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आज ज्योतिष, अंक, और हस्तरेखा विद्या समाज के अंग बन चुके हैं। यह विद्यायें कुछ लोगो के जीवन व्यापन का साधन हैं तो कुछ लोगो को, कष्ट से मुक्ति दिलाने की झूठी दिलासा दे कर, शान्ति पहुंचाते हैं। इस लेख में उन बातों की चर्चा होगी जिससे पता चलता है कि इनका विज्ञान से कोई सम्‍बंध नहीं है। सबसे पहले हम ज्योतिष विद्या के बारे में बात करेंगे, पर पहले तारे, ग्रह और तब राशि के बारे में।

तारे और ग्रह
रात में आकाश में कई पिण्ड चमकते रहते हैं, इनमें से अधिकतर पिण्ड हमेशा पूरब की दिशा से उठते हैं और एक निश्चित गति प्राप्त करते हैं और पश्चिम की दिशा में अस्त होते हैं। इन पिण्डों का आपस में एक दूसरे के सापेक्ष भी कोई परिवर्तन नहीं होता है। इन पिण्डों को तारा (Star) कहा गया। पर कुछ ऐसे भी पिण्ड हैं जो बाकी पिण्ड के सापेक्ष में कभी आगे जाते थे और कभी पीछे – यानी कि वे घुमक्कड़ थे। Planet एक लैटिन का शब्द है जिसका अर्थ इधर-उधर घूमने वाला है। इसलिये इन पिण्डों का नाम Planet और हिन्दी में ग्रह रख दिया गया।

हमारे लिये आकाश में सबसे चमकीला पिण्ड सूरज है, फिर चन्द्रमा और उसके बाद रात के तारे या ग्रह। तारे स्वयं में एक सूरज हैं। ज्यादातर, हमारे सूरज से बड़े ओर चमकीले, पर इतनी दूर हैं कि उनकी रोशनी हमारे पास आते आते बहुत क्षीण हो जाती है इसलिये दिन में नहीं दिखायी पड़ते पर रात में दिखायी पड़ते हैं। कुछ प्रसिद्ध तारे इस प्रकार हैं:
  • सबसे प्रसिद्ध तारा, ध्रुव तारा (Polaris या North star) है। यह इस समय पृथ्वी की धुरी पर है इसलिये अपनी जगह पर स्थिर दिखायी पड़ता है। ऐसा पहले नहीं था या आगे नहीं होगा। ऐसा क्यों है, इसके बारे में आगे चर्चा होगी।
  • तारों में सबसे चमकीला तारा व्याध (Sirius) है। इसे Dog star भी कहा जाता है क्योंकि यह Canis major (बृहल्लुब्धक) नाम के तारा समूह का हिस्सा है।
  • मित्रक (Alpha Centauri), नरतुरंग (Centaurus) तारा समूह का एक तारा है। यदि सूरज को छोड़ दें तो तारों में यह हमसे सबसे पास है। प्रकाश की किरणें 1 सेकेन्ड मे 3x(10)8 मीटर की दूरी तय करती हैं। एक प्रकाश वर्ष वह दूरी है जो कि प्रकाश की किरणें एक साल में तय करती हैं। इसकी हमसे दूरी लगभग 4.3 प्रकाश वर्ष है। वास्तव में यह एक तारा नहीं है पर तीन तारों का समूह है जो एक दूसरे के तरफ चक्कर लगा रहें हैं, इसमें Proxima Centauri हमारे सबसे पास आता है।
ग्रह और चन्द्रमा, सूरज नहीं हैं। यह अपनी रोशनी में नहीं चमकते पर सूरज की रोशनी को परिवर्तित करके चमकते हैं। तारे टिमटिमाते हैं पर ग्रह नहीं। तारों की रोशनी का टिमटिमाना, हवा में रोशनी के अपवर्तन (refraction) के कारण होता है। यह तारों की रोशनी पर ही होता है क्योंकि तारे हमसे बहुत दूर हैं और इनके द्वारा आती रोशनी की किरणें हम तक पहुंचते पहुंचते समान्तर हो जाती हैं पर ग्रहों कि नहीं।

प्राचीन भारत में खगोल शास्त्र
पहले के ज्योतिषाचार्य वास्तव में उच्च कोटि के खगोलशास्त्री थे और अपने देश के खगोलशास्त्री दुनिया में सबसे आगे। अपने देश में तो ईसा के पूर्व ही मालुम था कि पृथ्वी सूरज के चारों तरफ चक्कर लगाती है। यजुर्वेद के अध्याय 3 की कण्डिका 6 इस प्रकार है,
आयं गौ: पृश्रिनरक्रमीदसदन् मातरं पुर: ।
पितरं च प्रचन्त्स्व:।।
डा. कुँवर चन्द्र प्रकाश सिंह द्वारा इसका काव्यानुवाद एवं टिप्पणी की है। इसे भुवन वाणी ट्रस्ट, मौसम बाग, सीतापुर रोड, लखनऊ-20 ने प्रकाशित किया है। उन्होंने इस कण्डिका में काव्यानुवाद व टिप्पणी इस प्रकार की है:
‘प्रत्यक्ष वर्तुलाकार सतत गतिशीला।
है अंतरिक्ष में करती अनुपम लीला।।
अपनी कक्षा में अंतरिक्ष में संस्थित।
रवि के सम्मुख हैं अविरत प्रदक्षिणा-रत।।
दिन, रात और ऋतु-क्रम से सज्जित नित नव।
माता यह पृथ्वी अपनी और पिता दिव।।
हे अग्नि। रहो नित दीपित, इस धरती पर।
शत वर्णमयी ज्वालाओं से चिर भास्वर।।
फैले द्युलोक तक दिव्य प्रकाश तुम्हारा।
मेघों में विद्युन्मय हो वास तुम्हारा।।
लोकत्रय में विक्रम निज करो प्रकाशित।
त्रयताप- मुक्त हो मानव पर निर्वृत्तिरत।।
टिप्पणी: यह मंत्र बड़ा कवित्वपूर्ण है। इसमें अग्नि के पराक्रम का चित्रात्मक वर्णन है। इसमें श्लेषालंकार है। ‘गौ पृश्नि:’ का अर्थ गतिशील बहुरंगी ज्वालाओं वाला अग्नि किया गया है। महर्षि दयानन्‍द ने ‘गौ:’ का अर्थ पृथ्वी किया है। यह पृथ्वी अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर अंतरिक्ष में घूमती है। इसी से दिन-रात, कृष्ण-शुक्ल पक्ष, अयन, वर्ष, ऋतु आदि का क्रम चलता है। अनुवाद में यही अर्थ ग्रहण किया गया है। अग्नि पृथ्वी का पुत्र भी कहा गया है। इस मंत्र में विशेष ध्यान देने की बात है- पृथ्वी का अपनी कक्षा में सूर्य के चारों ओर घूमना। इससे सिद्ध है कि वैदिक ऋषि को पृथ्वी के सूर्य के चारों ओर घूमने का ज्ञान था।’

प्राचीन भारत में अन्य प्रसिद्ध खगोलशास्त्री तथा उनके द्वारा किया गया कार्य इस प्रकार है:
  • याज्ञवल्क्य ईसा से दो शताब्दी पूर्व हुऐ थे। उन्होने यजुर्वेद पर काम किया था। इसलिये यह कहा सकता है कि अपने देश ईसा के पूर्व ही मालुम था कि पृथ्वी सूरज के चारों तरफ घूमती है। यूरोप में इस तरह से सोचना तो 14वीं शताब्दी में शुरु हुआ।
  • आर्यभट्ट (प्रथम) (476-550) ने 'आर्य भटीय' नामक ग्रन्थ की रचना की। इसके चार खंड हैं– गीतिकापाद, गणितपाद, काल क्रियापाद, और गोलपाद। गोलपाद खगोलशास्त्र (ज्योतिष) से सम्बन्धित है और इसमें 50 श्लोक हैं। इसके नवें और दसवें श्लोक में यह समझाया गया है कि पृथ्वी सूरज के चारो तरफ घूमती है।
  • भास्कराचार्य (1141-1185) ने 'सिद्धान्त शिरोमणी' नामक पुस्तक चार भागों में लिखी है– पाटी गणिताध्याय या लीलावती (Arithmetic), बीजागणिताध्याय (Algebra), ग्रह गणिताध्याय (Astronomy), और गोलाध्याय। इसमें प्रथम दो भाग स्वतंत्र ग्रन्थ हैं और अन्तिम दो सिद्धांत शिरोमणी के नाम से जाने जाते हैं। सिद्धांत शिरोमणी में पृथ्वी के सूरज के चारो तरफ घूमने के सिद्धान्त को और आगे बढ़ाया गया है।
यूरोप में खगोल शास्त्र
यूरोप के प्रसिद्ध खगोलशास्त्री तथा उनके द्वारा किया गया कार्य इस प्रकार है:
  • टौलमी (90-168) नाम का ग्रीक दर्शनशास्त्री दूसरी शताब्दी में हुआ था। इसने पृथ्वी को ब्रम्हाण्ड का केन्द्र माना और सारे पिण्डों को उसके चारों तरफ चक्कर लगाते हुये बताया। इस सिद्धान्त के अनुसार सूरज एवं तारों की गति तो समझी जा सकती थी पर ग्रहों की नहीं।
  • कोपरनिकस (1473-1543) एक पोलिश खगोलशास्त्री था, उसका जन्म 15वीं शताब्दी में हुआ। यूरोप में सबसे पहले उसने कहना शुरू किया कि सूरज सौरमंडल का केन्द्र है और ग्रह उसके चारों तरफ चक्कर लगाते हैं।
  • केपलर (1571-1630) एक जर्मन खगोलशास्त्री था, उसका जन्म 16वीं शताब्दी में हुआ था। वह गैलिलियो के समय का ही था। उसने बताया कि ग्रह सूरज की परिक्रमा गोलाकार कक्षा में नहीं कर रहें हैं, उसके मुताबिक यह कक्षा अंड़ाकार (Elliptical) है। यह बात सही है।
  • गैलिलियो (1564-1642) एक इटैलियन खगोलशास्त्री था उसे टेलिस्कोप का आविष्कारक कहा जाता है पर शायद उसने बेहतर टेलिस्कोप बनाये और सबसे पहले उनका खगोलशास्त्र में प्रयोग किया।
टौलमी के सिद्धान्त के अनुसार शुक्र ग्रह पृथ्वी के चारों तरफ चक्कर लगाता है और वह पृथ्वी और सूरज के बीच रहता है इसलिये वह हमेशा बालचन्द्र (Crescent) के रूप में दिखाई देगा। कोपरनिकस के मुताबिक शुक्र सारे ग्रहों की तरह सूरज के चारों तरफ चक्कर लगा रहा है इसलिये चन्द्रमा की तरह उसकी सारी कलायें (phases) होनी चाहिये। गैलिलियो ने टेलिस्कोप के द्वारा यह पता किया कि शुक्र ग्रह की भी चन्द्रमा की तरह सारी कलायें होती हैं इससे यह सिद्ध हुआ कि ग्रह – कम से कम शुक्र तो – सूरज की परिक्रमा कर रहे हैं। गैलिलियो ने सबसे पहले ग्रहों को सूरज का चक्कर लगाने का प्रयोगात्मक सबूत दिया। पर उसे इसका क्या फल मिला। चर्च ने यह कहना शुरू कर दिया कि यह बात ईसाई धर्म के विरूद्ध है और गैलिलियो को घर में नजरबन्द कर दिया गया।

भौतिक शास्त्र में हर चीज देखी नहीं जा सकती है और किसी बात को सत्य केवल इसलिये कहा जाता है कि उसको सिद्धान्तों के द्वारा समझाया जा सकता है। यदि पृथ्वी को सौरमंडल का केन्द्र मान लिया जाय तो किसी भी तरह से इन ग्रहों की गति को नहीं समझा जा सकता है पर यदि सूरज को सौरमंडल का केन्द्र मान लें तो इन ग्रहों और तारों दोनों की गति को ठीक प्रकार से समझा जा सकता है। इसलिए यह बात सत्य मान ली गयी कि सूरज ही हमारे सौरमंडल के केन्द्र में है जिसके चारों तरफ पृथ्वी एवं ग्रह घूम रहे हैं।

Hair Musical हेयर संगीत नाटक
1960 के दशक में, हेयर संगीत नाटक {Hair (musical)} का मंचन अमेरिका में शुरू किया गया। इसका सबसे पहले मंचन 17 अक्टूबर 1967 को हुआ। इसका मंचन आज तक अलग-अलग देशों में हो रहा है पर अपने देश में कभी नहीं हुआ। यह उस समय शुरू हुआ जब अमेरिका में लोग वियतनाम जंग के खिलाफ हो रहे थे, हिप्पी सभ्यता जन्म ले रही थी। बहुत से लोगों का कहना है कि हिप्पी सभ्यता, इसी संगीत नाटक से जन्मी। इसमें लड़के और लड़कियां राशि के चिन्हों को दर्शाते थे, कुछ दृश्यों में निर्वस्त्र होते थे कुछ में वे अमेरिकी झण्डे को पहने होते थे। इसलिये शायद यह चर्चित तथा विवादास्पद हो गया।

इसका शीर्षक गीत इस प्रकार है This is the dawning age of Aquarius है। इस गाने के शब्द यहां हैं और इसे आप यहां देख वा सुन सकते हैं। यह गाना अपने देश में भी प्रचलित है। इस गाने का शब्दिक अर्थ है कि कुम्भ राशि का समय आने वाला है लोग इसका शब्दिक अर्थ तो जानते हैं – पर यह नहीं समझते कि यह क्या है। क्या वास्तव में कुम्भ राशि का समय आ रहा है? यह क्यों कहा जा रहा है? इसका गाने के अर्थ का भी हमारे विषय से सम्बन्ध है। इसको समझने के लिये जरूरी है कि पृथ्वी की गतियों एवं राशियों को समझें।

पृथ्वी की गतियॉं
हमारी पृथ्वी की बहुत सारी गतियां हैं:
  • पृथ्वी अपनी धुरी पर 24 घंटे में एक चक्कर लगा रही है। इसलिये दिन और रात होते हैं।
  • पृथ्वी सूरज के चारों तरफ एक साल में एक चक्कर लगाती है। यदि हम उस तल (plane) की कल्पना करें जिसमें पृथ्वी और सूरज का केन्द्र, तथा उसकी परिक्रमा है तो पायेंगे कि पृथ्वी की धुरी, इस तल से लगभग साढ़े 23 डिग्री झुकी है पृथ्वी के धुरी झुके रहने के कारण अलग-अलग ऋतुयें आती हैं। हमारे देश में गर्मी के दिनों में सूरज उत्तरी गोलार्द्ध में रहता है और जाड़े में दक्षिणी गोलार्द्ध में चला जाता है। यानी कि साल के शुरू होने पर में सूरज दक्षिणी गोलार्द्ध में रहता है पर वहां से चलकर उत्तरी गोलार्द्ध और फिर वापस दक्षिणी गोलार्द्ध के उसी विन्दु पर पहुंच जाता है।
  • पृथ्वी की धुरी भी घूम रही है और पृथ्वी की धुरी लगभग 25700 साल में एक बार घूमती है। इस समय हमारी धुरी सीधे ध्रुव तारे पर है इसलिये ध्रुवतारा हमको घूमता नहीं दिखाई पड़ता है और दूसरे तारे घूमते दिखाई देते हैं। हजारों साल पहले हमारी धुरी न तो ध्रुव तारा पर थी और न हजारों साल बाद यह ध्रुव तारा पर होगी। तब ध्रुवतारा भी रात में पूरब की तरफ से उदय होगा और पश्चिम में अस्त होता दिखायी देगा।
  • हमारा सौरमंडल एक निहारिका में है जिसे आकाश गंगा कहा जाता है। इसका व्यास लगभग 1,00,000  प्रकाश वर्ष है। हमारी पृथ्वी आकाश गंगा के केन्द्र से लगभग 30,000 प्रकाश वर्ष दूर है और हमारा सौरमंडल भी इस आकाश गंगा के चक्कर लगा रहा है और हमारी पृथ्वी भी उसके चक्कर लगा रही है।
  • हमारी आकाश गंगा और आस-पास की निहारिकायें भी एक दूसरे के पास आ रही हैं। यह बात डाप्लर सिद्धान्त से पता चलती है। हमारी पृथ्वी भी इस गति में शामिल है।
मुख्य रूप से हम पृथ्वी की पहली और दूसरी गति ही समझ पाते हैं, तीसरी से पांचवीं गति हमारे जीवन से परे है। वह केवल सिद्धान्त से समझी जा सकती है, उसे देखा नहीं जा सकता है। हमारे विषय के लिये दूसरी और तीसरी गति महत्वपूर्ण है।

तारा समूह
ब्रम्हाण्ड में अनगिनत तारे हैं और अनगिनत तारा समूह। कुछ चर्चित तारा समूह इस प्रकार हैं:
  • सप्त ऋषि (Great/ Big bear or Ursa Major): यह उत्तरी गोलार्ध के सात तारे हैं। यह कुछ पतंग की तरह लगते हैं जो कि आकाश में डोर के साथ उड़ रही हो। यदि आगे के दो तारों को जोड़ने वाली लाईन को सीधे उत्तर दिशा में बढ़ायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचती है।
  • ध्रुवमत्स्य/ अक्षि (Little Bear or Ursa Minor): यह सप्त ऋषि के पास उसी शक्ल का है इसके सबसे पीछे वाला तारा ध्रुव तारा है।
  • कृतिका (कयबचिया) Pleiades: पास-पास कई तारों का समूह है हमारे खगोलशास्त्र में इन्हें सप्त ऋषि की पत्नियां भी कहा गया है।
  • मृगशीर्ष (हिरन- हिरनी) Orion: अपने यहां इसे हिरण और ग्रीक में इसे शिकारी के रूप में देखा गया है पर मुझे तो यह तितली सी लगती है।
  • बृहल्लुब्धक (Canis Major): इसकी कल्पना कुत्ते की तरह की गयी पर मुझे तो यह घन्टी की तरह लगता है। व्याध (Sirius) इसका सबसे चमकीला तारा है। अपने देश में इसे मृगशीर्ष पर धावा बोलने वाले के रूप में देखा गया जब कि ग्रीक पुराण में इसे Orion (शिकारी) के कुत्ते के रूप में देखा गया।
  • शर्मिष्ठा (Cassiopeia): यह तो मुझे कहीं से सुन्दरी नहीं लगती यह तो W के आकार की दिखायी पड़ती है और यदि इसके बड़े कोण वाले भाग को विभाजित करने वाली रेखा को उत्तर दिशा में ले जायें तो यह ध्रुव तारे पर पहुंचेगी।
  • महाश्व (Pegasus): इसकी कल्पना अश्व की तरह की गयी पर यह तो मुझे टेनिस के कोर्ट जैसा लगता है।
जाहिर है मैं इन सब तारा समूह के सारे तारे देख कर आकृतियों कि कल्पना नहीं कर रहा हूं, पर इन तारा समूह के कुछ खास तारों को ले कर ही कल्पना कर रहा हूं।

राशियां (Signs of Zodiac)
यह तो थे आकाश पर कुछ मुख्य तारा समूह। इन सब का नाम हमने कभी न कभी सुना है। इनके अलावा बारह तारा समूह जिन्हें राशियां कहा जाता है उनका नाम हम अच्छी तरह से जानते हैं। इन सब को छोड़ कर, किसी तारा समूह के लिये तो खगोलशास्त्र की पुस्तक ही देखनी पड़ेगी। बारह तारा समूह, जिन्हें राशियां कहा जाता है, उनके नाम तो हम सब को मालुम हैं पर साधरण व्यक्ति के लिये इन्हें आकाश में पहचान कर पाना मुश्किल है। यह बारह राशियां हैं,
  1. मेष (Aries)
  2. वृष ( Taurus)
  3. मिथुन (Gemini)
  4. कर्क (Cancer)
  5. सिंह (Leo)
  6. कन्या (Virgo)
  7. तुला (Libra)
  8. वृश्चिक (Scorpio)
  9. धनु (Sagittarius)
  10. मकर (Capricorn)
  11. कुम्भ (Aquarius)
  12. मीन (Pisces)
इन 12 तारा समूहों को ही क्यों इतना महत्व दिया गया? इसके लिये पृथ्वी की दूसरी और तीसरी गति महत्वपूर्ण है।

दि पृथ्वी, सूरज के केन्द्र और पृथ्वी की परिक्रमा के तल को चारो तरफ ब्रम्हाण्ड में फैलायें, तो यह ब्रम्हाण्ड में एक तरह की पेटी सी बना लेगा। इस पेटी को हम 12 बराबर भागों में बांटें तो हम देखेंगे कि इन 12 भागों में कोई न कोई तारा समूह आता है। हमारी पृथ्वी और ग्रह, सूरज के चारों तरफ घूमते हैं या इसको इस तरह से कहें कि सूरज और सारे ग्रह पृथ्वी के सापेक्ष इन 12 तारा समूहों से गुजरते हैं। यह किसी अन्य तारा समूह के साथ नहीं होता है इसलिये यह 12 महत्वपूर्ण हो गये हैं। इस तारा समूह को हमारे पूर्वजों ने कोई न कोई आकृति दे दी और इन्हें राशियां कहा जाने लगा।

यदि आप किसी आखबार या टीवी पर राशिचक्र को देखें या सुने तो पायेंगें कि वे सब मेष से शुरू होते हैं, यह अप्रैल-मई का समय है। क्या आपने कभी सोचा हैकि यह राशि चक्र मेष से ही क्यों शुरू होते हैं? चलिये पहले हम लोग विषुव अयन (precession of equinoxes) को समझते हैं, उसी से यह भी स्पष्ट होगा।

विषुव अयन (precession of equinoxes)
विषुव अयन और राशि चक्र के मेष राशि से शुरू होने का कारण पृथ्वी की तीसरी गति है। साल के शुरु होते समय (जनवरी माह में) सूरज दक्षिणी गोलार्द्ध में होता है और वहां से उत्तरी गोलार्द्ध जाता है। साल के समाप्त होने (दिसम्बर माह) तक सूरज उत्तरी गोलार्द्ध से होकर पुनः दक्षिणी गोलार्द्ध पहुचं जाता है। इस तरह से सूरज साल में दो बार भू-मध्य रेखा के ऊपर से गुजरता है। इस समय को विषुव (equinox) कहते हैं। यह इसलिये कि, तब दिन और रात बराबर होते हैं। यह सिद्धानतः है पर वास्तविकता में नहीं, पर इस बात को यहीं पर छोड़ देते हैं। आजकल यह समय लगभग 20 मार्च तथा 23 सितम्बर को आता है। जब यह मार्च में आता है तो हम (उत्तरी गोलार्द्ध में रहने वाले) इसे महा/बसंत विषुव (Vernal/Spring Equinox) कहते हैं तथा जब सितम्बर में आता है तो इसे जल/शरद विषुव (fall/Autumnal Equinox) कहते हैं। यह उत्तरी गोलार्द्ध में इन ऋतुओं के आने की सूचना देता है।

विषुव का समय भी बदल रहे है। इसको विषुव अयन (Precession of Equinox) कहा जाता है। पृथ्वी अपनी धुरी पर 24 घन्टे में एक बार घूमती है। इस कारण दिन और रात होते हैं। पृथ्वी की धुरी भी घूम रही है और यह धुरी 25,700 साल में एक बार घूमती है। यदि आप किसी लट्टू को नाचते हुये उस समय देखें जब वह धीमा हो रहा हो, तो आप देख सकते हैं कि वह अपनी धुरी पर भी घूम रहा है और उसकी धुरी भी घूम रही है। विषुव का समय धुरी के घूमने के कारण बदल रहा है। इसी लिये pole star भी बदल रहा है। आजकल ध्रुव तारा पृथ्वी की धुरी पर है और दूसरे तारों की तरह नहीं घूमता। इसी लिये pole star कहलाता है। समय के साथ यह बदल जायगा और तब कोई और तारा pole star बन जायगा।

पृथ्वी अपनी धुरी पर लगभग 25,700 साल में एक बार घूमती है। वह 1/12वें हिस्से को 2141 या लगभग 2150  साल में तय करती है। वसंत विषुव के समय सूरज मेष राशि में ईसा से 1650 साल पहले (1650BC) से, ईसा के 500 साल बाद (500 AD) तक लगभग 2150 साल रहा। अलग-अलग सभ्यताओं में, इसी समय खगोलशास्त्र या ज्योतिष का जन्म हुआ। इसीलिये राशिफल मेष से शुरु हुआ पर अब ऐसा नहीं है। इस समय वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, मीन राशि में है। यह लगभग ईसा के 500 साल बाद (500 AD) से शुरु हुआ। यह अजीब बात है कि विषुव के बदल जाने पर भी हम राशिफल मेष से ही शुरु कर रहें है – तर्क के हिसाब से अब राशिफल मीन से शुरु होने चाहिये, क्योंकि अब विषुव के समय सूरज, मेष राशि में न होकर, मीन राशि में है।

ईसा के 500 साल (500 AD) के 2150 साल बाद तक यानि कि 27वीं शताब्दी (2650 AD) तक, वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, मीन राशि में रहेगा। उसके बाद वसंत विषुव के समय सूरज, पृथ्वी के सापेक्ष, कुम्भ राशि में चला जायगा। यानि कि तब शुरु होगा कुम्भ का समय। अब आप हेयर संगीत नाटक के शीर्षक गीत Aquarius की पंक्ति ‘This is the dawning age of Aquarius’ का अर्थ समझ गये होंगे। अकसर लोग इस अर्थ को नहीं समझते – ज्योतिष में भी कुछ ऐसा हो रहा है।

ज्योतिष या अन्धविश्वास
सूरज और चन्द्रमा हमारे लिये महत्वपूर्ण हैं। यदि सूरज नहीं होता तो हमारा जीवन ही नहीं शुरू होता। सूरज दिन में, और चन्द्रमा रात में रोशनी दिखाता है। सूरज और चन्द्रमा, समुद्र को भी प्रभावित करते हैं। ज्वार और भाटा इसी कारण होता है। समुद्री ज्वार-भाटा के साथ यह हवा को भी उसी तरह से प्रभावित कर, उसमें भी ज्वार भाटा उत्पन करते हैं। ज्वार-भाटा में किसी और ग्रह का भी असर होता होगा, पर वह नगण्य के बराबर है। इसके अलावा यह बात अप्रसांगिक है कि हमारा जन्म जिस समय हुआ था उस समय,
  • सूरज किस राशि में था, या
  • चन्द्रमा किस राशि पर था, या
  • कोई अन्य ग्रह किस राशि पर था,
इसका कोई सबूत नहीं है कि पैदा होने का समय या तिथि महत्वपूर्ण है। यह केवल अज्ञानता ही है।

हमारे पूर्वजों ने इन राशियों को याद करने के लिये स्वरूप दिया। पुराने समय के ज्योतिषाचार्य बहुत अच्छे खगोलशास्त्री थे। पर समय के बदलते उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि किसी व्यक्ति के पैदा होने के समय सूरज जिस राशि पर होगा, उस आकृति के गुण उस व्यक्ति के होंगे। इसी हिसाब से उन्होंने राशि फल निकालना शुरू कर दिया। हालांकि इसका वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नहीं है। यदि आप ज्योतिष को उसी के तर्क पर परखें, तो भी ज्योतिष गलत बैठती है।

यदि ज्योतिष का ही तर्क लगायें तो – विषुव अयन के समय सूरज की स्थिति बदल जाने के कारण – जो गुण ज्योतिषों ने मेष राशि में पैदा होने वाले लोगों को दिये थे वह अब मीन राशि में पैदा होने वाले व्यक्ति को दिये जाने चाहिये। यानी कि, हम सबका राशि फल एक राशि पहले का हो जाना चाहिये पर ज्योतिषाचार्य तो अभी भी वही गुण उसी राशि वालों को दे रहे हैं।

सच में हम बहुत सी बातो को उसे तर्क या विज्ञान से न समझकर उस पर अंध विश्वास करने लगते हैं, जिसमें ज्योतिष भी एक है। ज्योतिष या टोने टोटके में कोई अन्तर नहीं। यह एक ही बात के, अलग अलग रूप हैं। यही बात अंक विद्या और हस्तरेखा विद्या के लिये लागू होती है। अंक विद्या पर बात करने से पहले हम लोग ओमेन नाम की फिल्म की चर्चा करेंगे।

डेमियन: ओमेन – फिल्म
1976 में एक फिल्म आयी थी जिसका नाम ओमेन (Omen) था। इसकी कहानी कुछ इस प्रकार की है कि एक अमेरिकन राजनयिक (Diplomat) के पुत्र की म़ृत्यु हो जाती है और उसकी जगह एक दूसरा बच्चा रख दिया जाता है। इस बच्चे का नाम डेमियन (Damien) है। यह बच्चा वास्तव में एक शैतान का बच्चा है और आगे चलकर इसके एन्टीक्राइस्ट (Antichrist) बनने की बात है। यह बात बाइबिल की एक भविष्यवाणी में है। कुछ लोगों को पता चल जाता है कि यह शैतान का बच्चा है और उसे मारने का प्रयत्न किया जाता है पर पुलिस जिसे नहीं मालुम कि वह शैतान का बच्चा है, उसे बचा लेती है। यह फिल्म यहीं पर समाप्त हो जाती है।

इस फिल्म के बाद, 1978 में दूसरी फिल्म Damien: Omern II नाम से आयी। यह डैमियन के तब की कहानी है, जब वह 13 साल का हो जाता है। 1981 में इस सीरीज में तीसरी फिल्म Oemn III: The Final Conflict आयी। इस सिरीस की चौथी फिल्म टीवी के लिये 1991 में Omen IV : The Awakening के नाम से बनी। इन फिल्मों में यह महत्वपूण है कि डेमियन के शैतान का बच्चा होने की बात कैसे पता चली।

डेमियन के सर की खाल (Scalp) पर बालों से छिपा 666 अंक लिखा था। इस नम्बर को शैतान का नम्बर कहा जाता है। इससे पता चला कि यह शैतान का बच्चा है। पर क्या आप जानते हैं कि इस नम्बर को क्यों शैतान का नम्बर क्यों कहा जाता है। चलिये कुछ अंक लिखने के इतिहास के बारे में जाने, जिससे यह पता चलेगा।

अंक लिखने का इतिहास
अधिकतर सभ्यताओं में लिपि के अक्षरों को ही अंक माना गया। रोमन लिपि के अक्षर I को एक अंक माना गया क्योंकि यह शक्ल से एक उंगली जैसा है। इसी तरह II को दो अंक माना गया क्योंकि यह दो उंगलियों की तरह है। रोमन लिपि के अक्षर V को 5 का अंक माना गया। यदि आप हंथेली को देखे जिसकी सारी उंगलियां चिपकी हो और अंगूंठा हटा हो तो वह इस तरह दिखेगा। रोमन X को उन्होंने दस का अंक माना क्योंकि यह दो हंथेलियों की तरह हैं। L को पच्चास, C को सौ, D को पांच सौ और N को हजार का अंक माना गया। इन्हीं अक्षरों का प्रयोग कर उन्होंने अंक लिखना शुरू किया। इन अक्षरों को किसी भी जगह रखा जा सकता था। इनकी कोई भी निश्चित जगह नहीं थी। ग्रीक और हरब्यू (Hebrew) में भी वर्णमाला के अक्षरों को अंक माना गया उन्हीं की सहायता से नम्बरों का लिखना शुरू हुआ।

नम्बरों को अक्षरों के द्वारा लिखने के कारण न केवल नम्बर लिखे जाने में मुश्किल होती थी पर गुणा, भाग, जोड़ या घटाने में तो नानी याद आती थी। अंक प्रणाली में क्रान्ति तब आयी जब भारतवर्ष ने लिपि के अक्षरों को अंक न मानकर, नयी अंक प्रणाली निकाली और शून्य को अपनाया। इसके लिये पहले नौ अंको के लिये नौ तरह के चिन्ह अपनाये जिन्हें 1,2,3 आदि कहा गया और एक चिन्ह 0 भी निकाला। इसमें यह भी महत्वपूर्ण था कि वह अंक किस जगह पर है। इस कारण सबसे बड़ा फायदा यह हुआ कि सारे अंक इन्हीं की सहायता से लिखे जाने लगे और गुणा, भाग, जोड़ने, और घटाने में भी सुविधा होने लगी। यह अपने देश से अरब देशों में गया। फिर वहां से 16वीं शताब्दी के लगभग पाश्चात्य देशों में गया, इसलिये इसे अरेबिक अंक कहा गया। वास्तव में इसका नाम हिन्दू अंक होना चाहिये था। यह नयी अंक प्रणाली जब तक आयी तब तक वर्णमाला के अक्षरों और अंकों के बीच में सम्बन्ध जुड़ चुका था। जिसमें काफी कुछ गड़बड़ी और उलझनें (Confusion) पैदा हो गयीं।

इस कारण सबसे बड़ी गड़बड़ यह हुई कि किसी भी शब्द के अक्षरों से उसका अंक निकाला जाने लगा और उस शब्द को उस अंक से जोड़ा जाने लगा। कुछ समय बाद गड़बड़ी और बढ़ी। उस अंक को वही गुण दिये जाने लगे जोकि उस शब्द के थे। यदि वह शब्द देवी या देवता का नाम था तो उस अंक को अच्छा माना जाने लगा। यदि वह शब्द किसी असुर या खराब व्यक्ति का था तो उस अंक को खराब माना जाने लगा। यहीं से शुरू हुई अंक विद्या: इसका न तो कोई सर है न तो पैर, न ही इसका तर्क से सम्बन्ध है न ही सत्यता से। यह केवल महज अन्धविश्वास है।

666 – शैतान का नम्बर
नीरो एक रोमन बादशाह हुआ था। वह बहुत क्रूर था लेकिन कोई यह खुले तौर पर नहीं कह सकता था। उसके नाम के अक्षरों का अंक 666 था। इसलिये इसे शैतान का अंक कहा जाने लगा। चलिये अब हस्तरेखा विद्या पर चलते हैं पर पहले डा. जोसेफ बेल के बारे में बात करते हैं जो कि शर्लौक होल्मस की कहानियां लिखने की प्रेरणा रहे।

हस्तरेखा विद्या
इरविंग वैलेस, कल्पित (fiction) उपन्यास के बादशाह हैं, पर उनका मन हमेशा अकल्पित (non-fiction) लेख लिखने में रहता है। उनके अनुसार वे कल्पित उपन्यास इसलिये लिखते हैं क्योंकि उसमें पैसा मिलता है। उन्होंने बहुत सारे अकल्पित लेख लिखे हैं। इन लेखों को मिलाकर एक पुस्तक निकाली है, उसका नाम है, The Sunday Gentleman है यह पुस्तक पढ़ने योग्य है। इसमें एक लेख The Incredible Dr. Bell के नाम से है। यह लेख डा. जोसेफ बेल के बारे में है।

डा. जोसेफ बेल वे 19वीं शताब्दी के अंत तथा 20वीं शताब्दी के शुरू में, एडिनबर्ग में सर्जन थे और एक वहां के विश्वविद्यालय में पढ़ाते थे। वे हमेशा अपने विद्यार्थियों को कहते थे कि लोग देखते हैं पर ध्यान नहीं देते। यदि आप किसी चीज को ध्यान से देखें तो उसके बारे में बहुत कुछ बता सकते हैं। उन्होंने बहुत सारे विद्यार्थी को पढ़ाया, उनमें से एक विद्यार्थी का नाम था आर्थर कैनन डॉयल, जो कि शर्लौक होल्मस के रचयिता हैं।

इस लेख में डा. बेल के बहुत सारे उदाहरण बताये गये हैं जब उन्होंने किसी व्यक्ति को देखकर उसके बारे में बहुत कुछ बता दिया। शर्लोक होल्मस एक जासूस थे और कहानियों में ध्यान पूर्वक देखकर बहुत कुछ सुराग ढूंढ़ कर हल निकालते थे। आर्थर कैनन डॉयल ने जब शर्लोक होल्मस की कहानियां लिखना शुरू किया तो उसका चरित्र डा. बेल के चरित्र पर और डा. वाटसन का चरित्र अपने ऊपर ढ़ाला।

यदि आप किसी कागज को मोड़ें तो हमेशा पायेंगे कि उस कागज को जहां से मोड़ा जाता है, उसमें चुन्नट (Crease) पड़ जाती है। इस तरह से जब हम हथेली को मोड़ते हैं तो जिस जगह हमारी हथेली मुड़ती है, उस जगह एक चुन्नट, रेखा के रूप में पड़ जाती है। हथेलियों की रेखायें, हाथ के मुड़ने के कारण ही पड़ती हैं।

हम किसी के हाथ को ध्यान से देखें तो कुछ न कुछ उस व्यक्ति के बारे में पता चल भी सकता है। शायद यह भी पता चल जाय कि वह व्यक्ति बीमार है या नहीं। पर उसकी हथेली की रेखाओं को देखकर यह बता पाना कि उस व्यक्ति की शादी कब होगी, वह कितनी शादियां करेगा, कितने बच्चे होंगे, या नहीं होंगे। यह सब बता पाना नामुमकिन है। यह सब भी ढ़कोसला है।

निष्कर्ष
ज्योतिष, अंक विद्या, और हस्त रेखा विद्या में कोई भी तर्क नहीं है: यह महज अन्धविश्वास है। फिर भी, हमारे समाज में बहुत सारे काम इनके अनुसार होते हैं। बड़े से बड़े लोग इन बातों को विचार में रख कर कार्य करते हैं। शायद यह सब इसलिये क्योंकि यह कभी कभी एक मनश्चिकित्सक (psychiatrist) की तरह काम करते हैं। आप परेशान हैं कुछ समझ नहीं आ रहा है कि क्या करें। मुश्किल तो अपने समय से जायगी पर इसमें अक्सर ध्यान बंट जाता है और मुश्किल कम लगती है। पर इसका अर्थ यह नहीं कि इनमें कोई सत्यता है या यह अन्धविश्वास नहीं है या ये टोने टुटके से कुछ अलग है।

पिछली शताब्दी में विज्ञान को लोकप्रिय बनाने में जब भी लोगों का नाम लिया जायगा तो उसमें दो लोग अवश्य रहेंगे – आइज़ेक एसीमोवव और कार्ल सेगन (Carl Sagan)।
 

यदि आपको 1980 के दशक में दूरदर्शन की याद हो तो आप हर रविवार को आने वाले टीवी सीरियल Cosmos को नहीं भूले होंगे। यह कार्ल सेगन ने ही बनायी थी। इसके बाद इसी नाम से यह पुस्तक के रूप में भी प्रकाशित हुई। यहां ज्योतिष पर कार्ल सेगन के विचारों को भी सुने।


 उन्‍मुक्‍त जी के ब्‍लॉग से साभार

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  1. bahut satik...scentific najariya....lagta hai jyotish kaa baajaa phodakar hi rahenge...achhi baat hai...andhaviswaas se parda uthanaa hi caahiye.

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  2. जाकीर भाई एक बहुत ही अच्छा लेख ! सांप की बांबी में हाथ डाल दिया है आपने , आलोचना के लिए तो तैयार ही होंगे ! वैसे अभी लोग पूछते आ जायेंगे ये आशीमोव या कार्ला सागन कौन है ? सागन कोई तोप है जो उसका कहा सच होगा !
    अंधविश्वास ऐसी चीज है कि आप ढोल नगाड़े ले कर लोगो को जगाने की कोशिश कर ले ये नहीं जागने वाले !

    क्या बाह्य अंतरिक्ष मे जीवन है ? :परग्रही जीवन श्रंखला भाग १

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  3. अभी तक ज्‍योतिषियों का कोई कमेंट नहीं आया। कहां रह गये?

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  4. अच्छी किन्तु बड़ी लंबी पोस्ट है अभी आधा पढ़ा बाकि फुरसत में | मुझे तो लगा रहा है की आज के समय में कई और नये नये भविष्य बताने वाले शास्त्र आ गये है |

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  5. आपने ब्लॉग पर आकार जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए आभारी हूं

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  6. खगोलशास्त्र के तथ्यों की संक्षिप्त जानकारी आपने प्रस्तुत की, धन्यवाद।
    भविष्यफल बताने के विभिन्न प्रकारों का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है।

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  7. उन्मुक्त जी के सौजन्य से एक संदर्भनीय आलेख -बार बार पढ़े जाने योग्य !

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  8. वैज्ञानिक जानकारियों से भरा आलेख.
    बधाई.

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत बङा लेख बङा समय लगा पढने मे लेकिन
    सशक्त आलेख , धन्यवाद।

    सर जी समय निकालकर कभी मेरे ब्लाग पर भी आकर मार्गदर्शन करें। खुशी होगी ।

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  10. लो जी कर लो बात
    पढ़ा जाकिर भाई ऊपर karishna जी का कमेन्ट ?

    और बजाईये बीन :)


    लगे रहिये जब तक ये लोग ताला न खरीद लें
    एक और जबरदस्त पोस्ट
    बधाई और आभार

    उत्तर देंहटाएं
  11. .
    .
    .
    आदरणीय उन्मुक्त जी की यह पोस्ट आपने तस्लीम पर छापी है २०-१-११ को... बोले तो अंकों का जोड़ है ५... माने V...मतलब विक्टरी... माने इस पोस्ट पर भी ज्योतिष, हस्तरेखा शास्त्र व अंक ज्योतिष की ही जीत होगी अंतत:... वैसे भी अब 'वैज्ञानिक ज्योतिष' का बहुत विकास हो चुका है... कब कहाँ भूकंप आयेगा, साल के किस किस दिन दुर्घटनायें होंगी, किस तारीख को सेंसेक्स किस स्तर पर रहेगा, कब बारिश होगी, कब धूप आयेगी, कब कोहरा छायेगा सब कुछ ग्रहों की चाल से व आसमान में उनकी स्थिति से निर्धारित होता है... अब देखिये न इतना लंबा पोस्ट लगाये आप पर कमेंट अभी तक केवल १४... ज्योतिष शास्त्र के अनुसार उच्च के सूर्य में यह पोस्ट लगाये होते तो अब तक तीन अंकों का आंकड़ा पा गये होते...

    बाइ द वे न तो उन्मुक्त जी के और न ही जाकिर अली रजनीश जी के हाथ में हस्तरेखा-अंक शास्त्र-ज्योतिष ज्ञान रेखा है... तभी इन दोनों को इन तीनों चीजों पर भरोसा नहीं है... अब यह न पूछना कि यह रेखा होती कैसी है... तो यह भी बता दूँ कि इसे देखने का सौभाग्य भी वही पाता है जिसके खुद के हाथ में यह होती है...

    समझ आया कुछ... नहीं... होपलैस हो आप फिर तो... ;))



    ...

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  12. अच्छा संकलन, आपने कहा की ज्योतिष का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है. मैं कहता हूँ क्यों होना चाहिए? आपका ऐसा कहना मेरे हिसाब से इस बात का द्योतक है की आप आधुनिक विज्ञान को सर्वोपरि मानते हैं. ऐसा है तो मैं पूरी तरह से सहमत नहीं हूँ.

    हमने कभी ऐसा सोचा है की किसी वैज्ञानिक तथ्य का कोई ज्योतिषीय आधार है या नहीं. इसलिए ऐसा कहना की किसी ज्योशीय गन्ना का कोई वैज्ञानिक आधार नहीं है, ज्योतिष के साथ पक्षपात है.

    ज्योतिष की सारी गणनाओं में से एक है सूर्या और चन्द्र-ग्रहण की गणना. जो की बिलकुल वैज्ञानिक गन्नान्ना से मेल खाती है. या यु कहें की ज्योतिषीय गणनाओं में से सिर्फ ग्रहण के ही गणना है जिसे science replicate कर पता है. अन्य को नहीं. इसलिए वो इसे समझता नहीं है और कहता है की ये गलत है.....
    समाश्या ये है की ज्योतिष के field में research नहीं हुई इसलिए पूर्णता शेष है. इसमें शोध की जरूरत है......
    और हर बात के पीछे वैज्ञानिक तर्क ढूंढना क्या विज्ञान के प्रति अंधविश्वास नहीं कहा जाएगा. मैं जानता हूँ बहुत ज्यादा लिख रहा हूँ.
    मैं अभी मानता हूँ की बिना अध्ययन किये ज्योतिष को झूठ बताना सही नहीं है.

    उत्तर देंहटाएं
  13. मरे पिछले कमेन्ट को अन्यथा ना लिया जाए. मैं बस ज्योतिष को benifit of dout देना चाहता होण ताकि अपना ज्योतिष वास्तविकता के आधार पर और अच्छे ज्योतिष वैज्ञानिकों की मदद से अपनी जगह बना सके. इतनी बात कह दी तो एक छोटी सी हल्की फुल्की analogy और दे दूं टोटके के सम्बन्ध में.
    आप कहते हैं की टोटके का कोई महत्वा नहीं है. मान लिया जाए आप कहते हैं की सूर्यदेव को जल चढाने से क्या होता है? कहाँ सूर्य इतनी दूर और कहाँ ५० ग्राम पानी इतनी दूर ? क्या फरक पडेगा और कैसे? हम ऐसा इसलिए सोचते हैं क्योकी हम सूर्या, पृथ्वी, मंत्र और ताम्बे के लोटे से डाले गए पानी का सम्बन्ध नहीं जानते इसलिए बकवास मानते हैं.
    अब एक thought एक्सपेरिमेंट कीजिये. मान लीजिये एक बच्चे या किसी ऐसे को जिसे ज़रा भे ज्ञान नहीं है, सर में दर्द होता है वो डाक्टर के पास जता है वो उसे एक गोली दे कर कहता है की इसे खा लेने से उसका सर का दर्द ठीक हो जाएगा. जबकी उसे कोई ज्ञान नहीं है की ये गोली पेट में जा कर कैसे काम करेगी और सर का दर्द कैसे ठीक करेगा वो सोच सकता है,( अगर वो अपने हिसाब से बुद्धिमान होगा) की कैसा पागल डॉ है की सर के दर्द को ठीक करने के लिए पेट में दवा खिला रहा है. इस ससोच के पीची उसकी वही अनभिज्ञता है जो हमारी आपकी ग्रहों और उससे होने वाले प्रभाव के ऊपर है.
    एक बात और, जब आप कहते हैं की चन्द्रमा ग्रह है ही नहीं तो इसे ग्रह मानते हुए ज्योतिष की गणना कैसे सही हो सकती है. नामस इ क्या फरक पड़ता है......विज्ञान में भी ऐसे ही है है की नहीं? electro motive force (EMF) कोई फ़ोर्स तो है नहीं फिर भी नाम तो है. Year टाइम की उनित है लेकिन light year दिस्तांस की. तो किसी को किस नामस इ पुकारा जाए वो उतना important नहीं है जितना उसका गणना में प्रयोग.
    थोडा बहुत स्सिएंस मैंने भी पढ़ा है इसलिए मानता हूँ की इसमें कही हुई बात के पीछे बहुत प्रयोग और सिद्धांत होते है. इसलिए इसपर विस्वास करना चाहिए.
    इतना सारा लिख कर मैं बस इतना कहना चाहता हूँ की ज्योतिष को जो सम्मान मिलना चाहिए वो नहीं मिला है.
    इसमें रेसेअर्च की बहुत जरूरत है.

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  14. बहुत लंबा लेसन था, फिर भी पढा। क्योंकि बहुत सी काम की जानकारी थी। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
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    विचार

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  15. जाकिर जी, यह लेख अन्तरजाल पर कई जगह पूरा कई जगह इसके कुछ भाग - आभार प्रगट करते हुऐ तो कई जगह आभार न प्रगट करते हुऐ छपे हैं। इसे यहा आभार देते हुऐ जगह देने के लिये मेरा आभार और धन्यवाद।

    चाहे भारतीय ज्यतिष हो या पाश्चात्य, इन दोनो का मूलभूत सिद्धान्त यह है कि खगोलीय पिण्ड आपके व्यक्तिगत जीवन पर असर डाल सकते हैं। यदि कोई उल्का पृथ्वी से टकरा जाय तो अवश्य यह हमारे जीवन पर असर डालेगी लेकिन पैदा होते समय वे किस स्थिति में थी उससे हमारे व्यक्तिगत जीवन में कोई असर नहीं पड़ता। यह केवल एक अन्धविश्वास, टोना टुटका है।

    यह लेख अन्तरजाल पर कई जगह होने के बावजूद भी, मेरा सबसे पढ़ा जाने वाला लेख है। इस पर लगभग प्रतिदिन १०० लोग आते हैं। यह मुझे एक स्तर पर दुखी करता है तो दूसरे स्तर पर प्रसन्न - कम से कम लोग इस दृष्टिकोण को भी पढ़ सकेंगे जो कि आजकल कम दिखायी देता है। हिन्दी टीवी के कुछ चैनल उल्टी दिशा में चलते हैं।

    इस पर अक्सर असहमति की टिप्पणियां आती हैं। इसमें जितनी टिप्पणियां हैं, उससे अधिक मैंने प्रकाशित नहीं की। या तो वे शालीनता से परे होती थीं, या फिर लेख को बिना पढ़े होती हैं। अक्सर कुछ परेशान लोगों की होती हैं जिन्हें मैं ढाढस बंधाता हूं और इससे दूर रहने के लिये कहता हूं।

    इस लेख पर जब शालीनता से परे टिप्पणियों कि अति हो गयी तब मैंने एक अन्य चिट्ठी आप सही हैं ... मैं बदलाव कर रहा हूं नाम से लिखी।

    कुछ समय पहले बीबीसी पर एक बेहतरीन विज्ञान श्रृंखला वंडरस् ऑफ द सोलर सिस्टम आ रही थी। लोगों को ध्यान, इसकी तरफ आकर्षित करने के लिये, इसके उद्घोषक की एक बात, मैंने ज्योतिष कूड़े का भार है नाम से लिखी।

    इन सब के बावजूद भी जब शालीनता से पर टिप्पणीयां बन्द नहीं तब मैंने दो चिट्ठियां ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके’ श्रृंखला किसी को दुख देने के लिये नहीं लिखी गयी थी एवं मैंने ‘ज्योतिष, अंक विद्या, हस्तरेखा विद्या, और टोने-टुटके’ श्रृंखला अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिये लिखी। देखिये कि अब भी कम होती हैं कि नहीं।

    इस लेख को पुनः अपने चिट्ठे पर जगह देने और इसे व्यापक श्रोतागण के समक्ष लाने के लिये मेरा पुनः आभार।

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  16. very interesting blog you have here Zakir saheb. Thanks.

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  17. लेख का पूर्वार्द्ध ज्ञानवर्धक है.उत्तरार्द्ध पूर्वाग्रह पर आधारित है.किसी भी विषय के नियमबद्ध एवं क्रमबद्ध अध्ययन को विज्ञानं कहते है.अतः इस कसौटी पर किये ज्योतिषीय विश्लेषण वैज्ञानिक होंगे तथा ढोंग -पाखंड पर आधारित निष्कर्ष निश्चित ही ठगी कहलायेंगे.

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  18. ज्योतिष तिथि,वार,मास,वर्ष इत्यादि की गणना करने के लिए है। लेकिन कुछ सिद्ध लोग ग्रह-नक्षत्रों के आधार पर फ़लित भी निकालते हैं। शुभाशुभ का निर्णय करते हैं।

    हम तो भैया चौघड़िया देख कर घर से निकलते हैं और साथ में देव पंचाग भी रखे रहते हैं। किसी को सहायता की जरुरत पड़ जाए तो त्वरित सहायता उपलब्ध करा देते हैं डायल 100 नम्बर जैसे। :)

    हमारे एक डॉक्टर मित्र हैं जो मरीज की जन्म कुंडली देख कर इलाज करते हैं और दवाई भी देते हैं। प्राचीन ज्योतिष विद्या और आधुनिक एलोपैथी चिकित्सा विज्ञान में सामंजस्य बिठाकर जनस्वास्थ्य संरक्षण कर रहे हैं।

    ज्ञान वर्धक पोस्ट के लिए आपका आभार

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  19. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  20. @सूरज और चन्द्रमा, समुद्र को भी प्रभावित करते हैं। ज्वार और भाटा इसी कारण होता है। समुद्री ज्वार-भाटा के साथ यह हवा को भी उसी तरह से प्रभावित कर, उसमें भी ज्वार भाटा उत्पन करते हैं। ज्वार-भाटा में किसी और ग्रह का भी असर होता होगा, पर वह नगण्य के बराबर है।

    अभी तक विज्ञान आकाशीय पिंडों की जिन शक्तियों को ढूंढ सका है .. उसमें से किसी के कारण समुद्र में ज्‍यार भाटा नहीं आता है .. इसका अर्थ यह है कि सूर्य और चंद्रमा के द्वारा समुद्र में ज्‍वार भाटा आने की कोई और वजह है .. और यदि सूर्य और चंद्रमा के पास कोई शक्ति हो सकती है तो अन्‍य ग्रहों के पास भी होगी .. कभी बडे और कभी छोटे स्‍तर पर ज्‍वार भाटा आने का कारण अन्‍य ग्रह भी तो हो सकते हैं .. इसकी खोज होनी चाहिए !!

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  21. @यदि ज्योतिष का ही तर्क लगायें तो – विषुव अयन के समय सूरज की स्थिति बदल जाने के कारण – जो गुण ज्योतिषों ने मेष राशि में पैदा होने वाले लोगों को दिये थे वह अब मीन राशि में पैदा होने वाले व्यक्ति को दिये जाने चाहिये।
    यह पाश्‍चात्‍य ज्‍योतिषियों के तर्क हैं .. भारतीय ज्‍योतिष राशि निर्घारण के मामले में अटल हैं .. इसलिए इसके आधार पर भारतीय ज्ञान को गलत नहीं ठहराया जा सकता है !!

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  22. वैसे ज्‍योतिष के विरोध की बातें छोड दी जाएं .. तो आधुनिक खगोल शास्‍त्र के बारे में विस्‍तृत जानकारी देता यह आलेख बहुत बढिया है .. पर हमारे देश में वैदिक गणित की तरह ही खगोल के अपने नियम भी बहुत ही विकसित हैं .. उसकी जानकारी जन जन को होनी चाहिए .. भारतीय खगोल शास्‍त्र की जानकारी जिसे भी हो जाएगी .. वो फलित को न स्‍वीकार करे .. ऐसा हो ही नहीं सकता !!

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  23. इसरो का पिछला मिशन तमाम वैज्ञानिक गणनाओं के बावजूद किस क़दर फेल हुआ,आप देख ही रहे हैं। कोई आश्चर्य नहीं कि फलित की बात करते समय हमारे ज्योतिषियों की भी गणना चूक जाती है। दरअसल,ज्योतिष की ही तरह विज्ञान की भी अपनी सीमाएं हैं। स्वयं विज्ञान भी प्रकृति के रहस्यों को ही जानने में लगा है। ज्योतिषी भी जब फलित के लिए ग्रहीय स्थितियों का विश्लेषण करते हैं,तो वे भी ज्योतिष को वैज्ञानिक बनाने का प्रयास ही करते हैं। ज्योतिष के क्षेत्र में शोषणकारी प्रवृत्तियों के प्रवेश के कारण इस विधा का नुक़सान हुआ है। फिर भी,यह नहीं भूलना चाहिए कि यदि यह विधा एकदम झूठी होती,तो कब की समाप्त हो गई होती। ज़रूरत है इसके वैज्ञानिक आधार को मज़बूत करने की। इसमें आप जैसे विज्ञान-सजग सज्जन सकारात्मक भूमिका निभा सकते हैं।

    उत्तर देंहटाएं
  24. @कृष्‍णा महोदय, क़पया अपने नाम की मर्यादा रखने वाले कमेंट करें और विषय पर बात करें, अन्‍यथा उन्‍हें डिलीट करना हमारी मजबूरी होगी।

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  25. सॉरी .. ऊपर की टिप्‍पणी में सूर्य की जगह पृथ्‍वी लिखा गया था .. इसलिए मिटाना पडा..

    @यदि पृथ्वी को सौरमंडल का केन्द्र मान लिया जाय तो किसी भी तरह से इन ग्रहों की गति को नहीं समझा जा सकता है पर यदि सूरज को सौरमंडल का केन्द्र मान लें तो इन ग्रहों और तारों दोनों की गति को ठीक प्रकार से समझा जा सकता है।
    फिर भौतिकी के सापेक्षिक गति के सिद्धांत का क्‍या होगा .. सभी ज्‍योतिषियों को मालूम है कि ग्रह सूर्य के चारो ओर परिक्रमा करते हैं .. पर पृथ्‍वी पर रहने वालों को अपने आसमान में ग्रहों की स्थिति निकालने के लिए पृथ्‍वी की गति को शून्‍य करना ही होगा !!

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  26. गहरे विश्लेषण के साथ प्रस्तुत रोचक पोस्ट .... अच्छी जानकारी

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  27. @jakir Ali saheb aap ki post mein har baar kuch na kuch nayapan aur gyanvardhak batein hoti hai.

    Thanks

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  28. योगियों ने मानव को ब्रह्माण्ड का मॉडेल यानी प्रतिरूप जाना,,, हमारे सौर-मंडल के नौ सदस्यों के सार से बना, जो आधार बना सूर्य से शनि तक 'नवग्रह' पूजा की चलन का, और योगियों द्वारा मानव शरीर में मेरु-दंड को मूलाधार से सहस्रार तक अष्ट-चक्र धारण किये हुए एक मिटटी का पुतला),,,
    उपरोक्त को पृष्ठभूमि में रख, खगोलशास्त्र और ज्योतिष आदि में विस्तार से जाने का प्रयास करने से पहले शायद 'आधुनिक वैज्ञानिकों' को, आम आदमी को, यह समझाना होगा कि स्वप्न, बंद आँखों से, माथे में (?) निद्रावस्था में अनादिकाल से कैसे दिखाई पड़ते आ रहे हैं - सर्वश्रेष्ट प्राणी मानव को ही नहीं अपितु निम्न श्रेणी के अन्य कई पशुओं को भी (जिसकी 'विज्ञान जगत' द्वारा पुष्टि की जा चुकी है) ?
    स्वप्न के समान चित्र (स्वप्न से प्रेरित हो?) रुपहले पर्दे पर प्रस्तुत करने की क्षमता केवल हाल ही में मानव जाति अथक प्रयास (तपस्या?) के बाद अर्जित कर पायी है, और जिसे पिछले कुछ दशक में ही अपनी चरम सीमा पर पहुँचते कहा जा सकता है...(जबकि योगियों ने काल-चक्र को सतयुग से कलियुग तक ब्रह्मा के एक दिन में १०८० बार घूमते हुए दर्शाया, और ब्रह्मा के एक दिन को लगभग साढ़े चार अरब वर्ष का, और उसके पश्चात उतनी ही लम्बी उसकी रात का होना,,,जबकि उसके प्रतिरूप समान पृथ्वी पर औसतन १२ घंटे का दिन और १२ घंटे की रात का होना हम जानते ही हैं)...

    उत्तर देंहटाएं
  29. ये है हमारे न्यायालयो के निर्णय और फील प्लेट द्वारा उसकी खींचाई :

    http://blogs.discovermagazine.com/badastronomy/2011/02/03/america-and-india-love-their-antiscience/

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  30. काश, हमारे पास कुछ और ज़ाकिर अली रजनीश होते!
    धन्यवाद ज़ाकिर भाई.

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  31. बेनामी5/18/2013 10:15 pm

    jivan anubhv anubhuti (1) air we see answer no (2) god we see answer no (3)used any thing than result right/wrong (4) honest people only amount not expensive govt. supply.(5) maths is write life education change17/marrige26 /house 35 (6)jyoush man free seva is right another all thing is wrong (7)self mind sckore /bol is 100% right

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  32. jo ho9ta h usko hone do baaki sb bhagwan parchod do wo sb thik kar dega har chij apni jgh shi h kishi ka apman karna glt h

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  33. jotishshastr ka dusra nam thagshastr hai...

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  34. jaakir jee, aapka prayas achha hai, main bhee andhvishvaasi nahi hoon. lekin jahan aadhunik vigyan fail ho jaye or totke kaam kare to aap kya kahenge.kuchh mamle aise hote hain ki tark shakti pangu ho jaati hai.jyotish ke baare main aapne jo likha hai main usse poora sahmat nahi hoon. vastvikta yeh hai ki jise jyotish ka gyan hota hai voh kisi ko batata nai or jise adhkachra gyan hota hai voh apna dhol peet taa hai. mera ek funda hai ki sab kuchh purv main niyat hota hai. bas aapn karm kare jao.

    उत्तर देंहटाएं
  35. jaakir sahab, aapka prayas achha hai. lekin jyotish kya hai. yeh jaane wala kisi se kuchh nahi bolta or jo adhkachra hai voh apni dookaan khol ker baith jata hai'

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  36. jaakir jee, aapka prayas achha hai, main bhee andhvishvaasi nahi hoon. lekin jahan aadhunik vigyan fail ho jaye or totke kaam kare to aap kya kahenge.kuchh mamle aise hote hain ki tark shakti pangu ho jaati hai.jyotish ke baare main aapne jo likha hai main usse poora sahmat nahi hoon. vastvikta yeh hai ki jise jyotish ka gyan hota hai voh kisi ko batata nai or jise adhkachra gyan hota hai voh apna dhol peet taa hai. mera ek funda hai ki sab kuchh purv main niyat hota hai. bas aapn karm kare jao.

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  37. these is really great symbol
    thanks for these

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  38. bilkul sahi hai jakir bhai jankari dene ke liye dhanyvad

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  39. Ramesh Dhruw7/30/2014 1:52 pm

    bilkul, sahi hai jakir bhai !! jankari dene ke liye dhanyvad !!!

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वैज्ञानिक चेतना को समर्पित इस यज्ञ में आपकी आहुति (टिप्पणी) के लिए अग्रिम धन्यवाद। आशा है आपका यह स्नेहभाव सदैव बना रहेगा।

 
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