Loading...

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई?

SHARE:

विज्ञान के अब तक के सभी प्रयासों के बावजूद पृथ्वी के बाहर किसी स्थान पर जीवन होने की पुष्टि अभी ...

विज्ञान के अब तक के सभी प्रयासों के बावजूद पृथ्वी के बाहर किसी स्थान पर जीवन होने की पुष्टि अभी तक नहीं हो पाई है। पृथ्वी पर एक कोषिकीय, बहुकोश‍िकीय, कवक, पादप, जन्तु आदि लाखों प्रकार के जीव पाए जाते हैं मगर वैज्ञानिक इस बात पर सहमत हैं कि इन सब का प्रथम पूर्वज एक ही था। आज भी इस प्रश्न का उत्तर जानना शेष है कि सभी जीवों का प्रथम पूर्वज पृथ्वी पर ही जन्मा था या किसी अन्य खगोलीय पिण्ड से पृथ्वी पर आया? प्रथम जीव की उपपत्ति में ईश्वर जैसी किसी शक्ति की कोई भूमिका रही है या यह मात्र प्राकृतिक संयोग की देन है? प्रथम जीव के अजीवातजनन को समझाने वाले ओपेरिन व हाल्डेन के विचारों को भी जोरदार चुनौति दी जा रही है।

लगभग सभी धर्मों में विशि‍ष्ट सृजन की बात कही गई है। इस मान्यता के अनुसार पृथ्वी पर पाए जाने वाले सभी जीवों को ईश्वर ने ठीक वैसा ही बनाया जैसे वे वर्तमान मे पाए जाते हैं। मनुष्य को सबसे बाद में बनाया गया। इस मान्यता में विश्वास करने वाले इसाई धर्म गुरु आर्चबिशप उशर (Archbishop Ussher) ने सन् 1650 में अपनी गणना के आधार पर बताया था कि ईश्वर ने विश्व सृजन का कार्य 01 अक्टोबर 4004 ईसापूर्व को प्रारम्भ कर 23 अक्टोबर 4004 ईसा पूर्व को पूरा किया। इस मान्यता के पक्ष में किसी प्रकार के प्रमाण उपलब्ध नहीं हैं।

अपने अवलोकनों के आधार पर अरस्तू जैसे दार्शनिकों ने निर्जीव पदार्थों से जीवों की उपपत्ति को समझाने का प्रयास किया। इस मान्यता के अनुसार प्रकृति में निर्जीव पदार्थों जैसे कीचड़ से मेढ़क, सड़ते मांस से मक्खियां आदि सजीवों की उत्पत्ति होती रहती है। वान हेल्मोन्ट (Van Helmont) जैसे वैज्ञानिक ने प्रयोग द्वारा पुराने कपड़ों व अनाज द्वारा चूहे जैसे जीव पैदा होने की बात प्रयोग द्वारा सिद्ध करने का प्रयास भी किया था। निर्जीव पदार्थों से सजीव उत्पन्न होने की मान्यता उन्नीसवीं शताब्दि में तक चलती रही जबतक लुई पाश्चर ने अपने प्रयोगों के बल पर निर्विवाद रूप से इसका अन्त नहीं कर दिया। आज सभी यह जानते है कि कोई भी जीव पहले से उपस्थित अपने जैसे जीव से ही उत्पन्न हो सकता है मगर यह प्रष्न अभी भी महत्वपूर्ण है कि सबसे पहला जीव कहाँ से आया?
[post_ads]
प्रथम जीव का अजैविक जनन
जीव की उत्पत्ति में ईश्वर की भूमिका को नकार कर प्राकृतिक नियमों के अनुरूप जीव की उत्पत्ति की सर्वप्रथम विवेचना करने का श्रेय चार्ल्स डार्विन (Charles Darwin) को जाता है। अपनी पुस्तक आॅरिजन आॅफ स्पेसीज (Origin of Species) में पृथ्वी पर पाए जाने वाले विभिन्न जीवों की उत्पत्ति को जैवविकास के सिद्धान्त से समझाते हुए चार्ल्स डार्विन, चर्च के डर से, ईश्वर की भूमिका को पूरी तरह नकार नहीं सके थे। अपनी इच्छा के विपरीत डार्विन को यह बहना पड़ा कि ईश्वर ने सभी जीवों को अलग अलग नहीं बना कर एक सरल जीव बनाया तथा वर्तमान सभी जीवों की उत्पत्ति उस एक पूर्वज से, जैव विकास की विधि द्वारा हुई है। अपने मित्रों तथा अन्य जिज्ञासुओं से डार्विन ने अपने विचार की असलियत को नहीं छुपाया। 

डार्विन ने जीव की उपपत्ति में ईश्वर की भूमिका को नकारते हुए कहा था कि प्रथम जीव की उत्पत्ति निर्जीव पदार्थों से हुई। 01 फरवरी 1871 को उत्पत्ति को लिखे पत्र में चार्ल्स डार्विन ने संभावना प्रकट कि अमोनिया, फास्फोरस आदि लवण घुले गर्म पानी के किसी गढ्ढे में, प्रकाश, उष्मा, विद्युत आदि के प्रभाव से, निर्जीव पदार्थां से पहले जीव की उत्पत्ति हुई होगी।

रुसी वैज्ञानिक अलेक्जेण्डर इवानोविच ओपेरिन (Alexander Ivanovich Oparin) ने 1924 में जीव की उत्पत्ति नाम से निर्जीव पदार्थों से जीवन की उत्पत्ति का सर्व प्रथम सिद्धान्त प्रतिपादित किया था। ओपेरिन ने कहा कि लुई पाश्चर का यह कथन सच है कि जीव की उत्पत्ति जीव से ही होती है मगर प्रथम जीव पर यह सिद्धान्त लागू नहीं होता। प्रथम जीव की उत्पत्तितो निर्जीव पदार्थों से ही हुई होगी। ओपेरिन ने कहा कि सजीव व र्निजीव में कोई मूलभूत अन्तर नहीं होता। रसायनिक पदार्थों के जटिल संयोजन से ही जीवन का विकास हुआ है। विभिन्न खगोलीय पिण्डों पर मिथेन की उपस्थिति इस बात का संकेत है कि पृथ्वी का प्रारम्भिक वायुमण्डल मिथेन, अमोनिया, हाइड्रोजन तथा जल वाष्प से बना होने के कारण अत्यन्त अपचायक रहा होगा। इन तत्वों के संयोग से बने योगिकों ने आगे संयोग कर और जटिल योगिकों का निर्माण किया होगा। इन जटिल योगिकों के विभिन्न विन्यासों के फलस्वरूप उत्पन्न नए गुणों ने जीवन की नियमितता की नींव रखी होगी। एक बार प्रारम्भ हुए जैविक लक्षण ने स्पर्धा व संघर्ष के मार्ग पर चलकर वर्तमान सजीव सृष्टि का निर्माण किया होगा। 

अपने सिद्धान्त के पक्ष में ओपेरिन ने, कुछ कार्बनिक पदार्थों के व्यवस्थित होकर कोश‍िका के सूक्ष्म तन्त्रों में बदलने उदाहरण दिए। बाद में डच वैज्ञानिक जोंग के द्वारा किए गए प्रयोगों में बहुत से कार्बनिक अणुओं के आपस में जुड़ कर विलयन से भरे पात्र जैसी सूक्ष्म रचनाओं के बनने से ओपेरिन के सिद्धान्त को बल मिला। कार्बनिक अणुओं की पर्त से बने सूक्ष्म पात्रों को ही डी जुंग ने कोअसरवेट नाम दिया था। कोअसरवेट द्वारा परासरण जैसी क्रियाओं के प्रर्दशन के कारण इन्हें उपापचय क्रियाओं का आधार मानते हुए जीवन के प्रथम के घटक के रूप में देखा गया। ओपेरिन का मानना था कि आद्य समुद्र में अनेकानेक कोअसरवेट बने होगे तथा उनके जटिल संयोजन से ही अचानक प्रथम जीव की उत्पत्ति हुई होगी। 

1929 में जे.बी.एस. हाल्डेन (JBS Halden) ने ओपेरिन के विचारों को ओर विस्तार दिया। हाल्डेन ने पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर सुकेन्द्रकीय कोषिका की उत्पत्ति तक की घटनाओं को आठ चरणों में बांट कर समझाया। हाल्डेन ने कहा कि सूर्य से अलग होकर पृथ्वी धीरे धीरे ठण्डी हुई तो उस पर कई प्रकार के तत्व बन गए। भारी तत्व पृथ्वी के केन्द्र की ओर गए तथा हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, आॅक्सीजन आर्गन से प्रारम्भिक वायुमण्डल बना। वायुमण्डल के इन तत्वों के आपसी संयोग से अमोनिया व जलवाष्प बने। इस क्रिया में पूरी आॅक्सीजन काम आजाने के कारण वायुमण्डल अपचायक हो गया था। सूर्य के प्रकाश व विद्युत विसर्जन के प्रभाव से रसायनिक क्रियाओं का दौर चलता रहा और कालान्तर में अमीनो अम्ल, शर्करा, ग्लिसरोल आदि अनेकानेक प्रकार के यौगिक बनते गए। इन यौगिको के जल में विलेय होने से पृथ्वी पर पूर्वजीवी गर्म सूप बना। 

सूप का घनत्व बढ़ता गया तथा उसमें कोलायडी कण बनने लगे। जल की सतह पर तैरते इन कणों ने आपस में जुड़कर झिल्ली का रूप लिया होगा। इस झिल्ली ने बाद में सू़क्ष्म पात्रों का निर्माण कर लिया जिन्हे कोसरवेट नाम दिया था। इस प्रकार जीवनपूर्व रचनाओं का उदय हुआ होगा। एन्जाइम जैसे उत्प्रेरकों के प्रभाव के कारण कोसरवेट में भरे रसायनों में संश्लेषण विश्लेषण जैसी क्रियाएं होने लगी होगी। धीरे धीरे अवायु श्वसन होने लगा। कोअसरवेट में कोई रसायन कम होता तो बाह्य वातावरण से अवषोषण कर उसकी पूर्ती करली जाती। चिपचिपेपन के कारण कोअसरवेट का आकार बढ़ता रहता तथा अधिकतम आकार होजाने पर वह स्वतः विभाजित होजाता था। बाद में नाभकीय अम्लों के रूप में कार्बनिक नियन्त्रक-तन्त्र विकसित हुए जो वृद्धि व जनन जैसी जैविक क्रियाओं को नियन्त्रित करने लगे। प्रारम्भिक कोषिका परपोषी प्रकार की रही होगी। बाद में पर्णहरित यौगिक तथा हरितलवक कोषिकांग के कोषिका में प्रवेष करने से पहली स्वपोषित कोषिका बनी होगी। प्रकाष संष्लेषण की क्रिया के प्रारम्भ होने पर जल का विघटन होने लगा जिससे आक्सीजन उत्पन्न होने लगी। वायुमण्डल में आॅक्सीजन की मात्रा साम्य स्थापित होने तक बढती रही होगी।
[next]
स्टेनले मिलर का प्रयोग
ओपेरिन तथा हाल्डेन की कल्पनाओं का कोई प्रयोगिक आधार नहीं था। 1953 में स्टेनले मिलर (Stanley Miller) ने ‘‘प्रारम्भिक पृथ्वी अवस्था में अमीनो अम्लों का उत्पादन संभव’’ लेख प्रकाषित कर ओपेरिन व हाल्डेन के विचारों का समर्थन किया। स्टेनले मिलर ने अपने गुरु हारोल्ड यूरे के निर्देषन में एक बहुत ही अच्छे प्रयोग की योजना तैयार कर उसे क्रियान्वित किया था। मिलर ने पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल जैसी परिस्थितियाँ उत्पन्न कर यह देखना चाहता था कि क्या ओपेरिन ने जो कहा वैसा होना सम्भव है? 

मिलर ने प्रयोग करने के लिए एक विद्युत विसर्जन उपकरण बनाया। उपकरण में एक गोल पेंदे का फ्लास्क, एक विद्युत विसर्जन बल्ब तथा एक संघनक लगा था। गोल पेंदे के फ्लास्क में पानी भरने के बाद उपकरण में हवा निकाल कर उसमें मिथेन, अमोनिया व हाइड्रोजन को 2:1:2 अनुपात में भर दिया गया। विद्युत विसर्जन के साथ साथ पानी को उबलने दिया जाता तो उत्पन्न भाप के प्रभाव के कारण गैसे निरन्तर वृत में घूमती रहती। विद्युत विर्सजन बल्ब से निकलने वाली जलवाष्प के संघनित होने पर उसे विष्लेषण हेतु बाहर निकाला जा सकता था। मिलर ने निरन्तर एक सप्ताह विद्युत विर्सजन होने के बाद संघनित द्रव का विष्लेषण किया। विश्लेषण करने पर उस द्रव में अमीनो अम्ल, एसिटिक अम्ल आदि कई प्रकार के कार्बनिक पदार्थ उपस्थित पाए गए। 

मिलर के प्रयोग द्वारा ओपेरिन के रसानिक विकास की परिकल्पना की पुष्टि होने से इस सिद्धान्त की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गई। मिलर के प्रयोग के महत्व को इस बात से समझा जा सकता है कि शनि के उपग्रह टाइटन के वायुमण्डल में जीव की उत्पत्ति की संभावना की पड़ताल के सन्दर्भ में इस प्रयोग को पुनः दोहराया गया है। प्रयोग से प्राप्त आकड़ों के आधार पर कहा जाने लगा है कि जल की अनुस्थिति में भी वायुमण्डल में जीवन के घटकों का संश्लेषण संभव है।

मिलर के प्रयोग से पृथ्वी के प्रारम्भिक वातावरण में कार्बनिक अणुओं के बनने की बात तो समझ में आगई थी मगर अब प्रश्न यह था कि इन एकल अणुओं ने आपस में जुड़ कर बहुलक अणुओं का निर्माण किस प्रकार किया होगा? 1950 से 1960 के मध्य सिडनी फोक्स (Sidney Fox) ने कुछ प्रयोग किए जिनमें यह पाया गया कि पृथ्वी के प्रारम्भिक समय में अमीनो अम्ल स्वतः ही पेप्टाइड बंधों से जुड़ कर पोलीपेप्टाइड बनाने में सफल रहे होंगे। ये अमीनो अम्ल तथा पोलीपेप्टाइड जुड़ कर गोलाकार झिल्ली व प्रोटीनाॅइड माइक्रोस्फेयर में व्यवस्थित होसकते थे जैसा कि प्रारम्भिक जीवन रहा होगा।

मात्र अणुओं का समूह ही नहीं है जीवन
जीवन मात्र अणुओं का समूह ही नहीं है। जीवन के विषय में ज्यों ज्यों जानकारी बढ़ती जा रही है प्रथम जीव की उत्पत्ति को समझाना उतना ही कठिन होता रहा है। जीवन की संरचना व उसकी कार्य प्रणाली को 1992 में हारोल्ड होरोविट्ज (Harold Horowitz) ने निम्न बिन्दुओं में समझाया- 

1. जीव कोश‍िका से बना होता है।
2. प्रत्येक कोश‍िका का 50 से 90 प्रतिषत भाग जल का बना होता है। जल ही प्रकाश संश्लेषण की क्रिया में हाइड्रोजन, प्रोटोन तथा आक्सीजन की आपूर्ति करता है तथा जैव अणुओं के लिए विलायक की भूमिका निभता है। 

3. जीवन के निमार्ण में प्रयुक्त अधिकांश सहसंयोजक जैव-अणु कार्बन, हाइड्रोजन, नाइट्रोजन, आॅक्सीजन, फास्फोरस तथा गंधक से बने होते हैं। 

4. जैव-अणुओं जैसे शर्करा, अमीनोअम्ल, न्यूक्लियोटाइड, वसीयअम्ल, फोस्फोलिपिड, विटामिन तथा सहएन्जाइम आदि से बना एक छोटा समूह ही सम्पूर्ण सजीव सृष्टि का निर्माता है। 

5. प्रत्येक जीव के गठन में प्रमुख भाग बड़े अणुओं प्रोटीन, लिपिड, कार्बोहाइड्रेट व नाभकीय अम्ल का होता है।
6. सभी जीवों की कोषिकाओं में एक ही प्रकार की दोहरी लिपिड झिल्ली पाई जाती है। 

7.सभी जीवों में ऊर्जा का प्रवाह फास्फेट बंध (एटीपी) के जल अपघटन के माध्यम से होता है।

8.सम्पूर्ण सजीव जगत में उपापचय क्रियाएं एक छोटे समूह-ग्लाइकोलाइसिस, क्रेब्स चक्र, इलेक्ट्रोन स्थानान्तरण श्रंखला के माध्यम से सम्पन्न होती है।

9. विभाजित होने वाली प्रत्येक कोषिका में डीएनए का एक सेट जिनोम के रूप में होता है। यह आरएनए के रूप में सूचना निर्देष भेजता है जिसका अनुवाद प्रोटीन के रूप में होता है।

10. वृद्धि करती प्रत्येक कोषिका में राइबोसोम पाए जाते हैं जो प्रोटीन संष्लेषण करते हैं।

11. प्रत्येक जीन सूचनाओं का अनुवाद न्यूक्लियोटाइड भाषा से विषिष्ट एन्जाइम के सक्रियण व ट्रान्सफर आरएनए के रूप में करता है।

12. जनन करने वाला प्रत्येक जीव, उसके जीनोटाइप में उत्परिवर्तन के कारण, स्वयं से कुछ भिन्न सन्तानें उत्पन्न करता है।

13. सभी जीवित कोषिकाओं में पर्याप्त तीव्र गति से होने वाली रसायनिक क्रियाएं एन्जाइमों से उत्प्रेरित होती हैं। 

जीवन की उपरोक्त विशेषताओं से स्पष्ट है कि जीवन कार्बनिक अणुओं या उनके बहुलकों का विषिष्ट समूह मात्र नहीं है। जीवन में कोश‍िका झिल्ली, उपापचय क्रियाएं, जिनोम, एन्जाइम आदि अनेक तन्त्र अद्भुत सन्तुलन के साथ क्रियाशील रहते हैं। किसी की भी अनुपस्थिति में जीवन की कल्पना नहीं की जाकती। जीवन के विकास की बात करने पर यह तो सम्भव नहीं हैं कि प्रकृति में ये सभी तन्त्र एक साथ विकसित होकर साथ काम करने लगे होंगे। यदि इनका विकास अलग अलग हुआ तो कौन पहले और कौन बाद में बना। यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण कि किसी तन्त्र विषेष के बनने तक शेष तन्त्रों का कार्य कैसे चला होगा? यह कोई एक प्रश्न नहीं अपितु प्रश्नों का समुच्चय है जिनका जबाव खोजना चुनौति भरा कार्य है। वैज्ञानिक इस अनबुझ पहेली से खबराए नहीं हैं। हजारों वैज्ञानिक अनवरत रूप से इन प्रष्नों के हल तलाशने में लगे हैं। यहाँ हम कुछ प्रमुख प्रयासों की चर्चा करेंगे।
[next]
उष्णजलीय रन्ध्र (हाइड्रोथर्मल वेन्ट) सिद्धान्त
लम्बे समय से चले आ रहे ओपेरिनहाल्डेन के विचार को उस समय गहरा धक्का लगा जब कई युवा वैज्ञानिकों ने इस बात से असहमति जताई कि आद्यसूप में जन्मे प्रथम जीव ने अपनी ऊर्जीय आवश्कताओं की पूर्ती अवायु श्वशन द्वारा की होगी। उनका कहना है कि ओपेरिन व हाल्डेन के विचार जैव-और्जिकी व उष्मागतिक सिद्वान्तों के अनुरूप नहीं है। 

प्रोफेसर विलियम मार्टिन (Professor William Martin) के निर्देशन में भूरसायनिज्ञ माइकील रुस्सेल (Michael Russell) ने जीव की प्रथम उत्पत्ति का वैकल्पिक सिद्धान्त प्रस्तुत किया। उष्णजलीय रन्घ्र सिद्धान्त नाम के इस सिद्धान्त में कहा गया कि जीव उत्पत्ति आद्यसूप में नहीं होकर समुद्र के पेंदे पर धात्विक लवणों से निर्मित चट्टानों पर बने सूक्ष्म उष्णजलीय रन्ध्रों में हुई होगी। जल में विलेय हाइड्रोजन, कार्बन डाय आक्साइड, नाइट्रोजन व हाइड्रोजन सल्फाइड गैसों ने इन रध्रों में प्रवेश कर विभिन्न प्रकार के कार्बनिक योगिको को जन्म दिया होगा। सूक्ष्म दूरी पर स्थित इन रंध्रों के मध्य ठीक वैसी ही रसायनिक प्रवणता स्थापित हुई होगी जैसी वर्तमान कोषिका में उत्पन्न होती है। प्रारम्भिक जीव ने रसायनिक-परासरण के माध्यम से रसायनिक प्रवणता का उपयोग कर ऊर्जा की वैष्विक मुद्रा एटीपी या उसके समकक्ष किसी अन्य का उपयोग किया होगा। 

इस प्रकार प्रारम्भिक जीवन अपनी ऊर्जा आवष्यकताओं की पूर्ती हेतु धरती माँ पर निर्भर रहा होगा। कालान्तर में जीवन ने अपना स्वयं का प्रोटोन प्रवणता तन्त्र विकसित कर इलेक्ट्रोन का स्थानान्तरण करना सीख लिया होगा। इस सिद्धान्त के प्रतिपादकों का मानना है कि हाइड्रोजन ने प्रथम इलेक्ट्रोन दाता तथा कार्बन डाय आक्साइड ने प्रथम ग्राहाता की भूमिका निभाई होगी। अपना ऊर्जा उत्पादन तन्त्र विकसित करने के बाद जीवन सूक्ष्म उष्णजलीय रन्ध्रों से बाहर स्वतन्त्र जीवन जीने लगा होगा। आज सभी जीव रसायनिक परासरणी है, प्रथम जीव भी ऐसा ही रहा होगा।

आर.एन.ए. विश्व
वर्तमान जीवन पूर्णतः डी.एन.ए. आधारित है। डीएनए में संग्रहित सूचना को केन्द्रक के बाहर कोश‍िका द्रव्य में आरएनए लेजाता है। कोश‍िका द्रव्य में उपस्थित राइबोसोम डीएनए से प्राप्त सूचना के अनुरूप प्रोटीन (एन्जाइम) का संष्लेषण करते है। प्रोटीन के उत्प्रेरण से ही जीवन की सभी क्रियाएं निर्देश‍ित होती है। कोषिका में सभी प्रकार के निर्माण होते हैं। डीएनए के संश्लेषण में कई प्रकार के प्रोटीन (एन्जाइम) की भूमिका होती है। अतः यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जीवन विकास के क्रम में पहले डीएनए आया या प्रोटीन? 

बहुत सम्भव है कि जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में डीएनए नहीं था। आरएनए अपनी भूमिका के साथ डीएनए व प्रोटीन की भूमिका भी अभिनीत किया करता होगा। 1983 में थोमस केच तथा सिडनी अल्टान (Sidney Altman) ने स्वतन्त्र रूप से कार्य करते हुए राइबोजाइम की खोज की। इन वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि आरएनए को अपने निर्माण व परिवर्तन में किसी प्रोटीन की आवश्यकता नहीं होती। प्रोटीन की तरह कार्य कर सकने वाले आरएनए को ही राइबोजाइम नाम दिया गया। इस परिकल्पना के अनुसार एक समय ऐसा था जब अणु जगत का सुप्रिमो आरएनए ही था। उस काल को आरएनए विष्व के नाम से जाना जाता है। आरएनए विष्व की अवधारणा विकसित करने पर थोमस केच तथा सिडनी अल्टान को नोबल पुरस्कार प्रदान किया गया। वैज्ञानिकों का मानना है कि बाद में डीएनए ने आरएनए की कई भूमिकाओं को उससे छीन लिया। आरएनए के द्विगुणन तथा स्पालसिंग में राइबोजाइम आज भी सक्रिय है। 

यह प्रश्न विचारणीय है कि आरएनए संष्लेषण की क्रिया प्रणाली भी इतनी सरल तो नहीं कि जीवन के प्रारम्भ से ही इसकी भूमिका को स्वीकार लिया जाय? 2009 में जोहन सुथरलैण्ड (John Sutherland) ने जीवन पूर्व परिस्थितियों में आकस्मिक रूप से पायरीमीडीन न्यूक्लियोटाइड एकलक श्रंखला का संश्लेषण संभव बता कर आरएनए विश्व की संभावना को बल प्रदान किया है। प्यूरीन न्यूक्लियोंटादड एकलक श्रंखला का संश्लेषण की संभावना का प्रतिपादन अभी नहीं हुआ है।

समहस्तता का विकास
अमीनो अम्ल, शर्कराएं आदि असममित कार्बन यौगिक होते हैं और प्रकाश समावयता का गुण प्रदर्शित करते हैं। इनके अणु प्रतिबिम्ब आकृति लिए दो रूप के होते हैं। एक रूप समध्रुवी प्रकाश को बांई और तो दूसरा रूप समध्रुवी प्रकाश को दांई रूप घूमाने का गुण रखता है। पहले प्रकार के अणुओं को वास्तहस्त तथा दूसरे को दक्षिणहस्त रूप अणु कहते हैं। प्रयोगशाला में इनका निर्माण करने पर दोनों रूप साथ साथ व समान मात्रा में बनते हैं। एक अनुपात एक के इस रैसेमिक मिश्रण का समध्रुवित प्रकाश पर कोई असर नहीं होता। 

आश्चर्य की बात है कि जीवन की संरचना में लगे असममित अणु जैसे अमीनो अम्ल, शर्कराएं आदि समहस्तता का प्रदर्षन करते हैं। केवल वामहस्ती अमीनो अम्ल ही प्रोटीन बनाने व दक्षिण हस्ती शर्करा नाभकीय अम्लों के निर्माण में उपयोगी होती है। अध्ययन से पता चलता है कि समहस्तता जीवन की अनिवार्यता है। कई दषकों से अनुसंधानकर्ता इस चमत्कार का जबाव खोजते रहे हैं कि समहस्तता व जीवन का साथ कब से व किस कारण से हुआ?

अभी हाल ही में हुए कुछ अध्ययनों से इस बात का पता चला है कि जीवन के साथ समहस्तता का जुड़ाव कोई चमत्कार नहीं होकर एक प्राकृतिक घटना है। इस विषय में पहला प्रमाण मुरकीशन उल्का के अध्ययन से प्राप्त हुआ है। मुरकीशन उल्का का नामकरण आॅस्ट्रेलिया के उस स्थान के नाम कर किया गया है जहाँ 28 सितम्बर 1969 को यह उल्कापात हुआ था। इस उल्का का रसायनिक विश्लेषण करने पर अन्य पदार्थों के साथ इसमें कई प्रकार के अमीनोअम्ल भी पाए गए। इनमें कुछ अमीनो अम्ल वे थे जो पृथ्वी के जीवों के प्रोटीन में पाए जाते हैं तो कई ऐसे अमीनो अम्ल भी थे जो प्रोटीन बनाने में काम नहीं आते हैं। 

हमारे रुचि कि बात यह है कि मुरकीशन उल्का में पाए गए कई अमीनों अम्लों के वाम व दक्षिण हस्त रूप बराबर अनुपात में नहीं थे। ग्लेविन तथा डोरकिन ने एक अध्ययन में वामहस्ती आइसोवेलीन की मात्रा उसके दक्षिणहस्ती रूप से 18 प्रतिशत अधिक पाई। इससे इस बात का संकेत मिलता है कि समहस्तता के गुण का विकास किसी उत्प्रेरक क्रिया के कारण प्रकृति में उत्पन्न हुआ है। बाद के अध्ययनों में पाया गया कि कई प्रकार के धात्विक क्रिस्टल के प्रभाव से या अन्य किसी रसायन के प्रभाव से वामहस्त या दक्षिण रूप अणुओं का अनुपात बढ़ जाता है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अमीनो अम्लों में समहस्तता जीवनपूर्व काल में स्थापित होगई होगी तथा बाद में एन्जाइम के रूप में इसका प्रभाव र्शकरा पर हुआ होगा। आगे के अनुसंधान इस बात को और स्पष्ट कर सकेंगे।

पहले विकसित हुए उपापचय तन्त्र
जीवन की जटिलता को देखते हुए कई वैज्ञानिकों का मानना है कि जीवन की उत्पत्ति से पूर्व कई उपापचय चक्रों का स्वतन्त्र रूप से विकास हो चुका होगा तथा बाद में जीवन ने उनका उपयोग अपनी आवश्यकताओं की पूर्ती हेतु किया होगा। वर्तमान मे उपापचय तन्त्रों का नियन्त्रण-निर्देशन एन्जाइमों के माध्यम से आनुवंषिक अणुओं द्वारा होता है। हम पूर्व में भी चर्चा कर चुके हैं कि आनुवंषिक पदार्थ डीएनए तथा आरएनए के संष्लेषण में उपाचय-तन्त्रों की भूमिका होती है। उपापचय तन्त्र के पहले विकसित होने की परिकल्पना में कहा गया है कि आरएनए विश्व के विकास से पूर्व न्यूक्लियोंटाइडों, ओलिगोन्यूक्लियोटाइडों आदि का संश्लेषण संभव हुआ होगा। 
[next]
उष्णजल रन्ध्रों में जीवन की उत्पत्ति के समय समुद्र के तले में चट्टानों की सतह पर उपापचय चक्रों का विकास हुआ होगा। कार्बन डाइ आक्साइड व जल के अणुओं के आकस्मिक संयोग से एसीटेट जैसा दो कार्बन परमाणु युक्त अणु बना होगा। इसके बाद खनिज लवणों व चट्टान सतह पर उपस्थित रन्ध्रों के उत्प्रेरकीय प्रभाव के कारण सरल कार्बनिक अणुओं के संष्लेषण के विभिन्न परिपथों का सूत्रपात हुआ होगा। प्रारम्भ में सरल अमीनों अम्ल व लिपिड अणुओं का संष्लेषण हुआ होगा व कालान्तर में सरल कार्बनिक यौगिकों के उत्प्रेरण प्रभाव से जटिल कार्बनिक अणु बनने लगे होंगे। 

इनमें कुछ सरल पेप्टाइड भी रहे होंगे। पेप्टाइडों के बनने से उत्प्रेरण की क्रिया और तेज हुई होगी जिसके परिणाम स्वरूप जटिल अमीनोअम्ल तथा न्यूक्लियोटाइड अणु अस्तित्व में आए होंगे। समहस्तता व आरएनए विष्व के विकास में इन उपापचय परिपथों की भूमिका रही होगी। जेम्स ट्रेफिल, हारोल्ड मारोविट्ज तथा इरिक स्मिथ ने अपने प्रयोगों के माध्यम से बताया कि अपचायक साइट्रिक अम्ल चक्र वर्तमान कोशि‍का में पाए जाने वाले सभी कार्बनिक अणुओं के संश्लेषण में समर्थ है। साइट्रिक अम्ल चक्र को अभी तक ऊर्जा उत्पादक परिपथ के रूप ही देखा जाता रहा है। कोशि‍का की संरचना में इसकी भूमिका को पहली बार स्वीकार किया गया है।

सूर्य से पुराना है पृथ्वी पर जीवन
प्रथम जीव पृथ्वी पर नहीं जन्मा अपितु सूक्ष्म बीजाणुओं के रूप में अन्तरिक्ष के किसी जीव धारी पिण्ड से आया है यह परिकल्पना जीव विज्ञान के इतिहास में बहुत पुरानी है। लार्ड केल्विन (Lord Kelvin), वोन होलमहोल्ट्ज (Von Helmholtz) आदि ने उन्नीसवी शताब्दि में इस बात को प्रतिपादित किया था। फ्रेड हाॅयल (Fred Hoyle), विक्रमसिंघे (vikram singhe), जयन्त विष्णु नार्लीकर (Jayant Vishnu Narlikar) आदि ने बीसवीं शताब्दी में इसी बात को नए तथ्यों के साथ प्रस्तुत किया फिर भी आद्यसूप-परिकल्पना के मुकाबले यह विचार अधिक वजन ग्रहण नहीं कर पाया। अब स्थितियाँ बदलने लगी हैं। अनुसंधान के नए उपकरणों के विकास के बाद अब ऐसे तथ्य जुटने लगे हैं जिनके के आधार पर वैज्ञानिक अब मजबूती के साथ कह रहे हैं कि प्रथम जीव की उत्पत्ति पृथ्वी पर नहीं हुई थी। पृथ्वी पर पहला जीव बाहर से आया था।

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति के पक्ष में अब तब जुटाए सभी तथ्यों को नकारते हुए इन वैज्ञानिकों का कहना है कि रसायनिक पदार्थों के आकस्मिक संयोग से पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति की बात करना ठीक वैसा ही है जैसा मंगल ग्रह पर कम्पयूटर मिलने पर कोई यह दावा करे कि इस कम्प्यूटर का रेण्डम संयोजन मिथेन कुण्ड में हुआ है। विभिन्न वैज्ञानिक अनुसंधानों से अबतक जुटाए तथ्यों का गहन अध्ययन करने के बाद डाॅक्टर रहाव्न जोसेफ (Dr. Rhawn Joseph) ने प्रदिपादित किया है कि पृथ्वी पर पाया जाने वाला जीवन सूर्य तथा उसके सौर मण्डल से भी पुराना है। जोसेफ की बात सुनने में अविश्वसनीय लगती है मगर अपनी बात के पक्ष में उन्होंने जो तथ्य जुटाए हैं उन्हें झुठलाना मुश्किल है।

वैज्ञानिक अनुमानों के अनुसार पृथ्वी की उम्र 4 अरब 54 करोड़ वर्ष है। पृथ्वी की उत्पत्ति से लेकर 3 अरब 80 करोड़ वर्ष पूर्व तक के काल को वैज्ञानिक हैडीएन काल कहते हैं। यह पृथ्वी के जीवन का सर्वाधिक कठिनकाल माना जाता है। इस काल में पृथ्वी पर निरन्तर उल्कापात होता रहा था। ज्वालामुखियों की सक्रियता के कारण तापक्रम इतना बढ़ गया था कि पृथ्वी पिघल गई थी। इसका परिणाम यह हुआ कि सतह पर उपस्थित भारी धातुओं ने पृथ्वी के केन्द्र की ओर खिसककर केन्द्रीय सघन भाग का निर्माण किया। उस काल में बनी चट्टानों से प्राप्त सूक्ष्म जीवाष्मों का अध्ययन करने से पता चलता है कि लगभग 4 अरब वर्ष पूर्व पृथ्वी पर प्रकाष संश्लेषी जीवन उपस्थित था। यदि यह तथ्य सही है तो मात्र 58 करोड़ वर्ष में रसायनिक प्रक्रियाओं द्वारा पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति की बात को सही नहीं माना सा सकता। ऐसे में पृथ्वी के बाहर से जीव के आने का विकल्प ही रहता है।

वैज्ञानिको का मानना है कि हेडीयन काल में जीवन सूक्ष्म बीजाणुओं के रूप में पृथ्वी पर बरसा होगा। मंगल पर भी लगभग उसी समय जीवन पहुँचा होगा। आज इस बात के पक्ष में प्रबल प्रमाण मिल रहे है कि सूक्ष्म बीजाणु किसी एक ग्रह के वायु मण्डल से निकल कर, अन्तरिक्ष की लम्बी व कठिन यात्रा सफलता पूर्वक पूरी कर, किसी अन्य ग्रह पर उतर सकते हैं। वैज्ञानिको का कहना है कि जीवन की उत्पत्ति, एक बार नहीं होकर, कई बार कई स्थानों पर हुर्ह तथा वहाँ से जीवन हर दिशा में फैलता गया।

डाॅक्टर रहाव्न जोसेफ के अनुसार हमारे सूर्य व पृथ्वी की उत्पत्ति एक नष्ट हुए तारे के मलवे से हुई होगी। उस तारे के किसी ग्रह पर जीवन उपस्थित था। तारे के नष्ट होने की प्रक्रिया में जब उस तारे की गुरुत्वाकर्षण शक्ति कम हुई तो वह ग्रह उससे छिटक कर अलग हो गया। किसी कारणवश उस ग्रह का विघटन अणु स्तर तक नहीं हुआ। अणु स्तर तक विघटित होने से बचे उस ग्रह के मलबे का उपयोग पृथ्वी के निर्माण में हुआ होगा। स्पष्ट है कि पृथ्वी की उत्पति के साथ ही उस पर जीवन उपस्थित रहा होगा या पृथ्वी के बनने के कुछ करोड़ वर्ष में ही जीवन पृथ्वी पर आगया होगा।

उल्काओं में जैवघटकों की तलाश
जीवन के घटक बाहर अन्तरिक्ष से आने की बात की पुष्टि करने के लिए वैज्ञानिक आजकल पृथ्वी पर गिरी उल्काओं को एकत्रित कर उनका आधुनिक तकनीकी से विष्लेषण कर रहे है। उल्काओं का उपयोग पूर्व में भी किया जाता रहा है मगर उनके पृथ्वी के पदार्थो ये संक्रमित होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता था। वर्तमान अनुसंधान में ऐसे नाभकीय क्षारक व उनसे मिलते जुलते अन्य अणु मिले है जो पृथ्वी के रसायन नहीं है। इससे इस बात का सहज अनुमान किया जा कसता है कि अन्तरिक्ष में जीवन के घटक प्रचुर मात्रा में उपस्थित हैं। कार्बनधनी अन्य उल्काओं का अध्ययन करने पर कोषिका के उपापचय चक्रों जैसे साइट्रिक अम्ल चक्र आदि के घटक भी पाए गए हैं। इस अनुसंधान से इस बात का भी संकेत मिलता है कि साइट्रिक अम्ल चक्र जीवन उत्पत्ति के प्रारम्भिक इतिहास में भी उपस्थित थे।

आॅक्सीकारी था पृथ्वी का प्रारम्भिक वायुमण्डल?
नए अनुसंधानों से प्रथम जीव की उत्पत्ति के इतिहास की खोज में एक रणनितिक बदलाव आया है। न्यूयार्क के खगोलजैविकी (Astrobiology) केन्द्र के वैज्ञानिकों ने प्राप्त प्राचीनतम खनिजों के आधार पर पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल का जो संघटनात्मक चित्र तैयार किया है वह प्रचलित धारणाओं से मेल नहीं खाता। अब तक यह माना जाता रहा है कि पृथ्वी के प्रारम्भिक वायुमण्डल में मिथेन, कार्बन मनो आक्साइड, हाइड्रोजन सल्फाइड, अमोनिया जैसी जीवन विरोधि गैसों का प्रभुत्व था। आॅक्सीजन की कमी के कारण पृथ्वी का प्रारम्भिक वायुमण्डल घोर अपचायक था। र्जिकोन्स के अध्ययन से प्राप्त जानकारी के आधार पर वैज्ञानिकों का कहना है कि पृथ्वी की उत्पत्ति के बाद मात्र 50 करोड़ वर्ष की अवधि में ही वर्तमान वायुमण्डल बन गया था। कुछ वैज्ञानिक इस सीमा तक तो आगे नहीं बढ़ते हैं मगर वे भी मानते है कि वायु मण्डल में आॅक्सीजन युक्त गैसों जैसे कार्बन डाई आक्साइड, सल्फर डाई आक्साइड, जल वाष्प आदि का प्रभुत्व अवष्य था। यदि इस बात को स्वीकार किया जाता है तो जीव की प्रथम उत्पत्ति के विषय में अब तक दिए गए सिद्वान्तों को छोड़ना होगा क्योंकि वे अपचायक वायुमण्डल को ध्यान में रख कर दिए गए है। 

पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति को लेकर विभिन्न प्रकार के विचार प्रकट किए जाते रहे हैं मगर अभी किसी एक के पक्ष में आम सहमति नहीं बन पाई है। अभी तक ‘‘जितने मुँह उतनी बातें’’ जैसी स्थिति बनी हुई है। कुछ वैज्ञानिक जीव की उत्पत्ति को विशुद्ध प्राकृतिक संयोग मानते हैं तो ऐसे वैज्ञानिकों की भी कमी नहीं है जो जीवन की उत्पत्ति में ईश्वरीय योगदान की सम्भावना को नकारने के लिए तैयार नहीं है। अनुसंधानों का दौर अभी जारी है। बहुत सम्भव है कि जल्दी हमें किसी नए सिद्धान्त के प्रतिपादन की सूचना मिले। 
-X-X-X-X-X-

लेखक परिचय:

विष्णुप्रसाद चतुर्वेदी हिन्दी के चर्चित विज्ञान लेखक हैं। 25 वर्षों तक विज्ञान अध्यापन के बाद आप श्री बांगण राजकीय उच्च माध्यमिक विद्यालय से प्रधानाचार्य के रूप में सेवानिवृत्त हुए हैं। आपके विज्ञान विषयक आलेख वि‍भि‍न्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशि‍त होते रहे हैं। साथ ही आपकी विज्ञान विषयक 10 पुस्तकें भी प्रकाशि‍त हो चुकी हैं, जिनमें एक बाल विज्ञान कथा संग्रह भी शामिल है। इसके अतिरिक्त विज्ञान लेखन के लिए आपको राजस्थान साहित्य अकादमी सहित अनेक संस्थाएं पुरस्कृत/सम्मानित भी कर चुकी हैं।
-X-X-X-X-X-
keywords: beginning of life on earth, biology life on earth, origin of life on earth, evolution of life on earth, life on earth timeline, history of life on earth, alien life on earth, origin of life on earth theories, Theories Of Origin Of Earth, origin of life on earth in hindi, origin of life on earth according to hinduism, origin of life on earth elements responsible, origin of life on earth for kids, origin of universe beginning of life on earth in hindi, history of life on earth in hindi, evolution of life on earth in hindi, history of human life on earth in hindi, beginning of human life on earth, history of life on earth, beginning of life on earth theories, beginning of life on earth documentary, beginning of life on earth timeline, beginning of life on earth video, beginning of human life, did life on earth begin kids, first human born in earth, first human born in the world, first human born, first human ever born, The First Humans, how did the first person on earth get born, first human on earth, first human to orbit the earth, when was first human life on earth, archbishop ussher, archbishop ussher age of earth, archbishop ussher date of creation, theory of evolution beginning of life in hindi, big bang theory beginning of life in hindi, beginning of human life theories in hindi, top 10 theories on beginning of life on earth in hindi, evolution beginning of life in hindi, information theory evolution and the origin of life, theory of chemical evolution of life, information theory evolution and the origin of life, theory of the origin evolution and nature of life, origin of life evolutionar, van helmont experiment in hindi, van helmont theory in hindi, lui pascher scientist, origin of species theory in hindi, alexander ivanovich oparin theory, alexander ivanovic oparin experimentos, stanley miller experiment, stanley miller theory, sidney fox origin of life, sidney fox theory, harold horowitz obituary, sidney altman experiment, sidney altman discovery, पृथ्वी की संरचना, पृथ्वी की उत्पत्ति, मानव की उत्पत्ति कैसे हुई, पृथ्वी की आत्मकथा, पृथ्वी की गति, पृथ्वी का इतिहास, सौर मण्डल, पृथ्वी की आयु

COMMENTS

BLOGGER: 10
Loading...
नाम

अंतरिक्ष युद्ध,1,अंतर्राष्‍ट्रीय ब्‍लॉगर सम्‍मेलन,1,अंतर्राष्ट्रीय हिन्दी ब्लॉगर सम्मेलन-2012,1,अतिथि लेखक,2,अन्‍तर्राष्‍ट्रीय सम्‍मेलन,1,आजीवन सदस्यता विजेता,1,आटिज्‍म,1,आदिम जनजाति,1,इंदिरा गांधी नेशनल ओपन यूनिवर्सिटी,1,इग्‍नू,1,इच्छा मृत्यु,1,इलेक्ट्रानिकी आपके लिए,1,इलैक्ट्रिक करेंट,1,ईको फ्रैंडली पटाखे,1,एंटी वेनम,2,एक्सोलोटल लार्वा,1,एड्स अनुदान,1,एड्स का खेल,1,एन सी एस टी सी,1,कवक,1,किंग जार्ज मेडिकल कॉलेज,1,कृत्रिम मांस,1,कृत्रिम वर्षा,1,कैलाश वाजपेयी,1,कोबरा,1,कौमार्य की चाहत,1,क्‍लाउड सीडिंग,1,क्षेत्रीय भाषाओं में विज्ञान कथा लेखन,9,खगोल विज्ञान,2,खाद्य पदार्थों की तासीर,1,खाप पंचायत,1,गुफा मानव,1,ग्रीन हाउस गैस,1,चित्र पहेली,201,चीतल,1,चोलानाईकल,1,जन भागीदारी,4,जनसंख्‍या और खाद्यान्‍न समस्‍या,1,जहाँ डॉक्टर न हो,1,जादुई गणित,1,जितेन्‍द्र चौधरी जीतू,1,जी0 एम0 फ़सलें,1,जीवन की खोज,1,जेनेटिक फसलों के दुष्‍प्रभाव,1,जॉय एडम्सन,1,ज्योतिर्विज्ञान,1,ज्योतिष,1,ज्योतिष और विज्ञान,1,ठण्‍ड का आनंद,1,डॉ0 मनोज पटैरिया,1,तस्‍लीम विज्ञान गौरव सम्‍मान,1,द लिविंग फ्लेम,1,दकियानूसी सोच,1,दि इंटरप्रिटेशन ऑफ ड्रीम्स,1,दिल और दिमाग,1,दिव्य शक्ति,1,दुआ-तावीज,2,दैनिक जागरण,1,धुम्रपान निषेध,1,नई पहल,1,नारायण बारेठ,1,नारीवाद,3,निस्‍केयर,1,पटाखों से जलने पर क्‍या करें,1,पर्यावरण और हम,9,पीपुल्‍स समाचार,1,पुनर्जन्म,1,पृथ्‍वी दिवस,1,प्‍यार और मस्तिष्‍क,1,प्रकृति और हम,12,प्रदूषण,1,प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड,1,प्‍लांट हेल्‍थ क्‍लीनिक,1,प्लाज्मा,1,प्लेटलेटस,1,बचपन,1,बलात्‍कार और समाज,1,बाल साहित्‍य में नवलेखन,2,बाल सुरक्षा,1,बी0 प्रेमानन्‍द,5,बीबीसी,1,बैक्‍टीरिया,1,बॉडी स्कैनर,1,ब्रह्माण्‍ड में जीवन,1,ब्लॉग चर्चा,4,ब्‍लॉग्‍स इन मीडिया,1,भंते बुद्ध प्रकाश,1,भारत के महान वैज्ञानिक हरगोविंद खुराना,1,भारत डोगरा,1,भारत सरकार छात्रवृत्ति योजना,1,मंत्रों की अलौकिक शक्ति,1,मनु स्मृति,1,मनोज कुमार पाण्‍डेय,1,मलेरिया की औषधि,1,महाभारत,1,महामहिम राज्‍यपाल जी श्री राम नरेश यादव,1,महाविस्फोट,1,मानवजनित प्रदूषण,1,मिलावटी खून,1,मेरा पन्‍ना,1,युग दधीचि,1,यौन उत्पीड़न,1,यौन रोग,1,यौन शिक्षा,2,यौन शोषण,1,रंगों की फुहार,1,रक्त,1,राष्ट्रीय पक्षी मोर,1,रूहानी ताकत,1,रेड-व्हाइट ब्लड सेल्स,1,लाइट हाउस,1,लोकार्पण समारोह,1,विज्ञान कथा,1,विज्ञान दिवस,2,विज्ञान संचार,1,विश्व एड्स दिवस,1,विषाणु,1,वैज्ञानिक मनोवृत्ति,1,शाकाहार/मांसाहार,1,शिवम मिश्र,1,संदीप,1,सगोत्र विवाह के फायदे,1,सत्य साईं बाबा,1,समगोत्री विवाह,1,समाचार पत्रों में ब्‍लॉगर सम्‍मेलन,1,समाज और हम,14,समुद्र मंथन,1,सर्प दंश,2,सर्प संसार,1,सर्वबाधा निवारण यंत्र,1,सर्वाधिक प्रदूशित शहर,1,सल्फाइड,1,सांप,1,सांप झाड़ने का मंत्र,1,साइंस ब्‍लॉगिंग कार्यशाला,10,साइक्लिंग का महत्‍व,1,सामाजिक चेतना,1,सुपर ह्यूमन,1,सुरक्षित दीपावली,1,सूत्रकृमि,1,सूर्य ग्रहण,1,स्‍कूल,1,स्टार वार,1,स्टीरॉयड,1,स्‍वाइन फ्लू,2,स्वास्थ्य चेतना,15,हठयोग,1,होलिका दहन,1,‍होली की मस्‍ती,1,Abhishap,4,abraham t kovoor,7,Agriculture,7,AISECT,11,Ank Vidhya,1,antibiotics,1,antivenom,3,apj,5,arshia science fiction,1,AS,26,B. Premanand,6,Bal Kahani Lekhan Karyashala,1,Balsahitya men Navlekhan,2,Bhante Budhh Prakash,1,Bharat Dogra,1,Bhoot Pret,7,Blogging,1,Bobs Award 2013,2,Books,55,Born Free,1,Bushra Alvera,1,Butterfly Fish,1,Chaetodon Auriga,1,Challenges,9,Chamatkar,1,Child Crisis,4,Children Science Fiction,1,current,1,D S Research Centre,1,DDM,4,dinesh-mishra,2,Discount Coupon,1,DM,4,Dr. Prashant Arya,1,dream analysis,1,Duwa taveez,1,Duwa-taveez,1,Earth,41,Earth Day,1,eco friendly crackers,1,Education,3,Electric Curent,1,electricfish,1,Elsa,1,English Article,1,Environment,29,Featured,5,flehmen response,1,Gansh Utsav,1,Government Scholarships,1,Great Indian Scientist Hargobind Khorana,1,Green House effect,1,Guest Article,6,Hast Rekha,1,Hathyog,1,Health,60,Health and Food,2,Health and Medicine,1,Healthy Foods,2,Hindi Vibhag,1,human,1,Human behavior,4,humancurrent,1,IBC,5,Indira Gandhi Rajbhasha Puraskar,1,International Bloggers Conference,5,Invention,8,Irfan Hyuman,1,jacobson organ,1,Jadu Tona,3,Joy Adamson,1,julian assange,1,jyotirvigyan,1,Jyotish,11,Kaal Sarp Dosha Mantra,1,Kaal Sarp Yog Remady,1,Kranti Trivedi Smrati Diwas,1,lady wonder horse,1,Lal Kitab,1,Legends,13,life,2,Love at first site,1,Lucknow University,1,Magic Tricks in Hindi,8,magic-tricks,9,malaria mosquito,1,malaria prevention,1,man and electric,1,Manjit Singh Boparai,1,mansik bhram,1,media coverage,1,Meditation,1,Mental disease,1,MK,3,MMG,3,MS,2,mystery,1,Myth and Science,1,Nai Pahel,8,National Book Trust,3,Natural therapy,1,NCSTC,2,New Technology,3,NKG,30,Nobel Prize,5,Nuclear Energy,1,Nuclear Reactor,1,OPK,2,Opportunity,7,Otizm,1,paradise fish,1,personality development,4,PK,11,Plant health clinic,1,Power of Tantra-mantra,1,psychology of domestic violence,1,Punarjanm,1,Putra Prapti Mantra,1,Rajiv Gandhi Rashtriya Gyan Vigyan Puraskar,1,Report,9,Researches,2,SBWG,3,SBWR,5,SBWS,3,science blogging workshop,22,Science Blogs,1,Science communication,6,Science Communication Through Blog Writing,7,Science Fiction,7,Science Fiction Articles,6,Science Fiction Books,5,Science Fiction Conference,8,Science Fiction Writing in Regional Languages,11,Science Times News and Views,2,science-books,1,science-puzzle,44,Scientific Awareness,4,Scientist,30,SD,4,secret of happiness,1,secret of success,1,secrets of octopus paul,1,Sex Diseases,1,Sexpower,1,sexual harassment,1,shirish-khare,4,SKS,11,Social Challenge,1,Solar Eclipse,1,Steroid,1,Succesfull Treatment of Cancer,1,superpowers,1,Superstitions,48,Tantra-mantra,20,Tarak Bharti Prakashan,1,The interpretation of dreams,2,Tona Totka,3,travel,1,tsaliim,9,Universe,20,Vigyan Prasar,30,Vishnu Prashad Chaturvedi,1,VPC,4,Washikaran Mantra,1,Where There is No Doctor,1,wikileaks,1,wildlife,11,zakir science fiction,1,
ltr
item
Scientific World: पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई?
पृथ्वी पर जीवन की उत्पत्ति कैसे हुई?
https://1.bp.blogspot.com/-vcX6auPH9gE/U6qrQMs4oyI/AAAAAAAAEOs/Yo-WKSJpYrk/s1600/beginning+of+life+on+earth.jpg
https://1.bp.blogspot.com/-vcX6auPH9gE/U6qrQMs4oyI/AAAAAAAAEOs/Yo-WKSJpYrk/s72-c/beginning+of+life+on+earth.jpg
Scientific World
http://www.scientificworld.in/2014/06/life-on-earth-hindi.html
http://www.scientificworld.in/
http://www.scientificworld.in/
http://www.scientificworld.in/2014/06/life-on-earth-hindi.html
true
3850451451784414859
UTF-8
Loaded All Posts Not found any posts VIEW ALL Readmore Reply Cancel reply Delete By Home PAGES POSTS View All RECOMMENDED FOR YOU LABEL ARCHIVE SEARCH ALL POSTS Not found any post match with your request Back Home Sunday Monday Tuesday Wednesday Thursday Friday Saturday Sun Mon Tue Wed Thu Fri Sat January February March April May June July August September October November December Jan Feb Mar Apr May Jun Jul Aug Sep Oct Nov Dec just now 1 minute ago $$1$$ minutes ago 1 hour ago $$1$$ hours ago Yesterday $$1$$ days ago $$1$$ weeks ago more than 5 weeks ago Followers Follow THIS CONTENT IS PREMIUM Please share to unlock Copy All Code Select All Code All codes were copied to your clipboard Can not copy the codes / texts, please press [CTRL]+[C] (or CMD+C with Mac) to copy