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मेट्रो शहर का विकास और उसकी दुश्‍वारियां।

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अभी हाल ही में एक ख़बर पढ़ी. कि लखनऊ शहर का विस्तार होने जा रहा है. अब उसका क्षेत्रफल दूने से भी...

अभी हाल ही में एक ख़बर पढ़ी. कि लखनऊ शहर का विस्तार होने जा रहा है. अब उसका क्षेत्रफल दूने से भी अधिक हो जायेगा. वैसे भी शहर को मेट्रो का दर्जा हासिल करने के लिए इस तरह के कदम तो उठाने ही होंगे. इसके बाद अगला कदम होगा, क्षेत्र के भीतर चौड़ी सड़कें. फ़्लाइओवर्स, मेट्रो ट्रेन्स, बड़ी कालोनियां, और साथ में कंक्रीट के जंगल. और ये सब ज़रूरी भी है विकास के लिए. लेकिन इन सब के साथ कुछ बुनियादी मुद्दों पर सवाल भी उठते हैं.

metro culture
इस विकास में बहुत से गाँव भी शामिल हो रहे हैं, साथ में उनके खेत, खलिहान, तालाब, और बाग़. अगर अंधे विकास की चपेट में आकर ये गायब हो गये, किसानों से औने पौने दामों पर ज़मीनें लेकर वहां गगनचुम्बी इमारतें खड़ी हो गईं, और किसान भूखों मरने लगे, तो ये विकास हमारे किसी काम का नही रह जायेगा. हमारे सामने विकास के दो रास्ते हैं, पहला तो ये कि भारत कृषि प्रधान देश है और इसे इसी रूप में विकसित किया जाए.

हम अपने देश को संपन्न करने के साथ साथ दूसरे देशों की भी भुखमरी दूर करें. दूसरा रास्ता ये है कि योरोप और दुबई की तरह कृत्रिम विकास किया जाए. लेकिन ये रास्ता आगे चलकर भारी मुश्किलें पैदा कर देगा. आज योरोप के अधिकतर देश अपने भोजन के लिए दूसरों पर निर्भर हैं. वे विकसित तो हैं लेकिन बुनियादी ज़रूरतों में नहीं. और शायद हमारे देश के लिए ऐसा विकास हानिकर ही साबित हो. इसलिए देश के विकास की सही दिशा निर्धारित होना अत्यन्त आवश्यक है.

आज सवेरे अखबार चीख चीख कर कह रहे थे कि शहर में दूसरे सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण शुरू हो गया है. इस बड़ी हेडिंग के नीचे एक छोटी हेडिंग थी कि किसान अपने खेतों के बीच लेटकर रोए. क्योंकि उन खेतों की खड़ी फ़सलें कुछ ही देर में बुलडोज़र का ग्रास बनने जा रही थीं. कल के ज़मींदार अपनी ज़मीनें खोकर मजदूर बनने जा रहे थे. क्योंकि उन्हें जो मुआवजा मिल रहा है वो दूसरी जगह ज़मीन खरीदने में नाकाफी है. और वैसे भी दूसरी जगह ज़रूरी नही उन्हें ज़मीन मिल ही जाए. बहरहाल शहर के विकास में ये कुर्बानिया देनी ही पड़ती हैं. शहरवाले भी इन कुर्बानियों से अछूते नही रह पाते. अब ताज़ी हवा की उनसे दूरी कुछ और बढ़ जाती है. सब्जिया और अनाज मंहगा होता जाता है. क्योंकि जैसे जैसे शहर विस्तार लेता है, इन चीज़ों को पैदा करने वाले बाग़ और खेत दूर होते जाते हैं. एक अच्छे शहर में इन चीज़ों के लिए कोई जगह नही होती. जब शहर निर्माण की बात आती है तो प्लानिंग में शामिल होती हैं चौडी सड़कें, पक्के फुटपाथ, ऊंची इमारतें, बड़े शापिंग माल्स, चारों तरफ़ बिजली की जगमगाहट. सवाल ये उठता है कि क्या आदर्श मेट्रो शहर में बस यही चीज़ें शामिल होनी चाहिए? एक आदर्श शहर क्या ऐसा नही बन सकता जिसमे हर वर्ग का व्यक्ति एक अच्छे पर्यावरण के साथ गुज़र कर सके?

सेज के साथ साज़ चाहिए
जब मेट्रो सिटी बनाने की बात होती है तो उसके आसपास ( या भीतर ) बनाया जाता है स्पेशल इकोनोमिक ज़ोन (सेज) जहाँ बड़ी बड़ी कंपनियों को बंटती हैं कौडियों के भाव ज़मीनें. सरकार बनाने वाली हर पार्टी इसमें भरपूर इंटरेस्ट लेती है. इसके पीछे दो कारण हैं. एक तो नीतियां बनाने वाले योरोप का टूर करके आते हैं और वहां की चीज़ें अपने देश और शहर में लागू करना चाहते हैं. दूसरी वजह है राजनैतिक पार्टियों को मिलने वाली बड़ी बड़ी दान राशियाँ यही बड़ी कम्पनियाँ देती हैं सेज में शामिल होने के लिए. नेताओं को बैक डोर में मिलने वाली राशियों की तो कोई गिनती ही नही है. लेकिन यही सेज हमारे शहरों और आसपास के निवासियों के लिए अत्यन्त खतरनाक होते हैं. ज़मीन हवाओं और नदियों को जहरीला बनाते हैं. साँस लेना दुश्वार हो जाता है और साथ में जाम और मकान जैसी दूसरी समस्याएँ भी क्योंकि नौकरी हासिल करने के लिए दूर दूर से लोग वहां चले आते हैं. नंदीग्राम जैसे संघर्ष भी अक्सर सामने आते हैं.

लेकिन सेज ज़रूरी भी है विकास और रोज़गार के लिए. तो फिर इससे जुड़ी समस्याओं से कैसे निपटा जाए? हल है इसका. विकासकर्ताओं को बनाना चाहिए सेज के समान्तर साज़ भी यानी स्पेशल एग्रीकल्चर ज़ोन. यानी शहर के बीच में कुछ ऐसे ज़ोन जहाँ हरे भरे पेड़ हों. नहरें हों और ऐसे मैदान जो सिर्फ़ खेती के लिए रिज़र्व हों. अगर कहीं सेज बनाया जाए तो उसी से मिला हुआ साज़ भी ज़रूर हो. वरना अकेला सेज विकास तो कम करेगा, समस्याएँ ज़्यादा खड़ी करेगा. योरोप से तकनीकें लेना जितना अच्छा है उसका भारतीयकरण भी उतना ही ज़रूरी है. पता नही कोई सरकार इस बारे में सोचेगी या नही. बहरहाल साज़ तो नोट खींचकर देगा नहीं.

इन्हें भी जगह दें
हाल ही में एक सर्वे नज़रों से गुज़रा. जिसमें रिहाइश के लिए विभिन्न शहरों की लोकप्रियता मापी गई थी. इसमें मुंबई ने तो बाज़ी मार ली, लेकिन देश की राजधानी साफ सुथरी दिल्ली काफी निचले पायेदान पर पहुँच गई. जबकि दोनों ही मेट्रो शहर गिने जाते हैं. तो इसकी वजह है कि मुंबई शहर अमीर गरीब सभी को एडजस्ट कर लेता है. वहां अगर फाइव स्टार्स हैं तो बड़ा पाव के ठेले भी हैं. एक तरफ आलीशान बंगले हैं तो दूसरी तरफ दूर तक फैली झोपड़पटिटयां. दिल्ली में ऐसा नहीं है. वहां न तो गरीबों के बसने के लिए कोई जगह है, न पब्लिक टॉयलेट जैसी मूलभूत सुविधाएं. यहाँ तक कि मध्यम वर्ग भी अगर रहना चाहे तो उसे दिल्ली का आउटर एरिया चुनना पड़ता है. और फिर वहां से रोजाना दो घंटे का लंबा सफर.

हमारे देश के मौजूदा ढाँचे में अधिकतर नौकरियां और पैसा शहर में ही पाया जाता है. ऐसे में हर तरह का आदमी वहां आकर कुछ कमाना चाहता है. उनमें से कुछ करोड़पति हो जाते हैं और कुछ सिर्फ दो जून कि रोटी का जुगाड़ कर पाते हैं. दोनों तरह के लोगों से मिलकर शहर का सिस्टम सम्पूर्ण होता है. इस लिए एक आदर्श शहर वह होगा जो दोनों तरह के लोगों की आवश्यकताओं का ख्याल रखे. अगर वहां शौपिंग माल्स बन रहे हों तो खोमचे वाले को भी थोडी जगह चाहिए. अगर बड़े होटल हों तो चाय के ढाबे भी ज़रूरी हैं. लेकिन अफसोस की बात है की आज अतिक्रमण हटाने के नाम पर खोमचे का ठेला तो ज़ब्त कर लिया जाता है और नाले के ऊपर बनी पक्की बिल्डिंग अनदेखी कर दी जाती है. तो ऐसा मेट्रो शहर किसी काम का नहीं जिसमें भारतीय सिस्टम के एक वर्ग के लिए तो जगह है और दूसरा वर्ग इससे वंचित है.

समस्याओं की जड़ जनसँख्या?
कुछ लोगों का विचार है कि जनसँख्या ही सारी समस्याओं की जड़ है. मैं उनकी बात को एक कदम आगे रखते हुए कहना चाहता हूँ की जनसँख्या समस्याओं की जड़ न होकर ख़ुद एक समस्या है. और हर तरह की समस्याओं की जड़ बस एक ही है - इंसान का लालच.

वैसे देखा जाए तो लालच कुछ हद तक प्राकृतिक होता है. और इसके फाएदे भी हैं. इन्सान जो भी तरक्की करता है, वह अपने लालच की वजह से. कभी धन दौलत कमाने का लालच, कभी सत्ता का तो कभी लोकप्रियता हासिल करने का. लालच ज़रूरी भी है विकास के लिए. अगर मनुष्य में लालच न हो तो पूरी दुनिया का विकास रुक जाएगा.

लेकिन जहाँ मनुष्य का यह गुण ज़रूरत से ज़्यादा हो जाता है , समस्याएँ पैदा होनी शुरू हो जाती हैं. मेरे जानने वाले एक सज्जन जिनके कोई पुत्र या पुत्री नही है, अपने घर की तीन मंजिलें बनवाने के बाद चौथी की सोच रहे हैं. हम अपने लालच की वजह से अक्सर चीज़ों का ज़रूरत से ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं. हाथ धोने के लिए एक डोंगा पानी चाहिए, लेकिन पूरी बाल्टी खर्च कर देते हैं. नहाने बैठते हैं तो सब्मर्सिबिल लगाकर पन्द्रह बीस बाल्टियाँ खींच कर बहा देते हैं. हम अपनी ज़रूरत भर का कमा रहे हैं लेकिन उसके बाद भी चाहते हैं कि ग़रीबों के लिए बनने वाला लाल कार्ड हमारा भी बन जाए.

अगर घर में बच्चे नहीं हैं, तो अफ़सोस किया जाता है कि इधर उधर से छीन झपट कर बनाई गई जाएदाद दूसरों के कब्जे में पहुँच जाएगी. लालच के साथ हमारे अन्दर शर्म भी बहुत है. अगर घर में कार है तो बाइक से चलने में शर्म आती है. अगर बाइक है तो सब्जी खरीदने भी पैदल नही जा सकते. ये सारी चीज़ें आख़िर में पर्यावरण, असमानता. ट्रेफिक जाम, जनसँख्या जैसी बड़ी समस्याओं को जन्म देती हैं. और आखिर में अच्छा शहर और देश बनाने का सपना तार तार हो जाता है.

मेट्रो शहर में आतंकवाद
दरअसल शहरों में दो तरह के आतंकवाद से सामना है हमें. एक तो वह जो नाम निहाद मुजाहिदीन के ज़रिये ब्लास्ट हो रहा है. और दूसरा वह जो हमारे अन्दर पनप रहा है. पहले दिल्ली में ब्लास्ट. और उसके कुछ अरसे बाद ग्रेटर नॉएडा में एक एम.डी. की हत्या. कहीं ज़रा सी बात पर दंगे भड़के जा रहे हैं, तो कहीं मामूली सी कहासुनी पर लोग एक दूसरे को कत्ल किए दे रहे हैं. और अगर कोई बस नही चलता तो ख़ुद ही फांसी लगा लेते हैं. अब शहर वासियों में सब्र नाम की चीज़ नही रह गई है. अपने घर के सामने किसी को खोमचा लगाए हुए भी देख लेते हैं, या फेरी वाले की पुकार सुन लेते हैं तो फौरन हमारा पारा हाई हो जाता है. हर आदमी दूसरों के लिए आतंकवादी बना जा रहा है. हालाँकि ये सब पहले भी होता था लेकिन आज के दौर में ये आतंकवाद हद से बढ़ा दिखाई दे रहा है. ऐसे में इसका साइंटिफिक कारण ढूँढना ज़रूरी हो जाता है.

देखा गया है कि बढ़ते टेम्प्रेचर के साथ मिजाज़ की गर्मी भी बढती है. यानी ग्लोबल वार्मिंग का एक साइड इफेक्ट ये भी देखने को मिल रहा है. दूसरा कारण सामने नज़र आता है, हमारी शिक्षा पद्धति. जो भौतिकवादी शिक्षा तो दे रही है, लेकिन नैतिक व मानवीय ज्ञान से कोसों दूर है. पहले दादी नानी इस तरह की शिक्षाएं दिया करती थीं. लेकिन नयूक्लेअर फॅमिली के बढ़ते चलन ने यह सुविधा भी हमसे छीन ली है. इसलिए हमारा आज का युवा बहुत आसानी से भटक जाता है.

तीसरा कारण गिनाया जा सकता है पैसे कमाने की भागदौड़ को. आज का मेट्रो शहर रोज़गार के अवसर तो उपलब्ध करा रहा है, लेकिन बहुत ज़्यादा मेहनत, भागदौड़ और कम्पटीशन के बाद. और बदले में छीन रहा है हमारा सुकून व सुख चैन. अब यह ऐसे जंगल में परिवर्तित हो रहा है जहाँ हर जानवर अपना अस्तित्व बचाने के लिए दूसरे की जान लेना ज़रूरी समझता है. माल कल्चर बढ़ रहा है. छोटी मोटी दूकान खोल लेना जीवन यापन के लिए नाकाफी हो गया है.

चौथा कारण है हमारा डर. कहीं हमारा धर्म/मज़हब खतरे में पड़ा है तो कहीं हमारी दौलत/ज़मीन कोई लूट न ले जाए. ऐसे में हम हर अजनबी को शक की निगाह से देखते हैं. और अकेलेपन का शिकार होकर तरह तरह की खुराफातें सोचने लगते हैं.

वजहें और भी हैं. कहाँ तक गिनाई जाएँ. अरे हाँ, सबसे बड़ा कारण 'राजनीति' तो भूल ही गया. देखना है कि इलेक्शन के बाद कितने ब्लास्ट, दंगे और आन्दोलन होते हैं.

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Scientific World: मेट्रो शहर का विकास और उसकी दुश्‍वारियां।
मेट्रो शहर का विकास और उसकी दुश्‍वारियां।
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