बच्चों के स्काईलैब अंकल प्रोफेसर यशपाल का अंतिम साक्षात्कार

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Professor Yashpal Interview in Hindi.

भारत के मशहूर वैज्ञानिक और शिक्षाविद प्रोफेसर यश पाल का 90 वर्ष की अवस्था में आज दिनांक 25 जुलाई 2017 को सुबह नोएडा के एक अस्पताल में निधन हो गया। वे काफी समय से बीमार चल रहे थे। युवा विज्ञान संचारक मनीष मोहन गोरे ने उनकी वैचारिकी से से परिचित होने के नज़रिए से कुछ समय पहले बातचीत की थी, जो हाल ही में 'इलेक्ट्रानिकी आपके लिए' में प्रकाश‍ित हुई थी। एक अनुमान के अनुसार यह प्रोफेसर यश पाल का अंतिम साक्षात्कार था। प्रस्तुत है उस महत्वपूर्ण बातचीत के प्रमुख अंश:  

वैज्ञानिक दृष्टिकोण सोचने-सीखने का एक तर्कसंगत तरीका है, बच्चों में इसका विकास किया जाना चाहिए : यश पाल
मनीष: विज्ञान लोकप्रियकरण की आप किस प्रकार व्याख्या करते हैं?

यश पाल: मैं विज्ञान लोकप्रियकरण शब्द के बजाय वैज्ञानिक समझ को अधिक उपयुक्त मानता हूँ। तथ्यों और कोरे ज्ञान को केवल जान भर लेना विद्यार्थी की समझ के लिए पर्याप्त नहीं होता। जानने और समझने में बड़ा व्यापक अंतर है और जो शिक्षक और संचारक इस अंतर को समझ ले, वहां से नई शुरुआत कर सकता है और समाज में परिवर्तन ला सकता है।

मनीष: आपका इशारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण की ओर है। शिक्षा व्यवस्था में इस दृष्टिकोण के समावेश को लेकर कृपया आपका मत साझा करें।

यश पाल: इतना हम सभी जानते हैं कि बच्चों के सवाल अनोखे होते हैं और हर बच्चा पैदायशी जिज्ञासु होता है। हमें उनके सवालों के जवाब देने की कोशिश नहीं छोड़नी चाहिए। अगर अभिभावक या शिक्षक उनके जवाब दे पाने में स्वयं को असमर्थ पाते हैं तो उन्हें उचित स्रोत से सही जवाब ढूंढना चाहिए और जवाब ढूंढना भी वास्तव में एक वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। वैज्ञानिक दृष्टिकोण दरअसल सोचने-सीखने का एक तर्कसंगत तरीका होता है। मनुष्य सोचता है इसलिए वह पृथ्वी के अन्य जंतुओं से अलग है और यह उसकी बहुत बड़ी ताकत है। दूसरी ओर यह सोचना कि यह ठीक है और वह नहीं, ये भी वैज्ञानिक दृष्टिकोण है। 

हम परंपरागत शिक्षा व्यवस्था में एकतरफा शिक्षण का सहारा लेते हैं जिसमें बच्चों के सोचने और स्वयं करके सीखने की प्रवृत्ति का विकास रोक लिया जाता है। शिक्षा ऐसी होनी चाहिए जिसमें बच्चों को सोचने और सीखने की आजादी हो। पाठ्यक्रम का बोझ इतना होता है कि बच्चे चाहकर भी लम्बे-चैड़े पाठ्यक्रम को नियत समय में समझ नहीं पाते। इसके अलावा अलग-अलग प्रतिभा
से संपन्न बच्चों को एक जैसे पाठ्यक्रम तथा विषय पढने को विवश किया जाना भी अतार्किक बात है।

मनीष: बच्चों की जिज्ञासा और उनके सीखने की प्रक्रिया में विज्ञान संचार की भूमिका को आप किस तरह देखते हैं?

यश पाल: बच्चे जब अपने आस-पास की चीजों को समझने लगते हैं तो वे सहज और अनोखे सवाल पूछने लग जाते हैं। शिक्षक का यह दायित्व होता है, यह सुनिश्चित करना कि बच्चों की यह नैसर्गिक प्रवृत्ति नष्ट न होने पाए और सीखने-समझने की उनकी प्रक्रिया अबाध चलती रहे। विज्ञान संचारक श्रव्य-दृश्य कार्यक्रम, हैंड्स आन प्रयोगों, लेखन और अन्य गतिविधि आधारित विधाओं के माध्यम से बच्चों के सीखने को गति और उचित दिशा दे सकते हैं।
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किसी सिद्धांत को स्वयं समझना सबसे महत्वपूर्ण होता है और मैं इसे समझने का आनंद (Joy of understanding) नाम देता हूं। इस आधार पर मैं कोचिंग क्लास की आलोचना करता हूँ क्योंकि वहां बच्चों के समझने पर नहीं, उन्हें सूचनाओं के भण्डार रटने पर जोर दिया जाता है। मेरी नजर में शिक्षा और सीखने का यह उचित तरीका नहीं है। मेधावी व्यक्तियों ने इस तरह की प्रक्रिया से गुजरकर ज्ञान-विज्ञान आदि जैसे विभिन्न क्षेत्रों में दुनिया में महान योगदान नहीं दिए हैं। अगर बीसवीं शताब्दी के तीन महान वैज्ञानिकों एडीसन, आइंस्टाइन और रामानुजन के उदाहरण लें तो हम पायेंगे कि इन्होंने अपने आकादमिक जीवन में 99.9 प्रतिशत अंक हासिल नहीं किये मगर विज्ञान के क्षेत्र में इनके योगदान सौ प्रतिशत से भी कहीं ज्यादा थे। ये कैसे हुआ? इन वैज्ञानिकों ने प्रकृति के गूढ़ रहस्यों को स्वयं समझ और अध्ययन-चिंतन-प्रयोग-परीक्षण से मिले नतीजों को कसौटी पर कसके अपने सिद्धांत दुनिया के सामने रखे।

मनीष: आपका झुकाव कास्मिक किरणों और कण भौतिकी में अनुसंधान से विज्ञान संचार की तरफ कैसे हो गया?

यश पाल: हमारे आस-पास हर तरफ विज्ञान की घटनाएं हर समय घटित हो रही हैं। इसे आम जन को एकदम सटीक न सही, सटीक के बहुत नजदीक की जानकारी हलके-फुल्के ढंग से देने में उन्हें आनंद आने लगा। इस तरह विज्ञान समझने के आरम्भिक प्रयास मैंने सबसे पहले स्पेश एप्लीकेशंस सेंटर, अहमदाबाद में किये और वहां लोग मुझे ‘स्काईलैब अंकल’ कहकर पुकारने लगे। विज्ञान को लेकर मेरी कही बात लोगों के समझ आ रही थी, यह देखकर मुझे आनन्द आता था और इस तरह मेरा रुझान विज्ञान संचार की तरफ हो गया।

मनीष: आप विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) के सचिव रहे जिसके अधीन एन सी एस टी सी और विज्ञान प्रसार की स्थापना विज्ञान संचार के उद्देश्य से की गई। पिछले 25-30 वर्षों के दौरान इन संस्थाओं ने देश में जो कार्य किये, उन्हें आप किस तरह देखते हैं?

यश पाल: इन्होंने जिन संसाधनों के साथ बड़ी सोच को लेकर दूरदर्शी कार्य किये, वे अत्यंत सराहनीय हैं। हां, आज के बदलते समय-समाज और इसकी चुनौतियों के मद्देनजर इन जैसी संस्थाओं को और भी अधिक सक्रिय भूमिका निभाने की जरुरत है क्योंकि वैज्ञानिक दृष्टिकोण की जरुरत कल से ज्यादा आज है।

मनीष: आपने वैज्ञानिक अनुसंधान, शिक्षा और विज्ञान संचार इन तीन क्षेत्रों में काम किये हैं। इन तीनों को जोड़कर भारत को आगे कैसे लेकर बढ़ सकते हैं?

यश पाल: अलबर्ट आइंस्टाइन ने ‘सिद्धांतों के तरन्नुम या संगीतात्मकता (Musicality of theories) की बात कही थी और इसके माध्यम से वह विज्ञान में उच्च स्तर के सौंदर्य की तरफ इशारा करना चाहते थे। वास्तव में विज्ञान, शिक्षा और समाज के बीच एक सकारात्मक तालमेल बनाने के बाद किसी भी देश में सच्चे अर्थों में प्रगति लाई जा सकती है।

मनीष: भावी वैज्ञानिकों और विज्ञान संचारकों को आप क्या सन्देश देना चाहेंगे?

यश पाल: देश के सभी कर्णधारों को मेरा विनम्र सुझाव है कि वे शिक्षा को किताब के पन्नों में छपी स्याही की तरह नहीं बल्कि उसे दुनिया के महान लोगों और उनकी संस्कृतियों का मूल्यवान खजाना समझें। आप सभी अद्वितीय हो और आप सबको अलग-अलग क्षेत्रों में महान कार्य करने हैं। आपकी विशेषज्ञता के क्षेत्रों में, आपके सच्चे मन से किये गये योगदान से एक देश या समाज ही नहीं बल्कि समूची मानव जाति को लाभ मिलेगा, ऐसी सोच के साथ काम करें।

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लेखक परिचय: 
मनीष मोहन गोरे चर्चित विज्ञान लेखक/संचारक हैं। आप वर्ष 1995 से पत्र-पत्रिकाओं, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन आदि जनसंचार के विभिन्न माध्यमों द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पर्यावरण संरक्षण जागरूकता के लिए प्रयासरत हैं। आपकी विज्ञान संचार विषयक एक दर्जन से अध‍िक पुस्तकें प्रकाश‍ित हो चुकी हैं तथा इन पर अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। आप विज्ञान संचार के क्षेत्र में कार्यरत संस्था ‘विज्ञान प्रसार’ से सम्बद्ध हैं।
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