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सेहत से खेलता रसायनों का ज़हर

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Agricultural Pesticides and Human Health in Hindi

खेती में कीटनाशकों के अंधाधुंध प्रयोग से कहीं, 07 वर्ष की लड़कियों में माहवारी शुरू हो रही है, तो कहीं मनुष्यों के सेक्स में ही परिवर्तन हुआ जा रहा है। विश्व बैंक के अनुसार दुनिया में 25 लाख लोग प्रतिवर्ष कीटनाशकों के दुष्प्रभावों के शिकार होते हैं, जिसमें से 05 लाख लोग काल के गाल में समा जाते हैं। फसलों में कीटनाशकों का बढ़ता हुआ प्रयोग क्या कहर बरपा रहा है, पढें इस शोधपरक लेख में।
खेतों के ज़रिये शरीर में उतरता ज़हर
कृषि रसायनों से दूषित होता पर्यावरण एवं स्वास्थ्य

-सुशील कुमार शर्मा

एक समय था जब घर में भोजन बनते ही सारा घर महक उठता था। मेरी माँ आँगन में बिर्रा (गेहूं एवं चना के मिश्रण) की रोटियां एवं आलू प्याज की तली सब्जी बनाती थी और हम दोनों भाई चटखारे ले कर कहते थे। वह स्वाद आज भी मुँह में पानी भर देता है। आज भी माँ रोटी बनाती है, वही स्नेह है, लेकिन स्वाद में बहुत अंतर आ गया है। क्या कारण है कि धीरे धीरे अनाज एवं सब्जियों में से वह न भुलाने वाला स्वाद लुप्त होता जा रहा है। सब्जियों एवं खाद्यान्नों की ऊर्जा का ह्राष हो रहा है। कृषि रसायनों (Agricultural chemicals) ने हमारी मिट्टी, पानी, हवा और सम्पूर्ण पर्यावरण को प्रदूषित कर दिया है। सबसे गंभीर प्रभाव हमारे स्वास्थ्य पर हुए हैं। यही जहरीले रसायन (Toxic chemicals) फलों, सब्जियों, अनाजों, दालों, मसालों, खाद्य तेलों, दूध, अंडे, मांस, पानी आदि के साथ आपके शरीर में प्रवेश कर आपकी सेहत को तबाह करते हैं।

Agricultural Pesticides and Human Health
आमतौर पर यह माना जाता है कि ज्यादा मात्रा में रासायनिक खाद (Chemical fertilizer) एवं कीटनाशक (Pesticide) इस्तेमाल करने से उत्पादन बढ़ाया जा सकता है और उत्पादन बढ़ने से किसान का मुनाफा बढ़ सकता है। सरकार भी किसानों को वैज्ञानिक ढंग से खेती करने की सलाह देती है, लेकिन इस वैज्ञानिक विधि का अर्थ सिर्फ और सिर्फ रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल तक ही सीमित होता है। 

अमेरिका में हुए अनुसन्धान से ज्ञात होता है कि जब कीटनाशी रसायनों का पेड़-पौधों, सब्जियों और फलों पर छिड़काव किया जाता है, तो इन रसायनों की 01 % मात्रा ही सही लक्ष्य तक प्रभावी हो पाती है, शेष 99 % रसायन पर्यावरण को प्रदूषित करता है। 

देश में फसलों पर हर वर्ष 25 लाख टन पेस्टीसाइड (Pesticide) का प्रयोग होता है। इस प्रकार हर वर्ष 10 हजार करोड़ रुपए खेती में इस्तेमाल होने वाले पेस्टीसाइडों पर खर्च हो जाते हैं। आज खतरा केवल रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के बढ़ते प्रयोग से ही नहीं है, बल्कि खाद्य पदार्थों मे जिस तरह मिलावट का धंधा फल-फूल रहा है, वह मानवीय स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा बन गया है।

सब्जियों में जहरीले रसायनों की संख्या दिन प्रतिदिनन बढ़ रही है। एक आकलन के अनुसार वर्तमान में ही हम रोजाना 0.5 मि.ली. ग्राम जहर ले रहे हैं। परवल को रंगा जा रहा है, सब्जियों के आकार को जल्दी बडा करने के लिए उसमें आक्सीटोसिन (Oxytocin) का इंजेक्शन लगाया जा रहा है। यह प्रयोग बेल वाली सब्जी पर सबसे ज्यादा किया जाता है, इससे सब्जियों की लम्बाई चौड़ाई जल्दी बढ़ जाती है और किसान ज्यादा मुनाफा कमाते हैं। 

बासी सब्जियों को मैलाथियान (malathion) के घोल में 10 मिनट तक डाला जाता है, ताकि सब्जी 24 घंटे तक ताजा रहे। इसका प्रयोग भिन्डी, गोभी, मिर्च, परवल, लौकी, पत्ता गोभी पर किया जाता है। रासायनिक खाद और कीटनाशकों के इस्तेमाल से अनाज, सब्जियां, दूध और पानी जो इंसान के जीवन का प्रमुख आधार हैं जहरीले बनते जा रहे हैं। इस वजह से इंसानी जीवन धीरे-धीरे खतरे में पड़ता जा रहा है।

आज दिल का दौरा (Heart attack), मधुमेह (Sugar), रक्त चाप (Blood pressure), एवं अन्य कई प्रकार की बीमारियां आम होती जा रही हैं। इसका एक बहुत बड़ा कारण यह है कि आज हम जो भी खाते हैं, उसमें रासायनिक तत्वों की अधिकता इतनी ज्यादा होती है कि हमारा खाना मीठा जहर बन चुका है।

चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय कानपुर (Chandra Shekhar Azad University of Agriculture & Technology, Kanpur) के वैज्ञानिकों के अनुसार गेहूँ (Wheat) की फसल में उर्वरकों का प्रयोग बढ़ने से रोटी में भी उर्वरक अवशेष बढ़ते जा रहे हैं। यही कारण है कि कृषि रसायन शरीर में रक्त के साथ बह रहे हैं। इसका प्रमाण पंजाब के भटिंडा और मुक्तसर जिले हैं, जहां के ग्रामीणों की रक्त करने में 13 तरह के कीटनाशक पाये गये हैं।

विश्व बैंक (World Bank) द्वारा किये गए अध्यन के अनुसार दुनिया में 25 लाख लोग प्रतिवर्ष कीटनाशकों के दुष्प्रभावों के शिकार होते है, उसमे से 5 लाख लोग तक़रीबन काल के गाल में समा जाते हैं। लम्बे समय तक ऐसे गेहूँ के प्रयोग से हार्ट (Heart) तथा यकृत (Liver) से संबंधित बीमारियां हो सकती हैं या लकवा (Paralysis) भी हो सकता है।

गन्ने (Sugarcane) की सघन खेती वाले क्षेत्रों में लड़कियों में 07 वर्ष की उम्र में ही माहवारी (Menstruation) शुरू हो गई। पक्षियों के अंडों के छिलके इतने पतले हो गए कि वे असानी से फूट जाते थे। डी.डी.टी. (DDT) से सेक्स में परिवर्तन के लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं। यानि कि, ये रसायन हमारी अनुवांशिकता के वाहक क्रोमोजोम्स (Chromosome) पर स्थित जीन्स की संरचना में भी अवांछित परिवर्तन करने में सक्षम हैं।

रासायनिक खाद कीटनाशी फफूंदनाशी खरपतवारनाशी रसायनों के उपयोग के दौरान संपर्क में आने पर वे किसानों के आंख, नाक, त्वचा और होठों की कोशिकाओं के मार्फत शरीर में प्रवेश कर रक्त के साथ वीर्य (Semen) में पहुँचकर उसकी पी.एच. कम करके उसे अम्लीय बना देते हैं तथा प्रति एम.एल. वीर्य में शुक्राणुओं की संख्या 7.5 करोड़ से घटकर 4.4 करोड़ रह जाती है। क्षतिग्रस्त शुक्राणुओं (Sperms) की संख्या भी बढ़ जाती है। इन सब बातों से उनकी प्रजनन क्षमता (Fertility) पर बुरा प्रभाव पड़ता है।

कृषि रसायनों (Agricultural chemicals) का भरपूर प्रयोग करने वाले फार्मों में तथा उनके समीप रहने वाले बच्चों का बौद्धिक स्तर (IQ Level) फार्म से दूर रहने वाले बच्चों की तुलना में काफी नीचा है। वृध्दों के भूलने की बीमारी अलजाइमर (Alzheimer) का संबंध भी कृषि रसायनों से जुड़ा पाया गया है। यानि ये रसायन मनुष्य की मानसिक क्षमता (Mental capacity) को भी कम कर रहे हैं।

हमें अपनी सुरक्षा स्वयं करनी होगी। खेत में जैव-विविधता (Biodiversity) होनी चाहिये यानी कि केवल एक किस्म की फसल न बो कर खेत में एक ही समय पर कई किस्म की फसल बोनी चाहियें। जैव-विवधता या मिश्रित खेती मिट्टी की उत्पादकता बढ़ाने और कीटों का नियन्त्रण करने, दोनों में सहायक सिद्ध होती है। जहाँ तक सम्भव हो सके हर खेत में फली वाली या दलहनी (दो दाने वाली) एवं कपास, गेहूँ या चावल जैसी एक दाने वाली फसलों को मिला कर बोएँ। दलहनी या फली वाली फसलें नाइट्रोजन (Nitrogen) की पूर्ति में सहायक होती हैं। एक ही फसल यानी कि कपास इत्यादि की भी एक ही किस्म को न बो कर भिन्न-भिन्न किस्मों का प्रयोग करना चाहिए। फसल-चक्र में भी समय-समय पर बदलाव करना चाहिये। 

एक ही तरह की फसल बार-बार लेने से मिट्टी से कुछ तत्व खत्म हो जाते हैं एवं कुछ विशेष कीटों और खरपतवारों को लगातार पनपने का मौका मिलता है। कीटनाशकों का प्रयोग करके हम पौधा खाने वाले कीड़े के साथ साथ उन कीड़ों को नष्ट कर रहे हैं, जो हानिकारक कीड़ों को खाते हैं. इस तरह हम समस्या के साथ साथ समाधान का भी उन्मूलन कर रहे थे और कीड़ों में उन कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधक क्षमता उत्पन्न हो रही थी, इसके अलावा लाखों रूपये कीटनाशकों पर व्यय हो रहे थे, जो किसानो को लाभ के रूप में प्राप्त हो सकते थे।

हम सुबह से लेकर रात के भोजन तक जो भी हम अपने शरीर में ग्रहण करते हैं, उसका महत्व हमारे अस्तित्व से जुड़ा है। परेशान किसान अब रासायनिक खाद व कीटनाशकों के चक्रव्यूह से निकलना चाहता है ताकि भूमि को फिर से उर्वरक बनाया जा सके। 

जब तक हम प्राकृतिक संसाधनों के अविवेकपूर्ण दोहन पर विराम नहीं लगायेंगे, पर्यावरण संरक्षण (Environment protection) व संवर्द्धन की बात निरर्थक होगी। हमें किसानों को हर संभव सहायता देनी होगी, जिससे कि वे अपने आपको मंहगी कृषि पद्धतियों (Expensive agricultural practices) तथा कीटनाशकों (Pesticides) के चक्र से मुक्त कर सतत पोषनीय तथा स्वस्थ कृषि में संलग्न हो सकें। धरती में इतनी क्षमता है कि वह सब की जरूरतों को पूरा कर सकती है, लेकिन किसी के लालच को पूरा करने में वह सक्षम नहीं है।
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लेखक परिचय: 
सुशील कुमार शर्मा व्यवहारिक भूगर्भ शास्त्र और अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक हैं। इसके साथ ही आपने बी.एड. की उपाध‍ि भी प्राप्त की है। आप वर्तमान में शासकीय आदर्श उच्च माध्य विद्यालय, गाडरवारा, मध्य प्रदेश में वरिष्ठ अध्यापक (अंग्रेजी) के पद पर कार्यरत हैं। आप सामाजिक एवं वैज्ञानिक मुद्दों पर चिंतन करने वाले लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं तथा अापकी रचनाएं 'हिन्दी वर्ल्ड' सहित विभ‍िन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाश‍ित होती रही हैं। आपसे सुशील कुमार शर्मा (वरिष्ठ अध्यापक), कोचर कॉलोनी, तपोवन स्कूल के पास, गाडरवारा, जिला-नरसिंहपुर, पिन -487551 (MP) के पते पर सम्पर्क किया जा सकता है।

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सेहत से खेलता रसायनों का ज़हर
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