक्षण सम्पन्न होने जा रहा था।
दो अति शक्तिशाली कम्प्यूटरों और द्रव्य विष्लेशण यंत्रों द्वारा निर्मित वह मानव प्रक्षेपण यंत्र दो टुकड़ों में विभक्त था। यंत्र का एक भाग प्रोफेसर की प्रयोगशाला में तथा दूसरा भाग वहां से 500 मीटर दूर स्थित माधवन के घर में स्थापित किया गया था। प्रोफेसर रामिश ने कम्प्यूटर पर अन्तिम कमाण्ड देने के बाद गर्व से स्क्रीन की ओर देखा। उनका चेहरा एक विशेष प्रकार की आभा से दमक रहा था।
दूसरे छोर पर बैठा हुआ माधवन दम साधे कम्प्यूटर स्क्रीन पर आंखें गड़ाए हुए था। प्रोफेसर का शरीर अपने मूल तत्वों में विभक्त होना प्रारम्भ हो गया था। बस अब कुछ ही क्षणों की बात थी। लेकिन इस समय माधवन को एक-एक क्षण एक साल के बराबर लग रहा था। और इसी अंतराल के बीच सहसा उसके दिमाग में वह घटना कौंध गयी, जब वह प्रोफेसर रामिश से पहली बार मिला था।
वह ऐसा ही एक गर्म दिन था। जब वह प्रोफेसर रामिश के जिगरी दोस्त आनन्द मेहता का सिफारिशी पत्र लेकर पहली बार उनकी लैब में पहुंचा, उस समय वे अपने कम्प्यूटर पर झुके हुए थे। माधवन का परिचय जानने के बाद प्रोफेसर रामिश ने सहर्श उसे अपने साथ काम करने की अनुमति प्रदान कर दी। माधवन ने एक नजर प्रोफेसर के कम्प्यूटर पर डाली,, पर जब उसे कुछ समझ में नहीं आया, तो उसने पूछ ही लिया, ‘‘सर, आनन्द सर ने बताया था कि आप किसी विशेष प्रोजेक्ट पर काम कर रहे हैं?’’
प्रो0 रामिश ने माधवन के चेहरे की ओर देखा। जैसे वे यकीन कर लेना चाहते हों कि माधवन से अपने प्रोजेक्ट की बातें षेयर की जा सकती हैं अथवा नहीं। हालॉंकि माधवन के साथ आनन्द की संस्तुति थी, लेकिन फिर भी उन्होंने माधवन की आंखों में झांक कर उसे परख लेना उचित समझा।
उन्होंने एक लम्बी सांस ली और फिर अपने ड्रीम प्रोजेक्ट ‘मानव प्रक्षेपण यंत्र’ के बारे में माधवन को बताने लगे। प्रोफेसर की बातें सुनकर माधवन का मुंह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया। आखिर जब उससे रहा न गया, तो वह पूछ ही बैठा, ‘‘सर, क्या वास्तव में ऐसा सम्भव है?’’
प्रोफेसर रामिश ने माधवन की ओर ऐसा देखा, जैसे कोई 10 साल का बच्चा हो। वे बोले, ‘‘क्यों नहीं भेजा जा सकता?’’
कहते हुए प्रोफेसर रामिश एक क्षण के लिए रूके। पर माधवन की ओर से कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न होने पर वे रूके नहीं। उन्होंने अपनी बात आगे बढाई, ‘‘अरे भई, ये तो तुमने पांचवीं क्लास में ही पढ़ा होगा कि प्रत्येक वस्तु एक विशेष प्रकार के अणुओं से मिलकर बनती है। अणु, परमाणुओं से मिल कर बनते हैं। और किसी भी परमाणु को आकार मिलता है उसके अपने भीतर मौजूद इलेक्ट्रान, प्रोटान, न्यूट्रान के कारण।’’
‘‘हां, ये तो बहुत सामान्य सी बात है।’’ माधवन ने उनकी बात का समर्थन किया।
‘‘यदि हमें किसी वस्तु की संरचना को समझना हो तो हम क्या करेंगे। हम उस वस्तु के अणुओं, परमाणुओं का अध्ययन करेंगे।’’ प्रोफेसर ने बातों का सिलसिला आगे बढ़ाया, ‘‘यह ठीक वैसा ही है जैसे किसी मशीन के अंदर के कल पुर्जों की बनावट और उनके कार्य करने की विधि।’’
माधवन मूर्तिवत प्रोफेसर रामिश की बात सुन रहा था। प्रोफेसर का वक्तव्य जारी था, ‘‘यह तो रही बनावट की बात। अब आती है किसी वस्तु को तरंगों के माध्यम से कहीं भेजने की बात। ...तुम्हें तो मालूम ही है कि ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती है। हां, उसका स्वरूप परिवर्तित किया जा सकता है। जैसे विद्युत ऊर्जा को यांत्रिक ऊर्जा में, आणविक ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में। अब हम आणविक ऊर्जा को उदाहरण के रूप में लेते हैं। यह ऊर्जा यूरेनियम, थोरियम आदि तत्वों को तोड़ कर प्राप्त की जाती है। इस काम के लिए परमाणु रिएक्टर काम में लाए जाते हैं। इससे हम यह आसानी से समझ सकते हैं कि किसी भी वस्तु को उसके मूल तत्वों में तोड़ा जा सकता है। और अगर किसी वस्तु को उसके मूल तत्वों में विभक्त किया जा सकता है, तो उन मूल तत्वों को आपस में जोड़ कर उस तत्व को दुबारा भी मूल रूप में प्राप्त किया जा सकता है।’’
‘‘हां, यह तो है।’’ माधवन ने उनकी बात का समर्थन किया।
प्रोफेसर रामिश ने अपनी बात आगे बढ़ाई, ‘‘और तुम्हें यह भी मालूम है कि हमारा शरीर भी विभिन्न प्रकार के तत्वों से मिल कर बना है। हालांकि किसी वस्तु और जीवित प्राणी की संरचना में काफी अंतर होता है, लेकिन जो बातें किसी वस्तु के बारे में लागू होती हैं, वही बातें जीवित प्राणियों के बारे में भी लागू होती हैं। अर्थात हम यह कह सकते हैं कि जिस प्रकार किसी वस्तु को उसके मूल तत्वों में विभक्त और वापस उन तत्वों को जोड़कर उसके मूल रूप में पाया जा सकता है, उसी प्रकार जीवित प्राणी के साथ भी यह प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। लेकिन यह दूसरी प्रक्रिया पहली के मुकाबले काफी जटिल और श्रमसाध्य होगी।’’ कहते हुए प्रोफेसर रामिश ने एक लम्बी सी सांस ली।
प्रोफेसर की बात सुनकर माधवन सम्मोहन की अवस्था में आ गया। एक क्षण के लिए वह कुछ सोच ही न पाया कि प्रोफेसर के इस लेक्चर को सुनने के बाद वह प्रसन्नता व्यक्त करे अथवा शंकाएं। लेकिन अगले ही क्षण उसके दिमाग में एक सवाल कौंधा। और वह बोले बिना रह न सका, ‘‘सर, माना कि ये सारी प्रक्रिया सम्भव है, पर इससे यह कैसे सिद्ध होता है कि हम किसी भी व्यक्ति को बिना किसी साधन के दूसरी जगह भेज सकते हैं?’’
माधवन की बात सुनकर प्रोफेसर के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान दौड़ गयी। वे बोले, ‘‘मैंने कब कहा कि बिना किसी साधन के हम किसी को एक स्थान से दूसरे स्थान पर भेज सकते हैं। मैं तो सिर्फ यह कह रहा हूं कि जिस प्रकार किसी फिल्म को एक खास प्रकार की तरंगों में परिवर्तित करके उसे एक स्थान अर्थात टीवी स्टेशन से प्रक्षेपित कर दूसरे स्थान यानी कि टीवी सेट पर प्राप्त कर लेते हैं। उसी प्रकार हम पहले किसी वस्तु अथवा व्यक्ति को पहले उसके मूल तत्वों में विभक्त करेंगे, फिर उन तत्वों को एक विशेष प्रकार की तरंगों में परिवर्तित कर एक स्थान से दूसरे स्थान तक भेजेंगे। जहां पर इन तरंगों को ग्रहण किया जाएगा, वहां तरंगों को वापस मूल तत्वों में परिवर्तित करके उसके मूल रूप में पुनः बदल लिया जाएगा।’’
और तभी अचानक माधवन की तन्द्रा भंग हो गयी। कारण था मानव प्रक्षेपण यंत्र से जुडे पॉवर सप्लाई बॉक्स से उठने वाला धुंआ। यह देखकर माधवन हक्का-बक्का रह गया। उसने मॉनीटर पर एक उड़ती सी नजर डाली। प्रोफेसर रामिश का शरीर तरंगों में परिवर्तित होकर प्रक्षेपण यंत्र के रिसीवर की ओर चल पड़ा था। लेकिन अचानक हुई यह दुर्घटना...।
माधवन का शरीर पसीने से नहा उठा। इससे पहले की वह कुछ करता, कमरे की पॉवर सप्लाई ऑफ हो गयी। माधवन के हाथ-पैर फूल गये। उसकी समझ में ही नहीं आ रहा था, कि वह क्या करे क्या नहीं। उस समय सिर्फ यंत्र की रडार प्रणाली और उससे जुड़ा कम्प्यूटर ही काम कर रहा था। प्रक्षेपण यंत्र का नियंत्रण कक्ष फेल हो जाने के कारण प्रोफेसर रामिश का तरंग रूप में परिवर्तित शरीर प्रक्षेपण यंत्र की रिसीविंग प्रणाली के नियंत्रण से बाहर जा चुका था। लेकिन सुकून की बात यह थी कि तरंगों में परिवर्तित प्रोफेसर के शरीर की स्थिति कम्प्यूटर पर प्रदर्शित हो रही थी।
मानव प्रक्षेपण यंत्र की दूसरी इकाई ठप्प हो जाने के कारण प्रो0 रामिश का तरंग स्वरूप अपनी गति खो बैठा और वह हवा के बहाव के साथ प्रयोगशाला के पीछे बहने वाले नाले की ओर उड़ चला।
नाले के किनारे बनी झुग्गियों के बाहर काफी चहल-पहल थी। वहां पर अभी-अभी शराब पी कर आए दो लोग आपस में गाली-गलौच कर रहे थे। पास में चेचक के दो मरीज लेटे हुए थे। उनसे थोड़ी दूरी पर बैठे बच्चे खाना खाने की जिद कर रहे थे। उनकी मॉं पास में जल रहे चूल्हें की गीली लकड़ियों से जूझते हुए अपने बच्चों को बुरी तरह से डांट रही थी।
उधर माधवन की दशा देखने वाली थी। उसका दिमाग काम नहीं कर रहा था। कभी वह फायर ब्रिगेड वालों को फोन कर रहा था, कभी बिजली के मिस्त्री को और कभी अपने आप से बातें करने लग जा रहा था। इन्हीं तमाम उपक्रमों में 15 मिनट का समय कब व्यतीत हो गया, उसे पता ही नहीं चला।
सहसा माधवन के दिमाग में एक विचार कौंधा। उसने प्रक्षेपण यंत्र के स्विच को पॉवर बॉक्स से निकाला और सीधे बिजली के स्विच से जोड़ दिया। देखते ही देखते कमरा रौशनी से भर गया। मानव प्रक्षेपण यंत्र फिर से सक्रिय हो उठा।
संयोग की बात यह थी कि प्रो0 रामिश का शरीर अभी भी नियंत्रण कक्ष की सीमा में था। मशीन की कार्यप्रणाली ऑन होते ही वे तरंगें रिसीवर की ओर घूम गयीं।
कुछ ही क्षणों में वे तरंगे प्रक्षेपण यंत्र द्वारा रिसीव कर ली गयीं और उसकी कार्यप्रणाली पुनः उन तरंगों को अपने मूल स्वरूप में परिवर्तित करने लगी। माधवन जल्दी से रिसीवर के चैम्बर के पास पहुंचा और उसमें लगे बटनों को दबाने लगा।
चंद क्षणों के अंतराल के बाद रिसीवर ने सारी प्रक्रियाएं सफलतापूर्वक सम्पन्न कर लेने का संकेत दिया। उसी क्षण रिसीवर के चैम्बर में हलचल हुई और प्रो0 रामिश बाहर आ गये। माधवन अपनी उत्तेजना को संभाल नहीं सका। वह लपक कर प्रो0 रामिश के पास पहुंचा और उन्हें अपनी बाहों में भींच लिया। लेकिन अगले ही क्षण प्रो0 रामिश का अचेत शरीर माधवन की बाहों में था। माधवन ने प्रोफेसर को बगल के कमरे में लिटा दिया और बिना कोई समय गंवाए डाक्टर को बुलाने के लिए फोन मिलाने लगा।
डाक्टर ने आते ही प्रो0 रामिश का चेकअप किया। उन्होंने प्रो0 रामिश के एक इंजेक्शन लगाया और फिर दिशा निर्देश देकर चले गये।
लगभग आधे घण्टे के बाद प्रो0 रामिश को होश आया। यह देखकर माधवन की जान में जान आई। वह बोला, ‘‘बधाई हो सर, आपका प्रयोग...।’’
प्रोफेसर रामिश के मस्तिष्क में काफी उथल पुथल मची हुई थी। एक ओर थी उनकी वर्षों की मेहनत, उनका महान आविष्का, जो उन्हें भारतवर्ष ही नहीं सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्धि दिलाने वाली थी। दूसरी ओर था उनका कुछ क्षणों का वह अनुभव, जिससे वे अभी थोड़ी देर पहले ही दो-चार हुए थे। नाले के सड़ांध मारते पानी के किनारे बजबजाती हुई मानवीयता ने उन्हें हिला कर रख दिया था। उन्हें अपना सम्पूर्ण व्यक्तिव ही खोखला नजर आने लगा था।
और ठीक उसी क्षण माधवन की बात उनके कानों तक पहुंची। उन्होंने रामिश की बात बीच में ही काट दी, ‘‘प्रयोग? कैसा प्रयोग? अभी तो मुझे अपना काम शुरू करना है। इस देश के लाखों नागरिकों को कुपोषण से बचाना है उनको जीवन की न्यूनतम सुविधाएं उपलब्ध करवानी हैं। ये बहुत बड़ा काम है और अभी तो इसकी शुरूआत होनी भी शेष है।’’ कहते हुए प्रो0 रामिश खड़े हुए और कमरे से बाहर निकल गये।
माधवन हैरान-परेशान उनके पीछे भागा। वह यह समझ भी कैसे सकता था कि इस दुर्घटना के दौरान प्रोफेसर रामिश पर क्या बीती थी और किन हालात में वे इतना बड़ा फैसला लेने में सक्षम हुए थे।
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