प्रेरक विज्ञान कथा- प्रसन्न-यंत्र (लेखिका: अर्शिया अली)

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आज साहिल के लिए बहुत बड़ा दिन था। क्योंकि आज उसने अपनी तीन साल की अथक मेहनत का फल पा लिया था। आज उसका...

आज साहिल के लिए बहुत बड़ा दिन था। क्योंकि आज उसने अपनी तीन साल की अथक मेहनत का फल पा लिया था। आज उसका प्रसन्न-यंत्र बनकर तैयार हो गया था। उसे आज से तीन साल पहले का वह दिन याद आने लगा, जिस दिन उसके दिमाग में इस यंत्र को बनाने की बात आई थी। वह घटना जिसने उसके जीवन, उसकी सोच सब कुछ बदल दिया और उसके जीवन को एक लक्ष्य प्रदान किया। 

साहिल लखनऊ के डालीगंज मुहल्ले में अपने माता-पिता और छोटी बहन शिखा के साथ रहता है। साहिल के पिता रेलवे में अधिकारी हैं। उसकी माँ एक कुशल गृहणी हैं, जो अपने परिवार को बहुत अच्छे से संभाती हैं। वे परिवार के सभी सदस्यों की पसंद-नापसंद, अच्छाई-बुराई सब बातों से तालमेल बिठा कर परिवार की खुशियों का ध्यान रखती हैं। 

साहिल ने इसी साल बायो ग्रुप से बी0एस-सी0 पूरा किया है। वह पिता के मुकाबले अपनी माँ से ज्यादा लगाव रखता है। उनसे इमोशनली ज्यादा टच में है। पिता का वह सम्मान करता है, पर उनके साथ वह उतना जुड़ाव नहीं महसूस करता है, जितना माँ के साथ। साहिल स्वभाव से बहुत भावुक है। अच्छी या बुरी कोई भी बात होती है, उसे वह बहुत गहराई से सोचता है। 

एक दिन वह अपनी क्लास में था तभी उसकी छोटी बहन शिखा का फोन आया कि पापा का एक्सीडेंट हो गया है। फौरन सिविल हास्पिटल चले आओ। साहिल झटपट हास्पिटल जा पहुँचा। वहाँ पर सब पहले से मौजूद थे, वह दौड़कर अपनी माँ के पास चला गया। उसकी माँ बहुत रो रही थीं। पिता जी के सिर में बहुत गहरी चोट लगी थी। काफी खून बह गया था। डॉक्टरों ने बहुत कोशिश की, पर उसके पिता को नहीं बचा पाए। 

पिता की मौत के बाद तो जैसे दुनिया ही बदल गयी। उसकी माँ बिलकुल टूट गयीं। वे हमेशा चुप रहतीं और गुमसुम सी अपना काम करती रहतीं। उनकी हंसी जाने कहाँ चली गयी थी। घर पर आई अचानक सी इस मुसीबत से साहिल बहुत सदमे में था। एक तो पिता का देहान्त, दूसरे माँ की ये हालत। साहिल से माँ की यह हालत नहीं देखी जाती। वह दिन-रात अपने कमरे में लेटकर यही सोचता रहता क्या करूँ कि माँ पहले जैसी हो जाएँ। 

एक दिन उसके दिमाग में एक बात आई। जब आदमी प्रसन्न रहता है, तो अच्छे से काम करता है। प्रसन्नता से आत्मविश्‍वास आता है, जिससे आदमी किसी भी काम में अपना सर्वोत्तम देता है। इससे काम अच्छा होता है। 

ये विचार मन में आते ही साहिल उठ बैठा और सोचने लगा। जैसे-जैसे वह इस विषय में सोचता जाता, उसकी इच्छा शक्ति उतनी ही दृढ़ होती जाती। अंत में उसने यह निश्‍चय कर लिया कि अपनी माँ की खुशी वापस लाने के लिए वह ऐसा यंत्र अवश्‍य बनाएगा। साहिल ने इन्टरनेट पर इस विषय से सम्बंधित काफी खोजबीन की। जानकारी जुटाने के लिए उसने शहर की सारी लाइब्रेरियाँ खंगालीं और मेडिकल कॉलेज के अनुभवी प्रोफेसरों से भी मिला। इन तमाम प्रक्रियाओं से उसे जितनी भी जानकारी मिली, उसने उन सबको ध्यान से पढ़ा और अपने लक्ष्य में जुट गया। 

मनुष्‍य के भीतर उत्पन्न होने वाली सभी भावनाएँ मस्तिष्‍क के भीतर पैदा होती हैं। इन्हें मस्तिष्‍क का जो भाग नियंत्रित करता है, उनका नाम है हाइपोथैलेमस और लिम्बिक। हाइपोथैलेमस मुख्य भाग है। यह मस्तिष्‍क के बीच में स्थित होता है। जबकि लिम्बिक मस्तिष्‍क में इधर-उधर छितरा रहता है। मनुष्‍य के आसपास होने वाला कोई भी वातावरणीय परिवर्तन जब तंत्रिका तंत्र के माध्यम से यहाँ तक पहुँचता है, तो प्रतिक्रिया स्वरूप एसिटिलकोलीन, डोपामीन और सीरोटोनिन आदि रसायन उत्पन्न होते हैं। 

साहिल ने देखा कि यदि मस्तिष्‍क में डोपामीन और सीरोटोनिन की मात्रा कम हो, तो मन में उदासी के विचार आते हैं। लेकिन यदि ये रसायन अधिक हो जाएँ, तो व्यक्ति अधिक क्रियाशील हो जाता है। उसकी उम्मीदों का महल इन्हीं रसायनों के ऊपर निर्भर था। उसने इनकी प्रवृत्ति एवं उत्पत्ति का गहन अध्ययन किया और अंततः ऐसा यंत्र बनाने में कामयाब हो गया, जो डोपामीन और सीरोटोनिन के उत्सर्जन को नियंत्रित करने में सक्षम था। 

साहिल ने सैद्धान्तिक स्तर पर यंत्र का कई बार परीक्षण किया। हर बार उसका परिणाम सही निकला। पर बिना व्यवहारिक परीक्षण के यह कैसे पता लग सकता था कि यंत्र सही काम कर रहा है कि नहीं। लेकिन सवाल यह था कि यह परीक्षण किया किस पर जाए? 

इसी उधेड़बुन में साहिल घर के बाहर आ गया। अचानक उसकी नजर पड़ोस में रहने वाले राशू पर जा पड़ी। वह घर के सामने स्थित पार्क में चुपचाप बैठा हुआ था। साहिल ने उसके पास जाकर पूछा, ‘‘क्या हुआ राशू? इस तरह चुपचाप क्यों बैठे हो?’’ 

राशू बोला, ‘‘कल मैथ का टेस्ट है। पर मेरा मन पढ़ने में नहीं लग रहा है।’’ 

‘‘क्यों?’’ साहिल ने पुनः प्रश्‍न किया। ‘‘मेरा वीडियो गेम खो गया है।’’ राशू ने जवाब दिया। 

‘‘लेकिन अगर तुम पढ़ोगे नहीं, तो तुम्हारा पेपर खराब हो जाएगा।’’ साहिल ने उसे समझाया। 

‘‘पर मैं क्या करूँ भैया, मेरा मन ही नहीं लग रहा।’’ 

राशू की बात सुनकर साहिल उसने अपनी लैब में ले गया। वह उसे हेलमेटनुमा ‘प्रसन्न यंत्र’ दिखाते हुए बोला, ‘‘यह देखो, मैंने एक नयी मशीन बनाई है। इसके लगाने से दिमाग में अच्छे हारमोंस निकलते हैं और मन प्रसन्न हो जाता है।’’ 

‘‘अच्छा?‘‘ राशू ने चौंकते हुए कहा, ‘‘क्या मैं इसे लगा सकता हूँ? ’’ 

‘‘हाँ, क्यों नहीं? इसीलिए तो मैं तुम्हें बुलाकर लाया हूँ।’’ कहते हुए साहिल ने अपनी मशीन राशू के सिर पर पहना दी। उसने राशू की उम्र के अनुसार तरंगों की फ्रिक्वेंसी सेट की और फिर स्विच को ऑन कर दिया। 

एक क्षण के लिए राशू की आँखों के आगे ढ़ेर सारे तारे झिलमिला गये। फिर उसे लगा कि जैसे वह कहीं दूर तारों के बीच उड़ रहा हो। कुछ पल में ही साहिल के यंत्र का परीक्षण समाप्त हो गया। साहिल ने डरते-डरते राशू के सिर से प्रसन्न-यंत्र को उतारा और धीरे से पूछा, ‘‘अब तुम्हें कैसा लग रहा है? ’’ 

‘‘भैया, मैं इस समय फ्रेशनेस महसूस कर रहा हूँ। आपने मेरे साथ क्या किया?’’ कहते हुए राशू का चेहरा खिल उठा। लेकिन फिर वह अगले ही पल चौंक उठा, ‘‘पर मैं यहाँ पर अपना समय क्यों नष्‍ट कर रहा हूँ? मुझे तो टेस्ट की तैयारी करनी है। अच्छा भैया, मैं चलता हूँ, बॉय!’’ 

साहिल यह देखकर बहुत खुश हुआ। उसने खुशी से अपनी मशीन को चूम लिया। लेकिन अभी वह कुछ और परीक्षण करना चाहता था। उसने सोचा कि कम उम्र के बच्चे पर तो परीक्षण सही रहा, अब किसी बड़े व्यक्ति पर भी इसे ट्राई करना चाहिए। 

साहिल ने अपने कमरे की खिड़की से झाँका। उसने देखा कि एक सेल्समैन अपना सामान लेकर उसके पड़ोस वाले घर के पास खड़ा है। साहिल ने उसके पास जाकर पूछा, ‘‘तुम कौन हो? और इस तरह रास्ते में खड़े होकर क्या सोच रहे हो?’’ 

सेल्समैन बोला, ‘‘आज सुबह से मेरा कोई सामान नहीं बिका है। इस वजह से मैं बुरी तरह से निराश हो गया हूँ। मैं सोच रहा हूँ कि इस घर में जाऊँ कि नहीं। मुझे लगता है कि यहाँ भी मेरा सामान नहीं बिकेगा।’’ 

साहिल को लगा कि निराशा के कारण इसने अपना आत्मविश्‍वास खो दिया है। उसने सेल्समैन पर अपने यंत्र का परीक्षण करने का निष्चय किया। वह बोला, ‘‘मैं आपके आत्मविश्‍वास को फिर से बूस्ट-अप कर सकता हूँ।’’ 

‘‘कैसे?’’ सेल्समैन से आश्‍चर्यचकित होकर पूछा। 

साहिल ने उसे संक्षेप में अपने यंत्र के बारे में बताया। उसकी बात सुनकर सेल्समैन उत्साहित हो गया। वह फौरन साहिल की प्रयोगशाला में जा पहुँचा। 10 मिनट के बाद साहिल का परीक्षण पूरा हुआ। साहिल ने देखा कि सेल्समैन का चेहरा खिल उठा है। उसने पूछा, ‘‘अब तुम कैसा महसूस कर रहे हो?’’ 

‘‘बहुत अच्छा!’’ सेल्समैन ने साहिल को धन्यवाद दिया और अपने सामान का बैग उठाकर पड़ोस वाले घर की ओर चला गया। उसने पूरे मन से अपने सामान के बारे में उन लोगों को बताया। उसकी बातों ने पड़ोसियों पर असर किया। उन्होंने सेल्समैन का काफी सामान खरीद लिया। 

यह देखकर साहिल को यकीन हो गया कि उसका प्रसन्न यंत्र सही काम कर रहा है। उसने सोचा जब मैं माँ को इसके बारे में बताऊँगा, तो वह कितना खुश होंगी। अपने बेटे की इतनी बड़ी कामयाबी देखकर उनका आत्मविश्‍वास फिर वापस आ जाएगा और वह पहले की तरह हो जाएँगी।
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