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शहरी तनाव और उससे बचने के उपाय।

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शहरी तनाव और उससे बचने के आसान उपाय।

आज महानगरों की भीड़ में जी रहा आदमी इस कदर तनाव से पीड़ित है कि वह जरा-जरा सी बात पर बुरी तरह झुंझला कर मरने-मारने पर उतारू हो जाता है। महानगरों की सड़कों पर तो हर आदमी जैसे तनाव के बारूद से भरा हुआ है। जरा सी तू-तू, मैं-मैं हुई नहीं कि जवाब में चाकू और तमंचे निकल आते हैं। कहा-सुनी में जान ले लेने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं।
मन क्यों परेशां है इस शहर में? 

-देवेंद्र मेवाड़ी

अब तक हम सिर्फ सुनते और अनुभव करते थे कि शहर में जिंदगी बेहद तनाव भरी होती है। लेकिन, अब वैज्ञानिकों ने शोध से साबित कर दिया है कि यह बात सच है। सच है कि शहर की व्यस्त सड़कें और भीड़ भरे बाजार हमारे दिलो-दिमाग को लगातार बीमार बना रहे हैं। शहर में फैले कंक्रीट के जंगल के किसी कोने में, कहीं किन्हीं ऊंची इमारतों के बीच किसी फ्लैट या अपार्टमेंट में एक टुकड़ा हरियाली, धूप और आसमान के लिए तरसती जिंदगी हमें हरदम तनाव से भरती रहती है। अब वैज्ञानिक तनाव भरे शहरी जीवन के खतरों से लगातार आगाह कर रहे हैं। कि अगर हम प्रकृति से दूर होते चले गए तो कल जीना दूभर होता चला जाएगा।

आज महानगरों की भीड़ में जी रहा आदमी इस कदर तनाव से पीड़ित है कि वह जरा-जरा सी बात पर बुरी तरह झुंझला कर मरने-मारने पर उतारू हो जाता है। महानगरों की सड़कों पर तो हर आदमी जैसे तनाव के बारूद से भरा हुआ है। जरा सी तू-तू, मैं-मैं हुई नहीं कि जवाब में चाकू और तमंचे निकल आते हैं। कहा-सुनी में जान ले लेने की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। किसी कवि की पंक्तियां सटीक साबित हो रही हैं- ‘आज की ताजा खबर/ सुबह का गया, शाम को घर लौट आया!’

शहर कुछ लोगों के लिए भले ही भौतिक सुखों की खान हों, मगर वे आदमी को प्रकृति से लगातार दूर करते जा रहे हैं। शहर के उस शोर और मनुष्यों व इमारतों की भीड़ में बच्चे तक न परिंदों की चहचहाहट सुन सकते हैं, न रंगीन तितलियों को छू सकते हैं, न नदियों की कल-कल, न पत्तियों की सर-सर सुन सकते हैं। मनोवैज्ञानिकों ने पता लगाया है कि इसके कारण शहर के माहौल में दिमाग पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है और उसे काफी क्षति पहुंच रही है। एक अध्ययन में देखा गया है कि शहर की किसी भीड़ भरी जगह से गुजरते समय चंद मिनटों के भीतर याददाश्त कम होने लगती है जिसके कारण आदमी आत्म नियंत्रण खोने लगता है।
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यहां हमें यह याद रखना चाहिए कि भारत के विभिन्न शहरों में आज 30 करोड़ से भी अधिक लोग रह रहे हैं। 2015 तक मुंबई विश्व का दूसरा सबसे घना बसा शहर हो जाएगा जिसकी आबादी लगभग 2.09 करोड़ तक पहुंच जाएगी। दिल्ली और कलकत्ता भी सबसे घने बसे शहरों में शामिल रहेंगे। वैश्विक स्तर पर देखें तो वर्ष 1900 में शहरों का अनुपात केवल 13 प्रतिशत था जो 2005 में 49 प्रतिशत तक बढ़ चुका था। संयुक्त राष्ट्र के एक अनुमान के अनुसार 2030 तक विश्व की 60 प्रतिशत आबादी यानी 4.9 अरब लोग शहरों में रह रहे होंगे। और, यहां हमारे देश में 2030 तक आधी आबादी शहरों में रह रही होगी।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि आदमी का दिमाग कुदरत की एक मशीन ही है। लेकिन, हजारों लोगों की भीड़, शोर-शराबा, आसपास से गुजरती तेज रफ्तार गाड़ियां इस मशीन को बुरी तरह थका देती है। भारी शोर-शराबे और आपाधापी में दिमाग कुछ और सोचने के बजाय सिर्फ यह सोचने के लिए मजबूर हो जाता है कि बस बचते-बचाते कैसे बाहर निकला जाए। शोर से ध्यान हटाए बिना दिमाग ढंग से कुछ और नहीं सोच पाता। जो ऊर्जा कम्प्यूटर रूपी दिमाग में सोचने के काम आनी चाहिए, उसका अधिकांश हिस्सा शोर से ध्यान हटाने और बचने-बचाने में खर्च हो जाता है।

लेकिन, क्या इस स्थिति से बचने का कोई रास्ता है? कई मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि ‘हां है।’ मिशिगन विश्विद्यालय के मनोविज्ञानी स्टेफेन कैप्लान (Stephen Kaplan) द्वारा विकसित ‘आर्ट’ यानी अटेंशन रेस्टोरेशन थ्योरी (Attention Restoration Theory) इसका रास्ता है। और, कैप्लान ने जो रास्ता सुझाया, वह है प्रकृति की शरण लेना। कल्पना कीजिए कि कहीं कोई साफ-सुथरी झील है। उसके आसपास नाना प्रकार के पेड़-पौधों की हरियाली बिखरी हुई है। वहां चिड़ियां चहचहाती हैं। हवा आकर पेड़ों की पत्तियों को सहलाती है। उनकी शाखों पर दिन भर गिलहरियां खेलती हैं। फूलों पर मधुमक्खियां, भौंरे और तितलियां मंडराती हैं। नीली झील में लहरों की रेशमी सलवटें उठती और मिटती रहती हैं। उनके बीच मछलियां अठखेलियां करती रहती हैं।...हमारा मन इस दृश्यावली में रम जाता है। दिमाग की मशीन के कल-पुर्जे विश्राम करने लगते हैं। कहीं कोई ध्यान भंग नहीं होता। मन बेहद शांत हो जाता है।

बस, यही है कैप्लान की संकल्पना जिसे ‘आर्ट’ यानी अटेंशन रेस्टोरेशन थेरेपी कहा गया है। यह दिमाग के इलाज की कुदरती दवा है। जिससे दिमाग को भारी सुकून मिलता है। शायद यही कारण हैं कि पिकासो जैसा प्रख्यात चित्रकार शहर छोड़ कर शांत-एकांत इलाके में जाकर बस गया। टैगोर और विवेकानंद ने पहाडों की गोद में आकर प्रकृति के सान्निध्य में शांति अनुभव की।

मनोवैज्ञानिक मार्क बरमैन (Marc Berman Psychologist) ने ध्यान केंद्रित करने और याददाश्त का पता लगाने के लिए विद्यार्थियों पर प्रयोग किया। विद्यार्थियों का एक समूह वनस्पति उद्यान में घूमने के लिए भेजा और दूसरा शहर की भीड़ और शोर-शराबे में। वे जी पी एस संपर्क में थे। बरमैन ने देखा कि शहर में घूम रहे विद्यार्थियों की मनःस्थिति ठीक नहीं थी और उनकी ध्यान केंद्रित करने तथा याददाश्त की क्षमता बहुत कम हो गई।

इसी तरह इलिनॉय विश्वविद्यालय (University of Illinois) की फ्रैंसीज कुओ (Frances Kuo) ने एक बृहद आवासीय क्षेत्र की निवासी महिलाओं­ से पूछताछ की। उनमें दो प्रकार की महिलाएं थीं: एक वे जिन्हें अपने अपार्टमेंट से बाहर केवल कंकरीट की इमारतें, पार्किंग स्थल और बास्केटबाल कोर्ट दिखाई देते थे। दूसरे समूह की महिलाओं को हरे-भरे पेड़, लॉन और फूलों की क्यारियां दिखाई देती थीं। पता लगा, हरियाली देखने वाली महिलाएं जीवन की चुनौतियों का बेहतर ढंग से सामना कर रही हैं। कुओ को यह भी पता लगा कि जिन अपार्टमेंटों से हरियाली दिखाई देती थी, उनमें घरेलू हिंसा का प्रतिशत भी कम था। अध्ययन से साबित हुआ कि शहरी जीवन में भावनात्मक नियंत्रण कम हो जाता है और व्यक्ति अपना आपा खो बैठता है।

मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि हरियाली के फायदों और पेड़-पौधों की विविधता में भी सीधा रिश्ता है। जितने अधिक प्रकार के पेड़-पौधे होंगे, दिमाग पर उतना ही अच्छा असर पड़ेगा। इसलिए अब इस खोज का लाभ उठा कर अनेक वास्तुविद घर-आंगन और व्यावसायिक इमारतों के लिए नए प्रकार के डिजायन तैयार करने लगे हैं ताकि अधिक से अधिक और विविधतापूर्ण हरियाली उगाई जा सके। हराभरा पार्क मन पर तुरंत असर करता है। बरमैन का कहना है, हरीभरी दृश्यावली को देखने भर से ध्यान और याददाश्त में इजाफा हो जाता है।

मगर, रुकिए जरा। शांता-फे इंस्टीट्यूट (Santa Fe Institute) के वैज्ञानिकों को शहर में संभावना भी नजर आ रही है। उनका कहना है कि शहर की जो चीजें हमारी ध्यान केंद्रित करने की क्षमता और याददाश्त को बर्बाद कर देती हैं, वे ही कुछ नया करने को भी प्रेरित करती हैं। उनसे सर्जनात्मकता बढ़ती है। भीड़ भरे शहरों में नई बौद्धिक उपलब्धियां सामने आई हैं। इसलिए शहरों में हरियाली बढ़ाने की बहुत आवश्यकता है। कुओ कहती हैं कि हरियाली एक प्रकार की औषधि है। इससे शहर में रहते हुए भी तनाव से मुक्ति मिल सकती है।

दार्शनिक थोरो (Philosopher Thoreau ) ने जीवन के लिए एक नए दर्शन का सुझाव देते हुए कभी कहा था कि जीवन की राह तलाशने के लिए व्यक्ति राज्य, देवताओं या समाज और यहां तक कि इतिहास के पास न जाकर प्रकृति और स्वयं के पास जाए। वही सच साबित हो रहा है।

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देवेंद्र मेवाड़ी हिन्दी के चर्चित विज्ञान कथाकार एवं विज्ञान संचारक हैं। आपकी विज्ञान कथा विषयक 'मेरी प्रिय विज्ञान कथाएं', 'भविष्य' और 'कोख' पुस्तकें प्रकाश‍ित हैं। लोकप्रिय विज्ञान लेखन के क्षेत्र में आपकी लगभग 2 दर्जन पुस्तकें प्रकाश‍ित हैं, जिनमें 'मेरी यादों का पहाड़' तथा 'मेरी विज्ञान डायरी' (दो भाग) हाल ही में काफी चर्चित रही हैं। विज्ञान लेखन के क्षेत्र में अतुलनीय कार्यों हेतु आपको प्रतिष्ठित आत्माराम पुरस्कार एवं एन.सी.एस.टी.सी. पुरस्कार सहित एक दर्जन से अध‍िक पुरस्कार/सम्मान प्राप्त हाे चुके हैं। आपसे निम्न ईमेल आईडी पर संपर्क किया जा सकता है: 

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शहरी तनाव और उससे बचने के उपाय।
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