सलखन जीवाश्म पार्क: सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए पुकारती एक अमूल्य भूवैज्ञानिक धरोहर

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पूर्वी उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले में स्थित सलखन जीवाश्म पार्क (Salkhan Fossil Park) के अंतर्राष्ट्रीय महत्व एवं उसकी उपेक्षा के कारण पार्क की होने वाली हानि का अवलोकन करती महत्वपूर्ण रिपोर्ट।

अमेरिका के यलोस्टोन पार्क के जीवाश्म अभी निर्माण की प्रक्रिया में हैं फिर भी यलोस्टोन पार्क को अमेरिकी सरकार ने पर्यटन के नजरिये से इस कदर विकसित कर लिया है कि इससे सलाना करोड़ों डालर की कमाई की जा रही है, जबकि सलखन का जीवाश्म पार्क तो पूरी तरह परिपक्व है और यकीनन 150 करोड़ वर्ष से ज्यादा प्राचीन हैं। -एच. जे. हाफमैन (प्रख्यात भूवैज्ञानिक, कनाडा)

सलखन जीवाश्म पार्क
सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए पुकारती एक अमूल्य भूवैज्ञानिक धरोहर

-डॉ. अरविन्द सिंह

सलखन जीवाश्म पार्क (Salkhan Fossil Park) पूर्वी उत्तर प्रदेश के सोनभद्र जिले के रोबर्ट्सगंज कस्बे से लगभग 17 किलोमीटर दूर वाराणसी-रेनूकुट राजमार्ग (एस एच-5) पर सलखन नामक गाँव में स्थित है। इसे सोनभद्र जीवाश्म पार्क (Sonbhadra Fossils Park) के नाम से भी जाना जाता है। सलखन जीवाश्म पार्क एक अत्यन्त ही महत्वपूर्ण स्थान है जहां जाकर के पृथ्वी के भूवैज्ञानिक एवं जैविक इतिहास के विषय में जानकारी प्राप्त की जा सकती है। यह जीवाश्म पार्क पृथ्वी पर जीवन के विकास के आरम्भिक अवस्था का प्रमाण प्रस्तुत करता है। यहाँ पाये जाने वाले जीवाश्म विश्व के प्राचीनतम जीवाश्मों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इसलिए सलखन जीवाश्म पार्क भारत के लिए ही नहीं अपितु दुनिया के लिए भी एक अमूल्य भूवैज्ञानिक धरोहर है।

salkhan fossil park
सलखन जीवाश्म पार्क ने उत्तर प्रदेश के आदिवासी बहुल सोनभद्र जिला के साथ-साथ उत्तर प्रदेश राज्य को अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलायी है। भूवैज्ञानिकों के अनुसार सलखन के जीवाश्म लगभग 150 करोड़ वर्ष पुराने व परिपक्व हैं। भूवैज्ञानिक समय माप के अनुसार ये जीवाश्म प्रोटीरोजोइक काल (Proterozoic period) से सम्बद्ध हैं। अमेरीकी वैज्ञानिकों के अनुसार सलखन जीवाश्म पार्क अमेरिका के यलोस्टोन जीवाश्म पार्क (Yellowstone fossil park) से काफी प्राचीन एवं क्षेत्रफल में तीन गुना ज्यादा बड़ा है। अतः भारत के इस जीवाश्म पार्क ने संयुक्त राज्य अमेरीका के यलोस्टोन जीवाश्म पार्क को प्रत्येक क्षेत्र में बौना साबित कर दिया है। यलोस्टोन जीवाश्म पार्क लगभग 110 करोड़ वर्ष पुराना है।

सलखन जीवाश्म पार्क कैमूर वन्यजीव क्षेत्र (Kaimoor Wildlife Sanctuary) में लगभग 25 हेक्टेयर क्षेत्रफल में फैला है, जो राज्य वन विभाग के अधिकार क्षेत्र में आता है। जीवाश्म पार्क का परिधि क्षेत्र 3.5 किलोमीटर है। यहाँ के वन उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन (Tropical dry deciduous forest) की श्रेणी में आते हैं। इन वनों में कुर्ची (होलेरीना प्यूबिसेन्स), सलई (बासबेलिया सिरैटा), पलास (ब्यूटिया मोनोस्परमा), तेंदू (डायोस्पिरास मेलैनोजाइलान), झिंगन (लैनिया कोरोमोण्डेलिका), सिद्धा (लैजरस्ट्रोमिया पारभिफ्लोरा) खैर (अकेसिया कटेचू), धावड़ा (एनोजिस्स लैटिफोलिया), जंगली बांस (डेण्ड्रोकेलेमस स्ट्रिक्टस) आंवला (फाइलैन्थस एम्बलिका), धवई (वुडफोर्डिया फ्रुटिकोसा) तथा हरसिंगार (निक्टेन्थस आरबोरट्रिस्टिस) जैसी काष्ठीय वनस्पतियों की प्रजातियों का बाहुल्य है। पार्क में जीवाश्म आमतौर से चट्टानों पर छल्ले के आकार में प्रकट होते दिखायी देते हैं।

यहाँ के जीवाश्मों के बारे में भूवैज्ञानिकों को पूर्व से ही पता था, लेकिन स्थानीय निवासियों एवं प्रशासनिक अधिकारियों को इसकी कोई जानकारी नही थी। पहली बार 23 अगस्त 2001 को हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान में छपे एक लेख के माध्यम से इस जीवाश्म पार्क के विषय में स्थानीय लोगों एवं अधिकारियों को पता चला था। अखबार में छपे इस लेख को संज्ञान में लेते हुए सोनभद्र जिले के तत्कालीन जिलाधिकारी भगवान शंकर ने इस जीवाश्म पार्क का 8 अगस्त 2002 को विधिवत उद्घाटन किया। प्रारम्भिक कवायदों के क्रम में पार्क के रास्ते बने, विश्राम के लिए पक्के हट, सुरक्षा की दृष्टि से कटीले तारों की घेरेबंदी आदि की गयी।

उसी वर्ष 5 दिसम्बर को भूविज्ञान सम्बन्धी एक अन्तर्राष्ट्रीय कार्यशाला का आयोजन किया गया। लखनऊ विश्वविद्यालय के प्रोफेसर एस. कुमार के संयोजकत्व में आयोजित इस कार्यशाला में देश एवं विदेश से आये कुल 42 भूवैज्ञानिकों ने हिस्सा लिया। इनमें कनाडा के प्रख्यात भूवैज्ञानिक प्रोफेसर एच. जे. हाफमैन, (HJ Hoffman) अमेरिका से प्रोफेसर ब्रूस रूनीगर (Bruce Norman Runnegar), डॉक्टर जे. आर. लायन (Dr. J R Lion), डॉक्टर लिण्डा (Dr. Linda) व एस. एम. पोर्टर (SM Portar) मुख्य थे। इस कार्यशाला में वैज्ञानिकों ने यह सिद्ध कर दिया कि यहाँ चट्टानों पर छल्लेदार आकृतियाँ जीवाश्म ही हैं।

कनाडा के प्रख्यात भूवैज्ञानिक एच. जे. हाफमैन सलखन जीवाश्म पार्क को देखकर अत्यन्त ही प्रभावित हुए और खुशी से नाचने लगे थे। उनके अनुसार सलखन के जीवाश्म इस दुनिया की सबसे सुन्दर व अनमोल वस्तु है और पूरे विश्व में इससे खूबसूरत एवं स्पष्ट जीवाश्म कहीं और नही हैं। हाफमैन समेत अन्य भूवैज्ञानिकों ने सलखन के जीवाश्मों को देखकर इसके 150 करोड़ वर्ष पुराने और परिपक्व होने की बात कही।

उस वक्त कार्यशाला में बोलते हुए एच. जे. हाफमैन ने कहा था कि ‘‘अमेरिका के यलोस्टोन पार्क के जीवाश्म अभी निर्माण की प्रक्रिया में हैं फिर भी यलोस्टोन पार्क को अमेरिकी सरकार ने पर्यटन के नजरिये से इस कदर विकसित कर लिया है कि इससे सलाना करोड़ों डालर की कमाई की जा रही है, जबकि सलखन का जीवाश्म पार्क तो पूरी तरह परिपक्व है और यकीनन 150 करोड़ वर्ष से ज्यादा प्राचीन है’’।

यद्यपि कि सलखन जीवाश्म पार्क अद्वितीय जीवाश्मों से भरा पड़ा है इसके बावजूद भूवैज्ञानिक दृष्टिकोण से इस अमूल्य जीवाश्म पार्क की सुरक्षा, संरक्षण एवं विकास हेतु कोई विशेष ध्यान नहीं दिया गया है। उत्तर प्रदेश के पर्यटन मानचित्र पर स्थापित होने के बावजूद भी यहाँ पर्यटकों का आना लगभग नहीं के बराबर है। जबकि अमेरिका के येलोस्टोन जीवाश्म पार्क से लगभग 300 करोड़ रुपये सालाना राजस्व की प्राप्ति होती है। यलोस्टोन पार्क में प्रत्येक वर्ष लगभग 40 लाख सैलानी भ्रमण हेतु आते हैं जबकि इसके विपरीत सलखन जीवाश्म पार्क में भ्रमण हेतु कुछ शोधकर्ता एवं पत्रकारिता जगत से सम्बद्ध लोग ही आते हैं।

सलखन जीवाश्म पार्क में एलगल स्ट्रोमैटोलाइट्स (Algal stromatolites) प्रकार के जीवाश्म पाये जाते हैं जो कि पृथ्वी पर पाये जाने वाले प्राचीनतम जीवाश्मों का प्रतिनिधित्व करते हैं। इस प्रकार के जीवाश्मों का निर्माण आमतौर से नील हरित शैवाल (Blue green aglae) समूह के सूक्ष्मजीवों द्वारा अवसाद कणों को आपस में जोड़ने के कारण होता है। नील हरित शैवालों की कोशिकाओं के बाहर म्यूसिलेज की चिपचिपी परत होती है जो अवसाद कणों को आपस में बांधती है जिससे स्ट्रोमैटोलाइट जीवाश्म का निर्माण होता है। नील हरित शैवाल पृथ्वी पर जीवन के विकास के प्रारम्भिक रूप का प्रतिनिधित्व करते हैं।

सलखन जीवाश्म पार्क अपने महत्व के बावजूद आज राज्य सरकार एवं स्थानीय प्रशासन की घोर उपेक्षा का शिकार है। स्थानीय निवासी भी इस पार्क की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार हैं क्योंकि जीवाश्मों को लेकर स्थानीय निवासियों में जागरूकता का अभाव है। आज भी यहाँ पर जीवाश्म असुरक्षित हैं। राज्य सरकार एवं सम्बन्धित अधिकारी इस पार्क को सुरक्षा एवं संरक्षण प्रदान करने में पूर्णतः असफल रहे हैं।

जीवाश्म पार्क के उद्घाटन के बाद सुरक्षा हेतु चारों तरफ लगाये गए कटीले तारों को कबाड़ चोरों द्वारा काटकर चुरा लिया गया है जिसके कारण जीवाश्म पार्क मवेशियों के लिए चारागाह बन गया है। स्थानीय निवासियों ने पार्क से होकर विभिन्न गाँवों की ओर जाने के लिए अस्थायी मार्ग बना लिया है जिससे जीवाश्म नष्ट हो रहे हैं और लोग जीवाश्मों के टुकड़ों को घर ले जा रहे हैं। पुरानी एवं बहुमूल्य वस्तुओं के तस्कर बे रोकटोक पार्क से जीवाश्म को चोरी कर उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय बाजार में बेच रहे हैं।

यहाँ जीवाश्मों को हथौड़े से नष्ट किया जा रहा है। क्षेत्र में अवैध खनन इस जीवाश्म पार्क के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। बीते वर्षों में राज्य वन विभाग ने सलखन जीवाश्म पार्क को विकसित करने के उद्देश्य से एक सड़क का निर्माण करवाया था, जो कि पार्क को मुख्य सड़क से जोड़ती है, लेकिन इससे भी पार्क के विकास एवं संरक्षण में कोई विशेष सहायता नहीं मिली।

सलखन जीवाश्म पार्क की सुरक्षा, संरक्षण एवं विकास की सबसे बड़ी बाधा यह है कि यह अमूल्य पार्क उत्तर प्रदेश के एक अत्यन्त ही पिछड़े एवं सुदूर आदिवासी बहुल इलाके में स्थित है। यह क्षेत्र पिछले कई दशकों से नक्सली हिंसा का प्रमुख केन्द्र बना हुआ है। सोनभद्र जिले की सीमा भारत के पांच अन्य पिछड़े एवं नक्सल प्रभावित राज्यों बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ एवं उड़ीसा की सीमाओं को छूती हैं, जिससे यहां नक्सलियों का बोलबाला है।

अमूल्य सलखन जीवाश्म पार्क की दुर्दशा एक गम्भीर चिंता का विषय है जिस पर तत्काल ध्यान देने और सुरक्षा एवं संरक्षण हेतु ठोस कारवाई की आवश्यकता है। पार्क के उचित संरक्षण हेतु इसे ‘‘राष्ट्रीय भूवैज्ञानिक धरोहर’’ घोषित करना समय की सबसे बड़ी मांग है। इसके अतिरिक्त इस पार्क को अमेरिका के यलोस्टोन पार्क की तर्ज पर एक आदर्श पर्यटक स्थल के रूप में विकसित करने की आवश्यकता है। सलखन जीवाश्म पार्क को पर्यटन स्थल के रूप में विकसित कर न सिर्फ इससे भारी राजस्व की प्राप्ति की जा सकती है, अपितु स्थानीय बेरोजगार लोगों के लिए रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराये जा सकते हैं।

वास्तव में देखा जाय तो सलखन जीवाश्म पार्क सोनभद्र जिले के लिए एक वरदान है, जिसको योजनाबद्ध तरीके से विकसित कर इस जिले के पिछड़ेपन को दूर किया जा सकता है जो अन्ततः नक्सलवाद जैसी समस्या के उन्मूलन में भी सहायक साबित हो सकता है।
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लेखक परिचय:

डॉ. अरविंद सिंह वनस्पति विज्ञान विषय से एम.एस-सी. और पी-एच.डी. हैं। आपकी विशेषज्ञता का क्षेत्र पारिस्थितिक विज्ञान है। आप एक समर्पित शोधकर्ता हैं और राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की शोध पत्रिकाओं में अब तक आपके 4 दर्जन से अध‍िक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। खनन गतिविधियों से प्रभावित भूमि का पुनरूत्थान आपके शोध का प्रमुख विषय है। इसके अतिरिक्त आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मुख्य परिसर की वनस्पतियों पर भी अनुसंधान किया है। आपके अंग्रेज़ी में लिखे विज्ञान विषयक आलेख 'Science Log' पर पढ़े जा सकते हैं। आपसे निम्न ईमेल आईडी पर संपर्क किया जा सकता है-
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सलखन जीवाश्म पार्क: सुरक्षा एवं संरक्षण के लिए पुकारती एक अमूल्य भूवैज्ञानिक धरोहर
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