विज्ञान संचार शिक्षण संबंधी भारतीय परिदृश्य

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Science Communication Training in India in Hindi

विज्ञान संचार पर विशेष श्रृंखला—कड़ी 4

विज्ञान संचार शिक्षण संबंधी भारतीय परिदृश्य

Science communication Training: An Indian Perspective

-अभय एस डी राजपूत एवं नवनीत कुमार गुप्ता

पूरी दुनिया के साथ भारत में भी 1980 के दशक में विज्ञान संचार को एक विशेष क्षेत्र के रूप में पहचान मिलने लगी थी। भारत सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग के अंतर्गत, राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद् (एनसीएसटीसी- NCSTC) की एक स्वायत्त संस्था के रूप में सन 1982 में स्थापना हुई। इस संस्था के सहयोग से शिक्षण के क्षेत्र में भी कुछ प्रयास किये गए। एनसीएसटीसी की वित्तीय सहायता और सहयोग से, देश के कुछ विश्वविद्यालयों में विज्ञान संचार के क्षेत्र में परास्नातक और डिप्लोमा पाठ्यक्रमों का आरंभ किया गया। इन में से प्रमुख हैं: देवी अहिल्या विश्वविद्यालय, इंदौर; लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ; अन्ना विश्वविद्यालय, चेन्नई; माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता और संचार विश्वविद्यालय, भोपाल; और मदुराई कामराज विश्वविद्यालय, मदुराई । विज्ञान संचार के क्षेत्र में कोलकाता स्थित राष्ट्रीय विज्ञान संग्रहालय परिषद् द्वारा भी बिट्स पिलानी के साथ मिलकर इस क्षेत्र में एक एम.टेक. पाठ्यक्रम चलाया जा रहा है। इनके अलावा कुछ विश्वविद्यालयों द्वारा उनके पत्रकारिता और जनसंचार पाठ्यक्रमों के अंतर्गत कुछ पेपर या सेमेस्टर के पाठ्यक्रम के रूप में विज्ञान पत्रकारिता या विज्ञान संचार की शिक्षा प्रदान दी जा रही है।

Science communication Training
एनसीएसटीसी ने इन विश्वविद्यालयों को कुछ प्रारंभिक शैक्षिक और वित्तीय सहायता की पेशकश इस उम्मीद से की थी कि ये विश्वविद्यालय अंततः इन पाठ्यक्रमों को दीर्घकालिक आधार पर संचालित करेंगे। दुर्भाग्यवश, एनसीएसटीसी द्वारा वित्तीय सहायता को बंद करने और कुछ अन्य कारणों के परिणामस्वरूप, भारत में इनमें से अधिकतर विश्वविद्यालयों में विज्ञान संचार संबंधी पाठ्यक्रम बंद हो गए या बंद होने की कगार पर हैं।

उदाहरण के लिए, देवी अहिल्या विश्वविद्यालय (DAVV), इंदौर ने 1993-94 से विज्ञान संचार में पूर्णकालिक दो-वर्षीय एमएससी और 2006-07 से दूरस्थ माध्यम से एक-वर्षीय विज्ञान संचार में स्नातकोत्तर डिप्लोमा पाठ्यक्रम आरंभ किये। लेकिन ये दोनों पाठ्यक्रम कुछ साल पहले ही बंद कर दिए गए हैं। इसी तरह, अन्ना विश्वविद्यालय, चेन्नई ने 2008 में पूर्णकालिक विज्ञान और प्रौद्योगिकी संचार में दो-वर्षीय एमएससी पाठ्यक्रम को शुरू किया था। लेकिन 2014 में इस पाठ्यक्रम को बंद भी कर दिया गया।
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माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल ने भी अपना विज्ञान संचार संबंधी पाठ्यक्रम बंद कर दिया है। मदुराई कामराज विश्वविद्यालय, मदुराई और विज्ञान परिषद्, इलाहाबाद द्वारा चलाये जा रहे विज्ञान पत्रकारिता में डिप्लोमा पाठ्यक्रम भी अब बंद हैं। इस समय सिर्फ तीन ही कार्यक्रम चल रहे हैं: लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ का एमएससी कोर्स, राष्ट्रीय विज्ञान संग्राहलय परिषद् (NCSM), कोलकाता का एम.टेक. कोर्स और भारतीय विज्ञान संचार सोसाइटी, लखनऊ का 1-वर्षीय विज्ञान पत्रकारिता पाठ्यक्रम ।

भारत में विज्ञान संचार पाठ्यक्रमों की विफलता के कई अन्य संभावित कारण भी हो सकते हैं। उनमें से कुछ को समझने की कोशिश करेंगे। विज्ञान संचार से संबंधित इन पाठ्यक्रमों या सेमेस्टर पाठ्यक्रमों को एनसीएसटीसी के समर्थन से विश्वविद्यालयों में आमतौर पर विज्ञान के कुछ नियमित संकायों या जनसंचार विभागों द्वारा शुरू किया गया था। भारतीय विश्वविद्यालयों में आरंभ किए गए विज्ञान संचार पाठ्यक्रमों और विषयों के समन्वयक स्वयं विज्ञान संचार के विशेषज्ञ नहीं हैं। उनकी शैक्षिक गतिविधियों (शिक्षण और अनुसंधान) का मुख्य क्षेत्र कुछ और होता है। एनसीएसटीसी परियोजना के तहत कुछ एक परियोजना वैज्ञानिक या शिक्षक की भर्ती की है जिन्हें विज्ञान संचार में प्रोफेसर की तरह नियमित पद पाने की संभावना बहुत ही रहती थी। नियमित और पूर्णकालिक शिक्षकों के बिना, इन पाठ्यक्रमों को आम तौर पर अन्य विभागों, संस्थानों से आए ऐसे अतिथि विद्वानों के भरोसे छोड़ा गया जो अन्य विषयों को पढ़ाते थे। इन्हें प्रति व्याख्यान के आधार पर या प्रति घंटे के आधार पर भुगतान किया जाता था।

हालांकि निस्केयर (NISCAIR) एवं विज्ञान प्रसार (Vigyan Prasar) जैसी संस्थानों द्वारा लघु अवधि की विज्ञान लेखन कार्यशालाएं निरंतर आयोजित की जाती रही हैं।

यह काफी दुर्भाग्यपूर्ण है कि देश में कुशल विज्ञान संचार शिक्षकों की संख्या बहुत कम है। यह आगे ध्यान देने योग्य है कि भारतीय विश्वविद्यालयों में कहीं भी विज्ञान संचार में अध्यापन और शोध के लिए न तो पूर्णकालिक विभाग और केंद्र हैं और न ही इनमें नियमित प्रोफेसर या शिक्षक। इन पाठ्यक्रमों को बंद करने का एक अन्य संभावित कारण संस्थागत या विभागीय राजनीति भी हो सकती है। इसके अलावा, भारत में विज्ञान संचार पाठ्यक्रम की विफलता के पीछे अन्य संभावित कारणों में इन कोर्सों में दिलचस्पी रखने वाले छात्रों का नियमित दाखिला न लेना, भारतीय संदर्भ और भाषाओं में अध्ययन सामग्री की कमी, पाठ्यक्रमों का पूरी तरह से भारतीय जरूरतों के अनुरूप नहीं होना, और उचित रोजगार के अवसरों की कमी (विशेषकर सरकारी क्षेत्र में) हो सकते हैं। लगभग ये सभी पाठ्यक्रम रोजगार से जुड़े नहीं थे। इसीलिए पाठ्यक्रमों को पूरा करने के बाद, छात्रों को एक विज्ञान संचारक के रूप में अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष करना पड़ता है।

प्रशिक्षित विज्ञान संचारक बदलते समय के साथ अपने को नहीं ढाल पाए। दूसरी ओर भारतीय उच्च शिक्षण संस्थान इस दिशा में योगदान करने में काफी विफल रहे हैं। यद्यपि भारत में बड़ी संख्या में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में जनसंचार और पत्रकारिता विभाग हैं, परंतु विज्ञान संचार में डिग्री और डिप्लोमा कोर्स या सेमेस्टर पत्रों की पेशकश करने वालों की संख्या बहुत ही कम है। इसके अलावा भारत में विज्ञान संचार में शोध की स्थिति भी निराशाजनक है।

उपरोक्त बातों से स्पष्ट है कि ऐसे समय में जब विज्ञान संचार एक शैक्षिक एवं पेशेवर विधा के रूप में वैश्विक स्तर पर स्थान प्राप्त कर रहा है, भारत में इसकी स्थिति बहुत उत्साहवर्धक नहीं है। जन-जन तक वैज्ञानिक ज्ञान और समझ को पहुंचाए बिना, भारत का एक विकसित देश और ज्ञानआधारित अर्थव्यवस्था बनने का सपना पूरा करना बहुत कठिन होगा। इसलिए यह ध्यान देने योग्य बात है कि भारत में वैज्ञानिक संचार और विज्ञान लोकीकरण के प्रयास को सफल बनने के लिए विज्ञान संचार में प्रशिक्षण और कोशल निर्माण के लिए विशेष प्रयास किये जाएँ। और ऐसे प्रयास भारतीय समाज की आकांक्षाओं के अनुसार निर्मित किये जाएँ तो बहुत अच्छा होगा।
-लेखक परिचय-

अभय एसडी राजपूत विज्ञान संचारक हैं। पिछले कई सालों से विभिन्न मीडिया माध्यमों से विज्ञान संचार के कार्य में संलग्न हैं। आपको रजत जयंती विज्ञान संचार अवार्ड-2008 और एस. रामासेशन विज्ञान लेखन फैलोशिप-2008 के प्राप्त हो चुके हैं। आप विज्ञान लेखन के साथ-साथ, विज्ञान संचार में शोधकार्य में भी रूचि रखते हैं।
नवनीत कुमार गुप्ता पिछले दस वर्षों से विभिन्न माध्यमों द्वारा विज्ञान संचार के कार्य में संलग्न हैं। आपकी विज्ञान संचार विषयक लगभग एक दर्जन पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं तथा इन पर गृह मंत्रालय के ‘राजीव गांधी ज्ञान विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार' सहित अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। आप विज्ञान संचार के क्षेत्र में कार्यरत संस्था ‘विज्ञान प्रसार’ से सम्बंद्ध हैं।
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