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भूस्खलन क्यों होते हैं?

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भूस्खलन (Landslides) पर केंद्रित एक शोधपरक आलेख।

01 जुलाई, 2015 को भारी बारिश के चलते पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में भूस्लखन से 30 से अधिक लोगों की मौत हो गयी। अक्सर भूस्लखन की घटनाएं पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक होती हैं, जिससे जान-मान का भारी नुकसान होता है। ये घटनाएं क्यों होती हैं और इनके नुकसान को कैसे कम किया जा सकता है, प्रस्तुत है इस विषय पर एक महत्वपूर्ण आलेख। 
भूस्खलन- भीषण प्राकृतिक आपदा

-नवनीत कुमार गुप्ता

पर्वतों पर घटित होने वाली अनेक दुर्घटनाएं विपरीत मौसम से ही सम्बंधित होती हैं। यह तो सत्य है कि पर्वतों का मौसम आकस्मिक रुप से बदलता रहता है जो कभी-कभी अत्यन्त प्रचण्ड हो सकता है। पर्वत अनेक प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित हो सकते हैं। पर्वतों के शिखर तथा ढालों पर ठंडी वायु का द्रवीकरण अथवा हिमपात एवं अत्यधिक आकस्मिक विपदा तबाही का कारण बन सकती है। पर्वतों के सीधे ढलान से चट्टानें, मिट्टी आदि नीचे गिरकर भयंकर नुकसान करते हैं। ऐसा कभी-कभी मानव के पर्वतीय अभियान, तीर्थयात्रा के दौरान एवं खेल-कूद के आयोजनों के कारण भी हो जाता है।

भूस्खलन - Landslides
पर्वतों पर अनेक लोग बिजली के गिरने से या चट्टानों के आकस्मिक रूप से नीचे गिरने से काल के ग्रास बन जाते हैं। प्रतिकूल मौसम, साधनों तथा अन्य व्यवस्थाओं का अभाव छोटी-से-छोटी दुर्घनाओं को विकराल कर देते हैं।

यदि तुरंत इलाज की व्यवस्था न हो पाए तो अनेक अवसरों पर छोटी-छोटी दुर्घटनाएं व मामूली बीमारी भी मृत्यु का कारण बन जाती है। यदि आवश्यक सावधानी न बरती जाए तो पर्वतों की अविश्वसनीय सीमा तक की विपरीत परिस्थितियां वहां के निवासियों के लिए ही नहीं अपितु सैलानियों और पर्वतारोही दलों के लिए भी घातक हो जाती हैं।
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भूस्खलन:
चट्टानों के गिरने को भूस्खलन कहते हैं। भूक्षरण अथवा मृदा अपरदन की प्रक्रिया के कारण पर्वतों का निरन्तर विघटन होता रहता है। चट्टानों की बनावट तथा एक बिन्दु विशेष पर मौसम के प्रभाव के अनुसार चट्टानें टूट कर नीचे की ओर गिरती हैं। नीचे गिरती चट्टानें अपने साथ वनस्पतियां, वृक्ष तथा मिट्टी को भी नीचे गिराती हैं। कभी तो हाथ अथवा पैर के दबाव से ही भगुंर किस्म की चट्टानें टूट जाती हैं।

1 जुलाई, 2015 को भारी बारिश के चलते पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग जिले में भूस्लखन से 30 से अधिक लोगों की मौत हो गयी। अक्सर भूस्लखन की घटनाएं पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक होती है। पिछले वर्ष 2014 में नासिक के पास भी भूस्खलन से भारी तबाही हुई थी।

अत्यधिक या हिमधाव (एवेलांश):
प्रतिवर्ष अनेक पर्वतारोही हिमस्खलन के कारण काल का ग्रास बन जाते हैं। जब बर्फ या हिम की विशाल चट्टानें खिसक कर ढलान से नीचे गिरती हैं तो बहुत क्षति करती हैं। इन्हें शिलापट्ट हिमस्खलन यानी स्लेब एवेलांश (slab avalanche) कहते हैं। कभी-कभी तो विशाल स्लेब गिर कर पर्यटकों को दबा देती हैं। जमी हुई गिरती बर्फ से भी गिरती चट्टानों की तरह बचना चाहिए। सीधी चट्टानों पर बर्फ जम कर कठोर और बड़े आकार की हो जाती है यह ठंडे और तूफानी दिनों में निरंतर गिरती रहती है। 

लटकते हुए ग्लेशियरों से भी सावधान रहना चाहिए, क्योंकि उनकी चोंच या चोटी कुछ-कुछ अंतराल पर गिरती रहती हैं। इसकी पहचान नीचे पड़े बर्फ के टुकड़ों के द्वारा की जा सकती है। इन रास्तों से बचकर रहना श्रेयस्कर होता है। हिम नदी की दरारें बनना सामान्य सी बात है। जमी हुई हिम नदी (Glacier) के निचले भागों में ऐसी दरारें बन जाती हैं। अधिकतर यह स्पष्ट दिखाई देती हैं लेकिन यदि इन दरारों पर हिमपात हो जाए तो दरारें दिखाई नहीं देतीं और इसलिए घातक भी हो सकती हैं।

भूस्खलन की घटनाएं अक्सर भारी बारिश के कारण होती है। पर्वतों पर बादल फटने की घटनाएं अचानक होती हैं। ऐसी घटनाओं में अनेक लोग हताहत हो सकते हैं और जान-माल को नुकसान हो सकता है। यहां कुछ ऐसी ही विध्वसंक घटनाओं की सूची दी जा रही हैः

* 28 सितंबर, 1908 में मुसी नदी के आसपास के क्षेत्रों में बादल फटने से करीबन 15,000 हजार लोगों की मौत हो गई थी। इस विपदा से करीबन 80,000 घर नष्ट हो गए थे।

* जुलाई, 1970 में बादल फटने के कारण उत्तराखंड में अलकनंदा के जल स्तर में 15 मीटर की वृद्धि देखी गयी थी। हनुमानचट्टी के समीप के गांवों पर इसका विध्वंसक प्रभाव देखा गया था।

* 15 अगस्त, 1997 में हिमाचल के शिमला जिले में बादल फटने की घटना से करीबन 1500 लोग मौत के मुंह में समा गए थे।

* 17 अगस्त, 1998 को उत्तराखंड के कुमांयू क्षेत्र के माल्पा गांव में बादल फटने से करीबन 250 लोग असमय काल के ग्रास बन गए थे। इनमें से 60 कैलाश मानसरोवर के यात्री भी थे।

* 16 जुलाई, 2003 हिमाचल प्रदेश के कुल्लू क्षेत्र के शिलागढ़ क्षेत्र में बादल फटने से 40 लोगों की मौत हो गयी थी।

* 6 जुलाई, 2004 को उत्तराखंड के चमोली जिले में बद्रीनाथ क्षेत्र के समीप बादल फटने से भुस्खलन होने से करीबन 17 लोगों की मौत हुई थी और 28 लोग घायल हो गए थे।

* 26 जुलाई, 2005 को मुम्बई में बादल फटने से 37 इंच बारिश हुई थी। इस घटना से इस महानगर में जीवन कई घंटों तक थम गया था और करीबन 1000 लोगों की मौत हो गयी थी।

* 14 अगस्त, 2007 को हिमाचल प्रदेश के भावी गांव में बादल फटने से 52 लोगों की मौत हो गयी थी।

* 7 अगस्त, 2009 को उत्तराखंड के पिथोरागढ़ जिले के मंसुरी के पास नाची क्षेत्र में बादल फटने से 38 लोगों की मौत हो गयी थी।

* 6 अगस्त, 2010 में लेह में शृंखलाबद्ध बादल फटने की घटना से करीबन 1000 लोगों की मौत हो गयी थी।

* 15 सितम्बर, 2010 को उत्तराखंड के अल्मोड़ा के पास बेल्टा में बादल फटने से दो गांव पूरी तरह से खत्म हो गए थे।

* 29 सितम्बर, 2010 को महाराष्ट्र के पुणे के पास राष्ट्रीय रक्षा अकेदमी में बादल फटने से अनेक वाहन एवं इमारतें नष्ट हो गयी थी।

* 4 अक्टूबर, 2010 को महाराष्ट्र के पुणे के पाषाण क्षेत्र में दोपहर 2.30 बजे घटित बादल फटने की घटना का विश्व में पहली बार पुर्वानुमान लगा लिया गया था। इस पुर्वानुमान से पुणे में हजारों लोगों का जीवन सुरक्षित रह गया था।

* 9 जून 2011 को जम्मू के पास बादल फटने से चार लोगों की मौत होने के साथ ही अनेक व्यक्ति घायल हो गए थे।

* 20 जुलाई, 2011 को हिमाचल प्रदेश के मनाली शहर से 18 किलोमीटर दूर बादल फटने से 2 लोगों की मौत हो गयी थी।

* 15 सितम्बर, 2011 को दिल्ली में पालम के पास इंदिरा गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाईअड्डे में बादल फटने से टर्निमल-3 पानी से लबालब भर गया था।

* 14 सितम्बर, 2012 को उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग जिले में बादल फटने के दौरान 39 लोगों की मौत हो गयी थी।

* 15 जून, 2013 को उत्तराखंड के केदारनाथ और रामबाढ़ा क्षेत्र में बादल फटने से करीबन 5000 लोगों की मौत हो गयी और हजारों घर तबाह हो गए। इस आपदा के दौरान करीबन एक लाख लोग कई दिनों तक पहाड़ों में फंसे रहे। इन लोगों को निकालने के लिए करीबन 45 हेलीकॉप्टरों का उपयोग किया गया। राहत कार्यों में बचाव दल की काफी अहम भूमिका रही।
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* इसके अलावा बादल फटने के दौरान कुछ ही समय में भारी मात्रा में बारिश होती है। ऐसी ही कुछ घटनाओं का विवरण निम्नांकित हैः

* 7 जुलाई, 1947 को रोमानिया में 20 मिनट में 8.1 इंच बारिश रिकार्ड की गई थी।

* जमैका के पोर्ट बैलस् में 29 नवम्बर, 1911 को बादल फटने के दौरान 5.5 मिनट में ही 2.43 इंच बारिश दर्ज की गई।

* 5 अगस्त, 2010 को भारत के लेह में एक घंटे में करीबन 9.84 इंच बारिश दर्ज की गई।

* 29 सितम्बर, 2010 को भारत के पुणे शहर में 1 घंटे में करीबन 7.15 इंच बारिश दर्ज की गई।

* 4 अक्टूबर, 2010 को भारत के पुणे शहर में पाषाण क्षेत्र में 1.5 घंटे में करीबन 7.15 इंच बारिश दर्ज की गई।

* जून, 2015 में मुम्बई एवं गुजरात के सोमनाथ क्षेत्र में भारी बारिश से जनजीवन प्रभावित हुआ।

पर्वतों का नाजुक, भंगुर व कमजोर मिजाज:
पर्वतों की विभिन्न जन-जातियां, पशु-पक्षी, वनस्पति आदि वहां की विचित्र तथा विकट परिस्थितियों जैसे कि चट्टानों का गिरना, भूस्खलन, अत्यधिक आकाशीय विद्युत् की तीव्रता, जलवायु की चरम स्थितियां, अत्यधिक तापमान व नमी आदि से अपने अस्तित्व के लिए निरंतर समझौता किए हुए हैं।

असल में पर्वतों की पारिस्थितिकी बेहद नाजुक व भंगुर होता है। किसी भी तंत्र अथवा संस्थान का विकास उसकी इकाईयों द्वारा प्रतिक्रिया व उत्पादन शक्ति पर निर्भर करता है। इस विषय में पर्वत कमजोर होते हैं। उनमें स्थित जीवों में तीव्र प्रतिक्रिया का अभाव तो होता ही है साथ ही वहां उत्पादन क्षमता भी बहुत सीमित होती है। इसका प्रभाव पर्वतों को अति भंगुर व नाजुक बनाता है। इसके अतिरिक्त वहां की विभिन्न ऊंचाईयां व भांति-भांति की जलवायु भी जीवों की प्रतिक्रिया व विकास सीमित ही रखती है। पर्वतों को जलवायु परिवर्तन की प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली भी कहते हैं, क्योंकि इनमें ऊंचाई के कारण विभिन्न जलवायु की पट्टी होती है।

पर्वतीय परिस्थितियों के अनुकूल प्रजातियों ने कई शताब्दियों तक अपने को सफलतापूर्वक ढाला है। परन्तु आज हम अभूतपूर्व रुप से हो रहे तीव्र बदलाव को देख रहे हैं। पर्वतीय पारिस्थितिकी तंत्र पर तेजी से मंडराते जोखिम इसी तीव्रता तथा अभूतपूर्व बदलावों का नतीजा है, जिसकी गति से पर्वतीय पारिस्थितिकी अपने को ढालने में असमर्थ हैं। यह तीव्र बदलाव प्रत्यक्ष रुप से मानवीय गतिविधियों का ही परिणाम है।

प्राकृतिक आपदाएं और भावी तैयारियां:
असल में प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए संचार व्यवस्था को पुख्ता करना, इसके लिए उपग्रहों को प्रक्षेपित करना एवं मौसम की सटीक जानकारी होना आवश्यक है। आज ऐसे उपग्रहों की आवश्यकता है जो पल-पल के मौसम पर निगरानी रखे और किसी भावी संकट से हमें सावधान कर सकें। मौसम के पूर्वानुमान और मजबूत संचार व्यवस्था हमें प्राकृतिक आपदा से सामना करने की हिम्मत देगी। इसके साथ हमें प्रकृति के साथ मधुर संबंध स्थापित करने होंगे उसे उपभोग की वस्तु न मानकर उसके जीवनमय रूप को संवारना होगा।
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लेखक परिचय: 
नवनीत कुमार गुप्ता पिछले दस वर्षों से पत्र-पत्रिकाओं, आकाशवाणी एवं दूरदर्शन आदि जनसंचार के विभिन्न माध्यमों द्वारा वैज्ञानिक दृष्टिकोण और पर्यावरण संरक्षण जागरूकता के लिए प्रयासरत हैं। आपकी विज्ञान संचार विषयक लगभग एक दर्जन पुस्तकें प्रकाश‍ित हो चुकी हैं तथा इन पर गृह मंत्रालय के ‘राजीव गांधी ज्ञान विज्ञान मौलिक पुस्तक लेखन पुरस्कार' सहित अनेक पुरस्कार एवं सम्मान प्राप्त हो चुके हैं। आप विज्ञान संचार के क्षेत्र में कार्यरत संस्था ‘विज्ञान प्रसार’ से सम्बंद्ध हैं। आपसे निम्न मेल आईडी पर संपर्क किया जा सकता है:

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Scientific World: भूस्खलन क्यों होते हैं?
भूस्खलन क्यों होते हैं?
भूस्खलन (Landslides) पर केंद्रित एक शोधपरक आलेख।
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