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विलुप्ति के कगार पर खड़ी सोहन चिड़िया

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राजस्थान के राज्य पक्षी गोडावण अथवा सोहन चिडि़या के संकट एवं उसके संरक्षण की संभावनाओं की शोधपरक पड़ताल।

जब भारत के ‘राष्ट्रीय पक्षी’ के नाम पर विचार किया जा रहा था, तब सोहन चिड़िया का नाम भी प्रस्तावित किया गया था जिसका समर्थन प्रख्यात भारतीय पक्षी विज्ञानी सालिम अली ने किया था। लेकिन ‘बस्टर्ड’ शब्द के गलत उच्चारण की आशंका के कारण ‘भारतीय मोर’ को राष्ट्रीय पक्षी चुना गया था। आज वही सोहन चिडिया विलुप्ति की कगार पर खड़ी है। पढ़ें क्यों और कैसे-

विलुप्ति के कगार पर खड़ी सोहन चिड़िया

-डॉ. अरविन्द सिंह
सोहन चिड़िया भारत और पाकिस्तान में भूमि पर पाया जाने वाला एक विशाल पक्षी है। यह विश्व में पाए जाने वाली सबसे बड़े उड़ने वाले पक्षी प्रजातियों में से एक है। सोहन चिड़िया को भारतीय चरागाहों की पताका प्रजाति (Flagship species) के रूप में जाना जाता है। इस पक्षी का वैज्ञानिक नाम आर्डीओटिस नाइग्रीसेप्स (Ardeotis nigriceps) है, जबकि मल्धोक, घोराड येरभूत, गोडावण, तुकदार, सोन चिरैया आदि इसके प्रचलित स्थानीय नाम हैं। सोहन चिड़िया राजस्थान का राज्य पक्षी (Rajasthan state bird) जहां इसे गोडावण नाम से जाना जाता है।

Great indian bustardजब भारत के ‘राष्ट्रीय पक्षी’ के नाम पर विचार किया जा रहा था, तब सोहन चिड़िया का नाम भी प्रस्तावित किया गया था जिसका समर्थन प्रख्यात भारतीय पक्षी विज्ञानी सालिम अली ने किया था। लेकिन ‘बस्टर्ड’ शब्द के गलत उच्चारण की आशंका के कारण ‘भारतीय मोर’ को राष्ट्रीय पक्षी चुना गया था।

सोहन चिड़िया की जनसंख्या में अभूतपूर्व कमी के कारण अन्तर्राष्ट्रीय प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधन संरक्षण संघ (International Union for Conservation of Nature and Natural Resources) ने इसे संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची (Red List) में ‘गंभीर संकटग्रस्त’ (Critically Endangered) प्रजाति के तहत सूचीबद्ध किया गया है। गंभीर संकटग्रस्त वे प्रजातियां हैं, जो तत्काल भविष्य में जंगली अवस्था में विलुप्त होने के खतरे का सामना कर रही हैं।

वितरण क्षेत्र:
सोहन चिड़िया पहले भारत और पाकिस्तान के शुष्क (arid) एवं अर्ध-शुष्क (semi-arid) चरागाहों में व्यापक रूप से पाई जाती थी परन्तु, वर्तमान में इसकी संख्या में काफी अधिक कमी होने के कारण इसे दुर्लभ पक्षी माना जाता है। भारत में यह पक्षी पूर्व में पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश, उड़ीसा एवं तमिलनाडु राज्यों के चरागाहों की शान हुआ करता था लेकिन आज यह पक्षी कम जनसंख्या के साथ देश के राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक और संभवतः मध्य प्रदेश के चरागाहों तक ही सीमित होकर रह गया है।

सोहन चिड़िया की विशेषताएं:
सोहन चिड़िया शुतरमुर्ग के समान एक लंबी गर्दन और लंबी, नंगी टांगों वाला एक विशाल और धावक पक्षी (विशेष रूप से दौड़ने में माहिर) होता है। खड़ी सोहन चिड़िया की ऊंचाई लगभग एक मीटर होती है। हल्के रंग की गर्दन और सिर तथा माथे पर काले किरीट से इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। इसके शरीर का रंग भूरा होता है, जबकि पंखों पर काले, भूरे और स्लेटी रंग के निशान होते हैं। नर सोहन चिड़िया की लम्बाई लगभग 110-120 सेन्टीमीटर होती है और इसका भार 8-15 किलोग्राम तक होता है।

नर सोहन चिड़िया की तुलना में मादा की लम्बाई कम (92 सेन्टीमीटर) होती है और इसका वजन 2.5 से 6.75 किलोग्राम तक होता है। नर गहरे रेतीले-बादामी रंग का होता है और प्रजनन के मौसम में सीने पर एक काली पट्टी बन जाती है। सिर पर काले रंग का किरीट होता है, जिसे नर पक्षी फुला लेते हैं। मादाओं में सिर और गर्दन शुद्ध सफेद नहीं होती हैं और इनमें सीने पर पट्टी अल्पविकसित या टूटी हुई होती है, या फिर यह होती ही नहीं है। नर पक्षी की जीभ के बिल्कुल नीचे एक सुविकसित गले की थैली होती है, जो मादाओं को संगम हेतु आकर्षित करने के लिए गहरी मनमोहक गूंजती हुई ध्वनि उत्पन्न करने में सहायता प्रदान करती है। इस ध्वनि को 500 मीटर की दूरी तक सुना जा सकता है।

नर और मादा सोहन चिड़ियां आमतौर पर अपने-अपने लिंग के झुंडों में विचरण करते हैं। इनके झुंड में 3 से 10 तक पक्षी होते हैं। यह पक्षी जमीन पर बसेरा करता है। एक झुंड के सभी पक्षी एक साथ मिलकर बसेरा करते हैं जबकि उनमें से कुछेक पक्षी किसी भी संभावित खतरे के लिए चौकन्ने रहते हैं। ये पक्षी रात में खुले में बसेरा करते हैं, जबकि दिन के दौरान ये घनी घास अथवा झाड़ियों की छाया में रहना पसंद करते हैं। इस पक्षी में देखने और सुनने की अत्यधिक क्षमता होती है और खतरे की स्थिति में यह छिपने में भी माहिर होता है।

सोहन चिड़िया मुख्य रूप से एक शांत पक्षी है, लेकिन जब इसे डराया जाए तो यह ‘हुक’ जैसी भौंकने की आवाज निकालता है। इसीलिए उत्तरी भारत के कुछ भागों में इसे ‘हुकना’ के नाम से भी जाना जाता है। कुछ भागों में इसके बादल के गरजने अथवा बाघ के गुर्राने से मिलते-जुलते स्वर के कारण इसे गगनभेर अथवा गुरायिन के नाम से भी पुकारा जाता है।

आवास एवं परिस्थितिकी:
सोहन चिड़िया कंटीली झाड़ियों तथा फसलों के बीच में उगे लंबी घास वाले शुष्क और अर्ध-शुष्क चरागाहों में निवास करते हैं। ये पक्षी सिंचित क्षेत्रों से दूर रहते हैं।

सोहन चिड़िया एक अवसरवादी सर्वाहारी पक्षी है, जो जिजिफस प्रजातियों (Ziziphus spp.) के सरस फल (बेरी), घास के बीजों, कीड़े-मकोड़ों (टिड्डे, टिड्डियां और भृंग), बिच्छू, चूहे और छिपकलियों को अपना भोजन बनाता है। जुताई वाले क्षेत्रों से ये पक्षी मूंगफली, ज्वार, बाजरा, दलहनी फलियां और गेहूं के दाने खाते हैं। इन पक्षियों के चूज़े मुख्य रूप से कीड़े-मकोड़े खाते हैं। अन्य मरुस्थलीय जीव-जंतुओं की तरह ये भी विकल्पी जल पीने वाले जीव हैं। यानी, उपलब्ध होने पर नियमित रूप से जल पीते हैं, लेकिन उपलब्ध नहीं होने पर लंबे समय तक बिना जल के भी गुजारा कर सकते हैं।

सोहन चिड़िया मार्च और सितम्बर के बीच प्रजनन करती हैं। उन दिनों नर पक्षी अपने नरम, सफेद पंखों को फुला कर मादा को आकर्षित करते हैं। नर पक्षियों में मादा के लिए लड़ाई होती है। वे एक-दूसरे के सामने अकड़ कर चलते हैं, टांगों पर उछल कर धकियाते हैं और छलांग लगाकर अपनी गर्दन के नीचे विरोधी के सिर को दबाते हैं। सोहन चिड़िया अपने असाधारण प्रणय प्रदर्शन (Courtship display) की मुद्रा के लिए प्रसिद्ध है।

नर अपनी सीमा में सर्वाधिक प्रमुख स्थान (प्रदर्शन स्थल) का चयन करता है और वहीं अपना अधिकतर समय व्यतीत करता है। प्रातःकाल और देर शाम वह प्रदर्शन स्थल पर खड़ा हो जाता है और मादाओं को आकर्षित करने के लिए प्रदर्शन (प्रणय-प्रदर्शन) आरम्भ कर देता है। नर अपने सिर को पीछे की ओर झुका कर और पूंछ को, जहां तक संभव हो, उठा कर मटक कर चलता है। इस दौरान उसके पंख झुके रहते हैं और गले की थैली फूल जाती है। थैली के फूलने पर वह गुब्बारे की तरह नजर आती है। नर पक्षी इसी स्थिति में कुछ मिनटों तक खड़ा रहता है और फिर गहरी आवाजें निकालता है।

यह प्रदर्शन लगभग 3-4 घंटे तक चलता है और इस दौरान वह सैकड़ों बार आवाज़ निकालता है। एक दिन में नर पक्षी 45 बार तक ऐसा प्रदर्शन कर सकता है। इस लम्बे अभ्यास का उद्देश्य मादाओं को संगम के लिए आकर्षित करना और अन्य नर पक्षियों को अपने क्षेत्र को छोड़ने का निवेदन करना है। मादाएं अपने मनचाहे नर की खोज में एक क्षेत्र से दूसरे क्षेत्र में विचरण करती हैं।

जब कोई मादा आकर्षित हो कर संगम के लिए तैयार हो जाती है, तब ये प्रदर्शनकारी नर पक्षी के पास उड़ते हुए जाती है। संगम के बाद मादा अंडे देने के लिए किसी एकांत स्थान का चुनाव करती है, आम तौर पर किसी झाड़ी के नीचे, जहां आसपास का दृश्य सुंदर हो। मादा खुले मैदानों में बनाए गए घोंसले में एक पीले जैतूनी-भूरे रंग का अंडा देती है और उसे चार हफ्तों तक सेती है। चूंकि नर कई मादाओं से संबंध स्थापित करते हैं, इसलिए वे अंडा सेने अथवा बच्चे की देखभाल में भाग नहीं लेते हैं। केवल मादाएं अंडे सेने के साथ-साथ नवजात की देखभाल भी करती हैं। सामान्यतया इनके बच्चे टिड्डे, भृंग और छोटी छिपकलियों को अपना भोजन बनाते हैं।

सोहन चिड़िया की घटती जनसंख्या के कारण:
आवास विनाश और शिकार इस पक्षी की घटती जनसंख्या के दो प्रमुख कारण हैं। इसके अतिरिक्त इस पक्षी के प्रजनन की धीमी प्रकृति भी इनकी कम होती जनसंख्या का एक कारण है।

विपरीत परिस्थितियों में भी जीवन जीने में माहिर होने के बावजूद सोहन चिड़िया की लगभग 90 प्रतिशत संख्या आवास विनाश और शिकार के चलते समाप्त हो चुकी है। अंग्रेज शासन के दौरान सोहन चिड़िया को खेल एवं भोजन के लिए सबसे पसंदीदा पक्षियों में माना जाता था परिणामस्वरूप इनका बड़े पैमाने पर शिकार किया जाता था। आज भी राजस्थान के थार मरूस्थल में इनका चोरी छुपे शिकार किया जाता है।

आंकड़े बताते हैं कि पिछले 47 वर्षों के दौरान इनकी संख्या में 82 प्रतिशत की दर से कमी आई है। भारत में वर्तमान में इनकी संख्या लगभग 200 आंकी जा रही है, जिसका अधिकतम घनत्व (लगभग 110 पक्षी) राजस्थान के जैसलमेर के पास स्थित मरुस्थल राष्ट्रीय पार्क में पाया गया है।

जिन चारागाहों में ये पक्षी रहते थे, वे अत्यधिक चराई, कृषि क्षेत्रफल विस्तार, शहरीकरण, विद्युत परियोजनाओं, खनन गतिविधियों तथा सड़कों के निर्माण के कारण नष्ट हो चुके हैं। जिसके परिणामस्वरूप इनकी जनसंख्या में तीव्र गिरावट आयी है। राजस्थान के अजमेर जिले का सोखलिया क्षेत्र सोहन चिड़िया की अच्छी संख्या के लिए प्रसिद्ध है, लेकिन इस क्षेत्र में खनन आरम्भ होने से इस पक्षी के आवास समाप्त होने की समस्या खड़ी हो गई है। इससे इस क्षेत्र में सोहन चिड़िया की संख्या में भारी कमी दर्ज की गई है। वर्ष 1990 में सोखलिया क्षेत्र में इन पक्षियों की संख्या 72 थी, जो सन् 2004 में घट कर 24 रह गई थी। परन्तु फरवरी 2012 में इस क्षेत्र में केवल 2 सोहन चिड़ियां देखी गई।

राजस्थान राज्य में इंदिरा गांधी नहर की स्थापना एवं विस्तार के परिणामस्वरूप कृषि योग्य भूमि में बढ़ोत्तरी होने से भी इस पक्षी को अपना आवास बदलना पड़ा। यही कारण है कि इस क्षेत्र से यह प्रजाति गायब हो गई हैं। इनके आवासों में विदेशी मूल की काष्ठीय वनस्पतियों जैसे-काबुली कीकर (Prosopis juliflora) एवं सफेदा प्रजातियों (Eucalyptus spp.) के बृहद पैमाने पर रोपण के कारण भी सोहन चिड़िया के जीवन पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। उदाहरण के लिए कर्नाटक के रानीबेनूर कालाहिरण अभ्यारण में सफेदा के रोपण के फलस्वरूप आवास में परिवर्तन से काले हिरनों (ब्लैकबक) और सोहन चिड़ियों की संख्या काफी प्रभावित हुई है।

महाराष्ट्र में सोहन चिड़िया अभ्यारण्य में केवल 9 पक्षी ही बचे हैं। गुजरात में की गई नवीनतम पक्षी गणना में यह उजागर हुआ है कि संपूर्ण राज्य में इनकी संख्या केवल 48 रह गई है।

सोहन चिड़िया का संरक्षण:
भारतीय वन्यजीव अधिनियम, 1972 की अनुसूची I में इस पक्षी को सूचीकृत किया गया है और वन्य जीव-जन्तुओं और वनस्पतियों की संकटग्रस्त प्रजाति व्यापार संविदा (Convention on International Trade in Endangerd Species) के परिशिष्ट I में सोहन चिड़िया को सूचीकृत करते हुए इसका अंतर्राष्ट्रीय व्यापार भी निषेध कर दिया गया है।

इस पक्षी का संरक्षण सुनिश्चित करने के लिए इसकी संख्या के वितरण को ध्यान में रखते हुए कई आरक्षित क्षेत्र स्थापित किए गए हैं। गुजरात के कच्छ क्षेत्र में नालिया, आंध्र प्रदेश में रोल्लापडू, महाराष्ट्र में सोहन चिड़िया अभ्यारण्य और राजस्थान में राष्ट्रीय मरु उद्यान इनमें से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण हैं।

संरक्षण उपायों के बावजूद भी सोहन चिड़िया की जनसंख्या में भारी कमी आई है। यहां तक कि अपने कई सुरक्षित क्षेत्रों से भी वे गायब हो चुके हैं। पहले के अभ्यारण्यों, जैसे कि मध्य प्रदेश के करेरा और घाटीगांव, कर्नाटक के रानीबेनूर और राजस्थान के सोरासन से ये पक्षी पूरी तरह विलुप्त हो चुके हैं।

भारत में इस शानदार पक्षी के संरक्षण हेतु निम्नलिखित कार्रवाई की आवश्यकता है।

1.  सोहन चिड़िया के निवास वाले क्षेत्रों के चरागाहों में अत्यधिक चराई पर तत्काल रोक लगाना चाहिए।

2.  विकास की गतिविधियों के चलते पक्षी के आवास में परिवर्तन को रोकने हेतु हर संभव प्रयत्न किए जाने चाहिए।

3.  सोहन चिड़िया के प्रदर्शन स्थलों (Lekking sites) को पूर्ण सुरक्षा प्रदान किया जाना चाहिए। प्रदर्शन स्थल वे स्थान होते हैं जहां पर नर पक्षी प्रणय प्रदर्शन कर मादा को आकर्षित करते हैं।

4.  चूंकि, सोहन चिड़िया का जीववैज्ञानिक (Biological) अध्ययन अभी पूरी तरह नहीं किया गया है, इसलिए इस पक्षी के संरक्षण के लिए उचित जीव वैज्ञानिक शोधकार्य भी आवश्यक है।

5.  भारतीय वन्यजीव (सुरक्षा) अधिनियम और संकटग्रस्त प्रजाति व्यापार संविदा को सख्ती से लागू करना चाहिए।

6. इस पक्षी की रक्षा के लिए भारत में तत्काल ‘बस्टर्ड परियोजना’ (Great indian bustard project) की शुरूआत करने की भी आवश्यकता है।

निष्कर्ष:
अंततः इस निष्कर्ष पर पहुचा जा सकता है कि सोहन चिड़िया मुख्यतः आवास विनाश एवं शिकार के कारण विलुप्ति के कगार पर खड़ी है। इस विशाल पक्षी की जनसंख्या में एक चिंताजनक स्तर तक कमी आई है। अतः इस गंभीर संकटग्रस्त पक्षी की प्रजाति की सुरक्षा और संरक्षण समय की मुख्य आवश्यकता है अन्यथा भविष्य में किसी भी समय यह प्रजाति पूरी तरह से विलुप्त हो सकती है।
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लेखक परिचय:

डॉ. अरविंद सिंह वनस्पति विज्ञान विषय से एम.एस-सी. और पी-एच.डी. हैं। आपकी विशेषज्ञता का क्षेत्र पारिस्थितिक विज्ञान है। आप एक समर्पित शोधकर्ता हैं और राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की शोध पत्रिकाओं में अब तक आपके 4 दर्जन से अध‍िक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। खनन गतिविधियों से प्रभावित भूमि का पुनरूत्थान आपके शोध का प्रमुख विषय है। इसके अतिरिक्त आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मुख्य परिसर की वनस्पतियों पर भी अनुसंधान किया है। आपके अंग्रेज़ी में लिखे विज्ञान विषयक आलेख 'Science Log' पर पढ़े जा सकते हैं। आपसे निम्न ईमेल आईडी पर संपर्क किया जा सकता है-
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विलुप्ति के कगार पर खड़ी सोहन चिड़िया
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