गाजर घास, कुर्री तथा जलकुम्भी नियंत्रण के उपाय।

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गाजर घास, कुर्री तथा जलकुम्‍भी के उपयोग तथा उनके नियंत्रण के आसान उपाय।

घातक खरपतवार गाजर घास, कुर्री 
तथा जलकुम्भी का उपयोग द्वारा नियन्त्रण

-डॉ. अरविन्द सिंह

विदेशी मूल की वनस्पतियों गाजर घास, कुर्री एवं जलकुम्भी की गिनती भारत के घातक खरपतवारों में होती है जिनका विनाश एक दुष्कर कार्य है। लेकिन इनमें कुछ लाभकारी गुण भी मौजूद हैं जो इन्हें उपयोगी बनाते हैं। अतः इन खरपतवारों के उपयोग से इनके विस्तार को रोका जा सकता है।

खरपतवार वह अनावश्यक पौधे होते हैं जो कि आमतौर पर वहाँ उगते हैं जहाँ उनकी आवश्यकता नहीं होती है। खरपतवार न केवल फसलों को क्षति पहुँचाते हैं अपितु उपजाऊ भूमि को बेकार भूमि में तब्दील कर देते हैं। इसके अतिरिक्त खरपतवार वन, घास के मैदान, तालाबों, नदियों, झीलों जैसे महत्वपूर्ण पारितन्त्रों (Ecosystem) की जैव-विविधता को भी प्रभावित करते हैं।

गाजर घास, कुर्री तथा जलकुम्भी विदेशी मूल के ऐसे ही घातक खरपतरवार हैं जो आज देश के लिए समस्या साबित हो रहे हैं। इनका विनाश एक दुष्कर कार्य है क्योंकि देश में इन खरपतवारों के नियन्त्रण के लिए विभिन्न प्रकार के रासायनिक खरपतवारनाशकों का उपयोग वृहद पैमाने पर होता है। उदाहरण के लिए गाजर घास के नियंत्रण के लिए एट्राजीन, पैराक्वाट, डाइयरान, डेलपान तथा ग्लाईफासेट जैसे शाकनाशकों का उपयोग होता है जबकि कुर्री के नियन्त्रण के लिए 2, 4-डी (2, 4-Dichlorophenoxyacetic acid) तथा 2,4,5-टी (2,4,5-Trichlorophenoxyacetic acid) जैसे खरपतवारनाशकों का उपयोग होता है।

जलकुम्भी जैसे जलीय खरपतवार के नियन्त्रण के लिए पैराक्वाट तथा 2,4-डी का प्रयोग होता है। खरपतवारनाशकों के प्रयोग से पर्यावरण तो प्रदूषित होता ही है साथ ही आर्थिक क्षति भी उठानी पड़ती है। इन हानिकारक पौधों में कुछ लाभकारी गुण मौजूद हैं जिससे इनका उपयोग कर न सिर्फ इनसे लाभ की प्राप्ति की जा सकती है अपितु इन पर प्रभावी नियंत्रण भी पाया जा सकता है। इन खरपतवारों एवं उनके लाभकारी गुणों का वर्णन निम्नलिखित है:
Gajar Ghas - Parthenium hysterophorus
गाजर घास:
गाजर घास उष्णकटिबंधीय अमेरीकी मूल का शाकीय पौधा है जो आज देश के मैदानी क्षेत्रों में समस्या बना हुआ है। चूंकि पौधे की पत्तियाँ गाजर की पत्तियों के समान होती हैं इसलिए इसे गाजर घास के नाम से जाना जाता है। इस पौधे को ‘कांग्रेस घास’ तथा ‘चमक चाँदनी’ नामों से भी जाना जाता है। गाजर घास का वैज्ञानिक नाम पार्थिनियम हिट्रोफोरस (Parthenium hysterophorus) है और यह पौधा पुष्पीय पौधों के एस्टेरेसी (Asteraceae) कुल का सदस्य है। पौधे की औसत ऊँचाई 1 मीटर तक होती है।

भारत में इस पौधे का आगमन अमेरिका तथा मेक्सिको से आयातित गेहुँ की विभिन्न प्रजातियों के साथ हुआ था। सर्वप्रथम इस पौधे को 1956 में पुणे, महाराष्ट्र में देखा गया था। आज इस विदेशी मूल के पौधे ने देश के मैदानी क्षेत्रों में आतंक मचा रखा है। गाजर घास का एक पौधा 25,000 से भी ज्यादा बीज पैदा करता है जिनका फैलाव दूर-दूर तक वायु द्वारा होता है। यह हानिकारक पौधा फसलों के उत्पादन को प्रभावित करने के साथ-साथ मनुष्य एवं पालतू पशुओं के स्वास्थ्य लिए भी हानिकारक है।

गाजर घास के पराग से मनुष्यों में श्वास सम्बन्धी बिमारियाँ जैसे दमा, ब्रान्काइटिस आदि पैदा होती हैं। जबकि पशुओं में इस पौधे से त्वचा बिमारियाँ होती हैं। गाजर घास मृदा में उपस्थित नाइट्रोजन स्थिरीकरण में सहायक राइजोबियम जीवाणुओं के विकास एवं विस्तार पर विपरीत प्रभाव डालता है। इसके कारण दलहनी फसलों में जड़ ग्रन्थियों की संख्या 60 प्रतिशत तक घट जाती है। यह पौधा जहाँ उगता है वहां यह पौधों की अन्य प्रजातियों को विस्थापित कर अपना एकाधिकार स्थापित कर लेता है जिससे जैव-विविधता की क्षति होती है।

गाजर घास के लाभकारी गुण:
गाजर घास घातक खरपतवार को हरी खाद के रूप में उपयोग कर इसको नियन्त्रित किया जा सकता है। पौधे में 1.5 से 2 प्रतिशत तक नाइट्रोजन की मात्रा होती है। गाजर घास को पुष्पित होने से पूर्व ही काटकर कृषि भूमि पर फैलाकर जुताई कर देने से भूमि की उर्वरा शक्ति बढ़ जाती है। खेत में जीवांश पदार्थों की वृद्धि के साथ-साथ नाइट्रोजन की मात्रा में भी वृद्धि होती है। जीवांश पदार्थों की वृद्धि के कारण मिट्टी की जल धारण क्षमता भी बढ़ जाती है परिणामस्वरूप कम वर्षा में भी फसल की पैदावार अच्छी होती है। जीवांश पदार्थ मृदा की संरचना में भी सुधार करते हैं जिससे जल तथा वायु द्वारा मृदा अपरदन की संभावनायें क्षीण हो जाती है। पौधों को कच्चे माल के रूप में जैव-गैस संयंत्र में उपयोग किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, गाजर घास के सूखे पौधे का उपयोग केंचुआ खाद निर्माण हेतु भी किया जा सकता है।

गाजर घास की पत्तियों का रस अलसी के बीजों की अंकुरण क्षमता को बढ़ाता है अतः इस हानिकारक पौधे का उपयोग बीज अंकुरण हेतु किया जा सकता है। पत्तियों से ही प्राप्त अर्क का उपयोग पिस्सू को दूर करने में किया जा सकता है। गाजर घास की जड़ों का अर्क पेचिस जैसी बिमारियों के उपचार में कारगर होता है।
कुर्री:
Kurri - Lantana camaraयह एक झाड़ीनुमा सदाबहार बहुवर्षीय पौधा है। इसका वैज्ञानिक नाम लैण्टाना कमरा (Lantana camara) है जो पुष्पीय पौधों के वरविनेसी (Verbenaceae) कुल का सदस्य है। इसे वनों का कैंसर भी कहा जाता है। कुर्री भी गाजर घास की तरह उष्णकटिबंधीय अमेरिकी मूल की वनस्पति है जिसे अंग्रेज शासन के दौरान भारत में सजावटी पौधे के रूप में पड़ोसी देश श्रीलंका से लाया गया था। आज यह पौधा पूरे देश में विशेषकर उत्तर भारत के पहाड़ी राज्यों जैसे उत्तराखण्ड तथा हिमाचल प्रदेश में एक प्रमुख समस्या बना हुआ है।

कुर्री के आक्रमण के फलस्वरूप इन राज्यों के वनों की जैव-विविधता पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। इसके अतिरिक्त यह कृषि भूमि में भी अपने आप को स्थापित कर फसलों को नुकसान पहुँचा रहा है। कुर्री की जड़े आमतौर से सतही होती हैं जो मृदा की ऊपरी सतह से पोषक तत्वों को अवशोषित कर फसलों को नुकसान पहुँचाती हैं।

कुर्री के लाभकारी गुण:
कुर्री के पत्तियों में मच्छर भगाने के गुण होते हैं अतः कुर्री की सुखी पत्तियों को जलाकर मच्छरों को दूर किया जा सकता है अथवा इसकी पत्तियों से मच्छररोधी उत्पादों का निर्माण किया जा सकता है। कुर्री का तना एवं लचीली शाखायें दीमकरोधी होती हैं अतः तनों तथा शाखाओं का उपयोग साज-सामग्री, डलिया, कुर्सी, मेज आदि के निर्माण में किया जा सकता है। कुर्री कम होती बांस (बैम्बू) वनस्पति का विकल्प साबित हो सकता है।

ग्रामीण क्षेत्रों में लकड़ी के स्थान पर कुर्री के तने को ऊर्जा उत्पादन हेतु गैसीफायर संयंत्र में किया जा सकता है। कुर्री की शाखाओं को हरी खाद के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है। कुर्री में औषधीय गुण भी पाये जाते हैं। पत्तियों का अर्क मलेरिया, टिटनस एवं गठिया रोगों के उपचार में उपयोगी होता है।

जलकुम्भी:
यह एक जलीय शाकीय पौधा है जिसका वैज्ञानिक नाम आइकार्निया क्रेसपीस है। यह वनस्पति पुष्पीय पौधों के पाण्टीडेरीयेसी कुल की सदस्य है। यह स्वतन्त्र रूप से जल में तैरने वाला पौधा है। जलकुम्भी को भी अंग्रेज शासन के दौरान सजावटी पौधे के रूप में सर्वप्रथम बंगाल में प्रवेश कराया गया था।

Jalkumbhiजलकुम्भी मीठे जल जैसे तालाबों, नदियों, नहरों, झीलों आदि में विशेषकर वर्षा ऋतु में बहुतायत में उगता है जिसके परिणामस्वरूप, नौकायन, मछली पकड़ने आदि में व्यवधान उत्पन्न होता है। जलकुम्भी खरपतवार के रूप में धान, मखाना, सिंघाड़ा जैसी फसलों के उत्पादन को प्रभावित करती है। भारत में जलकुम्भी का सर्वाधिक हानिकारक प्रभाव पश्चिम बंगाल, असम, बिहार और आन्ध्र प्रदेश राज्यों में देखा गया है। जलकुम्भी के घातक स्वरूप को देखते हुए इसे ‘बंगाल के आतंक’ तथा ‘नीला शैतान’ जैसे नामों से भी पुकारा जाता है।

जलकुम्भी के लाभकारी गुण:
जलकुम्भी वनस्पति में नाइट्रोजन की मात्रा 2 प्रतिशत से ज्यादा होती है। अतः पौधे को हरी खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में पौधे का उपयोग जैव-गैस संयंत्रों में कच्चे पदार्थ के रूप में किया जा सकता है। जलकुम्भी मुलायम होने के कारण आसानी से विघटित होने वाली वनस्पति है। इसी गुण के कारण जलकुम्भी जैव-गैस उत्पादन के लिए वरदान साबित हो सकता है। इसके अतिरिक्त, जलकुम्भी को पालतू पशुओं हेतु चारे के रूप में भी उपयोग किया जा सकता है। जैव-गैस संयंत्र में जलकुम्भी के उपयोग से गोबर की बचत होगी जिसे खाद के रूप में खेतों में उपयोग किया जा सकता है।

जलकुम्भी पौधे का उपयोग कम्पोस्ट बनाने हेतु भी किया जा सकता है। जलकुम्भी से तैयार कम्पोस्ट को गृह वाटिका में सब्जियों, फलों तथा सजावटी पौधों को उगाने में प्रयोग किया जा सकता है। इसके अतिरिक्त, जलकुम्भी कम्पोस्ट को नर्सरी में पौधो को तैयार करने हेतु भी किया जा सकता है। कम्पोस्ट को जमीन से निकाले गये पौधों की जड़ो की नमी को बनाये रखने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। जलकुम्भी का उपयोग दावा (लेयरिंग) तथा रोपण (ग्राफ्टिंग) में भी किया जा सकता है।

जलकुम्भी में जल के प्रदूषकों को अवशोषित करने की क्षमता होती है। अतः पौधे का उपयोग जल शोधन में भी किया जा सकता है। बाद में ऐसे पौधों को जलाकर अभवा भूमि में गाड़कर नष्ट किया जा सकता है।
निष्कर्ष:
गाजर घास, कुर्री एवं जलकुम्भी विदेशी मूल के वह घातक खरपतवार हैं जो आज देश के लिए अभिशाप बन गए हैं। इनके भरमार से न केवल फसल पैदावार प्रभावित होती है अपितु आवास में इनके एकाधिकार के कारण देसी पौधों की प्रजातियाँ विस्थापित हो जाती हैं जिसके जैव-विविधता का क्षय होता है। इन वनस्पतियों के नियन्त्रण हेतु आमतौर से वृहद पैमाने पर खरपतवारनाशकों का उपयोग होता है जिससे वातावरण प्रदूषित होता है और साथ ही लागत भी आती है। अतः इन घातक खरपतवारों में उपस्थित उपयोगी गुणों से न सिर्फ लाभान्वित हुआ जा सकता है अपितु इन पर प्रभावी नियंत्रण भी पाया जा सकता है।

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लेखक परिचय:

डॉ. अरविंद सिंह वनस्पति विज्ञान विषय से एम.एस-सी. और पी-एच.डी. हैं। आपकी विशेषज्ञता का क्षेत्र पारिस्थितिक विज्ञान है। आप एक समर्पित शोधकर्ता हैं और राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की शोध पत्रिकाओं में अब तक आपके 4 दर्जन से अध‍िक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। खनन गतिविधियों से प्रभावित भूमि का पुनरूत्थान आपके शोध का प्रमुख विषय है। इसके अतिरिक्त आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मुख्य परिसर की वनस्पतियों पर भी अनुसंधान किया है। आपके अंग्रेज़ी में लिखे विज्ञान विषयक आलेख 'Science Log' पर पढ़े जा सकते हैं। आपसे निम्न ईमेल आईडी पर संपर्क किया जा सकता है-
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Scientific World: गाजर घास, कुर्री तथा जलकुम्भी नियंत्रण के उपाय।
गाजर घास, कुर्री तथा जलकुम्भी नियंत्रण के उपाय।
गाजर घास, कुर्री तथा जलकुम्‍भी के उपयोग तथा उनके नियंत्रण के आसान उपाय।
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