वियना संधि की 30वीं वर्षगांठ पर विशेष- ओजोन कवच संरक्षण में आप भी दे सकते हैं योगदान

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ओजोन परत परिचय, संरक्षण के उपाय और ऐतिहासिक वियना संधि।

धरती का रक्षा कवचः ओजोन आवरण

नवनीत कुमार गुप्ता

हमारी पृथ्वी विभिन्न घटकों के आपसी समन्वय से जीवन को पालन-पोषण कर रही है। पृथ्वी पर वायुमंडल की उपस्थिति बहुत महत्वपूर्ण है। विभिन्न गैसों के विभिन्न कार्य पृथ्वी पर जीवन के प्रवाह को बनाए रखने के लिए आवश्युक है। ओजोन भी ऐसी ही एक गैस है जो जीवन की गतिशीलता में आवश्यक भूमिका निभा रही है। ओजोन गैस पृथ्वी के वायुमंडल में लगभग 15 से 50 किलोमीटर के मध्य समताप मंडल में एक ऐसा आवरण बनाती है जिससे अंतरिक्ष से पृथ्वी सतह की ओर आने वाली हानिकारक पराबैंगनी विकिरण ऊपरी वायुमंडल में ही रूक जाती है। इस प्रकार ओजोन आवरण के कारण धरती के जीव-जंतु उन हानिकारक पराबैंगनी विकिरणों के कुप्रभाव से बचे रहते हैं।

समतापमंडल में पाया जाने वाला ओजोन आवरण (Ozone Layer) पृथ्वी का रक्षात्मक आवरण है। ओजोन आवरण हम मानव ही नहीं इस धरती के सभी जीव-जंतुओं को सूर्य की पराबैंगनी विकिरणों (ultraviolet radiations) से बचाता है। इसीलिए इसे जीवनरक्षक आवरण भी कहा गया है। वायुमंडल की यह अनोखी चादर सूर्य की हानिकारक विकिरणों जो जीवन को नुकसान पहुंचा सकती हैं, उन्हें पृथ्वी पर पहुंचने नहीं देती।

ओजोन क्या है
वायुमंडल में मुक्त ऑक्सीुजन का अणु सौर विकिरण की उपस्थिति में ऑक्सीजन के दो अकेले अणुओं में टूट जाता है। यह अकेला नया ऑक्सीकजन अणु, आक्सीजन (O2) अणु के साथ जुड़कर ओजोन (O3) का निर्माण करता है। इस प्रकार ओजोन के क्रमिक रूप से एकत्र होने के कारण लगभग 2 अरब वर्ष पूर्व वायुमण्डल के ऊपरी हिस्से में ओजोन आवरण का निर्माण हुआ है। जहां यह सूर्य के आने वाली हानिकारक पराबैंगनी विकिरणों को रोक लेता है।
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ओजोन परत का महत्व
पराबैंगनी विकिरण सूर्य वर्णक्रम का उच्च ऊर्जा वाला घटक होता है। इसकी तरंगरदैर्ध्य अन्य दृश्य प्रकाश की अपेक्षा कम होती है जिसे मानवीय आंखों से नहीं देखा जा सकता है। इन्हें पराबैंगनी कहा जाता है क्योंकि ये मानवीय आंखों से दिखाई देने वाली आवृत्ति से परे होती हैं। मानवीय आंखे वर्णक्रम के बैंगनी रंग तक के प्रकाश को देख सकती है। पराबैंगनी विकिरणें को तीन वर्गों में बांटा जा सकता है। पराबैंगनी विकिरण ए’, पराबैंगनी विकिरण बी’ और पराबैंगनी विकिरण सी’ जो इनकी तरंगदैध्र्य पर निर्भर करता है। इनका प्रत्येक प्रकार स्वास्थ्य को विभिन्न प्रकार से नुकसान पहुंचा सकता है। सूर्य से आने वाली सूक्ष्म तरंगदैर्ध्य की अधिकतर पराबैंगनी विकिरणें पृथ्वी के ओजोन आवरण से छन जाती हैं।

सूर्य से आने वाली पराबैंगनी विकिरणों की अधिक मात्रा से जीवों के स्वास्थ्य पर अनेक परिवर्तन देखे गए हैं जिनमें आंखों की बीमारियां, त्वचा केंसर सहित प्रतिरोधी क्षमता के प्रभावित होने से अनेक संक्रामक रोगों का खतरा रहता है। मानव ही नहीं पराबैंगनी विकिरणों का पौधों की शारीरिक और विकास संबंधी प्रक्रियाओं पर भी प्रभाव पड़ता है। जंगलों और घासभूमियों में पराबैंगनी विकिरणों की अधिक मात्रा के कारण उत्परिवर्तन यानी प्रजातियों में परिवर्तन हो सकता है जिससे विभिन्न पारिस्थितितंत्रों की जैवविविधता में परिवर्तन हो सकता है।

बदलती जीवनशैली
आज विश्व में करीब 15 करोड़ फ्रिज घरों में चल रहे हैं। इसके अलावा विश्व भर के लगभग 15 करोड़ घरों और 40 करोड़ कारों में एसी लगे हैं। ये घर और कार को ठंडा रखते हैं। ये आजकल जरूरत बनते जा रहे हैं। आज कोई भी बिना एसी के विशालकाय मॉलों और बहुमंजिला बाजारों की कल्पना नहीं कर सकता। आजकल ट्रेनों और बसों में भी एसी की सुविधा मिलने लगी है। तटों पर पकड़ी जाने वाले मछलियों को दूर मैदानी इलाकों में और गांवों-गावों से दूध रेफ्रिजरेटरों के द्वारा पहुंचता है।

आधुनिक जीवन में एसी और फ्रिज की आवश्यजकता ने इनकी संख्या में अत्यधिक वृद्धि की है। इसीलिए विकासशील देशों जैसे भारत और चीन में एसी और फ्रिज की संख्या तेजी से बढ़ रही है। एक सर्वे के अनुसार अगामी 10 सालों में फ्रीज की संख्या में 20 प्रतिशत की वृद्धि होगी।

ओजोन क्षरण का कारण
अक्सर लोग सोचते हैं कि साधारण से दिखने वाले फ्रिज और एसी में ऐसा क्या है जो पर्यावरण को नुकसान पहुंचाता है। असल में इसके लिए हमें इनकी क्रियाविधि और इनमें उपयोग किए जाने वाले सिद्धांत समझने की आवश्यकता है।
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फ्रिज में वाष्पल-संघनन चक्र का उपयोग किया जाता है। इसे इस प्रकार समझने का प्रयास करते हैं। जब हम अपने मुंह को पूरा खोलकर हथेली पर फूंक मारते हैं तो हमें मुंह से निकली हवा गर्म लगती है। ऐसा इसीलिए होता है क्योंकि सामान्यतया हमारे शरीर का तापमान बाहर के तापमान से अधिक होता है। लेकिन जब हम हमारे मुंह को संकरा करके हथेली पर फूंक मारते हैं तो हवा ठंडी लगती है। बस इसी सिद्धांत को एसी और फ्रिज में उपयोग किया जाता है। फ्रिज और एसी में कूलेन्ट के रूप में जिन गैसों का उपयोग किया जा रहा है वही ओजोन आवरण को नुकसान पहुंचाती हैं।

फ्रिज में कम्प्रेशर कूलेन्ट को उसी प्रकार सम्पीड़ित करता है जिस प्रकार हमारे सिकुड़े मुंह से हवा दबती है। कम्प्रेसर का पंप इस द्रव को उच्च दाब से फ्रिज में बाहर की ओर लगी छोटी नलियों में धकेलता है। उच्च दाब पर द्रव गर्म होता है जिससे वह उष्माे को हवा में मुक्त करता है। सामान्यतया इसीलिए फ्रिज के पीछे का हिस्सा गर्म होता है। जब यह कोईल फ्रिज के अंदर प्रवेश करती है तो यह संकरी नली से गुजरकर उच्च दाब को मुक्त करती है। कुलेंट एक छोटे छिद्र से इसे ठंडा करता है। ठंडा कुलेन्ट फ्रिज के अंदर फैली संकरी नलियों से अंदर फैल कर फ्रिज को ठंडा करता है। फ्रिज के अंदर का पंखा हवा फैलाता है जिसे कुलेन्ट ठंडा करता है। यह ठंडी हवा फ्रिज से गर्मी लेकर वापिस पंप में आ जाती है और फिर से वही प्रक्रिया आरंभ हो जाती है। इस प्रकार फ्रिज ठंडा बना रहता है।

आरंभ में कुलेन्ट के रूप में सल्फरडाइऑक्साइड, अमोनिया और कार्बन डाइऑक्साइड उपयोग किए जाते थे लेकिन इन सबकी कुछ सीमाएं थीं। अमोनिया जहरीली और खतरनाक हैं वहीं कार्बन डाइऑक्साइड बहुत अधिक पॉवर खींचती थी। इसलिए वैज्ञानिक एक उपयोगी कुलन्ट की खोज में थे। और सीएफसी समूह और एचएफसीएफ की खोज हुई।

आरंभ में सीएफसी को आश्चर्यकारी और बहुत ही उपयोगी रसायन माना गया, लेकिन ओजोन आवरण के लिए ये गैस हानिकारक साबित हुईं। असल में इनमें उपस्थित क्लोरीन मूलक ओजोन गैस से क्रिया कर उसे विघटित कर ऑक्सीाजन में तोड़ देती है। और सबसे बड़ी बात तो यह है कि सीएफसी में उपस्थित एक क्लोरीन मूलक ओजोन के करीबन 1 लाख अणुओं को तोड़ देता था जिससे ओजोन आवरण पतली होने लगी और पृथ्वी पर पराबैंगनी विकिरणों के कारण कैंसर का खतरा बड़ने लगा।

ओजोन आवरण और जलवायु परिवर्तन
असल में ओजोन पर्त एक महत्वपूर्ण और नाजुक संतुलन का उदाहरण है। अगर ओजोन की मात्रा वर्तमान के स्तर से ज्यादा होती तो धरती का तापमान बहुत कम होता और अगर ओजोन का स्तर कम होता तो धरती का तापमान बहुत ज्यादा होता और पराबैंगनी विकिरणें भी धरती की सतह पर ज्यादा टकराती। ओजोन क्षरण और जलवायु परिवर्तन अनेक प्रकार से एक-दूसरे से संबंधित हैं। ओजोन आवरण में क्षरण का सीधा प्रभाव भूमि पर पहुंचने वाली पराबैंगनी विकिरणों की मात्रा में वृद्धि से होता है। इसीलिए ओजोन आवरण की भूमिका बहुत ही महत्वपूर्ण है। इसीलिए ओजोन क्षरण का विशय आज अंतर्राश्ट्रीय मुद्दा बना हुआ है जिसने अंतर्राष्ट्रीहय स्तर पर एक चर्चा को निरन्तर बनाए रखा है। लेकिन सभी इस बात पर सहमत हैं कि यह विषय बहुत ही महत्वपूर्ण होने के साथ इस ग्रह पर मानव के जीवन से संबंधित है।

ओजोन आवरण पर मंडराता संकट
सबसे पहले सन् 1970 में पहली बार इस बात के वैज्ञानिक साक्ष्य मिले थे कि उद्योगों में मानव निर्मित रसायनों के उपयोग से होने वाले उत्सर्जन के कारण ओजोन आवरण का क्षरण हो रहा है। तब उस समय षायद पहली बार मानवीय गतिविधियों के परिणाम वायुमंडल पर संकट के रूप में दिखे थे। औद्योगिक विकास के साथ ही ऐसे पदार्थ बनें जिनमें उपयोग किए गए रसायनों से ओजोन आवरण नश्ट हो रहा था। अनेक वस्तुओं के निर्माण जैसे वातानुकूलक यानी एयर कंडीशनर और रेफ्रिजरेटर आदि में ऐसे रसायनों का उपयोग किया जाता है। 

ऐसे रसायन पर्यावरण-हितैषी नहीं है और ये पृथ्वी को पराबैंगनी विकिरणों से बचाने वाले ओजोन आवरण को क्षति पहुंचाते हैं। पुराने रेफ्रिजरेटर या वातानुकूलक से मुक्त हुआ एक मुक्त क्लोरोफ्लोरोकार्बन अणु ओजोन के 1,00,000 अणुओं को नष्टर कर सकता है जिससे हानिकारक पराबैंगनी विकिरणों को भूमि तक पहुंचने का अवसर मिल जाता है। सबसे पहले सन् 1974 में ओजोन आवरण के क्षरण के लिए मुख्यतया मानवनिर्मित रसायन क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) (chlorofluorocarbon (CFCs) समूह को जिम्मेदार माना गया। हालांकि इस विचार को सन् 1985 में अंकर्टाटिका के ऊपर ओजोन आवरण में देखे गए छिद्र के बाद गंभीरता से लिया गया।
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ओजोन परत की मोटाई
असल में मानवीय गतिविधियों में प्रयुक्त रसायनों के कारण ओजोन आवरण के झीने होने यानी कुछ स्थानों पर बहुत ही पतले हो जाने को ओजोन आवरण में छिद्र होना कहा जाता है। ओजोन आवरण बहुत ही पतला है। यदि पूरे वायुमंडल की मोटाई 8000 मीटर है तो उसमें ओजोन आवरण की मोटाई केवल 3 मिलीमीटर ही होगी। लेकिन इतनी कम मात्रा होते हुए भी यह आवरण पृथ्वीवासियों के लिए जीवनरक्षक बना हुआ है।

ओजोन परत का क्षरण
क्लोरोफ्लोरोकार्बन समूह के रसायन पृथ्वी के वायुमंडल में नष्ट् नहीं होते इसकी बजाय ये समतापमंडल में सूर्य से आने वाली पराबैंगनी विकिरणों से टूटकर क्लोरीन को मुक्त करते हैं। ओजोन गैस अत्यन्त क्रियाशील गैस है। ओजोन के विनाश में क्लोरीन प्रमुख भूमिका निभाता है। क्लोरीन का एक अणु ओजोन के तीन अणुओं से क्रिया कर क्लोरीन मूलक को मुक्त करता है। और यह प्रक्रिया चलती रहती है।

इस प्रक्रिया में ओजोन ऑक्सीतजन में परिवर्तित हो जाती है और क्लोरीन अणु मुक्त होकर वापिस 1,00,000 बार यही क्रिया दोहराते हैं जिससे ओजोन का स्तर कम होता जाता है। ब्रोमीन योगिक और हैलोजन वर्ग के अन्य तत्व भी इसी प्रकार समतापमंडल में उपस्थित ओजोन का विनाश करते हैं। क्लोरोफ्लोरोकार्बन समूह के रसायनों का उत्सर्जन ओजोन आवरण के लगभग 80 प्रतिशत क्षरण का कारण होता है।

इसीलिए विभिन्न उद्योग भी आज क्लोरोफ्लोरोकार्बनों का विकल्प तलाश रहे हैं और जनमानस ओजोन आवरण में होने वाली क्षति के नुकसान के प्रति जागरूक हुआ है। जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भी ऐसे रसायनों के उपयोग को नियंत्रित करना उतना ही महत्वपूर्ण था क्योंकि इनमें से अधिकतर रसायन प्रबल ग्रीनहाउस गैसों के रूप में व्यवहार प्रदर्शित कर वैश्विक तापन के लिए जिम्मेदार थे। ओजोन आवरण को क्षति पहुंचाने वाला एक और रसायन डाइक्लोरोमेथेन है, जिसमें ओजोन परत को नष्‍ट करने की क्षमता है। इस रसायन की सांद्रता भी दिनोंदिन वायुमंडल में बढ़ती जा रही है। हालांकि वर्तमान में इसका योगदान ओजोन आवरण के क्षरण में कम है लेकिन भविष्य में इसका प्रभाव बढ़ सकता है।

मांट्रियल प्रोटोकॉल या वियना संधि
अंतर्राष्ट्री य स्तर पर इस आवरण के संरक्षण के लिए 30 साल पहले से ही प्रयास होने लग गए थे संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा सन् 1987 में मांट्रियल प्रोटोकॉल ¼Montreal Protocol½ अस्तित्व में आया था। बहुआयामी समझौतों के रूप में इस प्रोटोकॉल का लक्ष्य ओजोन आवरण को क्षति पहुंचाने वाले रसायनों की पहचान कर उनके उपयोग में कमी लाना था। मांट्रियल प्रोटोकॉल को अंतर्राश्ट्रीय समुदाय से काफी सहयोग मिला। यह समझौतों को लगभग 200 देशों ने अपनाया। 16 सितम्बर, को इस समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे।

23 जनवरी, 1995 को संयुक्त राष्ट्र6 महासभा ने प्रस्ताव पारित किया जिसके अंतर्गत 16 सितम्बर को ओजोन आवरण को क्षरण से बचाने के लिए अंतर्राष्ट्री य दिवस’ (International Day for the Preservation of the Ozone Layer) घोषित किया गया। उसके बाद से ही इस दिन को पूरे विश्व में ओजोन क्षरण एवं उसकी रोकथाम के प्रति जागरूकता के प्रसार के लिए मनाया जाता रहा है। तब से प्रत्येक वर्ष 26 सितम्बर को विश्व ओजोन परत परिरक्षण दिवस के तौर पर मनाया जाता रहा है। इस वर्ष का विषय ‘‘सूर्य के नीचे सभी जीवन की देखभाल’’ (Caring for all life under the sun) है।

हमारे देश में सदैव पर्यावरण संरक्षण पर ध्यान दिया जाता रहा है। इसीलिए जून, 1992 में भारत ने भी मांट्रियल प्रोटोकॉल पर हस्ताक्षर किए। फिर सन् 1993 से हमारे यहां ओजोन आवरण को क्षति पहुंचाने वाले तत्वों को धीरे-धीरे उपयोग से अलग करने की रणनीति बननी आरंभ हुई। भारत सरकार ने पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के अंतर्गत ओजोन प्रकोष्ठी का गठन किया गया है। ओजोन प्रकोष्ठत द्वारा सन् 1995 से ही प्रत्येक वर्ष ओजोन आवरण को क्षरण से बचाने के लिए अंतर्राष्ट्री दिवस का आयोजन किया जाता रहा है। यह प्रकोष्ठh ओजोन आवरण के संरक्षण के लिए प्रतिबद्ध वियना समझौते एवं ओजोन आवरण को क्षरित करने वाले रसायनों को क्रमबद्ध तरीके से उपयोग से मुक्त करने के लिए कार्यरत मांट्रियल समझौतों से संबंधित कार्य भी करता है।
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वियना संधि के 30 साल
इस वर्ष ओजोन आवरण के संरक्षण को समर्पित वियना संधि के 30 साल पूरे हो रहे हैं। इस ऐतिहासिक संधि की 30वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में 16 सितम्बर को आयोजित होने वाले ओजोन आवरण के संरक्षण के अंतर्राष्ट्रीवय दिवस की विषयवस्तु ओजोन के सहभागी उपचार के 30 वर्ष है । इसके अलावा इसका उपविषय है ‘आप और पराबैंगनी विकिरणों के मध्य ओजोन है’। हालांकि अब तक ओजोन आवरण को इतना अधिक नुकसान पहुंचा है कि यदि हम आज भी ओजोन आवरण को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों का उपयोग बंद कर दें तब भी पूर्व में हमारे द्वारा उपयोग किए गए क्लोरोफ्लोरोकार्बन अगले सौ सालों तक वायुमंडल में बने रहेंगे।

काफी सालों के अध्ययन के बाद वैज्ञानिकों द्वारा जून 2016 में पहली बार इस बात को बताया गया कि दक्षिणी ध्रुव के ऊपर के ओजोन छिद्र में कमी आ रही है। इस अध्ययन से संबंधित शोध पत्र ‘साइंस’ नामक विज्ञान पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। हालांकि ओजोन छिद्र का आकलन इसलिए कठिन है क्योंकि इसका छिद्र लगातार घटता-बढ़ता रहता है। अक्टू्बर 2015 में इसका आकार सबसे अधिक मापा गया था।

उस समय तक जब तक कि ओजोन क्षरण की प्रक्रिया रूक न जाए और भूमि तक पहुंचने वाली पराबैंगनी विकिरणों की मात्रा कम न हो जाए हमें जनमानस को इस जटिल विषय और उससे जुड़े विज्ञान के प्रति शिक्षित करने की आवश्यमकता है। हमें आम आदमी विशेषतर बच्चों को जो पराबैंगनी विकिरणों के सबसे अधिक प्रभावित होते हैं, उन्हें ओजोन आवरण के क्षरण और उसके मानव स्वास्थ्य और अन्य जीवों पर पड़ने वाले प्रभावों के प्रति जागरूक करना होगा। ओजोन परत की सुरक्षा के लिए हमारा भी यह कर्तव्य बनता है कि हम ओजोन क्षरण प्रदार्थों यानी ओजोन डिप्लीटिंग सब्सटेंस Ozone depleting substances (ODSs) का इस्तेमाल कम से कम करें जो ओजोन आवरण को नुकसान पहुंचाते हैं। इसके स्थान पर हमें ओजोन मित्र पदार्थों यानी ओजोन फ्रेंडली सब्सटेंस Ozone friendly substances (OFSs) के उपयोग को बढ़ावा देना होगा।

यदि आपके पास पुराना रेफ्रिजरेटर, वातानुकूलक (एसी) है तो आप इन पुराने समानों को उपयोग न करें और यदि आप प्रसाधन सामग्री का उपयोग करते हैं तो आपको यह समझ लेना चाहिए कि ऐसा करने पर आप ओजोन आवरण को नष्ट् करने वाले रसायनों का उपयोग कर रहे हैं। ओजोन आवरण की सुरक्षा कर हम त्वचा कैंसर, आंखों की बीमारी और अनेक अन्य बीमारियों से अपने आप को एवं दूसरों का स्वस्थ रखने में योगदान दे सकते हैं।
-लेखक परिचय-

नवनीत कुमार गुप्ता पिछले दस वर्षों से पत्र-पत्रिकाओं, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन आदि जनसंचार के विभिन्न माध्यमों द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पर्यावरण संरक्षण जागरूकता के लिए प्रयासरत हैं। आपकी विज्ञान संचार विषयक लगभग एक दर्जन पुस्तकें प्रकाश‍ित हो चुकी हैं तथा इन पर गृह मंत्रालय के ‘राजीव गांधी ज्ञान विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार' सहित अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। आप विज्ञान संचार के क्षेत्र में कार्यरत संस्था ‘विज्ञान प्रसार’ से सम्बंद्ध हैं। आपसे निम्न मेल आईडी पर संपर्क किया जा सकता है:

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ओजोन परत परिचय, संरक्षण के उपाय और ऐतिहासिक वियना संधि।
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Scientific World
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