हठयोग के चमत्‍कार: लिंग के द्वारा 80 किलो का पत्‍थर उठाना ।

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करतब दिखाता हुआ एक नागा बाबा अभी कल एक ब्‍लॉग पर एक विद्वान का कमेंट पढ़ने को मिला, जिसमें उन्‍होंने हठयोग के द्वारा लिंग से पत्‍थर उ...

करतब दिखाता हुआ एक नागा बाबा
अभी कल एक ब्‍लॉग पर एक विद्वान का कमेंट पढ़ने को मिला, जिसमें उन्‍होंने हठयोग के द्वारा लिंग से पत्‍थर उठाने का जिक्र किया है। यह बात ऐसे व्‍यक्ति द्वारा कही गयी है जो स्‍वयं को विज्ञान संचारक कहलाना पसंद करते हैं। धन्‍य है हमारे देश के विज्ञान संचारक, जो अब विज्ञान की तो कम बातें करते हैं, पर धर्म से जुड़ी हुई प्रवृत्तियों को विज्ञान सम्‍मत सिद्ध करने में ज्‍यादा रूचि रखते हैं। 

जैसा कि हम जानते हैं कि हमारे देश में हठयोग के नाम पर आदिकाल से लोगों को मूर्ख बनाया जाता रहा है। लेकिन जैसे-जैसे ज्ञान का विकास होता गया, वैसे-वैसे मनुष्‍य तथाकथित चमत्‍कारों और दिव्‍य शक्तियों का भंडा फोड़ता चला गया। इस दिशा में बी0 प्रेमानन्‍द का नाम विशेष रूप से उल्‍लेखनीय है।  

बी0 प्रेमानन्‍द 26 पुस्‍तकों के लेखक हैं, वे प्रादेशिक संस्‍थाओं द्वारा आयोजित विज्ञान यात्राओं के अध्‍यक्ष हैं, जिनके कारण वे भारत के सात हजार शहरों और गांवों में जा चुके हैं, जहां उन्‍होंने लगभग दो करोड़ व्‍यक्तियों को व्‍याख्‍यान दिया है। वे वर्कशाप का भी आयोजन करते हैं, जिसमें वे 150 चमत्‍कारों को दिखा कर उनका विश्‍लेषण करते हैं और देवताओं, धर्म के चमत्‍कारों के इतिहास पर प्रकाश डालते हैं।  
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बी0 प्रेमानन्‍द
उन्‍होंने 'विज्ञान बनाम चमत्‍कार' पुस्‍तक में ऐसे सैकड़ों चमत्‍कारों की असलियत बताई है, जिन्‍हें देखकर व्‍यक्ति अभिभूत हो जाता है। इसी पुस्‍तक के पृष्‍ठ 53 पर एक नागा बाबा द्वारा श्श्नि के सामने की खाल द्वारा 35 किलो का पत्‍थर उठाने और उसके रहस्‍य पर प्रकाश डाला गया है। उन्‍होंने लिखा है:

हाल ही के एक कुंभ मेले में एक नंगे नागा बाबा अपने श्श्नि कीत्‍वचा पर खूंटे से 35 किलो का पत्‍थर लटकाकर जुलूस में चल रहे थे। यह दृश्‍य दूरदर्शन और अधिकतर समाचारपत्रों और पत्रिकाओं में चित्रित किया गया। साक्षात्‍कार के दौरान उन्‍होंने इसआश्‍चर्यजनक कार्य का श्रेय अपनी योगशक्ति और ब्रह्मचर्य को दिया। वास्‍तव में इस योग का ब्रह्मचर्य से कोई सरोकार नहीं है। शिश्‍न कीऊपरी खाल80किग्रा तककावजन उठाने की क्षमता रखती है। पर बाबा ने तो डर के मारे 35 किलो का ही भर उठाया था। 

दक्षिण भारत के मंदिरों में भिक्षुकों द्वारा खाल छेद कर पूरे शरीर पर नींबूं फल और सब्जियां सिल लेना, आम दृश्‍य हैं। केरल के एक मंदिर में प्रचारक अपनी पीठ पर दो खूंटे बांध कर अपने को डंडे से लटका लेता है। इसी प्रकार कुछ लोग पीठ पर खूंटे सिल करदेवताओं के रथ खींचते हैं। अन्‍य लोग त्रिशूल द्वारा जीभ और गाल छेद डालते हैं। 

मुसलमान फकीर अपनी गर्दन, पेट छाती को तलवारों से जख्‍मी करते हैं। इन विकट और भयंकर चमत्‍कारों को देखकर लोग भयग्रस्‍त हो कर श्रद्धा से भर उठते हैं। पर क्‍या ये वास्‍तव में चमत्‍कार हैं ये किसी भी साहसी व्‍यक्ति द्वारा बहुत कम पीड़ा सह कर दिखाए जा सकते हैं। 

आगे प्रेमानन्‍द इन क्रियाओं के रहस्‍य को स्‍पष्‍ट करते हुए लिखते हैं कि दर्द की संवेदना तभी मालूम होती है जब दर्द के लक्षण का संकेत मस्तिष्‍क तक पहुंचता है। इसी प्रकार एनस्‍थीसिया द्वारा दर्द रहित शल्‍यक्रिया की जाती है। त्‍वचा को नोचने से वहां की शिराएं सुन्‍न पड़ जाती हैं और दर्द की संवेदना मस्तिष्‍क तक नहीं पहुंचती है और बाहरी त्‍वचा, बिना फटे आसानी से वजन उठा लेती है। यही इस तरह के चमत्‍कारों का एक मात्र राज है। 
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COMMENTS

BLOGGER: 32
  1. विचारो का विरोध उचित है व्यक्ति का नही! व्यक्तिगत हमलो से परहेज करें तो बेहतर !

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  2. mhtvpurn jaankari ke liyen bdhaai. akhtar khan akela kota rajsthan

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  3. बहुत ही संुदर और सार्थक प्रयास, ब्लॉगिंग का सही मायने यही है।

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  4. ऊपरी खाल80किग्रा तक का वजन उठाने की क्षमता-भई,ये तो सिर्फ गप्प है. UNBELIEVABLE.

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  5. sabka apna pet bharne ka alag alag tareeka hai.kintu ye baba janta ko bhramit kar moorkh banate hain jo samaaj par bhi galat asar daalte hai.inko protsaahan nahi dena chahiye.aapke is lekh se achchi jaankari mili hai.yeh prastuti sarahniya hai.

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  6. ज़ाकिर भाई शीर्षक पसंद नहीं आया.... कम से कम शीर्षक में तो प्राइवेट पार्ट्स के नाम लिखने से बचने कोशिश करनी चाहिए...

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  7. लेख सार्थक और विचारणीय है.

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  8. क्या सचमुच ऐसा है ?
    इस पर शोध होना चाहिए कि लिंग के ऊपरी खाल से ८० किलो का वजन उठाया जा सकता है खाल का तो पता नही लेकिन बाबा को बाबागीरी छोड़ कर ताली बजाने वाला व्यवसाय अपनाना पड़ सकता है

    --

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  9. बाबा ने डर के मारे ३५ किलो उठाया था आप सायद बहादुर हो आप ५० किलो उठाकर अपनी बहादुरी दिखायेंगे

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  10. हम आपसे सहमत हो सकते हैं बशर्ते आप 80 किलो नहीं तो कम से कम 50 किलो का पत्थर बाहरी खाल से लटकाकर चल कर दिखाएं। आप नहीं तो कोई अन्य इंसान, जिसने इसका अभ्यास किया हो। इस पर विश्वास करना इतना आसान नहीं, जितना कि आपने लिख दिया है। बाहर खाल 80 किलो वजन सहन कर लेगी। नामुमकिन सा लगता है।
    कहते हैं प्रत्यक्ष को प्रमाण की जरूरत नहीं होती। लेकिन प्रत्यक्ष करके दिखाएं तो मानें। कुछ लोगों ने हमारी पुरानी पद्धतियों को झुठलाने का ठेका उठा रखा है। वही लोग इनका विरोध करते हैं या तरह-तरह की बातें गढ़कर सामने रखते हैं। यह जरूर माना जा सकता है कि बहुत से बाबा ढोंग करते हैं, चमत्कार करना आसान नहीं। लेकिन आपकी बातों से पूर्णतः सहमति नहीं जताई जा सकती।

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  11. bahut hi saarthak post......itani saarthakta lekar kisi kaa bhi virodh uchit hai...insaan kabhi chamatkar nahi kar sakta...bas vigyaanik aadhaar ki logo ko jaankaari honi chaahiye....aapke vicharon se puri tarah sahamat hun.

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  12. ये तो एन्द्रिक दुरूपयोग है :)

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  13. संभव है कि आपकी बाकी बातें सही हों लेकिन हठयोग को चमत्कार की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता, यदि आप मार्शल आर्ट्स को स्वीकारते हैं तो इसे भी स्वीकार सकते हैं. यह भी बाबा गोरखनाथ के शिष्य योगी स्वात्माराम द्वारा वैज्ञानिक तरीके से विकसित किया गया योग है जिसका कि इस तरह के चमत्कारों से कोई लेना-देना नहीं. वैसे यदि सबूत के तौर पर वीडिओ उपलब्ध ना होते तो कोई ब्रूस ली के 'वन इंच पञ्च' पर भी भरोसा ना कर पाता.

    --

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  14. बहुत ही संुदर और सार्थक प्रयास

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  15. @ blogtaknik / एम्. सिंह साहब का चेलेंग कबूल करने का विचार मन में आया लेकिन साथ ही ये अंदेशा पैदा हुआ कि अगर बकौल 'जोश' मरहूम अगर :
    " जो उठ सका न ये बारे गिरां तो क्या होगा?"
    [ जोश मरहूम से माफ़ी तलब करते हुए कि उनके मिसरे को किस काम में लेना पड़ा !

    "चला हूँ दोश पे रखने अमानते आफाक'
    जो उठ सका न ये बारे गिरां तो क्या होगा?" ]

    @ अली साहब: इनसे सहमत नहीं हुआ जा सकता- ये एन्द्रिक दुरूपयोग नही बल्कि नसीब की बात है ! "उसके" नसीब में पत्थर लिखा है तो वही मिलेगा !!

    सारा चिंतन व्यर्थ गया !!! अरे, अग्रिम भाग तो मुसलमानी [ circumcision] की भेंट हो गया है !!!!....................सब गुड़-गोबर हो गया!!!!!

    -एम् हाश्मी
    http://aatm-manthan.com

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  16. ज़ाकिर भाई, शीर्षक पसंद नहीं आया....

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  17. साथियो, आपने ग्‍लोब के भीतर मोटर साइकिल चलाते हुए सरकस के कलाकारों को देखा होगा। कैसे कर लेते हैं वे सब? बंद ग्‍लोब के भीतर तीन मोटर साइकिल सवाल सिर्फ एक दूसरे के आगे पीछे ही नहीं चलते हैं, उन्‍हें ऊपर नीचे से काटते भी हैं। भला कैसे? आम आदमी को तो सोचकर ही सिहरन हो जाती है। लेकिन वे करते हैं। कैसे? सिर्फ अभ्‍यास और लगन के कारण। ठीक ऐसे ही सारे करतब किये जाते हैं। चाहे वह शरीर में नुकीले भाले चुभाकर ट्रक खींचना हो, अथवा लिंग द्वारा वजन उठाना। इसके लिए दृढ इच्‍छा शक्ति और अभ्‍यास की जरूरत होती है। बी0 प्रेमानन्‍द ने अपनी इस पुस्‍तक में इसी अभ्‍यास के रहस्‍य को बताया है। जाहिर सी बात है कि यह कोई सामान्‍य काम नहीं है, इसे हर कोई नहीं कर सकता, इसीलिए जब इस तरह के काम लोग करते हैं, तो आम आदमी उन्‍हें श्रद्धावश चमत्‍कार मान लेता है। जबकि वे लगन और अभ्‍यास के परिणाम मात्र होते हैं।

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  18. कुछ साथियों को पोस्‍ट का शीर्षक समझ में नहीं आया। उनसे मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि अगर आप किसी व्‍यक्ति को आम के फल के बारे में बता रहे हैं, तो उसे आम न कह कर क्‍या कहेंगे? क्‍या यह कि वह गोल गोल होता है, पीले रंग का होता है, दबाने पर गुलगुला लगता है? क्‍या यह सब कहेंगे आप? यकीन मानिए, इससे अगला व्‍यक्ति आम तो नहीं समझेगा, हॉं, वह और कुछ जरूर समझने लगेगा।

    साथियो हम इक्‍कीसवीं सदी में जी रहे हैं, जहां टीवी पर कंडोम के ऐड दिखाए जाते हैं और अखबारों में जापानी तेल के विज्ञापन धडल्‍ले से छपते हैं। ऐसे में हमें इतना परिपक्‍व तो होना ही पडेगा कि हम सच को सच कह सकें। और हॉं, जब हम पुलिंग, स्‍त्रीलिंग, शिवलिंग जैसे शब्‍द गर्व के साथ उच्‍चारित कर सकते हैं, तो सिर्फ लिंग शब्‍द के उच्‍चारण में इतनी शर्म अथवा झिझक क्‍यों?

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  19. बहुत सालों पहले ओशो की एक पुस्तक में एक ऐसे ही बाबा का जिक्र पढ़ा था (पूरी घटना अब थोड़ी भूल रहा हूँ) जो अपने लिंग से पूरा कमंडल पानी अपने अंदर खींच लेता था।
    जब ओशो उससे मिले तो पूछा इस क्रिया को सीखने के लिए कितने साल लगे तब उसने शायद बीस या तीस साल बताया तब ऒशो ने कहा मूर्ख जो काम आसानी से मिनिटों में मुँह से किया जा सकता है उसके लिए तीस साल बर्बाद कर दिए!
    :)
    हद है, और आश्‍चर्य है कि लोग अब भी ऐसे चमत्कारों को मानते हैं और चमत्कृत भी होते हैं।

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  20. शीर्षक वाली बात के लिए ऊपर के टिप्पणीकर्ताओं से सहमत हूँ।

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  21. हम तो सारी गृहस्थी का बोझ उठा लेते हैं , जो यह बोझ उठाने से जी चुराते हैं वे पत्थर उठाते घूमते हैं .
    भाई उठाने की चीज़ उठानी चाहिए , कल्याण तो इसी में है .
    http://commentsgarden.blogspot.com/2011/04/blog-post_16.html

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  22. जाकीर जी, बहुत ही बढ़िया पोस्ट है ... टिपण्णी करने में थोड़ी देर हो गई माफ़ी चाहता हूँ ...
    आपने जो भी लिखा है एकदम सही है ... और शीर्षक भी बिलकुल वाजीब है ...
    लिंग से पत्थर उठाने जैसे बकवास काम करके ये लोग समाज का कोई उपकार नहीं करते हैं उल्टा समाज को नुक्सान पहुंचाते रहते हैं ...

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  23. सोचने की बात यह है कि लिंग से पत्थर उठाना व्यक्ति या समाज के लिए किस तरह लाभप्रद है !?
    फिर क्रेन का आविष्कार और इस्तेमाल करने की ज़रुरत क्योंकर हुई ? सोचने की बात यह भी है कि क्या इस ‘चमत्कार’ का सार्वजनिक इस्तेमाल संभव है !?

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  24. mai ye jaan-na chaahta hoo......ki tathakathit baaba ne 35 kg ka patthar uthaya.......aap kahte hai ki 80 kg utha sakte hai......
    us baba ne to apni baat siddh ki ...aap kis aadhar par ghoshna kar rahe hai????????
    Doosri baat......aap baat andhvishvaas ki kar rahe hai to poochhna chaahunga.....
    1.> Muslim samudaay mein paaizama unchaa kyu pahnte hai?????? kya kapde ki kamee pad jaati hai.....???

    2.> Vazoo kartey waqt hath ulta kyu dhotey hai...?????? kya paani ki kamee pad jati hai...?????

    3. > Bawazood iske ki Science bhi prove kar chiki hai ki sapind aor sam rakt vivaah se Genetic problems hoti hai....Muslim aaj bhi bhai-bahno ki shadi kyu kar rahe hai....??????

    Sawaal to aor bhi hai.....par abhi aap ho sake to inka jawaab dekar apne scientific approach aor secularism ko justify kijiye.....

    Dhanyavaad

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  25. शक्ति जी, ये विज्ञान का ब्‍लॉग है और यहां पर उन अंधविश्‍वासों के बारे में लिखा जाता है, जो समाज के लिए हानिकारक हैं। आपकी बातें इस विषय से सम्‍बंध नहीं रखतीं हैं, इसलिए उनका जवाब देना उचित नहीं है।

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    उत्तर
    1. ज़ाकिर अली ‘रजनीश.bhai ji kya apni bhen se bahu se nikah karna ek andhvishwas nahi ahin ..kya lakho pasu ko allah k naam per katal kar dena andhvishwas nahi hain ..mujhe ise bada andh vishwas samaj me koi aur nahi lagta lakho karoro pasu ki bina apradh k hatya phir usi khuda ko rahmane rahim kahna ise bada aap andhvishwas aap ko kahi dekhne ko mile ga .. ki allah k naam per janwar ko katne se janwar ko jannat nasib hoti hain .................iske uper koi post likh ..yeh samaj k liye sab se bada andhvishwas hain ....

      हटाएं
    2. Raj mishra ji jabab dnewale bahut hai lekin e dharm charcha ki jagah nahi hai , aur rishta tabhi tak rhta hai jab tak bana rahe apki bahu tabhi tak bahu hai jab tak apke bete ke vivah me hai talak ke bad ab o rishta khtm , dusari bat jisko ap beta aur jisko bahu bna rhe hai o muh bole bete the to bahu bhi muh boli hui , unka sambandh bichhed ho gaya fir uski shadi hui, shayad shadi apke eha buri chij ho , ho gi bhi keu nahi jaha live relationship ho waha shadi ki jarurat kaha, aur pashu ki hatya adikal se ho rhi hai jiska ullekh apki kitabo me milta hai, dusari bat ye ki jan sirf padhuo me hi nahi waran sag sabjio me bhi hoti hai usko bhi mt khaiye

      हटाएं
  26. बेनामी9/15/2016 6:21 pm

    Bhai ager pasu nahi katenge to pasu ki tadad badh jaygi or ho sakta hai fir insano ke rahne ke liye jagah ki kami bhi ho sakti hai or india me hi nahi pure world me pasu kate jate hai manusye ko ahaar jal or kalsiyam parapt hota jo dawaiyo me milker aata hai or inki khalo ki bhi adhik vastua banai jati hai.....or rahi bat dharm ki ram ji ne hiran ka sikaar kiya kyo roz arbo caroro janwer Kate jate or nahi ktenge to ve janwer kaha jaige....

    उत्तर देंहटाएं
वैज्ञानिक चेतना को समर्पित इस यज्ञ में आपकी आहुति (टिप्पणी) के लिए अग्रिम धन्यवाद। आशा है आपका यह स्नेहभाव सदैव बना रहेगा।

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Scientific World: हठयोग के चमत्‍कार: लिंग के द्वारा 80 किलो का पत्‍थर उठाना ।
हठयोग के चमत्‍कार: लिंग के द्वारा 80 किलो का पत्‍थर उठाना ।
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