मानव के चंद्रमा पर पहुंचने के 50 वर्ष: रोमांचक फिल्म सा है ये सफर

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मानव के चंद्रमा पर पहुंचने के 50 वर्ष: रोमांचक फिल्म सा है ये सफर -डॉ. सत्य पाल सिंह अंतरिक्ष में टिम-टिमाते तारों एवं अन्य आकाशीय पि...

मानव के चंद्रमा पर पहुंचने के 50 वर्ष: रोमांचक फिल्म सा है ये सफर

-डॉ. सत्य पाल सिंह

moon mission
अंतरिक्ष में टिम-टिमाते तारों एवं अन्य आकाशीय पिण्डों को देखकर मानव मस्तिष्क सहज ही उत्सुक हो जाता है। मानव मन से यह प्रश्न सहज ही उठते हैं, कि ये पिण्ड, ग्रह या तारें, क्या हैं? इनकी सृष्टि कैसे और कब हुई? क्या अन्य ग्रहों पर भी पृथ्वी की तरह कोई सभ्यता निवास करती है? पर-ग्रहीय जीवन कैसा होगा? क्या वह हमसे लाखों साल पीछे होगें या वह हमसे लाखों साल पहले अवतरित हुए? उनका ज्ञान-विज्ञान हमसे आगे होगा या पीछे। मानव मस्तिष्क में उठने वाले यह सहज प्रश्न जहां एक ओर अद्भुत रोमांच को जन्म देते हैं, वहीं मन में पर-ग्रहीय जीव (एलियंस) के पृथ्वी पर आने को लेकर एक अज्ञात आशंका पैदा करते हैं।

सृष्टि के सृजन के सन्दर्भ में शास्त्रों में छोटी-छोटी कथाओं के माध्यम से बहुत सी बातें कही गयी हैं। उनमें वर्णित पात्रों को हम एक संकेत मानकर विचार करें, तो उनमें से कुछ वैज्ञानिक चिंतन प्रतीत होते हैं, एवं कुछ प्राकृतिक घटनाओं की ओर संकेत करते हैं। ऐसे विचारों को आधुनिक विज्ञान में मान्यता प्राप्त सिद्धान्त माना गया है। उदाहरण स्वरूप ब्रम्ह-पुराण में सृष्टि के सृजन की बात वर्णित है। भगवान को नारायण कहा गया है। नारायण ने ही सृष्टि की रचना करने के लिए सबसे पहले जल की रचना की। जल का दूसरा नाम ‘नार’ है, क्योंकि उसकी उत्पत्ति भगवान से हुई है। प्रारम्भ में जल ही भगवान निवास का स्थान हुआ। अतः वे नारायण कहलाए। नारायण अर्थात् भगवान ने जल में शक्ति का आधान किया, जिससे एक विशालकाय सुवर्णमय अण्डा उत्पन्न हुआ। इस अण्डे में स्वयं ब्रम्हा जी उत्पन्न हुए। भगवान ब्रम्हा ने उस अण्डे में एक वर्ष तक निवास करने के पश्चात् उस अण्डे के दो टुकडे कर दिए। एक टुकडे से द्युलोक बनाया और दूसरे से भूलोक। उन दोनों के बीच आकाश अर्थात अंतरिक्ष रखा। जल के ऊपर तैरती हुई पृथ्वी को बनाया। सम्पूर्ण जीवित और अजीवित पदार्थ की उत्पत्ति इसी अण्डे से हुई। समतल और असमतल भूमि का निर्माण पर्वतों के निकलने और उनके एक स्थान पर एकत्रित होने से हुआ। पृथ्वी पर वनस्पतियों एवं जीवों की उत्पत्ति हुई। अव्यक्त या सूक्ष्म पदार्थ का अभिप्राय कारण या प्राकृतिक नियम और ऊर्जा इत्यादि से लिया जा सकता है। व्यक्त या कार्य का अभिप्राय स्थूल पदार्थों से है। इन सभी की उत्पत्ति नारायण के मन से हुई, अर्थात सृष्टि के प्रारम्भ में ऊर्जा का प्रादुर्भाव हुआ, तत्पश्चात् सूक्ष्म और स्थूल जगत का निर्माण हुआ। जल की उत्पत्ति के संदर्भ में एक श्लोक आता है-

कीर्तितं स्थिर कीर्तीनां सव्र्वेंषा पुण्यवर्धनं। भगवान ततः स्वम्भूभर्गवान, सिसृक्षुर्विविधाः प्रजाः।
अप एव  ससरज्जादौ  तासु  वीर्य्यमथासृजत । आपो नारा इति प्रोक्ता आपो  वै नरसूनवः। 

अर्थात् यश शरीर से अमर व्यक्तियों का स्मरण पुप्यप्रद होता है। यह सृष्टि कथा आप लोगों की प्रतिष्ठा को बढ़ाने वाली है। स्वयंभू भगवान ने अनेक प्रकार की प्रजाओं को उत्पन्न करने की इच्छा रखकर सबसे पहले जल की सृष्टि की। उसमें बीज डाला। नार शब्द जलराशि और नर-पुत्र इन दो अर्थों में प्रयुक्त होता है। उस परम पुरूष का आश्रय पहले जलराशि ही थी। इसीलिए उनको नारायण कहा गया। नार का एक अर्थ ज्ञान से है। ज्ञान को हम भाव-वाचक मानते हुए ‘अव्यक्त’ अर्थात ऊर्जा के रूप में ले सकते हैं। पहले ब्रम्हा ने सृष्टि की उत्पत्ति के लिए प्राकृतिक नियम एवं विधानों की संरचना की। तदोपरान्त उस सूक्ष्म ऊर्जा से व्यक्त (स्थूल जगत) पदार्थ इत्यादि की रचना की। इस प्रकार से व्याख्या करने पर जो वैज्ञानिक दृष्टिकोण परिलक्षित होता है, वह आधुनिक विज्ञान की परिकल्पनाओं के अत्यन्त सन्निकट पहुँच जाता है। इसका एक अद्भुत उदाहरण यह है कि पुराणों के अनुसार ब्रम्हा की आयु की गणना करने पर ब्रम्हा की आयु ब्रम्हांड की आयु के आस-पास ही आती है। ध्यान देने योग्य बात यह है, कि आधुनिक खगोल शास्त्र के अनुसार ब्रम्हांड की उत्पत्ति 13.6 अरब साल पूर्व हुई थी। पृथ्वी की आयु के बारे में भी शास्त्रों में काफी सही वर्णन है।

अंतरिक्ष में मनुष्य की पहली छलांग   

अंतरिक्ष की यात्रा करने के अपने सपनों को कितने कवियों एवं लेखकों ने अपनी साहित्यिक रचनाओं में जगह दी है, लेकिन मानव की उस उड़ान को सबसे पहले अमेरिकी वैज्ञानिकों ने अपोलो मिशन के जरिये पंख लगाया। पृथ्वी की कक्षा में पहुंचकर अंतरिक्ष की यात्रा सबसे पहले रूसी अंतरिक्ष यात्री यूरी गॉगारिन Yuri Gagarin ने वर्ष 1961 में की। अंतरिक्ष में पहुँचने की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में अमेरिका ने अपोलो मिशन Apollo mission को शुरू किया। पहले कुछ अपोलो मिशन में चन्द्रमा की कक्षा में चक्कर लगाने के लिए आरबिटर यान छोड़े गये। फिर अपने अपोलो मिशन के जरिए अमेरिका ने चन्द्रमा पर साफ्ट-लैडिंग Soft landing कर वहां की चट्टानों का अध्ययन किया। उन्होंने चन्द्रमा पर मानव को भेजने का जो अभूतपूर्व निर्णय लिया, वह यदि वास्तव में देखा जाय तो तात्कालिक विज्ञान एवं अभियांत्रिकी की दृष्टि से एक अतिमहत्वाकांक्षी परियोजना थी। 

अंतरिक्ष में पहुंचने के प्रयास में जनवरी 27, 1967 को अपोलो 204 (AS 204) के उड़ान पूर्व परीक्षण में यान प्रमोचन स्थल Launching pad पर ही एक दुर्घटना हो गयी।

इसमें अंतरिक्ष-यात्रियों विर्जिल ग्रिसमॅ Virgil I. "Gus" Grissom, एडवर्ड व्हाईट Edward H. White II एवं रोगर सैकी Roger B. Chaffee ने अपनी जान गवाँ दी। इसके पूर्व अपोलो-2 एवं अपोलो-3 की परीक्षण उड़ानें हुईं। वर्ष 1967 में ही अमेरिकी अंतरिक्ष एजेन्सी नासा ने इस बात की घोषणा किया कि अपोलो-204 को ही अपोलो-1 मिशन के रूप में जाना जायेगा। अतः अपोलो-2 एवं अपोलो-3 नाम से कोई यात्रा दर्ज नहीं हो सकी। अपोलो मिशॅन की पहली चार उड़ानें उपकरणों का परीक्षण करने हेतु की गईं। बाद की सात उडानों में से छः उड़ानों में चन्द्रयात्री चन्द्रमा की सतह पर उतरे। चन्द्रमा की सतह पर पहली और अंतिम लैडिंग क्रमशः वर्ष 1969 और 1972 में हुई। अपोलो मिशन के इन अमेरिकी प्रयासों में कुल 12 अंतरिक्ष यात्री चन्द्रमा की सतह पर कदम रखे।


Neil Armstrong on the Moon


यद्यपि की पहला मानव-युक्त मिशन अपोलो-8 था, लेकिन इसमें अंतरिक्ष यात्रियों फ्रैंक बोरमैन Frank F. Borman II, विलियम ऐंडर्स William A. Anders एवं जेम्स लोवेल James A. Lovell ने केवल चन्द्रमा की कक्षा में आर्ब्टिर मॉड्यूल Orbiter module के सहारे चक्कर लगाए। यह अभियान क्रिसमस ईव के अवसर पर 1968 में सम्पन्न हुआ। 

चन्द्रमा की सतह पर मानव को ले जाने वाला अभियान अपोलो-11 था। अपोलो-11 के अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग Neil A. Armstrong, माईकल कालिन्स Michael Collins  एवं बज़ ऐल्ड्रिन Edwin "Buzz" E. Aldrin थे। दिनांक 25 जुलाई, 1969 को आर्मस्ट्रांग एवं ऐल्ड्रिन चन्द्रमा की सतह पर उतरे और कुछ दूर पैदल चले। कालिन्स चन्द्रमा की परिक्रमा कर रहे आर्बिटर में ही रहे। इस प्रकार नील आर्मस्ट्रांग चन्द्रमा की सतह पर उतरने वाले पहले व्यक्ति बने। ऐसा कर उन्होंने विज्ञान के विकास पथ पर एक मील का पत्थर रख दिया, जिसकी मिशाल कई सदियों तक दी जायेगी। इसी वर्ष जुलाई माह में मानव इतिहास के उन स्वर्णिम क्षणों के पचास वर्ष पूरे हो गये। आज नील आर्मस्ट्रांग की चन्द्रमा से प्रसारित हुई उक्ति मानव मात्र के लिए प्रेरणा स्रोत बन चुकी है- ‘यह मानव मात्र के लिए एक छोटा कदम है, लेकिन मानवता के लिए एक बहुत बड़ी छलांग।‘

इस अपोलो मिशन में अंतरिक्षयान सैटर्न-5 राकेट का प्रयोग किया गया। सैटर्न-5 राकेट की ऊँचाई एक 36 मंजिला इमारत के बराबर थी। यह राकेट तीन चरणों में कार्य करते थे। पहले दोनों चरणों में ईंधन का प्रयोग अंतरिक्षयान को पृथ्वी की अति दीर्घ दीर्घ वृत्ताकार कक्षा में स्थापित करने के लिए किया गया। तीसरे चरण के ईंधन का प्रयोग अपोलो कमांड माड्यूल Apollo command module और ल्यूनर माड्यूल Lunar module को चन्द्रमा की ओर भेजने के लिए किया गया। 

यद्यपि कि अपोलो 7, 8, 9 एवं 10 सभी मिशन मानव युक्त मिशन थे, लेकिन इन अभियानों में कोई यात्री चन्द्रमा की सतह पर नहीं उतरा। इन अभियानों का उद्देश्य विविध उपकरणों का परीक्षण करना एवं अंतरिक्ष वातावरण का मानव के ऊपर पड़ने वाले प्रभाव का अध्ययन करना था। अपोलो-8 अभियान में लगभग 20 घंटे की अवधि में अंतरिक्ष यात्रियों ने चन्द्रमा के 10 चक्कर लगाए एवं चन्द्रमा के विभिन्न हिस्सों को काफी निकट से देखा। इस यात्रा के पूर्व विविध चरणों के परीक्षण हेतु अपोलो 7 मिशन का प्रक्षेपण दिनांक 11 अक्टूबर 1968 को अमेरिका ने किया। इसमें प्रारम्भिक परीक्षण हेतु सैटर्न-1 बी राकेट का प्रयोग किया गया। इसमें केवल दो चरणों र्का इंधन प्रयोग में लाया गया। यह पहला मानवयुक्त मिशन था, लेकिन इसमें सभी परीक्षण पृथ्वी की कक्षा में किए गये। इसका उद्देश्य चन्द्रमा पर भविष्य के अभियानों के लिए सभी उपकरणों का आवश्यक परीक्षण करना था। इस मिशन में अंतरिक्ष यात्री 11 दिनों तक अंतरिक्ष वातावरण में रहे, जो भविष्य में चन्द्रमा पर जाने और वापस आने की अवधि से काफी अधिक था। 

अपोलो-11 अभियान का मुख्य उद्देश्य चन्द्रमा पर मानव कदम रखने का था, लेकिन कम ही लोग जानते होगें कि इस मिशन में विशेष क्षणों के सीधे प्रसारण हेतु अच्छी गुणवत्ता का वीडियो कैमरा भी भेजा गया था। साथ ही साथ सौर वायु (सूर्य की सतह से उच्च ऊर्जा के इलेक्ट्रान व प्रोटान निकलकर पूरे सौर मण्डल में फैल जाते हैं, इसे सौर वायु Solar wind कहते हैं) की जांच करने चन्द्रमा की सतह पर भूकम्प Earthquake सम्बन्धी परीक्षण करने हेतु उपकरण और पृथ्वी से चन्द्रमा की दूरी के सटीक मापन हेतु एक लेज़र परावर्तक उपकरण भी भेजा गया था। नील आर्मस्ट्रांग ने यहां न केवल अपने देश अमेरिका का ध्वज स्थापित किया, अपितु वहां से चट्टानों को भी साथ ले आये।

अंतरिक्ष यान की भीषण दुर्घटना और अंतरिक्ष यात्रियों का अदम्य साहस

apollo13 splashdown
अपोलो-11 मिशन के पश्चात् इसके छः और मिशन हुए। अपोलो-12 से अपोलो-17 तक के सभी मिशन चन्द्रमा पर उतरने के उद्देश्य से भेजे गए। लेकिन अपोलो-13 मिशन में कुछ तकनीकी गड़बड़ी आने के कारण वह चन्द्रमा की सतह पर लैंड नहीं कर सका। इस अभियान का वर्णन प्रायः ही किया जाता है। अपोलो-13 मिशन में जब अंतरिक्ष यान चन्द्रमा की परिक्रमा कर रहा था तो अचानक दो आक्सीजन टैंकों में से एक में विस्फोट हो गया। इस विस्फोटक से  पहला टैंक भी क्षतिग्रस्त हो गया। इससे कमांड माड्यूल में विद्युत, जल एवं प्रकाश की आपूर्ति रूक गयी। एक आक्सीजन टैंक तो पूर्णतः खाली हो गया। दूसरे टैंक से भी आक्सीजन का रिसाव तेजी से होने लगा। इस घटना का आभास अंतरिक्ष यात्रियों को विस्फोट से होने वाले कम्पन के 13 मिनट पश्चात् हो गया। तब कमांड माड्यूल से निकल कर अंतरिक्ष यात्री ल्यूनर माड्यूल में प्रवेश कर गये। ल्यूनर माड्यूल में केवल 45 घंटे ही जिन्दा रहा जा सकता था। इसमें अतिरिक्त आक्सीजन भी उपलब्ध थी। लेकिन पानी आवश्यकता का केवल पांचवां हिस्सा रह गया था। अन्दर का तापक्रम केवल 38 डिग्री फारेनहाईट रह गया था। किसी तरह अंतरिक्ष यात्रियों की लैंडिंग पैसिफिक समुद्र में सम्पन्न हुई। इसी अदम्य साहस और अति-विषम परिस्थितियों में तात्क्षणिक निर्णय लेने की इच्छा शक्ति के कारणों से यह मिशन सदैव याद किया जाता है। 

अंतिम तीन अपोलो मिशन में चन्द्र यात्रियों ने चन्द्रमा की सतह पर रोवर चलाया। अमेरिका ने अपोलो-16 मिशन, जो 6-19 दिसम्बर 1972 में सम्पन्न हुआ, के बाद कोई मानव-युक्त मिशन चन्द्रमा पर नहीं भेजा। जब मई 1961 में अमेरिकी राष्ट्रपति जान एफ0 कैनेडी John F Kennedy ने सन् 1970 के पूर्व चन्द्रमा पर पहुँचने के लक्ष्य की घोषणा की, तो इसे तत्कालीन यू0एस0एस0आर0 वर्तमान रूस के नेतृत्व ने किसी गम्भीर चुनौती के रूप में नहीं लिया। वित्तीय संकट के बाद भी 1962 से 1974 की अवधि में इससे सम्बन्धित कई प्रक्षेपण रूसी वैज्ञानिकों ने किये, लेकिन वह अमेरिकी वैज्ञानिकों की तरह भाग्यशाली नहीं रहे। उनके कई परीक्षण असफल हो गये। उन्होंने सोयुज एवं प्रोटान लांचर का प्रयोग किया।

रूस के अंतरिक्ष अभियान

जहां तक मानव-रहित प्रयासों की बात है, रूस इसमें अमेरिकी अभियानों से आगे रहा। सन् 1959 में लूना-1 मिशन के असफल होने के पश्चात् उसी वर्ष लूना-2 मिशन में मानव द्वारा निर्मित कोई वस्तु पहली बार 13 सितम्बर 1959 को चन्द्रमा की सतह से सीधे टकराई। अभी तक अमेरिका ही एक मात्र देश है, जिसने अपने अंतरिक्ष यात्रियों को चन्द्रमा की सतह पर उतारा है। उनकी आखिरी सफल यात्रा सन् 1972 में हुई। तब से लेकर 14 सितम्बर 2013 तक चन्द्रमा की सतह पर अनेकों बार सफलतापूर्वक हार्ड-लैंडिंग Hard landing हुई, लेकिन कोई साफ्ट-लैंडिंग Soft landing सफल नहीं हो सकी थी। 03 जनवरी 2019 के पूर्व जो साफ्ट-लैंडिंग हुई, वह सभी चन्द्रमा के पृथ्वी से निकट वाले भाग पर हुई। 03 जनवरी 2019 को चीन के चांग-4 अंतरिक्षयान ने चन्द्रमा के दूर वाले भाग पर सफलता पूर्वक साफ्ट-लैंडिंग कर नया इतिहास बनाया। इसके पूर्व 14 दिसम्बर 2013 को सम्पन्न चांग-3 मिशन में चीन ने एक रोवर को चन्द्रमा की सतह पर उतारा। 

लूना-2 की सफलता के पश्चात् अमेरिका ने सन् 1962 के एक मिशन में रेंजर-4  के द्वारा घटना पुनरावृत्ति की। 1966 से 1976 की अवधि में बारह सोवियत एवं अमेरिकी अभियानों में चन्द्रमा की सतह पर साफ्ट-लैंडिंग की गयी। सन् 1966 में लूना-9 मिशन में पहली बार चन्द्रमा की सतह पर साफ्ट लैंडिंग की गई। वर्ष 1966 में लूना-9 और लून-13 अभियानों के अन्तर्गत पहली बार चन्द्रमा की सतह की तस्वीरें खीचीं गयी और पृथ्वी पर विद्युत चुम्बकीय तरंगों के माध्यम प्रेषित की गईं। यह अभियान यू0एस0एम0आर0 द्वारा सम्पन्न किये गये।
 
24 सितम्बर 1970 को लूना-16 अभियान में चन्द्रमा की सतह से चट्टानों के नमूने एकत्रित कर पृथ्वी की सतह पर लाये गये। इसकी पुनरावृत्ति वर्ष 1972 एवं 1976 में क्रमशः लूना-20 एवं लूना-24 अभियानों में सम्पन्न हुई। रूस के लूना-16 एवं लूना-21 अभियान सन् 1970 एवं 1973 में हुए जिसमें चन्द्रमा की सतह पर रोवर उतारे गये। जापान के हितेन अंतरिक्षयान ने 10 अपै्रल 1993 को चन्द्रमा की सतह पर क्रैश-लैडिंग Crash landing की। योरोपियन स्पेस एजेन्सी European space agency ने स्मार्ट-1 को 3 सितम्बर 2006 को क्रैश-लैंडिंग कराया। भारत ने 14 नवम्बर 2008 को (एम0आई0पी0) मून इम्पैक्ट प्रोब की क्रैश-लैंडिंग चन्द्रमा की सतह पर कराई। यह भारत के चन्द्रयान-1 मिशन का हिस्सा था। चीन का चांग-1 यान मार्च 2009 को चन्द्रमा की सतह से टकराया। चीन के चांग-3 यान ने 14 दिसम्बर 2013 को चन्द्रमा की सतह पर साफ्ट-लैंडिंग कर एक रोवर को उतारा।

अमेरिका ने अपने मानवयुक्त अभियानों में कुल 12 अंतरिक्ष-यात्रियों को चन्द्रमा की सतह पर उतारा। पहले मिशन में 20 जुलाई 1969 को आर्मस्ट्रांग एवं ऐल्ड्रिन ने चन्द्रमा पर कदम रखे। चन्द्रमा पर अंतिम चरण 14 दिसम्बर 1972 को जान सेसॅन के पड़े। उनके सहयात्री जैक स्मिट रहे। यह अपोलो का सत्रहवां और आखिरी अभियान था।

भारत के चंद्र अभियान

INDIA ON MOON (CHANDRAYAAN-1)
भारत ने चन्द्रमा के बारे में जानकारी एकत्रित करने और अपने तकनीकी ज्ञान के परीक्षण एवं प्रदर्शन करने के उद्देश्य से 22 अक्टूबर 2008 को श्रीहरिकोटा से चन्द्रयान-1 उपग्रह का सफलता पूर्वक प्रक्षेपण किया। चन्द्रयान-1 Chandrayaan 1 ने पहले 100 कि0मी0 की ऊँचाई वाली कक्षा में बने रहकर चन्द्रमा के बारे में रासायनिक एवं भूगर्भ विज्ञान से सम्बन्धित परीक्षण किए। उसने चन्द्रमा पर खनिज लवण से सम्बन्धित जानकारी एकत्रित की। बाद में मई 2009 में इसकी कक्षा को बदल कर 200 कि0मी0 कर दिया गया। चन्द्रयान-1 उपग्रह ने चन्द्रमा के 3400 चक्कर लगाए। 29 अगस्त 2009 को चन्द्रयान-1 से सम्पर्क समाप्त हो गया। चन्द्रयान-1 को पी0एस0एल0वी0 सी 11 राकेट से चन्द्रमा की कक्षा में छोड़ा गया। इस पर स्वदेश निर्मित पांच उपकरणों सहित कुल 11 उपकरण भेजे गए। शेष छः उपकरण अन्य देशों के थे। यद्यपि कि इस मिशन का कार्यकाल कुल दो वर्षो का था, लेकिन इसने मात्र 10 माह के सक्रिय जीवन काल में ही अपने सभी परीक्षणों को पूरा कर लिया। 

चन्द्रयान-1 का कुल प्रमोचन भार-1380 कि0ग्रा0 था। इसमें भारत के पांच उपकरण इस प्रकार थे- 1. टेरेन मैपिंग कैमरा Terrain mapping camera (TMP) 2. हाईपर स्पेक्ट्रल इमेजर Hyperspectral imager (HySI) 3. लूनर लेज़र रेन्जिंग इंस्ट्रूमेंट Lunar laser ranging instrument (LLRI) 4. हाई एनर्जी एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर High energy x-ray spectrometer (HEX) 5. मून इम्पैक्ट प्रोब Moon impact probe (MIP)। इसमें दूसरों देशों के छः उपकरण इस प्रकार थे] जो इस प्रकार हैं- 1. चन्द्रयान-1 स्पेक्ट्रोमीटर (CIXS) 2. नीयॅर इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोमीटर (SIR-2) 3. सब-किलो इलेक्ट्रान वोल्ट एटम रिफ्लेक्टिंग एनालाईज़र (SARA) 4. मिनिएचेर सिंथेटिक अपर्चर राडार (Mini SAR) 5. मून मिनिरोलाजी मैपर (M3) 6. रेडियेशन डोज़ मानीटर (RADOM)। 

चन्द्रयान-1 द्वारा संकलित किये हुए आंकड़ों से इस बात की पुष्टि हुई कि चन्द्रमा के एक्जोस्फीयर Exosphere (ऊपरी आवरण), चन्द्रमा की सतह और इसकी सतह के नीचे (उप सतह) पानी की कुछ मात्रा उपस्थित है। चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर गिरे मून इम्पैक्ट प्रोब से इस बात की पुष्टि हुई कि चन्द्रमा के अति विरल वातावरण में पानी के अंश मौजूद हैं। ऐसा माना जा सकता है कि तीन-चार अरब साल पहले निर्मित जल का कुछ अंश चन्द्रमा के ध्रुवों पर शेष रह गया होगा। चन्द्रमा की सतह से परावर्तित प्रकाश से पानी/बर्फ होने का पता मून मिनिरोलाजी मैपर यानि (M3) उपकरण से लगा। 2-2.5 माईक्रान तरंगों के अवशोषण प्रक्रिया से इस बात की पुष्टि हुई। प्रयोगशालाओं में किए गए शोध से इस बात की पुष्टि होती है कि जल/बर्फ के इंटरफेस से 1.3, 1.5 एवं 2 माईक्रान की तरंगे अवशोषित हो जाती हैं। यद्यपि कि चन्द्रयान से इसरो का सम्पर्क 29 अगस्त 2009 को कट गया था, लेकिन  मार्च 2017 में अमेरिकी अंतरिक्ष एजेन्सी नासा के पृथ्वी पर स्थित एक राडार से इस बात की पुष्टि हुई कि चन्द्रयान-1 अभी भी चन्द्रमा की कक्षा में 200 कि0मी0 उपर चक्कर लगा रहा है।

भारत ने चंद्रयान-2 Chandrayaan 2 का प्रक्षेपण 22 जुलाई 2019 को किया। चन्द्रयान-2 मिशन का मुख्य उद्देश्य चन्द्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर स्थित दो गड्ढों मंज़िनिस-सी Manginic C और सिमपेलियस-एन Simpelius N के बीच वाले मैदान पर (लगभग 700 दक्षिणी अक्षांश) पर सफलता पूर्वक विक्रम लैंडर के सहारे प्रज्ञान रोवर का उतारना है। यह माना जाता है कि चांद के धु्रवों पर तापक्रम कम होने एवं उसके कुछ हिस्सों पर सूर्य की किरणों के न पहुंच पाने के कारणों से पानी मौजूद हो सकता है। प्रज्ञान रोवर पर लगाए गये उपकरणों से इस बात की पुष्टि हो सकेगी। राकेट भारत का अब तक का सबसे शक्तिशाली लॉन्चर है, और यह पूरी तरह स्वदेशी तकनीकी से बना है। ऑर्बिटर चन्द्रमा की कक्षा में परिक्रमा करते हुए चंद्रमा की सतह का निरीक्षण करेगा और चंद्रयान-2 के लैंडर - विक्रम  और पृथ्वी के बीच संकेत प्रेषित और प्राप्त करेगा। ऑर्बिटर का वजन 2739 किग्रा है, जबकि विक्रम लैंडर का वजन 1471 किग्रा है।

लैंडर विक्रम को चंद्रमा की सतह पर भारत की पहली सफल सॉफ्ट-लैंडिंग के लिए निर्मित किया गया है। रोवर ए आई-संचालित 6 पहिया वाहन है, इसका नाम ‘प्रज्ञान’ है जिसका अभिप्राय विशेष ज्ञान से है। यह संस्कृत के ज्ञान शब्द से लिया गया है। प्रज्ञान रोवर का वजन 27 किग्रा है। चंद्रयान-2 पर लगाए गये उपकरणों विस्तृत क्षेत्र सॉफ्ट एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर, इमेजिंग आई आर स्पेक्ट्रोमीटर, सिंथेटिक एपर्चर रडार एल एंड एस बैंड, ऑर्बिटर हाई रेजोल्यूशन कैमरा, चंद्रमा की सतह थर्मो-फिजिकल ताप भौतिकी प्रयोग, अल्फा कण एक्स-रे स्पेक्ट्रोमीटर और लेजर चालित ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोस्कोप का उद्देश्य क्रमशः चंद्रमा की मौलिक रचना, मिनरेलॉजी मैपिंग और जल तथा बर्फ होने की पुष्टि करना, क्षेत्र मानचित्रण और उप-सतही जल और बर्फ की पुष्टि करना, हाई-रेज टोपोग्राफी मैपिंग, तापीय चालकता और तापमान का उतार-चढ़ाव मापन करना, लैंडिंग साइट के आसपास मौजूद तत्वों और खनिजों की मात्रा का विश्लेषण करना और डाटा संकलित कर पृथ्वी पर भेजना है।
CHANDRAYAAN-2

विक्रम लैंडर हुआ दुर्घटनाग्रस्त

चंद्रयान-2 को पृथ्वी की कक्षा में परिक्रमा के दौरान इसकी कक्षा को ऊंचा किया गया। चन्द्रमा के गुरूत्वाकर्षण के प्रभाव में आने के पश्चात इसकी कक्षा को परिवर्तित कर 100 किलोमीटर कर दिया गया।  दिनांक 1 सितम्बर को शाम 06 बजकर 21 मिनट पर चंद्रयान-2 पांचवीं कक्षा में प्रवेश कर गया है। 2 सितम्बर को ऑर्बिटर से विक्रम लैंडर को अलग किया गया। विक्रम लैंडर चांद पर उतरने से पहले चंद्रयान चंद्रमा की दो और कक्षाओं में प्रवेश किया । अभी तक चंद्रयान-2 लगातार से चन्द्रमा की अद्भुत तस्वीरें प्राप्त हुई हैं।
   

2 सितंबर को चंद्रयान से लैंडर अलग हो गया। अलग होने की घटना काफी तेज गति से होती है। यह उतनी ही तीव्र गति होती है, जितनी गति से कोई सैटलाइट राकेट से अलग होता है। इंटिग्रेटेड स्पेसक्राफ्ट को अलग-अलग करने के लिए जरूरी कक्षा में चंद्रयान को स्थिर करने के बाद इसरो ने कमांड दिया, जो ऑनबोर्ड कंट्रोल सिस्टम को अपने आप प्रारम्भ दिया। एक अनुमान के अनुसार विक्रम लैंडर को 07 सितम्बर को रात में 1:55 पर चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर उतरना था, लेकिन लगभग 400 मीटर की ऊंचाई पर विक्रम का संपर्क पृथ्वी  और ऑर्बिटर से टूट गया।  ऑर्बिटर पर लगे थर्मल (इंफ्रारेड) स्पेक्ट्रोमीटर से इस बात की पुष्टि हुई है कि विक्रम -लैंडर चन्द्रमा की सतह पर निर्धारित स्थान के 500 मीटर पास ही उतरा है, पर लैंडिंग हार्ड हुई है जिससे उसपर लगा ट्रांसमीटर संभवतः काम नहीं कर रहा है।

98 प्रतिशत तक सफल रहा चंद्रयान-2 मिशन

इसरो के वैज्ञानिक रात-दिन एक कर विक्रम लैंडर से संपर्क करने की कोशिश में जुटे हैं। विक्रम लैंडर में रखे प्रज्ञान रोवर को एक चंद्र दिवस ही कार्य करना था। एक चंद्र दिवस पृथ्वी के 14 दिन के बराबर होता है। इसके पश्चात वहां रात्रि रहेगी और सूर्य की रोशिनी नहीं मिलने से विक्रम का सोलर पैनल कार्य नहीं करेगा। इसरो के वैज्ञानिक इस अवधि में संपर्क की कोशिह करते रहेंगे। पृथ्वी से प्रक्षेपण से लेकर प्रज्ञान के डाटा एकत्रित करने तक की पूरी टेक्नोलॉजी की गणना करें तो उस हिसाब से यह मिशन लगभग 98 प्रतिशत तक सफल रहा। अपने पहले प्रयास में इसरो के वैज्ञानिकों ने देश के लिए एक बहुत महत्त्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। इस अभियान से इसरो ने जो सीखा है, उससे भविष्य के अभियानों में काफी मदद मिलेगी।

लेखक परिचय:

डॉ. सत्य पाल सिंह वर्तमान में मदन मोहन मालवीय प्रौद्यिगिकी विश्वविद्यालय, गोरखपुर, उ0प्र0 में सहायक आचार्य (भौतिकी) के पद पर कार्यरत हैं। आप पूर्व में आई.आई.टी. कानपुर में रिसर्च साइंटिस्ट के पद पर कार्य कर चुके हैं। उनके 70 से अधिक शोध-पत्र राष्ट्रीय/अंतर-राष्ट्रीय पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आप 'Introduction to Special Relativity and Space Science' पुस्तक के लेखक हैं। डॉ. सत्य पाल को वर्ष 2012 में इंडियन अकादमी ऑफ साइंसेज, बंगलुरू से समर रिसर्च फेलोशिप प्राप्त हो चुकी। आप इंडियन फिजिक्स एसोसिएशन के आजीवन सदस्य हैं। साथ ही आप विज्ञान को आम-जनमानस के बीच में लोकप्रिय बनाने की दिशा में भी सतत प्रयासरत हैं। उनसे ईमेल आई.डी. singh.satyapal@hotmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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Scientific World: मानव के चंद्रमा पर पहुंचने के 50 वर्ष: रोमांचक फिल्म सा है ये सफर
मानव के चंद्रमा पर पहुंचने के 50 वर्ष: रोमांचक फिल्म सा है ये सफर
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