वेदों में विज्ञान बनाम प्राचीन भारत में विज्ञान, एक बेबाक विश्लेषण

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Science in Indian History and Culture in Hindi.


वेदों में विज्ञान, वैदिक गणि‍त, अंग प्रत्यारोण, पुष्पक विमान, परमाणु बम जैसे अनेक विषय हैं, जिनके जरिये समय-समय पर यह बहस देखने को मिलती है कि फलां चीज का वर्णन भारतीय ग्रन्थों में आदिकाल से है। इस बहस से प्रेरित होकर युवा विज्ञान संचारक प्रदीप ने एक शोधपरक लेख तैयार किया है, जिसमें प्राचीन भारतीय वैज्ञानिक उपलब्धियों की बेबाक मीमांसा की है। प्रस्तुत है यह महत्वपूर्ण आलेख-
प्राचीन भारत में वैज्ञानिक सृजन: 
मिथक और यथार्थ

-प्रदीप

विज्ञान की विस्मयकारी प्रगति विश्व-भर के कर्मठ वैज्ञानिकों के सामूहिक प्रयास का प्रतिफल है। यह सर्वविदित है कि विज्ञान की दृष्टि से प्राचीन भारत की उपलब्धियां विस्मयकारी थीं। परन्तु ऐसा देखा गया है कि वर्तमान में जब भी प्राचीन भारतीय विज्ञान की चर्चा होती है, तो भारतीय जनमानस दो गुटों में विभाजित हो जाते हैं। एक गुट के अनुसार हमारे पूर्वजों ने प्राचीन काल में ही सबकुछ खोज लिया था, तो दूसरे गुट के अनुसार प्राचीन भारतीय वांड्मय में कुछ भी वैज्ञानिक नहीं है। पहले गुट के अनुसार यदि प्राचीन ग्रन्थों की भलीभांति व्याख्या की जाए, तो आधुनिक विज्ञान के सभी आविष्कार उसमें पाए जा सकते हैं।

Science in Indian History and Culture.
जब प्राचीन काल के विज्ञान पर गहन चर्चा की जाती है तो भारतीय जनमानस अपने दावे की पुष्टि के लिए प्राचीन ग्रंथों (वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत आदि) के उपलब्धियों के उदाहरण प्रस्तुत किये जाते हैं, जैसे- राडार प्रणाली (रूपार्कण रहस्य), गौमूत्र को सोने में बदलने की तकनीक, मिसाइल तकनीक, कृष्ण विवर का सिद्धांत, सापेक्षता सिद्धांत एवं क्वांटम सिद्धांत, विमानों की भरमार, संजय द्वारा दूरस्थ स्थान पर घटित घटनाओं को देखने की तकनीक, समय विस्तारण सिद्धांत, अनिश्चितता का सिद्धांत, संजीवनी औषधि, कई सिर वाले लोग, भांति-भांति प्रकार के यंत्रोंपकरण आदि-इत्यादि।

एक आम हिन्दुस्तानी अपने पूर्वजों के उच्च कोटि के प्रौद्योगिकी पर बेहद गर्व करता है। उसे ये उपलब्धियां अपने गौरवपूर्ण स्वर्णिम इतिहास की झलक दिखाती प्रतीत होती हैं और वह यह मानता है कि जरुर हमारे पूर्वज विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी की दृष्टि से उन्नत रहे होंगे। वहीं दूसरे गुट के लोग प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों को बेतुका, छल-कपटपूर्ण और अप्रासंगिक मानते हैं।
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तो हम किसे सही मानें, पहले गुट को या दूसरे गुट को? जैसाकि हम जानते हैं कि विज्ञान सूचनाओं एवं तथ्यों पर आधारित ज्ञान है। विज्ञान में किसी भी सिद्धांत को स्वीकार करने से पहले प्रमाण की विश्वसनीयता की कठिन परीक्षा ली जाती है। इसमें सूचनाओं एवं तथ्यों का तार्किक एवं क्रमबद्ध विश्लेषण अनिवार्य है। यह शर्त पहले गुट की कपोल-कल्पनाओं पर लागू नहीं होती है। वहीं दूसरे गुट के लोगों में वैज्ञानिक कट्टरता झलकती है।

बिना प्रमाण, परीक्षण के किसी भी बात को मान लेना अवैज्ञानिक है, उसी प्रकार से प्रमाण, परीक्षण को नकार देना भी अवैज्ञानिक है। इसलिए हम इस लेख में पूर्वाग्रहों को दूर करते हुए प्राचीन साहित्य में जो कुछ वैज्ञानिक है, उसे निष्पक्ष भाव से उजागर करने का प्रयास करेंगे। पहले हम उन दावों का विश्लेषण करेंगे जिससे यहपता चलता है कि हमारे पूर्वज वैज्ञानिक दृष्टि सम्पन्न थे। उसके बाद हम उन दावों का विश्लेषण करेंगे जिसके अनुसार आधुनिक विज्ञान की सभी खोजों को हमारे पूर्वजों ने खोज लिया था।

वेदों में विज्ञान_Science in Vedas:
वर्तमान अनुसंधानों से ऐसे प्रमाण मिले है, जिससे यह प्रतीत होता है कि सिंधु घाटी सभ्यता मिश्र तथा बेबीलोन की सभ्यता से अधिक विस्मयकारी और महान थी। सिन्धुघाटी की सभ्यता के लोग कच्ची-पक्की इंटों और लकड़ी के अच्छे भवनों में रहते थे, जो योजना के अनुसार बने हुए थे। वहां की नालियाँ ग्रीड पद्धति के अनुसार बनी थीं। पुरातत्ववेत्ताओं को मोहनजोदड़ो से एक विशाल स्नानागार मिला है। सिन्धुघाटी सभ्यता के स्थानों से अनेक प्रकार के बांटभी मिले हैं, जिनमें आश्चर्यजनक रूप से एकरूपता है। यहाँ की लिपि को अभी तक नहीं पढ़ा जा सका है। विद्वानोंका अनुमान है कि सिंधु सभ्यता के लोगों को रेखागणित और अंक-गणित का अच्छा ज्ञान रहा होगा।

हमारे देश की आम जनता को वेदों के बारे में बड़ी गलतफहमी है। बहुसंख्य जनता यह मानती है कि वेद विज्ञान के अक्षय भंडार है, परंतु हमें याद रखना चाहिए कि वेद लगभग साढ़े तीन हजार साल पहले की कृतियाँ हैं। इनमें उतना ही विज्ञान है जितना की तत्कालीन मानव समाज ने खोजा था। वैदिक साहित्य के चार प्रमुख अंगों – वेद (ऋग्वेद, सामवेद, अथर्ववेद, यजुर्वेद), ब्राह्मण-ग्रंथ, उपनिषद तथा वेदांग से हमें वैदिक-कालीन समाज की वैज्ञानिक उपलब्धियों की जानकारी प्राप्त होती है। (अगले पृष्ठ पर जारी)
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वैदिक काल की कोई भी लिपि नहीं थी, इसलिए वेदों को श्रुति कहा गया है। प्राचीन भारत में इन्हें रट-रटकर मौखिक रूप से प्रसारित करने की परम्परा थी। वैदिक ऋषियों को सूर्य, चन्द्र, ग्रहों एवं तारों की गतिविधियों का अच्छा ज्ञान था। परन्तु सूर्य, चन्द्र, ग्रहों और तारों की दूरियों के संबंध में बिलकुल भी ज्ञान नहीं था। ऋग्वेद में 12 महीनों का चन्द्रवर्ष माना गया है। वैदिक ऋषियों को सात ग्रहों, 27 नक्षत्रों, खगोलीय परिघटना उत्तरायण-दक्षिणायन का ज्ञान था। वैदिक ऋषियों को ग्रहणों की बारंबारता का ज्ञान था, परन्तु ग्रहणों के कारणों की जानकारी नहीं था।

ब्रह्मांड की उत्पत्ति तथा संचालन जिन नियमों से होते हैं, ऋग्वेद में उसे ऋत् की संज्ञा दी गयी है। ऋग्वेद का नासदीय सूक्त वैदिक ऋषियों के ब्रह्मांड की उत्पत्ति से सम्बन्धित तर्कसंगत चिंतन का परिचय देता है। एक वैदिक ऋषि कहता है कि ‘प्रलयकाल में पंच-महाभूत सृष्टि का अस्तित्व नहीं था और न ही असत् का अस्तित्व था। उस समय भूलोक, अंतरिक्ष तथा अन्तरिक्ष से परे अन्य लोक नहीं थे। सबको आच्छादित करने वाले (ब्रह्मांड) भी नहीं थे। किसका स्थान कहाँ था? अगाध और गम्भीर जल का भी अस्तित्व कहाँ था?’ अन्यत्र ऋग्वेद का एक ऋषि कहता है कि ‘ब्रहमांड की उत्पत्ति का कारण कोई भी नहीं जानता, भगवान भी नहीं क्योंकि वह भी बाद में पैदा हुआ है’।

वैदिक ज्योतिष का सार महर्षि लगध के वेदांग ज्योतिष_Vedang jyotish को माना जाता है। यह भारत की पहली ज्ञात ज्योतिष की पुस्तक है। वेदांग ज्योतिष में काल गणना तथा पंचांगों के संबंध में विस्तृत वर्णन मिलता है।

वैदिककालीन चिकित्सा के बारे में हमें सर्वाधिक जानकारी अथर्ववेद से प्राप्त होती है। इसमें सिरदर्द, यक्ष्मा(टीबी), बुखार आदि बिमारियों का उल्लेख मिलता है। अथर्ववेद में हमें जड़ी-बूटियों से इलाज के साथ-साथ जादू-टोने, झाड़-फूंकआदि के बारे में भी जानकारी मिलती है। दरअसल, उस समय के वैद्य या ओझा यह मानते थे कि राक्षस, भूत और पिशाच मनुष्यों में असाध्य रोग फैलाते हैं। सभ्यता के इस आदि काल में रोगों को पाप-कर्म, पूजा-अर्चना में कमी का फल माना गया है।

शुल्व सूत्र_Sulba sutra:
वैदिक लोगों के रेखागणित से संबंधित ज्ञान का पहला प्रमाण ‘ब्रह्माण ग्रंथों_Brahman granth’ में मिलता है। दरअसल ज्यामिति_Geometry की उत्पत्ति स्वयं सिद्ध कथनों या मूल तत्वों से नहीं हुई थी, बल्कि इसकी शुरुवात हुई थी यज्ञ वेदियों के निर्माण में आने वाली कुछ समस्याओं को सुलझाने के प्रयासों से। शुल्वसूत्रों में यज्ञों के प्रयोजन के अवसर पर बनने वाली वेदियों के बारे में जानकारी है। इन सूत्रों से हमें रेखागणित के सन्दर्भ में अत्यधिक जानकारी प्राप्त होती है। सर्वाधिक प्रसिद्ध शुल्वसूत्र बौधायन_Baudhayana Sulba sutra के हैं।

शुल्वसूत्रों में पाईथागोरस का प्रमेय_Pythagorean theorem भी मिलता है कि ‘समकोण त्रिभुज के आधार तथा लम्बवत भुजा पर बने वर्ग का जोड़, कर्ण पर बने वर्ग के बराबर होता है’। शुल्वसूत्रों में यूक्लिड_Euclid की ज्यामिति का प्रसिद्ध पाईथागोरस प्रमेय जरुर है, परंतु प्रमेय का सत्यापन नहीं है। यानी गणित में जिस तार्किक ढांचे की अपेक्षा की जाती है, उसका नितांत अभाव। कुल-मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि भारत में रेखागणित का उद्गम धर्म या जादू के कर्मकांडों से हुआ।

सिद्धान्तिक काल: आर्यभट प्रथम से भास्कर द्वितीय तक
विज्ञान की दृष्टि से यह काल वैभव का काल है।आज वैज्ञानिक एवं इतिहासकार 5वीं शताब्दी में आर्यभट प्रथम से लेकर 12वीं शताब्दी में भास्कर द्वितीय तक के काल को सिद्धांतिक काल के नाम से जानते हैं। इस काल में हमारे देश में आर्यभट_Aryabhatta, वराहमिहिर_Varahamihira, ब्रह्मगुप्त_Brahmagupta, महावीर_Mahaveer, नागार्जुन_Nagarjuna जैसे महान वैज्ञानिक हुए।

आर्यभट प्रथम प्राचीन भारत के सर्वाधिक प्रतिभासंपन्न गणितज्ञ-ज्योतिषी थे। वर्तमान में पश्चिमी विद्वान भी यह स्वीकार करते हैं कि आर्यभट प्रथम प्राचीन विश्व के एक महान वैज्ञानिक थे। यद्यपि हम आर्यभट का महत्व इसलिए देते हैं क्योंकि सम्भवतः वे ईसा की पांचवी-छठी सदी के नवीनतम खगोलिकी आन्दोलन के पुरोधा थे। और आर्यभट की ही बदौलत प्राचीन भारत में वैज्ञानिक चिन्तन की सैद्धांतिक परम्परा स्थापित हो पाई।

प्राचीन भारत के असंख्य पोथियों में उनके रचयिता तथा रचनाकाल के बारे में स्पष्ट जानकारी नहीं प्राप्त होती है। मगर महत्वपूर्ण बात यह है कि आर्यभट ने अपने समय के संबंध में सुस्पष्ट जानकारी दी है। आर्यभट ने अपने क्रांतिकारी कृतित्व ‘आर्यभटीय_Aryabhatiya’ में यह जानकारी दी है कि उन्होंने इस ग्रंथ की रचना 23 वर्ष की आयु में कुसुमपुर में की थी। आर्यभटीय के एक श्लोक में वे बताते हैं कि ‘‘कलियुग के 3600 वर्ष बीत चुके हैं और अब मेरी आयु 23 वर्ष है।’’ भारतीय ज्योतिषीय काल गणना के अनुसार कलियुग का आरंभ 3101 ईसा पूर्व में हुआ था। कलन से विद्वानों ने यह निष्कर्ष निकाला कि आर्यभटीय की रचनाकाल 499 ई. है।

इससे यह स्पष्ट होता है कि आर्यभट का जन्म 476 ई. में हुआ होगा। अपने जन्मकाल की सुस्पष्ट सूचना देने वाले आर्यभट प्राचीन भारत के संभवत: पहले वैज्ञानिक थे।

आर्यभटीय के रचयिता के रूप में, आरंभ में आर्यभट का बहुत सम्मान रहा। उनके ग्रंथ में नवीन एवं युगांतरकारी अवधारणाएं थी, जिसके कारण आर्यभट बहुत जल्द ही मशहूर हो गये। आइए, आर्यभट की कुछ प्रमुख अवधारणाओं पर चर्चा करते हैं-
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आर्यभट की महत्वपूर्ण स्थापनाएं:
• आर्यभट ने हजारों वर्ष पुराने इस विचार का खंडन कर दिया कि हमारी पृथ्वी ब्रह्माण्ड के मध्यभाग में स्थिर है। आर्यभट ने भूभ्रमण का सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसके अनुसार पृथ्वी अपने अक्ष पर घूर्णन करती है। इसका विवरण आर्यभट गोलपाद में निम्न प्रकार से देते हैं-

अनुलोमगतिनौंस्थ: पश्यत्यचलम्‌विलोमंग यद्वत्‌।
अचलानि भानि तद्वत्‌ समपश्चिमगानि लंकायां॥

‘‘लंका में स्थित मनुष्य नक्षत्रों को उल्टी ओर (पूर्व से पश्चिम) जाते हुए देखता है उसी भांति से चलती नाव में बैठे मनुष्य को किनारें स्थित वस्तुओं की गति उल्टी दिशा में प्रतीत होती है।’’

पृथूदकस्वामी आर्यभट की एक आर्या के बारे में लिखते हैं-

भपंजर: स्थिरो भूरेवावृत्यावृत्य प्राति दैविसिकौ।
उदयास्तमयौ संपादयति नक्षत्रग्रहाणाम्‌॥

‘‘तारामंडल स्थिर है और पृथ्वी अपनी दैनिक घूर्णन गति से नक्षत्रों तथा ग्रहों को उदय एवं अस्त करती है।’’

• आर्यभट ने स्थिर तारों के सापेक्ष पृथ्वी का अपने अक्ष पर घूर्णन-काल की गणना 23 घंटे 56 मिनट और 4.1 सेकेण्ड की थी। आधुनिक गणना के अनुसार पृथ्वी अपने अक्ष पर 23 घंटे 56 मिनट और 4.091 सेकेण्ड में घूर्णन करती है। इससे यह स्पष्ट है कि आर्यभट की गणना शुद्धता के बहुत निकट है। ध्यातव्य है कि आर्यभट के परवर्ती गणितज्ञों ने भी पृथ्वी के घूर्णन-काल की गणना की थी, परन्तु आर्यभट की गणना उनकी तुलना में अत्यधिक सटीक थी। और आर्यभट ने एक वर्ष को 365.25868 दिनों, एक चंद्र मास को 27.32167 दिनों का माना। जबकि आधुनिक गणना के अनुसार क्रमशः मान 365.25636 दिन और 27.32166 दिन है, जोकि शुद्धता के काफी निकट है।

• आर्यभट ने गोलपाद में बताया कि जब पृथ्वी की विशाल छाया चन्द्रमा पर पड़ती है, तो चन्द्र ग्रहण होता है। उसी प्रकार, जब चन्द्रमा सूर्य एवं पृथ्वी के बीच आ जाता हैं और वह सूर्य को ढक लेता है, तब सूर्य ग्रहण होता हैं। आर्यभट ने ग्रहणों की तिथि तथा अवधि के आकलन का सूत्र भी प्रदान किया।

• आर्यभट ने महायुग अर्थात्, सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग को चार समान भागों में विभाजित किया। उन्होनें मनु की भांति 4 : 3 : 2 : 1 में नही विभक्त किया। उन्होनें 1 कल्प में 14 मन्वन्तर और 1 मन्वन्तर में 7 महायुग माना। एक महायुग में चारों युगों को एकसमान माना।

• आर्यभट ने बड़ी-बड़ी संख्याओं को अक्षरों के समूहों में निरुपित करने की नई अक्षरांक पद्धति को जन्म दिया। उन्होनें इसी शैली में आर्यभटीय की रचना की है। आर्यभटीय के एक श्लोक से यह भी स्पष्ट है कि वे नई स्थानमान अंक पद्धति से परिचित थे। अत: वे शून्य से भी परिचित थे।

• आर्यभट ने वृत्त की परिधि और उसके व्यास के अनुपात π (पाई) का मान 3.1416 कलित किया जोकि दशमलव के चार अंकों तक ठीक है। आर्यभट यह जानते थे कि πएक अपरिमेय संख्या है, इसलिए उन्होनें अपने मान को सन्निकट माना।

• आर्यभट गोलीय त्रिकोणमिति की अवधारणाओं से भलीभांति परिचित थे। उन्होनें अर्धज्याओं के मान 3°45 के अंतर पर दिए, जो आधुनिक त्रिकोणमिति के सिद्धांतों के काफी अनुरूप हैं। वर्तमान में प्रचलित ‘साइन_Sine’ और ‘कोसाइन_Cosine’ आर्यभटीय के ‘ज्या’ और ‘कोज्या’ ही हैं। आज सम्पूर्ण विश्व में जो त्रिकोणमिति पढ़ाया जाता है, वास्तविकता में उसकी खोज आर्यभट ने की थी।

आर्यभट ने आर्यभटीय में तत्कालीन गणित की संक्षिप्त जानकारी दी है, मगर उन्होंने गणित को शाखाओं में विभाजित नहीं किया था। उत्कृष्ट गणितज्ञ और खगोलविद ब्रह्मगुप्त वे पहले भारतीय गणितज्ञ हैं, जिन्होंने तत्कालीन गणित को दो शाखाओं में विभाजित किया-पाटीगणित तथा कुट्टक गणित (बीजगणित)। यदि ब्रह्मगुप्त को बीजगणित का आदि-आविष्कर्ता_Father of algebra माना जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी क्योंकि ब्रह्मगुप्त ने ही पहली बार अपनेग्रंथ ब्रह्मस्फुट सिद्धांत के ‘कुट्टकाध्याय’ में बीजगणित का विवेचन किया था।

ब्रह्मगुप्त ने आर्यभट की परम्परा को आगे बढ़ाया, परंतु उन्होंने आर्यभट की आपत्तिजनक शब्दों में कड़वी आलोचना भी की। ब्रह्मगुप्त ने आर्यभट के भूभ्रमण सिद्धांत, ग्रहण के सही कारण और आर्यभट के युग विभाजन पद्धति आदि की आलोचना एवं उपेक्षा की। विद्वान अल्बरूनी_Alberuni ने लगभग 13 वर्षों तक भारत में रहकर भारतीय संस्कृति, गणित एवं खगोलशास्त्र का व्यापक अध्ययन किया। उन्होनें ब्रह्मगुप्त के आलोचनाओं को गलत एवं आपतिजनक माना साथ ही आर्यभट की बुद्धि का भी लोहा माना।

सिद्धांतिक काल तक भारतीय गणित-ज्योतिष का विकास होता रहा। तब तक भारतीय विज्ञान मध्य एशिया के देशों से होकर यूरोप तक पहुंच चुका था। प्राचीन काल में आखिरी चोटी के गणितज्ञ-ज्योतिषी हुए भास्कराचार्य द्वितीय_Bhaskaracharya ii. इनकी सर्वाधिक प्रसिद्ध पुस्तक है-लीलावती_Lilavati. दरअसल लीलावती भास्कराचार्य के ग्रंथ सिद्धांत-शिरोमणि_Siddhanta shiromani का ही एक भाग है। अकबर के दरबारी फैजी ने लीलावती का अरबी भाषा में अनुवाद किया था। फैजी के अनुसार लीलावती भास्कर की पुत्री का नाम था, जिसका विवाह शुभ-मुहूर्त्त के टल जाने के कारण नहीं हो पाया। इसलिए भास्कराचार्य ने लीलावती के नाम को अमर करने के लिए ‘लीलावती’ नामक ग्रंथ की रचना की।

लीलावती में गणित को एक सरल विषय के रूप में प्रस्तुत किया गया है। मनोरंजन के लिए लीलावती के एक पहेली पर विचार कीजिए-

‘एक झील में चक्रवाक और क्रौंच पक्षी स्नान कर रहे थे। जल-स्तर से आधे हाथ ऊपर एक कमल खिला हुआ था। धीमी हवा ने उस फूल को दो हाथ नीचे डुबो दिया। तुरंत बताओ कि पानी कितना गहरा था?’

उपरोक्त पहेली पाईथागोरस प्रमेय का एक अनुपम उदाहरण है। कमल के डूबने से पहले तथा डूबने के बाद की स्थिति पर विचार करें तो हमारे समक्ष समकोण वाली त्रिकोणीय आकृति प्रकट हो जायेगी। भास्कराचार्य ने उन मतों का भी खंडन किया कि पृथ्वी किसी आधार पर टिकी हुई है। सम्भवतः उन्हें गुरुत्वाकर्षण का भी मूलभूत ज्ञान था। परंतु उन्हें गुरुत्वीय व्युत्क्रम के नियम का ज्ञान नहीं था।
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विश्व को भारत की सबसे बड़ी देन: शून्ययुक्त दाशमिक अंक पद्धति
महान वैज्ञानिक बंट्रेंड रसेल_Bantered russell से जब यह पूछा गया कि विज्ञान के क्षेत्र में भारत की सबसे महत्वपूर्ण देन क्या है, तो उन्होंने द्वयर्थक शब्द का प्रयोग करते हुए उत्तर दिया ‘जीरो’ यानी शून्य। वस्तुतः शून्य प्राचीन भारतीय गणित की सबसे महत्वपूर्ण देन है। शून्य के ही माध्यम से दाशमिक स्थानमान अंक पद्धति निकली। शून्ययुक्त यह अंक पद्धति भारत की विश्व को सबसे बड़ी बौद्धिक देन है। आज सम्पूर्ण विश्व में इसी अंक पद्धति का उपयोग होता है। यह अंक पद्धति अरबों के माध्यम से यूरोप पहुंचकर ‘अरबी अंक पद्धति_Arabic numeral system’ बन गयी और अंततः ‘अन्तर्राष्ट्रीय अंक पद्धति_International numeral system’ बन गयी। भारतीय संविधान में इस अंक पद्धति को ‘भारतीय अन्तर्राष्ट्रीय अंक पद्धति’ कहा गया है।

वैदिक काल में न तो शून्य की धारणा ने जन्म लिया था और न ही दाशमिक अंक पद्धति ने। पांचवी-छठी सदी के गणितज्ञ-ज्योतिषी आर्यभट और ब्रह्मगुप्त इस अंक पद्धति से परिचित थे। कुल मिलाकर हम यह कह सकते हैं कि शून्ययुक्त दाशमिक स्थानमान अंक पद्धति प्राचीन भारत का सबसे बड़ा मौलिक आविष्कार है।

प्राचीन भारत में आयुर्वेद_Ayurveda in Ancient India:
भारत की स्वदेशी चिकित्सा प्रणाली को आयुर्वेद कहते हैं। आयुर्वेद शब्द का शाब्दिक अर्थ है- लंबी उम्र प्राप्त करने का विज्ञान। प्राचीनकाल में आयुर्वेद को विकसित करने में अनेक ऋषियों का योगदान है। प्राचीन भारत में अत्यधिक मात्रा में चिकित्सा साहित्य की रचना हुई थी, परंतु समय की मार से जो दो प्रमुख ग्रंथ सुरक्षित रह गए वे हैं- चरकसंहिता_Charaka samhita और सुश्रुत संहिता_Sushruta samhita. इन दोनों ग्रंथों में तत्कालीन चिकित्सा ज्ञान का संकलन है, परंतु वर्तमान में इनके प्रणेताओं के विषय में सही जानकारी उपलब्ध नहीं है।

चरक संहिता में आठ खंड तथा 120 अध्याय हैं, यह मुख्यतःकाय-चिकित्सा का ग्रंथ है। सम्भवतः इस ग्रंथ केरचनाकार अकेले चरक नहीं हैं, बल्कि इतिहासकारों के अनुसार इस बात की पूरी सम्भावना है कि चरक नाम की जाति या परम्परा रही हो। इस ग्रंथ में अपने पूर्व के ज्ञान और चिकित्सा पद्धतियों को सम्मिलित किया गया है।

सुश्रुत संहिता मुख्यत: शल्य चिकत्सा_Surgery का ग्रंथ है। सुश्रुत संहिता में सर्जरी में उपयोग होने वाले उपकरणों की विस्तृत जानकारी है। वास्तव में प्लास्टिकसर्जरी के आदि-आविष्कर्ता सुश्रुत हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार भारत में 1600 ई. पू. में सुश्रुत और उनके शिष्य कटी नाक, ओंठऔर कान की प्लास्टिक सर्जरी करने में सक्षम थे।कटी-टूटी नाक की प्लास्टिक सर्जरी, जिसे राइनोप्लास्टी_Rhinoplasty कहते हैं, काआदि-आविष्कर्ता सुश्रुत_Father of rhinoplasty को मानें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी। वस्तुतः सुश्रुत ने आँखों के मोतियाबिंद का जाला हटाने का शल्य-कर्म खोज लिया था। यह भी एक दिलचस्प तथ्य है कि 18वीं सदी में प्लास्टिक सर्जरी अंग्रेजी डॉक्टरों ने भारतीय वैद्यों से सीखी थी।

बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत की गईं वैज्ञानिक उपलब्धियां
ऊपर हमनें प्राचीन भारत की वैज्ञानिक उन्नति का वर्णन किया है, जिससे हमें पता चलता है कि हमारा अतीत बेहद गौरवपूर्ण था। अब हम उन दावों की पड़ताल करेंगे जिनके अनुसार हमारे पूर्वजों ने आधुनिक विज्ञान के सभी आविष्कारों को खोज लिया था तथा प्राचीन काल में आज से भी अधिक उच्च तकनीकी (प्रौद्योगिकी) ज्ञान ज्ञात था। भारतीय जनमानस द्वारा ऐसे आसाधारण दावे किये जाते हैं, परन्तु वे यह भूल जाते हैं कि आसाधारण दावों को सिद्ध करने के लिए आसाधारण प्रमाणों की आवश्यकता होती है।

यह भी कहा जाता है इसके प्रमाण प्राचीन ग्रंथों जैसे वेद, पुराण, उपनिषद, रामायण, महाभारत आदि से प्राप्त हो सकते हैं। परंतु ऐसे दावों को काव्य-रचनाओं परआधारित करना पूर्णतया अतर्कसंगत है। क्योंकि वर्तमान ऐतिहासिक साक्ष्यों से यह पता चला है कि ये साहित्यिक रचनाएँ थीं, नाकि वैज्ञानिक एवं तकनीकी शोधपत्र। जयंत नार्लीकर_Jayant Narlikar के अनुसार ‘ये तो ऐसा ही होगा कि कोई ग्रिम की परीकथाओं को पढ़कर यह निष्कर्ष निकाले कि 17वीं से 19वी सदी में यूरोप के लोग जादूगरी और प्रेतकलाओं में माहिर थे।’

हमारे देश की आम हिंदू जनता को वेदों के बारे में बड़ी गलतफहमी है। बहुसंख्य जनता यह मानती है कि वेद विज्ञान के अक्षय भंडार हैं, परंतु हमें याद रखना चाहिए कि वेद लगभग साढ़े तीन हजार साल पहले की कृतियाँ हैं। इनमें उतना ही ज्ञान है जितना की तत्कालीन मानव समाज ने खोजा था। यदि यह मान भी लें कि वेदों में विज्ञान का अक्षय भंडार समाया हुआ है, तो यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि अब तक हम क्या कर रहे थे? तो हमें यह भी मानना पड़ेगा कि अब तक वेदों के जो टीकाकार, भाष्यकार हुए वे सभी अज्ञानी थे क्योंकि उनको विज्ञान के इस अक्षय भंडार के बारे में पता ही नहीं चला? उन्होंने वेदों का अध्ययन करके कोई वैज्ञानिक आविष्कार किया ही नहीं? विज्ञान के जिस अक्षय भंडार को स्वयं आदि-शंकराचार्य, यास्क से सायण तक के वेदज्ञ, आर्यभट, वराहमिहिर, ब्रह्मगुप्त और भास्कराचार्य जैसे गणितज्ञ-ज्योतिषी नहीं खोज पाए, उसको खोजने का दावा आधुनिक शंकराचार्य और जनसामान्य करने लगे तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी।

यह भी कहा जाता है कि वैदिक ज्ञान अंतिम सत्य है तथा वैदिक ऋषियों ने अपने महाशक्तिशाली दिव्यदृष्टि से सम्पूर्ण ब्रह्मांड का अवलोकन कर लिया था। उनकी दिव्यदृष्टि कितनी शक्तिशाली थी, इसे कृत्तिका नक्षत्र के उदाहरण से जाना जा सकता है। वैदिक ऋषियों को कृत्तिका नक्षत्र में केवल सात तारे दिखाई देते थे, जबकि आधुनिक खोजों से यह पता चला है कि इस नक्षत्र में तीन सौ से अधिक तारे हैं। देवयानी आकाशगंगा हमें नंगी आँखों से कभी-कभार दिखाई देती है, परन्तु वैदिक ऋषि इसे भी नहीं देख पाए जबकि यह हमसे सर्वाधिक निकट की आकाशगंगा है। इसी से पता चलता है कि वैदिक ऋषियों की दिव्यदृष्टि कितनी शक्तिशाली थी। जहाँ तक अंतिम सत्य का सवाल है तो हम जानते हैं कि विश्व में कोई भी यह दावा नहीं कर सकता है कि वह अंतिम सत्य को जानता है।
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कुछ लोग यह दावा भी करते हैं कि वेदों में परमाणु बम_Atom Bomb in Vedas बनाने की विधि दी हुई। असल में वेदों में परमाणु बम बनाने की विधि खोजना कोरी दाकियानूसी है। हम जानते है कि विज्ञान समानुपाती एवं समतुल्य होता है। यहाँ पर यह प्रश्न उठाना स्वाभाविक है कि यदि वैदिक काल में नाभिकीय बम बनाने का सिद्धांत एवं उच्च प्रौद्योगिकी उपलब्ध थी, तो तत्कालीन वैदिक सभ्यता अन्य सामान्य वैज्ञानिक सिद्धांतों एवं आविष्कारों को खोजने में कैसे पीछे रह गई?

नाभिकीय सिद्धांत को खोजने की तुलना में विद्युत्य चुंबकीय शक्तियों को पहचानना और उन्हें दैनिक प्रयोग में लाना अधिक सरल है। परंतु वेदों में इस ज्ञान को प्रयोग करने का कोई विवरण उपलब्ध नहीं होता है। यहाँ तक इंद्र के स्वर्ग में भी बिजली नहीं थी, जबकि आज गाँव-गाँव में बिजली उपलब्ध है। तकनीकी की ऐसी रिक्तियां विरोधाभास उत्पन्न करती हैं। निश्चित रूप से इससे यह तर्क मजबूत होता है कि वैदिक सभ्यता को नाभिकीय बम बनाने का सिद्धांत ज्ञात नहीं था। मगर इससे हमें वैदिक ग्रंथों के रचनाकारों की अद्भुत् कल्पनाशक्ति के बारे में पता चलता है। निसंदेह कल्पना एक बेहद शक्तिशाली एवं रचनात्मक शक्ति है।

अक्सर ऐसे भी दावे सुनने को मिलते हैं कि वैदिक काल के दीर्घात्मा ऋषि यह जानते थे कि सूर्य की ऊर्जा का स्रोत ताप नाभिकीय अभिक्रिया है। जयंत विष्णु नार्लीकर अपने एक आलेख में लिखते हैं कि अगर हम इस वर्णन को स्वीकार कर भी लें, तो भी इससे यह पता नहीं चलता कि सूर्य की आंतरिक संरचना कैसी है, किस प्रकार से यह संतुलन में रहता है या किस प्रकार इसकी ऊर्जा इसके केंद्र से सतह तक आती है आदि। इन सारी बातों को जानने के लिए वर्तमान में हम गुरुत्वाकर्षण, विद्युत् और चुम्बकत्व और द्रवस्थैतिकी का सहारा लेते हैं। क्या वेदों में इसका विवरण मिलता है? संक्षिप्त उत्तर है- नहीं।

विलक्षण प्रतिभा के धनी महान वैज्ञानिक डॉ. मेघनाद साहा_Dr Meghnad Saha अपने प्रखर विचारों के लिए जाने जाते थे। वे पुराणपंथी विचारों के कटु आलोचक थे। उनके जीवन के एक प्रसंग का विद्वान लेखक स्व. गुणाकर मुले ने अपनी पुस्तक ‘भारत: इतिहास, संस्कृति और विज्ञान’ में कुछ इस प्रकार करते हैं :

एक बार डॉ. साहा ढाका गए, तो वहां के एक वकील ने उनकी खोज (तापीय आयनीकरण) के बारे में उनसे जानकारी चाही। साहा उन्हें विस्तार से तारों की संरचना और अपनी नई खोज के बारे में समझाते चले गए। मगर वकील महाशय बीच-बीच में टिप्पणी करते रहे कि, “लेकिन इसमें तो कुछ नया नहीं है, यह सब तो हमारे वेदों में है।”

अंत में साहा ने उनसे पूछा : बताइए कि वेदों में ठीक-ठीक कहाँ पर तारों के आयनीकरण के बारे में लिखा है?

“मैंने स्वयं वेद नहीं पढ़े हैं, किन्तु मुझे पूरा विश्वास है कि जिसे आप नए वैज्ञानिक आविष्कार बताते हैं वे सभी वेदों में विद्यमान हैं।” वकील का जवाब था।

डॉ. साहा ने आगे कई सालों तक वेदों, उपनिषदों, पुराणों और रामायण-महाभारत का अध्ययन किया। उनकी आलोचना करने वालों को उनका उत्तर था: क्यों वह (आलोचक) नहीं जानता कि बौद्ध और जैन धर्मों के उदय के साथ भारतीय संस्कृति के सबसे गौरवशाली युग का आरंभ हुआ था, और दोनों ने ही वेदों को भ्रांतियों का पिटारा कहकर पूर्णतया अस्वीकृत कर दिया था।? क्या वह यह नहीं जानता की लोकायत मत के अनुसार, ‘तीनों वेदों के रचयिता भंड, धूर्त और निशाचर थे’ (त्रयो वेदस्य कर्तारो भण्डधूर्तनिशाचरा:) इन सारी बातों का अर्थ यह है कि ईसा के कुछ समय पहले देश में बुद्धिवादियों का ऐसा एक वर्ग मौजूद था जिसने अनुभव किया था कि वेदों के मन्त्रों का वास्तविक अर्थ जानना अत्यंत कठिन है; केवल कुछ ढोंगी लोग ही वेदों को प्रमाण मानकर गलत विचारों का प्रचार करते हैं। इसलिए हिन्दू धर्म के स्रोत वेदों में खोजना करीब-करीब नब्बे प्रतिशत गलत है, और इसी कारण आलोचक का मत दोषपूर्ण है।

हम मिथक और इतिहास में भेद नहीं कर पाते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि मिथक प्राचीन कथाएँ हैं जिसे आलौकिक शक्तियों से जोड़कर देखा जाता है, जबकि इतिहास वह है जो वास्तव में घटित हुआ है। इतिहास की जगह मिथकीय गाथाओं को पेश करना सही नहीं है। भारत के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी ने एक निजी अस्पताल के उद्घाटन समारोह में पौराणिक ज्ञान का महिमामण्डन किया। उन्होंने कहा कि पौराणिक काल में अनुवांशिक विज्ञान का उपयोग किया जाता था। उन्होंने कहा कि-

“महाभारत का कहना है कि कर्ण मां की गोद से पैदा नहीं हुआ था। इसका मतलब ये हुआ कि उस समय जेनेटिक साइंस मौजूद था। तभी तो मां की गोद के बिना उसका जन्म हुआ होगा। हम गणेश जी की पूजा करते हैं। कोई तो प्लास्टिक सर्जन होगा उस ज़माने में, जिसने मनुष्य के शरीर पर हाथी का सर रख के प्लास्टिक सर्जरी का प्रारंभ किया हो।”
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हम जानते हैं कि प्लास्टिक सर्जरी की खोज भारत में हुई, मगर इसकी खोज सुश्रुत के समय में हुई, नाकि पौराणिक काल में। और जिस प्लास्टिक सर्जरी तकनीक का उल्लेख प्रधानमंत्री महोदय ने किया है, उतनी विकसित तकनीक की खोज सुश्रुत तो क्या आधुनिक वैज्ञानिक भी नहीं कर पाये हैं। इसलिए हम इसे अपने अतीत के प्रति व्यामोह भी कह सकते हैं।

प्राचीन भारत में विमान प्रौद्योगिकी_Aircraft Technology in Ancient India?
कुछ लोग कहते हैं कि प्राचीन भारत में विमान बनाने की उन्नत प्रौद्योगिकी उपलब्ध थी। चूँकि रामायण में पुष्पक विमान का बड़ा मनोहर चित्रण है, इसलिएहमारे पूर्वजों के पास वास्तव में विमान प्रौद्योगिकी उपलब्ध थी, ऐसा दावा किया जाता है। परंतु हमें इसे सिद्ध करने के लिए सम्पूर्ण तकनीकी साहित्य की आवश्यकता है, रामायण जैसे काव्यात्मक विवरण की नहीं। दरअसल, विमान एक जटिल उत्पाद है, इसके निर्माण में अत्यधिक उन्नत प्रौद्योगिकी की आवश्यकता होती है। अगर हमें यह सिद्ध करना है कि प्राचीन भारत में विमान प्रौद्योगिकी उपलब्ध थी, तो विमान के चित्र, बैठे हुए यात्रियों के तस्वीर दिखाना भ्रामक हो सकता है जबकि सिद्ध करने के लिए यह ढूढ़ना पड़ेगा कि क्या उस समय वायुगतिकी का सिद्धांत, विमान बनाने का डिजाईन, विमान की बॉडी बनाने हेतु सम्मिश्र का निर्माण आदि का ज्ञान उपलब्ध था। इन सभी तकनीकी विवरणों के अभाव में यह दावा करना कि रामायण काल के लोगों को विमान प्रौद्योगिकी का ज्ञान था सर्वथा असंगत है।

प्राचीन भारत में विमान प्रौद्योगिकी के होने के समर्थन में यह तर्क दिया जाता है कि यदि हम महर्षि भारद्वाज की रचना ‘वृहद विमानशास्त्र’ तथा राजा भोज की रचना ‘समरांगण सूत्रधार’ की सही ढंग से व्याख्या करना सीख लें तो तत्कालीन विमान प्रौद्योगिकी का विस्तृत वर्णन प्राप्त हो सकता है। परंतु इन दोनों रचनाओं में भी संतोषजनक विवरण प्राप्त नहीं होता है। प्रसिद्ध खगोलशास्त्री जयंत विष्णु नार्लीकर अपनी पुस्तक ‘साइंटिफिक एज : फ्रॉम वैदिक टू मॉडर्न साइंटिस्ट_ Scientific Age from Vedic to Modern Scientist’ में इन दोनों पुस्तकों की प्रमाणिकता का खंडन कर चुके हैं। उनका कहना है कि यहाँ पर विमान शब्द के बारे में भी भ्रम उत्पन्न हुआ है। ‘विमान हवाई जहाज को भी कहते हैं और बड़े मकानों में सुंदर वास्तुकला का उपयोग करते हुए ऊपरी मंजिल पर निकलने वाली खिड़कियों को भी विमान कहते हैं। राजा भोज की रचना में खिड़की का अनेक स्थानों पर वर्णन है।’ मुझे लगता है कि यह ग्रंथ वैमानिक शास्त्र से अधिक वास्तुशास्त्र से संबंधित है।

वैदिक गणित: आखिर कितना वैदिक_Vedic Math True or False?
‘वैदिकगणित’ नामक पुस्तक में जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी श्री भारती कृष्ण तीर्थजी महाराज_Jagat Guru Shankaracharya Sri Bharati Krishna Tirth Ji Maharaj ने कई गणितीय सूत्रों का वर्णन किया है। इनके बारे में उनका कहना है कि उन्होंने अथर्ववेद के परिशिष्ट से सोलह सरल गणितीय सूत्र एवं तेरह उपसूत्र प्राप्त किये हैं। परंतु आजतक अथर्ववेद के किसी भी परिशिष्ट में ये सूत्र व उपसूत्र प्राप्त नहीं हुए हैं। इससे वैदिक गणित के वैदिक होने पर प्रश्नचिन्ह खड़ा हो जाता है। वास्तव में ये सूत्र वैदिक काल के नहीं, बल्कि आधुनिक काल के हैं। मुझे लगता है कि स्वामीजी का वैदिक गणित ‘प्रक्षिप्त’ का एक उदाहरण है। संस्कृत शब्द प्रक्षिप्त से अभिप्राय है अपनी बातों को अधिक महत्वपूर्ण बनाने के लिए अपनी रचना को किसी प्रसिद्ध विद्वान या साहित्यिक रचना से जोड़ देना। स्वामीजी ने ऐसा ही किया और अपने सरल गणितीय खोजों को अथर्ववेद से जोड़ दिया ताकि उनके कार्यों को बेहतर स्वीकार्यता एवं सम्मान मिल सके। अत: यह सिद्ध होता है कि वैदिक गणित ‘वैदिक’ नहीं है।

अंत में यही कहा जा सकता है कि यह दावा कि वेदों में या प्राचीन भारत में हमारे पूर्वजों ने आधुनिक विज्ञान के सभी आविष्कारों को खोज लिया था, प्रमाणिकता के कसौटी पर खरा नहीं उतरता है। आज आक्रमक तरीके से यह विचार सामने लाने की खूब कोशिश होती है कि प्राचीन भारत आधुनिक काल से अधिक वैज्ञानिक और प्रौद्योगिकी सम्पन्न था। जबकि आधुनिकता में प्राचीन भारतीय विज्ञान का विरोध तो होता ही नहीं है, विरोध तो रूढ़ियों का होता है।
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लेखक परिचय: 
 श्री प्रदीप कुमार यूं तो अभी इंटरमीडिएट के विद्यार्थी हैं, किन्तु विज्ञान संचार को लेकर उनके भीतर अपार उत्साह है। आपकी ब्रह्मांड विज्ञान में गहरी रूचि है और भविष्य में विज्ञान की इसी शाखा में कार्य करना चाहते हैं। वे इस छोटी सी उम्र में 'वैज्ञानिक ब्रह्मांड' नामक ब्लॉग का भी संचालन कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त आप 'साइंस ब्लॉगर्स असोसिएशन' के भी सक्रिय सदस्य के रूप में जाने जाते हैं। आपसे निम्न ईमेल आईडी पर संपर्क किया जा सकता है:

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Scientific World: वेदों में विज्ञान बनाम प्राचीन भारत में विज्ञान, एक बेबाक विश्लेषण
वेदों में विज्ञान बनाम प्राचीन भारत में विज्ञान, एक बेबाक विश्लेषण
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