जैविक खेती के लाभ और उपाय

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जैविक खेती (Organic farming) पर केंद्रित एक शोधपरक आलेख।

जैविक खेती से उत्पन्न फसल न केवल स्वास्थ्य के लिए वरन पर्यावरण के लिए भी अनुकूल होती है। जैविक कृषि पध्दति से उत्पादित शुध्द अनाज, सब्जी, फलों का सेवन करने से देश के लाखों करोड़ों रुपये (स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च) की बचत की जा सकती है। पढि‍ए जैवि‍क खेती पर एक शोधपरक आलेख सुशील कुमार शर्मा की कलम से।
'जैविक खेती की ओर बढ़ रहे हैं किसानों के कदम'

-सुशील कुमार शर्मा

यह एक सर्वविदित तथ्य है कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और कृषकों की मुख्य आय का साधन खेती है। हरित क्रांति के समय से बढ़ती हुई जनसंख्या को देखते हुए एवं आय की दृष्टि से उत्पादन बढ़ाना आवश्यक है अधिक उत्पादन के लिये खेती में अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरको एवं कीटनाशक का उपयोग करना पड़ता है जिससे सीमान्य व छोटे कृषक के पास कम जोत में अत्यधिक लागत लग रही है और जल, भूमि, वायु और वातावरण भी प्रदूषित हो रहा है साथ ही खाद्य पदार्थ भी जहरीले हो रहे है। 

Organic Farming
2004-05 में पहली बार खेती पर राष्ट्रीय परियोजना की शुरुआत की गई सन 2004-05 में जैविक खेती (Organic Farming) को करीब 42 हजार हेक्टेयर में अपनाया गया जिसका रकबा मार्च 2010 तक बढ़ कर करीब 11 लाख हेक्टेयर हो गया। इसके अतिरिक्त 34 लाख हेक्टेयर जंगलों से फसल प्राप्त होती है। इस तरह कुल 45 लाख हेक्टेयर में जैविक उत्पाद उत्पन्न किये जा रहे हैं। भारत दुनिया में कपास का सबसे बड़ा जैविक उत्पादक है। पूरी दुनिया का जैविक कपास का 50 % उत्पादन भारत में किया जाता है। 920 उत्पादक समूहों के अंतर्गत आने वाले करीब 6 लाख किसान 56.40 करोड़ रूपए मूल्य के 18 लाख टन विभिन्न जैविक उत्पाद पैदा करते हैं। 18 लाख टन जैविक उत्पादों में से करीब 561 करोड़ रूपये मूल्य के 54 हज़ार टन जैविक उत्पादों का निर्यात किया जाता है।

जैविक खेती से लाभ:
जैविक खेती किसान एवं पर्यावरण के लिए लाभ का सौदा है। जैविक खेती से किसानो को काम लगत में उच्च गुणवत्ता पूर्ण फसल प्राप्त हो सकती है। इसके अन्य लाभ निम्नलिखित हैं-

1. जैविक खेती से भूमि की गुणवत्ता में सुधार होता है। रासायनिक खादों के उपयोग से भूमि बंजरपन की ओर बढ़ रही है। जैविक खादों से उसमें जिन तत्वों की कमी होती है वह पूर्ण हो जाती है एवं उसकी गुणवत्ता में अभूतपूर्व वृद्धि हो सकती है।

2. जैविक खादों एवं जैविक कीटनाशकों के उपयोग से जमीन की उपजाऊपन में वृद्धि होती है।

3. जैविक खेती में सिंचाई की कम लागत आती है क्योंकि जैविक खाद जमीं में लम्बे समय तक नमी बनाये रखतें हैं जिससे सिंचाई की आवश्यकता रासायनिक खेती की अपेक्षा काम पढ़ती है।

4. रासायनिक खादों के उपयोग से ज़मीन के अंदर फसल की उत्पादकता बढ़ने वाले जीवाणु नष्ट हो जाते हैं जिस कारण फसल की उत्पादकता कम हो जाती जैविक खाद का उपयोग कर पुनः उस उत्पादकता को प्राप्त किया जा सकता है।

5. जैविक खेती से भूमि की जल धारण शक्ति में वृद्धि होती है। रासायनिक खाद भूमि के अंदर के पानी को जल्दी सोख लेते हैं जबकि जैविक खाद जमीं की ऊपरी सतह में नमी बना कर रखते हैं जिससे जमीन की जल धारण शक्ति बढ़ती है।

6. किसान की खेती की लागत रासायनिक खेती की तुलना में करीब 80 % कम हो जाती है। इन दिनों रासायनिक खादों की कीमतें आसमान छू रही है जैविक खाद बहुत ही सस्ते दामों में तैयार हो जाता है।

7. जैविक खेती से प्रदूषण में कमी आती है रासायनिक खादों एवं कीटनाशकों से पर्यावरण प्रदूषित होता है। खेतों के आसपास का वातावरण जहरीला हो जाता है जिससे वहाँ के वनस्पति, जानवर एवं पशु पक्षी मरने लगते हैं। जैविक खादों एवं कीट नाशकों के प्रयोग से वातावरण शुद्ध होता है।

8. जैविक खेती से उत्पादों की गुणवत्ता रासायनिक खेती की तुलना में कई गुना बेहतर होती है एवं ऊँचे दामों में बाजार में बिकते हैं।

9. स्वास्थ्य की दृष्टि से जैविक उत्पाद सर्वश्रेष्ठ होते हैं एवं इनके प्रयोग से कई प्रकार के रोगों से बचा जा सकता है।

10.जैविक उत्पादों की कीमतें रासायनिक उत्पादों से कई गुना ज्यादा होती हैं जिससे किसानों की औसत आय में वृद्धि होती है।

जैविक खेती की एवं रासायनिक खेती की तुलनात्मक उत्पादकता:
निम्न आंकड़े दर्शाते है की जैविक खेती से फसलों की उत्पादकता रासायनिक खेती की तुलना में करीब 20से 25 प्रतिशत तक बढ़ जाती है।
फसल
जैविक खेती से उत्पादकता
रासायनिक खेती से उत्पादकता
जैविक खेती की अधिक उत्पादकता का प्रतिशत
गन्ना (टन में )
942
817
15.26
चावल (क्विंटल में )
88
78
12.82
मूंगफली (क्विंटल में )
18
14
28.57
सोयाबीन (क्विंटल में )
74
51
45.09
गेँहू (क्विंटल में )
45
35
28.57
फल एवं सब्जियां (क्विंटल में )
15
14
7.14

जैविक खेती हेतु खाद का निर्माण: 
रासायनिक खाद फसल के लिए उपयुक्त जीवाणुओं को नष्ट कर देता है। इन सूक्ष्म जीवाणुओं के तंत्र को विकसित करने के लिए जैविक खाद का प्रयोग किया जाना चाहिए जिससे फसल के लिए मित्र जीवाणुओं की संख्या में वृद्धि, हवा का संचार, पानी को पर्याप्त मात्रा में सोखने की क्षमता वृद्धि होती है। जैविक खाद बनाने की कुछ प्रमुख विधियां निम्न हैं:

1. नाडेप विधि: इस विधि में 12 फ़ीट लम्बा, 5 फ़ीट चौड़ा एवं 3 फ़ीट गहरा गड्ढा खोद कर उसमे 75% वनस्पति अवशेष, 20% हरी घास व 5% गोबर 200 लीटर पानी में डाल कर अच्छे से मिलाते हैं। इस गड्ढे को चार इंच मोटी मिट्टी की परत से ढक कर रखते हैं। 60 दिन बाद इस गड्ढे में कुछ छेद करके उनमें पी एस बी एवं एजेक्टोबेक्टर कल्चर गड्ढे के अंदर डाल कर उन छिद्रों को बंद कर देते हैं। 15 से 20 क्विंटल प्रति एकड़ की दर से इस खाद का उपयोग करें।हर 21 दिन बाद इस खाद को डाल सकते हैं।

2. वर्मी कम्पोस्ट खाद: फसल में पोषक तत्वों का संतुलन बनाने में वर्मी कम्पोस्ट खाद की महत्व पूर्ण भूमिका रहती है। वर्मी कम्पोस्ट खाद को विशेष प्रकार के केंचुओं से बनाया जाता है। इन केचुओं के माध्‍यम से अनुपयोगी जैविक वानस्पतिक जीवांशो को अल्‍प अवधि में मूल्‍यांकन जैविक खाद का निर्माण करके, इसके उपयोग से मृदा के स्‍वास्‍थ्‍य में आशातीत सुधार होता है एवं मृदा की उर्वरा शक्ति बढ़ती है जिससे फसल उत्‍पादन में स्थिरता के साथ गुणात्‍मक सुधार होता है। वर्मी कम्‍पोस्‍ट में नाइट्रोजन फास्‍फोरस एवं पोटाश के अतिरिक्‍त में विभिन्‍न प्रकार सूक्ष्‍म पोषक तत्‍व भी पाये जाते हैं। वर्मी कम्पोस्ट पोषण पदार्थों से भरपूर एक उत्तम जैव उर्वरक है। यह केंचुआ आदि कीड़ों के द्वारा वनस्पतियों एवं भोजन के कचरे आदि को विघटित करके बनाई जाती है।

वर्मी कम्पोस्ट में बदबू नहीं होती है और मक्खी एवं मच्छर नहीं बढ़ते है तथा वातावरण प्रदूषित नहीं होता है। तापमान नियंत्रित रहने से जीवाणु क्रियाशील तथा सक्रिय रहते हैं। वर्मी कम्पोस्ट डेढ़ से दो माह के अंदर तैयार हो जाता है। इसमें 2.5 से 3% नाइट्रोजन, 1.5 से 2% सल्फर तथा 1.5 से 2% पोटाश पाया जाता है।

3. हरी खाद: हरी खाद (green manure) उस सहायक फसल को कहते हैं जिसकी खेती मुख्यत: भूमि में पोषक तत्त्वों को बढ़ाने तथा उसमें जैविक पदाथों की पूर्ति करने के उद्देश्य से की जाती है। प्राय: इस तरह की फसल को इसके हरी स्थिति में ही हल चलाकर मिट्टी में मिला दिया जाता है। हरी खाद से भूमि की उपजाऊ शक्ति बढ़ती है और भूमि की रक्षा होती है। मृदा के लगातार दोहन से उसमें उपस्थित पौधे की बढ़वार के लिये आवश्यक तत्त्व नष्ट होते जा रहे हैं। इनकी क्षतिपूर्ति हेतु व मिट्टी की उपजाऊ शक्ति को बनाये रखने के लिये हरी खाद एक उत्तम विकल्प है। बिना गले-सड़े हरे पौधे (दलहनी एवं अन्य फसलों अथवा उनके भाग) को जब मृदा की नत्रजन या जीवांश की मात्रा बढ़ाने के लिये खेत में दबाया जाता है तो इस क्रिया को हरी खाद देना कहते हैं।

4. मटका खाद: गौ मूत्र 10 लीटर, गोबर 10 किलो, गुड 500 ग्राम, बेसन 500 ग्राम- सभी को मिलाकर मटके में भरकर 10 दिन सड़ाएं फिर 200 लीटर पानी में घोलकर गीली जमीन पर कतारों के बीच छिड़क दें। 15 दिन बाद पुन: इस का छिड़काव करें।

5. बायोगैस स्लरी: बायोगैस संयंत्र में गोबर गैस की पाचन क्रिया के बाद 25 प्रतिशत ठोस पदार्थ रूपान्तरण गैस के रूप में होता है और 75 प्रतिशत ठोस पदार्थ का रूपान्तरण खाद के रूप में होता हैं। जिसे बायोगैस स्लरी कहा जाता हैं दो घनमीटर के बायोगैस संयंत्र में 50 किलोग्राम प्रतिदिन या 18.25 टन गोबर एक वर्ष में डाला जाता है। उस गोबर में 80 प्रतिशत नमी युक्त करीब 10 टन बायोगैस स्लेरी का खाद प्राप्त होता हैं। ये खेती के लिये अति उत्तम खाद होता है। इसमें 1.5 से 2% नत्रजन, 1% स्फुर एवं 1% पोटाश होता हैं।

बायोगैस संयंत्र में गोबर गैस की पाचन क्रिया के बाद 20 प्रतिशत नाइट्रोजन अमोनियम नाइट्रेट के रूप में होता है। अत: यदि इसका तुरंत उपयोग खेत में सिंचाई नाली के माध्यम से किया जाये तो इसका लाभ रासायनिक खाद की तरह फसल पर तुरंत होता है और उत्पादन में 10-20 प्रतिशत बढ़त हो जाती है। स्लरी के खाद में नत्रजन, स्फुर एवं पोटाश के अतिरिक्त सूक्ष्म पोषण तत्व एवं ह्यूमस भी होता हैं जिससे मिट्टी की संरचना में सुधार होता है तथा जल धारण क्षमता बढ़ती है। सूखी खाद असिंचित खेती में 5 टन एवं सिंचित खेती में 10 टन प्रति हैक्टर की आवश्यकता होगी। ताजी गोबर गैस स्लरी सिंचित खेती में 3-4 टन प्रति हैक्टर में लगेगी। सूखी खाद का उपयोग अन्तिम बखरनी के समय एवं ताजी स्लरी का उपयोग सिंचाई के दौरान करें। स्लरी के उपयोग से फसलों को तीन वर्ष तक पोषक तत्व धीरे-धीरे उपलब्ध होते रहते हैं।

जैविक कीट एवं व्याधि नियंत्रण:
1.5 लीटर देशी गाय के मट्ठे में 5 किलो नीम के पत्ते डालकर 10 दिन तक सड़ायें, बाद में नीम की पत्तियों को निचोड़ लें। इस नीमयुक्त मिश्रण को छानकर 150 लीटर पानी में घोल बनाकर प्रति एकड़ के मान से समान रूप से फसल पर छिड़काव करें। इससे इल्ली व माहू का प्रभावी नियंत्रण होता है।

2. 5 लीटर मट्ठे में, 1 किलो नीम के पत्ते व धतूरे के पत्ते डालकर, 10 दिन सड़ने दे। इसके बाद मिश्रण को छानकर इल्लियों का नियंत्रण करें।

3. 5 किलो नीम के पत्ते 3 लीटर पानी में डालकर उबाल ली तब आधा रह जावे तब उसे छानकर 150 लीटर पानी में घोल तैयार करें। इस मिश्रण में 2 लीटर गौ-मूत्र मिलावें। अब यह मिश्रण एक एकड़ के मान से फसल पर छिड़के।

4. 1/2 किलो हरी मिर्च व लहसुन पीसकर 150 लीटर पानी में डालकर छान ले तथा एक एकड़ में इस घोल का छिड़काव करें।

5. मारूदाना, तुलसी (श्यामा) तथा गेदें के पौधे फसल के बीच में लगाने से इल्ली का नियंत्रण होता हैं।

6. गौमूत्र, कांच की शीशी में भरकर धूप में रख सकते हैं। जितना पुराना गौमूत्र होगा उतना अधिक असरकारी होगा। 12-15 मि.मी. गौमूत्र प्रति लीटर पानी में मिलाकर स्प्रेयर पंप से फसलों में बुआई के 15 दिन बाद, प्रत्येक 10 दिवस में छिड़काव करने से फसलों में रोग एवं कीड़ों में प्रतिरोधी क्षमता विकसित होती है जिससे प्रकोप की संभावना कम रहती है।

7.100-150 मि.ली. छाछ 15 लीटर पानी में घोल कर छिड़काव करने से कीट-व्याधि का नियंत्रण होता है। यह उपचार सस्ता, सुलभ, लाभकारी होने से कृषकों मे लोकप्रिय है।

 जैविक हरी खादों में पोषक तत्व (प्रतिशत में):
क्रमांक
जैविक खाद
पोटाश
फास्फोरस
नाइट्रोजन
1
वर्मी कम्पोस्ट
0.67
2.20
1.60
2
कम्पोस्ट
1.07
1.92
1.24
3
प्रेस मड
1.31
1.34
1.59
4
जल कुम्भी
2.30
1.00
2.00
5
मुर्गी खाद
2.35
2.93
2.87
6
नीम केक
1.4
1.00
5.2
7
सनफ्लावर
1.9
2.2
7.9
8
विनौला
1.6
1.8
2.5

विभिन्न प्रदेशों की सरकारें जैविक खेती को प्रोत्साहित कर रही हैं। मध्यप्रदेश में 1565 गांवों में पूरी तरह जैविक खेती हो रही है। प्रदेश में 29 लाख हैक्टेयर भूमि जैविक खेती के लिये उपयुक्त पायी गयी है।प्रदेश में जैविक जैविक क्षेत्रों का चयन किया जा रहा है। बेस लाइन सर्वे कर जैविक खेती करने वाले कृषक समूहों का निर्माण एवं पंजीयन किया जा रहा है। कृषि विभाग के द्वारा क्षेत्रों के अनुसार जैविक फसलों का चयन, निःशुल्क मिट्टी का परीक्षण, जैविक खेती के लिए भुसधर हेतु चूना, रॉक फास्फेट एवं कम्पोस्ट उपयोग हेतु प्रोत्साहन अनुदान, जैविक खाद एवं जैविक कीट नियंत्रण हेतु प्रोत्साहन अनुदान, आनफार्म जैविक खाद हेतु कृषकों को सहायता एवं विभागीय अमले व कृषकों को जैविक खेती की प्रशिक्षण योजना से जैविक खेती के विस्तारीकरण में तेजी आई है।

जैविक खेती करने वाले मध्य प्रदेश के किसानों के अनुभव:
1. प्रीतिराज पटेल निवासी गाडरवारा विकास खंड साइंखेड़ा, नरसिंहपुर "जैविक खेती उत्पादन की दृष्टि से रासायनिक खेती से कई गुना बेहतर है, इसमें किसान स्वाबलंबी बनता है एवं हवा, पानी और मिटटी जहर से मुक्त होते हैं।"

2. नागेन्द्र त्रिपाठी निवासी बम्होरी कला विकास खंड साइंखेड़ा नरसिंहपुर "हमारे यहाँ जो रसायनो के आधार पर खेती हो रही है उससे पर्यावरण का प्रदुषण बढ़ रहा है एवं मिट्टी का उपजाऊपन काम हो रहा है।''

3. विनीत उदेनिया निवासी पिपरिया ,विकासखण्ड पिपरिया जिला होशंगाबाद "फर्टिलाइजर एवं रासायनिक कीट नाशकों का प्रयोग बंद करने से मेरे खेतों में करीब 25% तक फसल की उत्पादकता बढ़ी है एवं प्रति एकड़ अौसत मुनाफा में बढ़ोतरी हुई है।"

जैविक खेती से उत्पन्न फसल न केवल स्वास्थ्य के लिए वरन पर्यावरण के लिए भी अनुकूल होती है। जैविक कृषि पध्दति से उत्पादित शुध्द अनाज, सब्जी, फलों का सेवन करने से देश के लाखों करोड़ों रुपये (स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च) की बचत की जा सकती है। जैविक कृषि पध्दति से सामाजिक समरसता बढ़ाकर अप्रत्यक्ष रूप से देश के आर्थिक विकास में सहभागी बना जा सकता है। हमारे स्वास्थ्य एवं सर्वांगीण विकास के लिए यह जरूरी है की प्राकृतिक संसाधन प्रदूषित न हों एवं शुद्ध वातावरण के साथ पोषक आहार मिले इन सबका आधार सिर्फ जैविक खेती है।
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लेखक परिचय: 
सुशील कुमार शर्मा व्यवहारिक भूगर्भ शास्त्र और अंग्रेजी साहित्य में परास्नातक हैं। इसके साथ ही आपने बी.एड. की उपाध‍ि भी प्राप्त की है। आप वर्तमान में शासकीय आदर्श उच्च माध्य विद्यालय, गाडरवारा, मध्य प्रदेश में वरिष्ठ अध्यापक (अंग्रेजी) के पद पर कार्यरत हैं। आप सामाजिक एवं वैज्ञानिक मुद्दों पर चिंतन करने वाले लेखक के रूप में भी जाने जाते हैं तथा अापकी रचनाएं समय-समय पर विभ‍िन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाश‍ित होती रही हैं। आपसे सुशील कुमार शर्मा (वरिष्ठ अध्यापक), कोचर कॉलोनी, तपोवन स्कूल के पास, गाडरवारा, जिला-नरसिंहपुर, पिन -487551 (MP) के पते पर सम्पर्क किया जा सकता है।
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Scientific World: जैविक खेती के लाभ और उपाय
जैविक खेती के लाभ और उपाय
जैविक खेती (Organic farming) पर केंद्रित एक शोधपरक आलेख।
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Scientific World
http://www.scientificworld.in/2016/01/organic-farming-hindi-article.html
http://www.scientificworld.in/
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