क्‍या ईश्‍वर को वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित किया जा सकता है?

SHARE:

आधुनिक वैज्ञानिक यह मानते हैं कि सृष्टि की उत्पत्ति बिग-बैंग से हुई है। महाविस्फोट सिद्धांत (The...

आधुनिक वैज्ञानिक यह मानते हैं कि सृष्टि की उत्पत्ति बिग-बैंग से हुई है। महाविस्फोट सिद्धांत (The Bing Bang Theory) के अनुसार लगभग 14 अरब वर्ष पूर्व एक विचित्रबिंदु (सिंगुलैरिटी) के महाविस्फोट से अंतरिक्ष, ऊर्जा, मूलकण और हिग्स-बोसोन जैसे कणों की उत्पत्ति के साथ ब्रह्मांड का सृजन हुआ, जो आज तक फैल रहा है। लेकिन इसके विपरीत कुछ आलोचक हैं जो बराबर यह बात उठाते रहे हैं कि वैज्ञानिक पहले सिर्फ ये बताएं कि वो विचित्रबिंदु, जिसमें महाविस्‍फोट हुआ था, वह कहां से आया था और बिना अंतरिक्ष के वह कहां रहा था?

इन्‍हीं आलोचकों में शामिल हैं फिरोजाबाद, उ.प्र. निवासी के.पी.सिंह, जिन्‍होंने अपनी पुस्‍तक 'ब्रह्मांड: एक अंतिम खोज' में 'निर्वात सिद्धांत' के आधार पर उक्‍त गुत्‍थी को सुलझाने का दावा किया है। श्री सिंह का यह लेख निश्‍चय ही अनेक रोचक एवं महत्‍वपूर्ण सिद्धांतों की बात करता है, जिनपर परिचर्चा की जा सकती है। क्‍या ये विचार बिन्‍दु वास्‍तव में किसी ठोस धरातल को प्रदान करते हैं या फिर Pseudoscience का ही एक रूप मात्र हैं? इसी उद्देश्‍य से श्री सिंह का यह लेख यहां पर अविकल रूप में प्रस्‍तुत किया जा रहा है:

शून्य, ब्रह्म, ईश्वर, परमात्मा, भगवान और सृष्टि का वैज्ञानिक आधार क्या है?

लेखक के. पी. सिंह
ईश्वर क्या है और सृष्टि की उत्पत्ति कैसे हुई? इन्हें जानने की जिज्ञासा हमारे अंदर आज भी बनी हुई है। इसके लिए हमें ब्रह्म, शून्य, परमात्मा-आत्मा और निर्गुण-सगुण आदि शब्दों का वास्तविक प्रयोजन जानना होगा कि इनको किस सैद्धांतिक लक्ष्य के लिए प्रयोग किया गया था। इनके संबंध में भारतीय दर्शन को गंभीरता से समझने पर ज्ञात होता है कि प्राचीन भारतीय दार्शनिक सृष्टि के उस आधारभूत कारण की खोज में थे, जिससे सृष्टि की उत्पत्ति हुई, और उसी से ईश्वर का रहस्य भी खुलता है। क्योंकि सृष्टि को समझकर ही ईश्वर को समझा जा सकता है। यदि हम भारतीय दर्शन को आज के वैज्ञानिक दृष्टिकोण से समझें तो यह प्रमाणित हो जाएगा है कि प्राचीन भारतीय दार्शनिकों ने हजारों साल पहले ही सृष्टि की उत्पत्ति के रहस्य का अंतिम सैद्धांतिक कारण जान लिया था, जैसे-
[post_ads]
ऋग्वेद सूक्त 10.129 में, सृष्टि की उत्पत्ति के संबंध में कई ऋषियों के परस्पर विचार इस प्रकार मिलते हैं- (एक ऋषि के अनुसार)-‘‘उस समय न सत् (अस्तित्व) था, न असत् (अनस्तित्व) था। न दिन था, न रात, सिर्फ अंधकार था। न कोई ढकने वाला आवरण था, केवल अनंत रिक्तता (शून्यता) थी। वहां वह एकाकी स्वावलंबी शक्ति से श्वसित था। इसके ऊपर अन्य कोई शक्ति नही थी। उस शक्ति में सृष्टि उत्पन्न करने की इच्छा हुई, जो सृष्टि के प्रांरभ का बीज बनी।। ऋषियों ने अपनी बुद्धि से इस प्रकार का विचार किया और असत् में सत् के कारण को जाना। (अन्य ऋषि...)- निश्चित रूप से कौन जानता है? किसने बताया है? कि उद्भव किससे हुआ है? सृष्टि कहां से हुई? देवता भी सृष्टि के बाद के हैं।। (एक अन्य ऋषि...)- तब वह मूलस्रोत जिससे यह विश्व उत्पन्न हुआ, वह क्या रचा गया? या वह न रचा गया? परम आकाश में जो नियामक है, सर्वदर्शी है, वह जानता होगा, न भी जानता होगा।।’’

ऋग्वेद के सूक्त की यह एकाकी स्वावलंबी शक्ति, निर्वात सिद्धांत के अनुसार और कुछ नही बल्कि ‘ब्रह्मांडीय निर्वात’ है, जो ‘कुछ नही’ (रिक्तता) के कारण स्वतः शाश्वत है और निर्वात, गति के सिवाय और कुछ नही, जो स्वयं को भरने की कोशिश करता, लेकिन भरा नही जा सकता, इसलिए यह सदैव गतिशील रहता है। निर्वात जितना प्रबल होगा, वह उतनी ही तीव्र आंतरिक गति में होगा। लेकिन ब्रह्मांडीय निर्वात अनंत है इसीलिए वह परम गति का केन्द्र है, जिसकी केन्द्रहीन आंतरिक गति के घर्षण से उसमें लगातार मूल ऊर्जा पैदा होती है, जिसके संपीडन से साकार ब्रह्मांड (पदार्थ) का सृजन हुआ। इसलिए निर्वातीय ब्रह्मांड स्वचालित है जिसे गति के लिए किसी सहारे की जरूरत नही बल्कि उसका अनंत निर्वात ही उसकी परम गति है। इसके अतिरिक्त उसमें और कुछ नही, न उससे कोई ऊपर है, न उसमें कुछ बाहर से आ सकता है, न उसमें पहले से कुछ भौतिक अस्तित्व हो सकता है। अतः ब्रह्मांड उत्पत्ति की खोज में इससे परे जाने की जरूरत नही, सब कुछ उसी में है और सब उसी से संभव है। (निर्वात सिद्धांत का विस्तार अध्ययन ‘ब्रह्मांडः एक अंतिम खोज’ पुस्तक में दिया गया है) 

अब सूक्त की निर्वात सिद्धांत से तुलना करने पर, जहां- एक ऋषि इस बात पर सुनिश्चित है कि परम निर्वात गति  (एकाकी स्वावलंबी शक्ति) जिससे ऊर्जा उत्पन्न (श्वसित) हो रही थी, वही ऊर्जा निर्वात गति में संपीडित होकर साकार पदार्थ (प्रारंभिक सृष्टि) का बीज बनी। लेकिन दूसरा ऋषि असमंजस में था कि इस शक्ति से ऐसा क्या कुछ उत्पन्न हो सकता है... जो प्रारंभिक सृष्टि का बीज बने। शायद व्यवहारिक विज्ञान के अभाव में यह ऋषि इस बात से अनजान था कि ऊर्जा, गति से ही पैदा होती है और ऊर्जा से ही पदार्थ बनता है, क्योंकि आइंस्टीन के अनुसार भी पदार्थ ऊर्जा का ही रूप है। जबकि अन्य ऋषि की बात का अर्थ है कि, क्या यह सृष्टि उस मूलस्रोत (ऊर्जा) से योजनाबद्ध तरीके से बनाई गई या यह अनुकूल स्थिति में अपने आप रची। इसके बारे में वह परम आकाश जो इस सबका संविधान है, सर्वदर्शी है, शायद! वही इसे अपने तरीके से जानता होगा या न जानता होगा, ये उसी पर निर्भर है।

अतः सृष्टि के संबंध में ऋग्वेदिक ऋषियों ने ऐसी कोई कल्पना नही की जिसपर प्रश्नचिन्ह उठे बल्कि उन्होंने एकाकी स्वावलंबी शक्ति के बारे में सही सोचा, जो इतना प्रमाणिक तथ्य है, जिसे गलत सिद्ध नही किया जा सकता। आगे चलकर इसी सूक्त की एकाकी स्वावलंबी शक्ति ने उपनिषदकारों को भी प्रभावित किया, जिसे उन्होंने ‘ब्रह्म’ कहा। क्योंकि, जब उपनिषदकार याज्ञवल्क्य से पूछा गया कि ब्रह्म क्या है? तो उन्होंने कहा- नेति! नेति! अर्थात् ‘नही-नही’ यानि जो ‘कुछ नही’, वही ब्रह्म है। इसलिए आदि शंकाराचार्य ने भी कहा है- ब्रह्म सभी में है और सभी ब्रह्म में हैं।

गौतम बुद्ध और बौद्ध आचार्य नागार्जुन ने इसी परमसत्ता को शून्य कहा, तो अन्य दार्शनिकों ने इसे परमात्मा कहा। अर्थात् जो अपने आप में परम आत्म है वही परमात्मा (निर्वात) है, और इससे उत्पन्न आत्म ‘आत्मा’ (ऊर्जा) है, जिससे ‘भूत’ (शरीर, पदार्थ) निर्मित हैं। क्योंकि सीधे तौर पर कोई पदार्थ पैदा हो नही सकता, इसलिए उस परमात्मा के आत्म में जो उससे उत्पन्न है उसे ही आत्मा (ऊर्जा) कहा गया। इसलिए गीता में कहा है- आत्मा को न मारा जा सकता है, न काटा जा सकता बल्कि ये एक शरीर से दूसरे शरीर में रूपांतरित होती है। और विज्ञान भी यही कहता है कि ऊर्जा नष्ट नही होती बल्कि रूपांतरित होती है। जब भी पदार्थ (शरीर) का क्षय होता है तब ऊर्जा (आत्मा) निर्वात (परमात्मा) में विलीन हो जाती है, जिसे आध्यात्म में आत्मा का परमात्मा से मिलन कहा जाता है। गीता में भगवान कृष्ण ने अपने को ‘मैं’ बताते हुए कहा है- मैं सभी में हूं और सभी मुझमें है। उनका तात्पर्य निर्वात से ही है जो सभी में है और सभी उसी में हैं।
[next]
भारतीय खगोलज्ञ् आर्यभट (चौथी सदी) जिन्होंने सर्वप्रथम खगोलीय वैज्ञानिक पद्धति को खोजा, ने भी ब्रह्म को ही ब्रह्मांड का सैद्धांतिक सृजनकर्ता मानते हुए अपने ‘आर्यभटीय’ ग्रंथ के ‘दशगीतिका’ के प्रथम अध्याय के प्रथम श्लोक में कहा है-
‘‘जो ब्रह्म कारण रूप से एक होते हुए भी कार्य रूप से अनेक है, जो सत्य देवता परमब्रह्म अर्थात् जगत का मूल कारण है उसको मन, वाणी और कर्म से नमस्कार करके आर्यभट गणित, कालक्रिया और गोलपाद इन तीनों का वर्णन करता हूं।’’

आर्यभट ने इस श्लोक में परमब्रह्म सत्ता को वैज्ञानिक आधार पर स्वीकार किया है, जो जानते थे कि इसके बिना न सृष्टि संभव है, न उसका कोई भी कार्य-रूप। आर्यभट के अनुसार ब्रह्म (निर्वात) ही जगत का मूल कारण है, भले ही वह एकल परमसत्ता है लेकिन उसके द्वारा ही सभी की अलग-अलग प्रकार से गति आदि कार्य-प्रक्रियाएं संपन्न हो रही हैं, जैसे आकाशीय पिंड, जीव-जंतु, वनस्पति आदि सब कुछ ब्रह्मांडीय निर्वात में ही है, जिनमें अलग-अलग गति कार्य इसी ब्रह्म अर्थात निर्वात द्वारा हो रहे हैं, स्वतः नही। और यदि, ब्रह्म का आशय निर्वात सत्ता से न होता तो आर्यभट इसे कभी स्वीकार नही करते क्योंकि उन्होंने चंद्र-सूर्यग्रहण का कारण बताने वाले राहू-केतु जैसे अवैज्ञानिक मत को अस्वीकार कर दिया था। किन्तु, कालांतर में इस ब्रह्म को सृष्टि का निर्माता ‘ब्रह्मा’ कहकर मानवीकरण कर दिया गया।

जिस प्रकार आर्यभट ने ब्रह्म (शून्य) को सृष्टि की परमसत्ता माना, उसी प्रकार महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन ने भी गणित में इसकी सैद्धांतिकता को माना। रामानुजन ‘शून्य’ को परमसत्ता मानते थे जिसकी विविधता को ‘अनंत’ सुस्पष्ट करता है। इसका तात्पर्य है कि शून्य एक परमसत्ता है, जिसकी ऊर्जा से विविध (अनिश्चित) पदार्थ निर्मित हैं और यह विविधता अनंत है जो इसी परमसत्ता में है। क्योंकि शून्य परमसत्ता न होता तो इतनी विविधता उसमें नही आ सकती थी। इसलिए साकार ब्रह्मांड की विविधता की अनंतता उसकी परमसत्ता को सुस्पष्ट करती है। गणित में शून्य और अनंत के गुणनफल को अनिश्चित ( 0 X ¥ = अनिश्चित) माना जाता है जिसका परिणाम कोई भी संख्या हो सकती है। रामानुजन इसे ब्रह्म और सृष्टि से जोड़ते थे, और उनका कहना था कि ‘‘यह गुणनफल केवल अनिश्चित संख्या ही नही है, वास्तम में यह सभी संख्याओं के बराबर है, और सभी अलग-अलग संख्याएं सृजन-क्रिया के अलग-अलग क्रमों के प्रतिरूप हैं।’’

उपरोक्त गणितीय सूत्र का सैद्धांतिक आधार यह है कि शून्य, ब्रह्मांडीय निर्वात गति और अनंत, इससे उत्पन्न मूलऊर्जा है। जिसके गुणनफल से ही पदार्थ बनता है, जैसे

 0 X ¥ = अनिश्चित संख्या

या
ब्रह्मांडीय निर्वात गति X मूल ऊर्जा = संपीडित (केन्द्रित) पदार्थ, उदाहरणार्थ सूर्य-तारे। लेकिन यह सैद्धांतिक सूत्र अलग-अलग पदार्थ अलग-अलग के लिए होगा। यहां ये सिर्फ सूर्य-तारों के लिए है। 

अतः उनके इस रहस्यमयी तथ्य का अर्थ है कि शून्य जो निर्वात और ऊर्जा जो अनंत है, के गुणनफल से ही जैसे सूर्य, तारे, ग्रह, पिंड, जीव, जंतु, वनस्पति आदि के अनिश्चित परिणाम प्राप्त हुए हैं और हो रहे हैं, जो अपनी अनुकूलता में हैं। क्योंकि सृजन-क्रिया से अलग-अलग प्रकार के विविध साकार परिणाम (द्रव्य, पदार्थ) अलग-अलग क्रमों के प्रतिरूप अथवा अलग-अलग क्रमों में अलग-अलग पदार्थ बनते हैं। जबकि पदार्थों की संख्या भले ही असंख्य हो, वह हमेशा शून्य और ऊर्जा के गुणनफल के बराबर ही रहेगी, क्योंकि पदार्थ लगातार बनते रहते हैं तो उन्हें बनाने वाली ऊर्जा भी लगातार उत्पन्न होती है।  

इसी परमसत्ता को ‘ईश्वर’ भी कहा गया है, क्योंकि किसी से पूछो कि क्या तुमने ईश्वर को देखा है, वह कहां है? तो वो इसका एक ही उत्तर देगा- ईश्वर एक अदृश्य परमशक्ति है जिससे सृष्टि उत्पन्न है, और उसी से चल रही है और वही कण-कण में व्याप्त है। तो ऐसा सर्वव्यापी ईश्वर परम निर्वात के अतिरिक्त और क्या हो सकता है, जिससे सृष्टि उत्पन्न है, और परमसूक्ष्म से परमस्थूल इकाइ में बसा जीवन उसी से गतिमान और श्वसनशील है। जबकि संतों ने इसी परमब्रह्म सत्ता को ‘निर्गुण’ कहा, जो सत्त्व, रज तथा तम तीनों गुणों से परे है, यानि बिल्कुल रिक्त, जो कि निर्वात है। लेकिन इसी निर्गुण में साकार (पदार्थ) भी विकसित हुआ है जिसे ‘सगुण’ या साकार ब्रह्म कहा गया।

इसके अतिरिक्त भारतीय तत्ववेत्ताओं ने ये भी प्रमाणिक आधार दिया कि साकार रूप पंचतत्वों (भूमि, गगन, वायु, अग्नि और नीर) से बना है, और प्रकृति के इस साकार पंचतत्व को ही ‘भगवान’ की संक्षिप्त संज्ञा दी गई, जैसे भ = भूमि, ग = गगन, व = वायु, या अ = अग्नि और न = नीर, यानि भगवान। इसलिए हमने जब भी किसी विशेष व्यक्ति को प्रकृति के प्रति सहज पाया तो उसे भी भगवान की उपाधि दे दी गई।

अतः ऋग्वेदिक सूक्त की एकाकी स्वावलंबी शक्ति, ब्रह्म और शून्य आदि का आशय परम शाश्वत सत्ता ब्रह्मांडीय निर्वात से ही है, जिसकी उत्पन्न ऊर्जा ही साकार सृष्टि की उत्पत्ति का आधारभूत कारण साबित होती है। साथ ही परमात्मा, आत्मा तथा भूत का रहस्य निर्वात, ऊर्जा तथा पदार्थ से तुलना करने पर हमारे सामने होता है। क्योंकि ब्रह्मांड के ‘कुछ नही’ को जो अनंत निर्वात (वायड) है, उसी को प्राचीन भारतीय दार्शनिकों ने ब्रह्म, शून्य परमात्मा, ईश्वर, निर्गुण कहा, जिनके गूढ़ रहस्य को समझना ब्रह्मांडीय निर्वात को समझे बिना संभव नही था। इसलिए इनका वैज्ञानिक दृष्टिकोण अबतक एक रहस्य बना रहा।

क्या परमशून्य के इस प्रमाण के बाद भी कोई दूसरी सत्ता संभव है? जिससे सृष्टि उत्पन्न हुई हो और जिसके कारण ये चलायमान हो...? क्या इसे उपेक्षित करके हम सृष्टि के वास्तविक आधार को जान सकते हैं...? क्या इसके बाद भी ईश्वर आदि को जानने की जिज्ञासा शेष रह जाती है...? तो, शून्य अपनी परमसत्ता का अंतिम प्रमाण इस प्रकार भी दे देता है कि यदि शून्य में रहना है तो शून्य का ही पालन करना पड़ेगा। इसीलिए सभी आकाशीय ग्रह-पिंड लगातार घूमकर शून्य बनाते हैं और पृथ्वी के घूमने के साथ हम भी शून्य बना रहे हैं।

यदि इसमें जिसकी गति जहां रुकी वहीं उसका क्षय निश्चित है। क्या शून्य की महत्ता का इससे बड़ा और कोई प्रमाण है, जिसमें सभी शून्य (निर्वात) का पालन कर रहे हों। यह है परमशून्य होने का प्रमाण और उसमें हमारे जीवित होने का प्रणाम यह है कि, यदि हम अपनी नाक-मुह बंद करके श्वास रोक दें तो बिना श्वास के हम या कोई भी जीवित नही रह सकता क्योंकि श्वास गति निर्वात से होती है जो ऑक्सीजन को अंदर ले जाने और कार्बन को बारह लाने का कार्य करती है। और जिसके साथ इसका प्रवाह बना रहता है वह तो जीवित है और जिसमें यह रुक गया है वही निर्जीव-मृत है। इसलिए निर्वात ही परमब्रह्म, परमात्मा, ईश्वर है, जो ब्रह्मांड तक ही सीमित नही बल्कि उसी से हम सभी का जीवन चलता है। और जब हमारा जीवन इसके बिना नही चल सकता तो सृष्टि कैसे चलती।  

हालांकि, वैज्ञानिक जगत व्यवहारिक दक्षता में परिपूर्ण है और ब्रह्मांडीय निर्वात से परिचित होने के बावजूद भी उसने इसकी भौतिकी को नही समझा बल्कि इसे यह सोचकर उपेक्षित कर दिया कि इससे कुछ भी उत्पन्न नही हो सकता, जिससे सृष्टि की उत्पत्ति हो। लेकिन भारतीय दार्शनिक इस बात पर सुनिश्चित थे कि सृष्टि का मूलाधार ब्रह्म (निर्वात) ही है, और कुछ नही। क्योंकि ‘ब्रह्म (निर्वात) $ अंड (केन्द्र)’ को ‘ब्रह्मांड’ कहा गया, जिसकी परम गति से साकार सृष्टि (पदार्थ) का सृजन करने वाली ऊर्जा लगातार उत्पन्न होती है। क्योंकि ब्रह्मांडीय निर्वात ही एकमात्र मूलगति है और अन्य समस्त गतियां इसी का रूपांतरण हैं। फिर भी वैज्ञानिकों ने गति की इस भौतिकी को नही समझा और न माइकल फैराडे के इस इशारे को कि गति ही ऊर्जा पैदा करती है। तब वैज्ञानिकों को ब्रह्मांडीय निर्वात पर ध्यान देना चाहिए था या नही। आखिरकार उसमें भी परम गति किसी प्रयोजन से है।

जबकि आधुनिक वैज्ञानिक सृष्टि की उत्पत्ति बिग-बैंग से मानते हैं। जिनके अनुसार लगभग 14 अरब वर्ष पूर्व, कोई अंतरिक्ष (रिक्तता) नही था बल्कि एक विचित्रबिंदू (सिंगुलैरिटी) था, जिसके महाविस्फोट (बिग-बैंग) से अंतरिक्ष, ऊर्जा, मूलकण और हिग्स-बोसोन जैसे कणों की उत्पत्ति के साथ ब्रह्मांड का सृजन हुआ, जो आज तक फैल रहा है। जिसकी पुष्टि के लिए सर्न में एलएचसी के महाप्रयोग से ‘ईश्वरी कण’ हिग्स-बोसोन की खोज का दावा भी कर दिया गया और जल्दबाजी में पीटर हिग्स को नोबल पुरस्कार दे दिया गया ताकि उनका दावा मजबूत हो जाए। लेकिन विज्ञान वही है जो प्रश्नचिन्ह से परे हो, इसीलिए आज भी विज्ञान के जिज्ञासू यही जानना चाहते हैं कि बिग-बैंग और हिग्स-बोसोन कण की खोज तभी वैज्ञानिक उपलब्धि मानी जा सकती है, जब वैज्ञानिक पहले सिर्फ ये बताएं कि वो विचित्रबिंदू कहां से आया था और बिना अंतरिक्ष के वह कहां रहा था? जिसमें महाविस्फोट हुआ।

इस प्रश्न का जबाव तो अभी तक वैज्ञानिकों ने दिया नही और हिग्स-बोसोन कण की खोज का दावा कर दिया। इसलिए बिग-बैंग और मूलकण भौतिकी जो शुरु से अंत तक प्रश्नचिन्हों से घिरे हैं, उनसे ब्रह्मांड की उत्पत्ति और उसके साकार क्रमिक विकास को कभी पूर्ण परिभाषित नही किया जा सकता बल्कि इसके लिए वैज्ञानिकों को भविष्य में ब्रह्मांडीय निर्वात सिद्धात की शरण में आना पडे़गा, जो किसी भी भौतिकी को परमसूक्ष्मता से परमस्थूलता में परिभाषित कर सकता है।।

K. P.  Singh, Nagla Radhey Lal, Tundla, Firozabad- (U.P.),
Email- almitmission2013@gmail.com, 

उपरोक्त आलेख सिक्के का एक पहलू है। इसके दूसरे पहले को जानने के लिए यह लेख अवश्य पढ़ें: ईश्वर एक अवैज्ञानिक अवधारणा!

keywords: universe in hindi, universe facts in hindi, universe information in hindi, universe meaning in hindi, universe definition in hindi, big bang in hindi, big bang theory in hindi, big bang theory of universe in hindi, god and science in hindi, god and science quotes in hindi, god scientific proof in hindi, god scientific evidence in hindi, god scientifically proven in hindi, rig veda and science, rig veda and modern science, सृष्टि की उत्पत्ति, सृष्टि रचना, सृष्टि की रचना, सृष्टि की रचना कैसे हुई, सृष्टि का निर्माण, ब्रह्मांड की उत्पत्ति, ब्रह्मांड के बारे में जानकारी, ब्रह्मांड के निर्माण, ब्रह्मांड बनने, ब्रह्मांड के रहस्य, ब्रह्मांड कैसे बना, ब्रह्मांड का राज, ईश्वर का अस्तित्व, क्या ईश्वर का अस्तित्व है, ईश्वर और विज्ञान, ईश्वर की वैज्ञानिक व्याख्या,

COMMENTS

BLOGGER: 38
Loading...
नाम

अंतरिक्ष युद्ध,1,अंतर्राष्‍ट्रीय ब्‍लॉगर सम्‍मेलन,1,अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन-2012,1,अतिथि लेखक,2,अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन,1,आजीवन सदस्यता विजेता,1,आटिज्‍म,1,आदिम जनजाति,1,इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी,1,इग्‍नू,1,इच्छा मृत्यु,1,इलेक्ट्रानिकी आपके लिए,1,इलैक्ट्रिक करेंट,1,ईको फ्रैंडली पटाखे,1,एंटी वेनम,2,एक्सोलोटल लार्वा,1,एड्स अनुदान,1,एड्स का खेल,1,एन सी एस टी सी,1,कवक,1,किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज,1,कृत्रिम मांस,1,कृत्रिम वर्षा,1,कैलाश वाजपेयी,1,कोबरा,1,कौमार्य की चाहत,1,क्‍लाउड सीडिंग,1,क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान कथा लेखन,9,खगोल विज्ञान,2,खाद्य पदार्थों की तासीर,1,खाप पंचायत,1,गुफा मानव,1,ग्रीन हाउस गैस,1,चित्र पहेली,201,चीतल,1,चोलानाईकल,1,जन भागीदारी,4,जनसंख्‍या और खाद्यान्‍न समस्‍या,1,जहाँ डॉक्टर न हो,1,जादुई गणित,1,जितेन्‍द्र चौधरी जीतू,1,जी0 एम0 फ़सलें,1,जीवन की खोज,1,जेनेटिक फसलों के दुष्‍प्रभाव,1,जॉय एडम्सन,1,ज्योतिर्विज्ञान,1,ज्योतिष,1,ज्योतिष और विज्ञान,1,ठण्‍ड का आनंद,1,डॉ0 मनोज पटैरिया,1,तस्‍लीम विज्ञान गौरव सम्‍मान,1,द लिविंग फ्लेम,1,दकियानूसी सोच,1,दि इंटरप्रिटेशन ऑफ ड्रीम्स,1,दिल और दिमाग,1,दिव्य शक्ति,1,दुआ-तावीज,2,दैनिक जागरण,1,धुम्रपान निषेध,1,नई पहल,1,नारायण बारेठ,1,नारीवाद,3,निस्‍केयर,1,पटाखों से जलने पर क्‍या करें,1,पर्यावरण और हम,9,पीपुल्‍स समाचार,1,पुनर्जन्म,1,पृथ्‍वी दिवस,1,प्‍यार और मस्तिष्‍क,1,प्रकृति और हम,12,प्रदूषण,1,प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड,1,प्‍लांट हेल्‍थ क्‍लीनिक,1,प्लाज्मा,1,प्लेटलेटस,1,बचपन,1,बलात्‍कार और समाज,1,बाल साहित्‍य में नवलेखन,2,बाल सुरक्षा,1,बी0 प्रेमानन्‍द,5,बीबीसी,1,बैक्‍टीरिया,1,बॉडी स्कैनर,1,ब्रह्माण्‍ड में जीवन,1,ब्लॉग चर्चा,4,ब्‍लॉग्‍स इन मीडिया,1,भंते बुद्ध प्रकाश,1,भारत के महान वैज्ञानिक हरगोविंद खुराना,1,भारत डोगरा,1,भारत सरकार छात्रवृत्ति योजना,1,मंत्रों की अलौकिक शक्ति,1,मनु स्मृति,1,मनोज कुमार पाण्‍डेय,1,मलेरिया की औषधि,1,महाभारत,1,महामहिम राज्‍यपाल जी श्री राम नरेश यादव,1,महाविस्फोट,1,मानवजनित प्रदूषण,1,मिलावटी खून,1,मेरा पन्‍ना,1,युग दधीचि,1,यौन उत्पीड़न,1,यौन रोग,1,यौन शिक्षा,2,यौन शोषण,1,रंगों की फुहार,1,रक्त,1,राष्ट्रीय पक्षी मोर,1,रूहानी ताकत,1,रेड-व्हाइट ब्लड सेल्स,1,लाइट हाउस,1,लोकार्पण समारोह,1,विज्ञान कथा,1,विज्ञान दिवस,2,विज्ञान संचार,1,विश्व एड्स दिवस,1,विषाणु,1,वैज्ञानिक मनोवृत्ति,1,शाकाहार/मांसाहार,1,शिवम मिश्र,1,संदीप,1,सगोत्र विवाह के फायदे,1,सत्य साईं बाबा,1,समगोत्री विवाह,1,समाचार पत्रों में ब्‍लॉगर सम्‍मेलन,1,समाज और हम,14,समुद्र मंथन,1,सर्प दंश,2,सर्प संसार,1,सर्वबाधा निवारण यंत्र,1,सर्वाधिक प्रदूशित शहर,1,सल्फाइड,1,सांप,1,सांप झाड़ने का मंत्र,1,साइंस ब्‍लॉगिंग कार्यशाला,10,साइक्लिंग का महत्‍व,1,सामाजिक चेतना,1,सुपर ह्यूमन,1,सुरक्षित दीपावली,1,सूत्रकृमि,1,सूर्य ग्रहण,1,स्‍कूल,1,स्टार वार,1,स्टीरॉयड,1,स्‍वाइन फ्लू,2,स्वास्थ्य चेतना,15,हठयोग,1,होलिका दहन,1,‍होली की मस्‍ती,1,Abhishap,4,abraham t kovoor,7,Agriculture,7,AISECT,11,Ank Vidhya,1,antibiotics,1,antivenom,3,apj,5,arshia science fiction,1,AS,26,B. Premanand,6,Bal Kahani Lekhan Karyashala,1,Balsahitya men Navlekhan,2,Bhante Budhh Prakash,1,Bharat Dogra,1,Bhoot Pret,7,Blogging,1,Bobs Award 2013,2,Books,55,Born Free,1,Bushra Alvera,1,Butterfly Fish,1,Chaetodon Auriga,1,Challenges,9,Chamatkar,1,Child Crisis,4,Children Science Fiction,1,current,1,D S Research Centre,1,DDM,4,dinesh-mishra,2,Discount Coupon,1,DM,4,Dr. Prashant Arya,1,dream analysis,1,Duwa taveez,1,Duwa-taveez,1,Earth,41,Earth Day,1,eco friendly crackers,1,Education,3,Electric Curent,1,electricfish,1,Elsa,1,English Article,1,Environment,29,Featured,5,flehmen response,1,Gansh Utsav,1,Government Scholarships,1,Great Indian Scientist Hargobind Khorana,1,Green House effect,1,Guest Article,6,Hast Rekha,1,Hathyog,1,Health,60,Health and Food,2,Health and Medicine,1,Healthy Foods,2,Hindi Vibhag,1,human,1,Human behavior,4,humancurrent,1,IBC,5,Indira Gandhi Rajbhasha Puraskar,1,International Bloggers Conference,5,Invention,8,Irfan Hyuman,1,jacobson organ,1,Jadu Tona,3,Joy Adamson,1,julian assange,1,jyotirvigyan,1,Jyotish,11,Kaal Sarp Dosha Mantra,1,Kaal Sarp Yog Remady,1,Kranti Trivedi Smrati Diwas,1,lady wonder horse,1,Lal Kitab,1,Legends,13,life,2,Love at first site,1,Lucknow University,1,Magic Tricks in Hindi,8,magic-tricks,9,malaria mosquito,1,malaria prevention,1,man and electric,1,Manjit Singh Boparai,1,mansik bhram,1,media coverage,1,Meditation,1,Mental disease,1,MK,3,MMG,3,MS,2,mystery,1,Myth and Science,1,Nai Pahel,8,National Book Trust,3,Natural therapy,1,NCSTC,2,New Technology,3,NKG,30,Nobel Prize,5,Nuclear Energy,1,Nuclear Reactor,1,OPK,2,Opportunity,7,Otizm,1,paradise fish,1,personality development,4,PK,11,Plant health clinic,1,Power of Tantra-mantra,1,psychology of domestic violence,1,Punarjanm,1,Putra Prapti Mantra,1,Rajiv Gandhi Rashtriya Gyan Vigyan Puraskar,1,Report,9,Researches,2,SBWG,3,SBWR,5,SBWS,3,science blogging workshop,22,Science Blogs,1,Science communication,6,Science Communication Through Blog Writing,7,Science Fiction,7,Science Fiction Articles,6,Science Fiction Books,5,Science Fiction Conference,8,Science Fiction Writing in Regional Languages,11,Science Times News and Views,2,science-books,1,science-puzzle,44,Scientific Awareness,4,Scientist,30,SD,4,secret of happiness,1,secret of success,1,secrets of octopus paul,1,Sex Diseases,1,Sexpower,1,sexual harassment,1,shirish-khare,4,SKS,11,Social Challenge,1,Solar Eclipse,1,Steroid,1,Succesfull Treatment of Cancer,1,superpowers,1,Superstitions,48,Tantra-mantra,20,Tarak Bharti Prakashan,1,The interpretation of dreams,2,Tona Totka,3,travel,1,tsaliim,9,Universe,20,Vigyan Prasar,30,Vishnu Prashad Chaturvedi,1,VPC,4,Washikaran Mantra,1,Where There is No Doctor,1,wikileaks,1,wildlife,11,zakir science fiction,1,
ltr
item
Scientific World: क्‍या ईश्‍वर को वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित किया जा सकता है?
क्‍या ईश्‍वर को वैज्ञानिक आधार पर प्रमाणित किया जा सकता है?
https://2.bp.blogspot.com/-1rPgWeWsrY4/U-Mq0hu7XfI/AAAAAAAAEag/HP3ZoohZcmY/s640/Brahmand+ki+utpatti.jpg
https://2.bp.blogspot.com/-1rPgWeWsrY4/U-Mq0hu7XfI/AAAAAAAAEag/HP3ZoohZcmY/s72-c/Brahmand+ki+utpatti.jpg
Scientific World
http://www.scientificworld.in/2014/08/god-scientifically-proven-in-hindi.html
http://www.scientificworld.in/
http://www.scientificworld.in/
http://www.scientificworld.in/2014/08/god-scientifically-proven-in-hindi.html
true
3850451451784414859
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy