कामोत्‍तेजक दवा और मछली के शिकार में मददगार होने के कारण खतरे में है 'मीठे जल का बाघ' (गंगा डॉल्फिन)।

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गंगा डॉल्फिन के विलुप्ति के खतरों एवं बचाव की संभावनाओं को उद्घाटित करता एक शोधपरक विस्तृत आलेख।

विलुप्ति के संकट से जूझ रही गंगा डॉल्फिन
-डॉ. अरविन्द सिंह
व्हेल कुल से संबद्ध गंगा डॉल्फिन (नदी डॉल्फिन) स्तनपाईयों की एक अत्यन्त ही दुर्लभ उपप्रजाति है जो भारत, बांगलादेश तथा नेपाल में गंगा और ब्रह्मपुत्र एवं उनकी सहायक नदियों में पायी जाती है। गंगा डॉल्फिन (Ganges Dolphin) का वैज्ञानिक नाम (Platanista Gangetica Gangetica - प्लटैनिस्टा गैंजेटिका गैंजेटिका) है, जिसे भारत में आम बोलचाल की भाषा में सोंस या सुसु नाम से जाना जाता है जबकि संस्कृत में इसे शिशुमार नाम से जाना जाता है।

Gangetic Dolphinमछली की तरह पूंछ वाली गंगा डाल्फिन भारत की नदियों में पायी जाने वाली एकमात्र स्तनपायी है। चूंकि गंगा डॉल्फिन एक स्तनपायी जीव है इसलिए यह जल के अन्दर श्वास नहीं ले सकती अतः प्रत्येक 30-120 सेकेण्ड में एक बार जल के सतह पर आकर के श्वास लेती है। श्वास के दौरान इसके थूथन से निकलने वाली सूंसूं के आवाज के कारण ही इसे सोंस अथवा सुसु कहा जाता है। गंगा डॉल्फिन को ‘मीठे जल का बाघ’ भी कहा जाता है।

गंगा डॉल्फिन मनुष्यों एवं मीठे जल के बीच की कड़ी है। यह पृथ्वी पर घड़ियाल, शार्क एवं कुछ कछुओं की प्रजातियों के साथ विश्व के प्राचीनतम जीवों का प्रतिनिधित्व करती है। भारत में सभी नदियों की जननी पवित्र गंगा नदी देश में मीठे जल की एक मात्र उपप्रजाति गंगा डॉल्फिन की जनसंख्या को संभालने में अक्षम साबित हो रही है। आज गंगा डॉल्फिन भारतीय नदियों में कारूणिक जीवन जीने को मजबूर हैं और अपने जीवन के लिए एक हारी हुई लड़ाई लड़ रही है।

ऐतिहासिक संदर्भ:-
गंगा डॉल्फिन का प्रमाणिक उल्लेख सम्राट अशोक के स्तम्भ लेख संख्या 5 में देखने को मिलता है। 246 ई0 पू0 अपने शासन काल के बीस वर्ष पूरे होने पर प्रियदर्शी राजा ने एक राज्यादेश के द्वारा विभिन्न प्रकार के जीवों जैसे मैना, तोता, चमगादड़, जंगली हंस, सारस, बारहसिंगा, गिलहरी, गंगा के पपुता आदि की हत्या पर पूर्णतः रोक लगा दी थी। प्राकृत भाषा में पपुता का तात्पर्य गंगा के डॉल्फिन से है। अकबरनामा एवं भारतीय पशु-पक्षियों पर जहांगीर के लेखों में भी गंगा डॉल्फिन का सचित्र वर्णन मिलता है।

गंगा डॉल्फिन का वैज्ञानिक अध्ययन सबसे पहले कोलकाता के वानस्पतिक उद्यान के अधीक्षक विलियम राक्सबर्ग (William Roxburgh) ने 1801 में किया था। उन्होंने ही गंगा डॉल्फिन का वैज्ञानिक नाम प्लटैनिस्टा गैंजेटिका रखा था। वर्ष 1878 में भारतीय संग्रहालय के अध्यक्ष डॉ0 जान एण्डरसन ने हुगली नदी से एक गंगा डॉल्फिन को पकड़कर उसे एक पोखरी में दस दिनों तक जिन्दा रखकर इसके स्वभाव एवं व्यवहार का अध्ययन किया और शोध पत्रों के माध्यम से उसकी शारीरिक संरचना का विस्तार से वर्णन किया। वर्तमान में पटना विश्वविद्यालय, बिहार के डॉ. आर. के. सिन्हा तथा तिलका मांझी विश्वविद्यालय, भागलपुर, बिहार के डॉ. एस. के. चौधरी गंगा डॉल्फिन पर विशेष अध्ययन कर रहे हैं।

भारत की राष्ट्रीय जलजीव:-
नदी की साफ-सफाई में सहायक गंगा डॉल्फिन तेजी से विलुप्त हो रही है। अतः इसको बचाने के लिए भारत सरकार ने इसे ‘राष्ट्रीय जलजीव’ (National Aquatic Animal of India) घोषित कर दिया है। गंगा डॉल्फिन को राष्ट्रीय जलजीव घोषित करने का निर्णय 5 अक्टूबर 2009 को प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह की अध्यक्षता में राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन प्राधिकरण की प्रथम बैठक में लिया गया जिसकी औपचारिक घोषणा 5 मई, 2010 में विधिवत् अधिसूचना के जरिए की गई।

गंगा डॉल्फिन की नदी जल में उपस्थिति एक स्वस्थ पारितंत्र की संकेतक है। चूंकि नदी डॉल्फिन खाद्य श्रृंखला के शिखर पर होती है इसलिए इनकी पर्याप्त संख्या में उपस्थिति नदी में जैव-विविधता की संपन्नता को दर्शाती है और पारितंत्र को संतुलित रखने में सहायक होती है। अतः गंगा डॉल्फिन की उपस्थिति नदी जल को प्रदूषण मुक्त रखती है।

डॉल्फिन को वरीयता प्रजाति (Priority Species) की संज्ञा दी गयी है। विश्व प्राकृतिक निधि वरीयता प्रजाति को पारिस्तिथिक, आर्थिक एवं/ अथवा सांस्कृतिक रूप से इस ग्रह पर सबसे महत्वपूर्ण प्रजाति मानता है।

भारत, बांगलादेश एवं नेपाल के अतिरिक्त वर्तमान में मीठा जल डॉल्फिन विश्व के दो और स्थानों पर पायी जाती हैं। एक दक्षिण अमेरिका के अमेजन नदी में पायी जाने वाली 'बोटो' (Inia Geoffrensis - इनिया जियोफ्रेन्सिस) है जबकि दूसरी पाकिस्तान की सिन्धु नदी में पायी जाने वाली ‘भूलन’ (Platanista Gangetica Minor - प्लटैनिस्टा गैंजेटिका माइनर) है। चीनी नदी डॉल्फिन (Lipotes Vexillifer - लिपोटेस वेक्सिलिफर) जो आमतौर से चीन में ‘बैजी’ नाम से जानी जाती थी, 2006 में विलुप्त हो गई। बैजी को ‘यांगजे नदी की देवी’ कहा जाता था जो कि वास्तव में गंगा डॉल्फिन की चचेरी बहन थी। गंगा डॉल्फिन की तरह ही बोटो एवं भूलन भी विलुप्ति के संकट से जूझ रही हैं।

नदी जल डॉल्फिन समूह की एक सदस्य Franciscana - फ्रान्सिस्काना जिसे आम बोलचाल की भाषा में टोनिन्हा एवं कैचिम्बो नाम से जाना जाता है दक्षिणपूर्वी दक्षिण अमेरिका के तटीय अटलान्टिक महासागर में पायी जाती है। नदी जल समूह की सदस्य होने के बावजूद फ्रान्सिस्काना नमकीन जल में पायी जाती है। इसे फ्रान्सिस्काना नदी डॉल्फिन के नाम से भी जाना जाता है। फ्रान्सिस्काना भी नदी डॉल्फिन समूह की अन्य सदस्यों की तरह ही विलुप्ति के संकट से जूझ रही है।

भारत में गंगा डॉल्फिन का वितरण क्षेत्र:-
भारत में गंगा डॉल्फिन उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड, बिहार, झारखण्ड, मध्य प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल तथा असम राज्यों के गंगा एवं ब्रह्मपुत्र नदियों में पायी जाती हैं। गंगा घाटी में गंगा डॉल्फिन सभी प्रमुख धाराओं एवं उनकी सहायक नदियों जैसे सोन, यमुना, चंबल, गोमती, घाघरा एवं कोसी नदियों में पायी जाती है। ब्रह्मपुत्र घाटी में गंगा डाल्फिन सभी प्रमुख सहायक नदियों जैसे तीस्ता, गदाधर, चंपावत, मानस, भराली, डिहांग, डिबांग, लोहित, दिसांग, डिखो एवं कापिली में पायी जाती हैं।

गंगा डॉल्फिन मुख्य धारा में रहने के साथ-साथ बाढ़ के मौसम में मौसमी सहायक नदियों एवं बाढ़युक्त निचले क्षेत्रों में भी रहती हैं। उनका वितरण जल की कमी एवं चट्टानी बाधाओं से सीमित होता है। नेपाल में गंगा डॉल्फिन करनाली नदी एवं बंगलादेश में कर्णफूली नदी में पायी जाती हैं। भूटान में ये पूर्णतः विलुप्त हो चुकी हैं। गंगा डॉल्फिन आमतौर से नदियों एवं नदियों के संगम के आसपास गहरे जल में पायी जाती हैं।

गंगा डॉल्फिन की विशेषताएं:-
गोलाकार उदर, गठीला शरीर एवं लम्बा पतला थूथन गंगा डॉल्फिन की प्रमुख विशेषताएं होती हैं। इनका मुख बन्द रहने के बावजूद भी उपरी एवं नीचले जबड़ों के दंत दिखायी देते हैं। युवा डॉल्फिन के दंत एक इंच लम्बे, पतले एवं मुड़े हुए होते हैं लेकिन बढ़ती आयु के साथ इनमें परिवर्तन होता है। दोनों जबड़ों में लगभग 134-135 दंत पाये जाते हैं।

शरीर आमतौर से हल्के भूरे रंग का होता है और बीच से गठीला होता है। युवा डॉल्फिन गहरे रंग की होती हैं लेकिन आकार में वृद्धि के साथ रंग हल्का हो जाता है। परिपक्व मादा नर से बड़ी होती है। डॉल्फिन का औसत वजन लगभग 85 किलोग्राम होता है।

गंगा डॉल्फिन की सबसे बड़ी विशेषता यह होती है कि चमकदार लेन्स के अभाव में वे अंधी होती हैं। इसीलिए इन्हें ‘अंधी डॉल्फिन’ भी कहा जाता है। ऐसा मानना है कि गंगा नदी जल के धुंधलेपन के कारण विकास की प्रक्रिया के दौरान संभवतः डॉल्फिन की आँख की रौशनी का पतन हो गया। अंधी होने के बावजूद भी डॉल्फिन अपने आँख का उपयोग सही स्थान का पता लगाने में करती हैं। यह आमतौर से 'सोनार' (Sound navigation and ranging) एवं 'प्रतिध्वनि-निर्धारण' (Echolocation) का उपयोग तैरने के दौरान करती हैं। इस अनुपम विशेषता के कारण गंगा डॉल्फिन विज्ञान के लिए अमूल्य हैं।


गंगा डॉल्फिन स्तनपायीयों में सबसे कम सोने वाली जीव हैं। वे जल में दिन रात सक्रिय रहते हुए सोनार तरंगों को छोड़ती रहती हैं। ये तरंगे सामने की किसी भी वस्तु से टकराकर जब डॉल्फिन के पास लौटती हैं, तो उस वस्तु के रूपए आकार और चरित्र के विषय में समस्त सूचनायें एकत्र कर लेती हैं।

मादा डॉल्फिन प्रत्येक 2 से 3 वर्ष में एक बार एक बच्चे को जन्म देती है। इनके गर्भधारण की अवधि 9 से 11 माह के बीच होती है। मादा डॉल्फिन आमतौर से वर्ष के अक्टूबर से मार्च महीने के बीच बच्चा जनती है और बच्चा जनने की क्रिया दिसम्बर और जनवरी माह में शीर्ष पर होती है जब शुष्क ऋतु का आगमन होता है। मादा बच्चे को एक वर्ष तक दूध पिलाती है और लगभग 10 वर्ष में बच्चे लैंगिक रूप से परिपक्व हो जाते हैं।

गंगा डॉल्फिन में एकतरफा तैरने की विचित्रता होती है। इसीलिए इन्हें ‘एक-तरफा तैरने वाली डॉल्फिन’ नाम से भी जाना जाता है। ऐसा समझा जाता है कि उनका यह बर्ताव भोजन के तलाश हेतु होता है।

गंगा डॉल्फिन विभिन्न प्रकार की मछलियों का शिकार करती हैं जिनमें कैटफिश सबसे महत्वपूर्ण होती है। नदी की तलहटी पर पायी जाने वाली मछलियों का शिकार गंगा डॉल्फिन अपने लम्बे थूथन की सहायता से करती हैं। वे आमतौर से अपने शिकार को निगल जाती हैं। गंगा डॉल्फिन का लम्बा थूथन संभवतः नदी की तलहटी में गाद आदि में छिपे शिकार को खींचने हेतु एक प्रकार का अनुकूलन है।

उन्नीसवीं सदी में गंगा डॉल्फिन बड़े समूहों में शहरी क्षेत्रों के समीप नदी किनारे पायी जाती थी, जबकि आज ये छोटे समूहों या अकेले ही पायी जाती हैं। हॉलिया अध्ययन बताता है कि इनके समूहों की औसत संख्या मात्र दो है।

नदी जल स्तर में उतार चढ़ाव के कारण गंगा डॉल्फिन के वितरण एवं घनत्व में मौसमी परिवर्तन होता है। शुष्क ऋतु में अक्टूबर से अप्रैल तक बहुत सी डॉल्फिनें गंगा-ब्रह्मपुत्र की सहायक नदियों को छोड़कर मुख्य नदी में एकत्र हो जाती हैं ताकि आने वाली वर्षा ऋतु में वो सहायक नदियों में लौट सके। इस प्रक्रिया के दौरान शुष्क ऋतु में बहुधा वे जलाशयों एवं नदी शाखाओं में अलग थलग पड़ जाती हैं।
Gangetic Dolphin

गंगा डॉल्फिन का आवास एवं पारिस्थितिकी:-
गंगा डॉल्फिन केवल मीठे जल में पायी जाती हैं। इनके आवास का विस्तार दुनिया की सबसे घनी आबादी वाले क्षेत्र में है। भारत एवं बंगलादेश में गंगा डॉल्फिन उन नदियों में रहती हैं जिनका बहाव मैदानों में धीमा होता है जबकि नेपाल में वे तेज बहाव वाली साफ जल धारा में निवास करती हैं। गंगा डॉल्फिन आमतौर से नदी के गहरे जल में निवास करती हैं जिसका तापमान 8.33 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है। गंगा डॉल्फिन नदी में अपने आप को उन स्थानों में केन्द्रित करती हैं जहां अधिक भोजन की उपलब्धता होती है।

गंगा डॉल्फिन घड़ियाल, कछुआ एवं नमभूमि पक्षियों के साथ आवास की साझेदारी करती हैं जिनमें से बहुत सी प्रजातियाँ मछली भक्षक होने के कारण डॉल्फिन की दमदार प्रतियोगी होती हैं।

गंगा डॉल्फिन की घटती जनसंख्या के कारण:-
गंगा डॉल्फिन की लगातार गिरती जनसंख्या के कारण वर्ष 1994 में अन्तर्राष्ट्रीय प्रकृति एवं प्राकृतिक संसाधन संघ ने इन्हें असहाय जीव घोषित कर दिया। तत्पश्चात् 1996 में इन्हें लुप्तप्राय जीव घोषित कर ‘लाल आंकड़ा किताब’ (Red Data Book) में लुप्तप्राय जीवों की सूची में डाल दिया गया। जबकि विश्व प्राकृतिक निधि ने इसे 'पताका प्रजाति' (Flagship Species – फ्लैगशि‍प स्पिशीज) के रूप में सूचीबद्ध किया है। भारतीय वन्य जीव सुरक्षा कानून 1972 के तहत इनके शिकार एवं इनसे प्राप्त किसी भी उत्पाद के घरेलू एवं आंतरिक व्यापार पर पूर्णतः रोक है।

शिकार, आवास विघटन, नदी प्रदूषण, दुर्घटनावश मृत्यु, भोजन की कमी एवं नदी विखण्डन डॉल्फिन की गिरती जनसंख्या के प्रमुख कारण हैं। विश्व प्राकृतिक निधि के अध्ययन के अनुसार 95 प्रतिशत डॉल्फिनों की मौत का कारण मनुष्य है। वर्ष 1982 में भारत की नदियों में गंगा डॉल्फिन की जनसंख्या 4000-5000 के बीच थी जबकि आज इनकी संख्या गंभीर स्तर तक घट चुकी है। एक अनुमान के अनुसार वर्तमान में गंगा एवं ब्रह्मपुत्र नदियों (6000 किलोमीटर) में गंगा डॉल्फिन की कुल संख्या मात्र 1200-1800 के बीच है। इस प्रकार गंगा डॉल्फिन एक अत्यन्त ही जोखिमग्रस्त स्तनपायी जीव है जो विलुप्ति के संकट से जूझ रही है।

शिकार:
भारत में गंगा डॉल्फिन का शिकार आम बात है। इनका शिकार आमतौर से मांस और चर्बी के लिए किया जाता है। चर्बी (Blubber – ब्लबर) से प्राप्त तेल का उपयोग कामोत्तेजक दवा और मछली पकड़ने हेतु चारे के रूप में होता है। बिहार राज्य के भागलपुर, कहलगांव एवं मुंगेर एवं झारखण्ड राज्य के साहिबगंज एवं इसके आसपास के क्षेत्रों में मछुवारे गंगा डॉल्फिन के तेल में कुछ अन्य पदार्थ मिलाकर मछली मारने का एक चारा तैयार करते हैं और इसके द्वारा वे कुछ विशेष प्रकार की मछलियां जैसे सिलन, बचवा आदि का शिकार करते हैं। ये मछलियां इस तेल के गंध से दूर से ही आकर्षित हो जाती हैं।

तेल प्राप्ति हेतु प्रत्येक वर्ष सैकड़ों डॉल्फिनों का शिकार किया जाता है। चर्बी से प्राप्त तेल का उपयोग देसी औषधि के रूप में गठिया एवं वात रोग के उपचार में भी होता है। शिकारियों द्वारा गंगा डॉल्फिन का शिकार पटना के पास मध्य गंगा में और ब्रह्मपुत्र नदी के ऊपरी क्षेत्रो में बड़े पैमाने पर किया जाता है। असम राज्य में गंगा डॉल्फिन का शिकार मांस के लिए किया जाता है जो वहां के बाजार में बिकता है।

एण्डरसन के अनुसार पूर्वी भारत के मछुआरों के बीच ऐसी मान्यता है कि डॉल्फिन अपनी विशेष क्षमता द्वारा मछलियों को उनके जाल में लाकर फंसा देती हैं। इसी धारणा के कारण हर मछुवारा गाँव डॉल्फिन को विशेष सम्मान देता है। आज भी बंगलादेश तथा पूर्वी भारत के मछुआरे डॉल्फिन की आमतौर पर हत्या नहीं करते। वे घायल होकर अगर किनारे पर आ जाती हैं तभी उनको जलाकर तेल निकाला जाता है। मछुआरे तेल को बेचने के बजाय एक दैवी उपहार के रूप में रिश्तेदारों एवं गांव वालों के बीच बांटते हैं।

आवास विघटन:
गंगा नदी बेसिन में गंगा डॉल्फिन की संख्या के साथ-साथ उनके आवास की गुणवत्ता में भी कमी आयी है। यह कमी 1950 के बाद से बांधों एवं बैराजों के निर्माण के परिणामस्वरूप आयी है। बैराजों के निर्माण ने गंगा डॉल्फिन की जनसंख्या को खण्डित कर दिया है। पचास से भी अधिक बांधों और सिंचाई से संबन्धित परियोजनाओं के कारण गंगा डॉल्फिन के आवास पर विपरीत प्रभाव पड़ा है जिससे उनकी संख्या में कमी आयी है। जल बहाव एवं जल की गुणवत्ता में परिवर्तन एवं गाद बोझ के कारण नदी जल गंगा डॉल्फिन के जीवन हेतु अनुकूल नहीं रहा। बांधों के निर्माण के फलस्वरूप डॉल्फिन जनसंख्या का छोटे.छोटे समूहों में अलगाव हो गया जिससे उनके प्रव्रजनए भोजन की उपलब्धता आदि पर विपरीत प्रभाव पड़ा है। डॉल्फिन के अलग थलग पड़े समूह मछुआरों के लिए आसान शिकार बन गये।

बांध एवं बैराज डॉल्फिन जनसंख्या को खण्डित करने के अतिरिक्त गंगा डॉल्फिन को उपर एवं नीचे तैरने में बाधा उत्पन्न करते हैं और नीचे की जलधारा को विघटित कर जलाशय को गाद युक्त बना देते हैं, परिणामस्वरूप मछलियों एवं मेरूदण्डहीन प्रजातियों का जमाव हो जाता है। फरक्का-बैराज के उपर जलीय पौधों की प्रचुरता एवं अत्यधिक गाद जमाव के कारण गंगा डॉल्फिन के आवास पर विपरीत प्रभाव पड़ा है।

नहर सिंचाई से जलोढ़ मैदानी क्षेत्रों में सम्पन्नता तो आई लेकिन यह डॉल्फिनों के लिए अभिशाप साबित हुई। गंगा के नहर वाले क्षेत्रों में सिंचाई हेतु अत्यधिक जल निकास के कारण गंगा नदी में जल की कमी हो गयी जिसके फलस्वरूप बड़े पैमाने पर गंगा डॉल्फिनों की मृत्यु हुई है।

वन-विनाश के कारण भी नदियों की तलहटी में बड़े पैमाने पर गाद का जमाव हुआ है जिसके फलस्वरूप गंगा डॉल्फिन का आवास विघटित हो गया है जिससे इनकी जनसंख्या में गिरावट आई है।

नदी की तलहटी से पत्थर एवं बालू निकालने की प्रक्रिया भी गंगा डॉल्फिन के आवास विघटन का एक कारण है।

नदी प्रदूषण:
हरित क्रान्ति के आगमन के पश्चात् जलोढ़ मैदानी क्षेत्रों में कृषि पैदावार बढ़ाने हेतु रासायनिक खादों एवं नाशिजीवनाशकों (पेस्टीसाइड्स) का अंधाधुन्ध प्रयोग हुआ है जिससे ये हानिकारक रसायन वर्षा जल के साथ नदी में पहुंच कर नदी जल को निरन्तर प्रदूषित कर रहे हैं। घातक आर्गेनोक्लोरीन (Organochlorine) एवं आर्गेनोफास्फेट (Organophosphate) नाशिजीवनाशकों ने गंगा डॉल्फिन के लिए जहर का काम किया है। गंगा डॉल्फिन के चर्बी (Blubber) में आर्गेनोक्लोरीन की उपस्थिति गंभीर चिंता का विषय है।

नगर पालिका का बहने वाला जलमल आदि गंगा नदी में पहुँचकर नदी को प्रदूषित कर रहा है। ‘समुद्री प्रजाति संरक्षण’ (Conservation of Marine Species - कंजरवेशन आफ मैरीन स्पिशीज) के अनुसार प्रत्येक वर्ष लगभग 1.15 मिलियन मेट्रिक टन रासायनिक खाद एवं 2600 टन नाशिजीवनाशक नदियों में छोड़े जाते हैं।

उदाहरण के लिए कानपुर के चर्म शोधक संयंत्र से उत्सर्जित भारी धातुओं से युक्त जल गंगा नदी को प्रदूषित करता है। यहां के 400 से भी ज्यादा चर्म शोधक संयंत्र लगभग 3 करोड़ लीटर उत्प्रवाहित गंदा जल रोजाना गंगा में उड़ेल रही हैं। कानपुर शहर इटावा के राष्ट्रीय चंबल अभ्यारण से मात्र 165 किलोमीटर दूर है जहां बड़ी संख्या में गंगा डॉल्फिन पायी जाती हैं। सीसा, आर्सेनिक एवं पारा जैसे हानिकारक तत्वों के जैव-एकत्रण के कारण धीरे-धीरे गंगा डॉल्फिनों की सेहत बिगड़ रही है।

दुर्घटनावश मृत्यु:
मछुवारों द्वारा मछली पकड़ने के दौरान दुर्घटनावश डॉल्फिन की मछली पकड़ने वाले उपकरणों में फंसकर मृत्यु हो जाती है यह भी डॉल्फिनों की कम होती जनसंख्या का एक प्रमुख कारण है। मछुआरों द्वारा एकतन्तु नाइलन (Gillnets) के बढ़ते उपयोग के कारण गंगा डॉल्फिनों की बड़े पैमाने पर मृत्यु हुई है। गिलनेट्स आमतौर से अत्यन्त ही महीन नाइलन धागे से बने होते हैं जिसका प्रतिध्वनिनिर्धारण करने में गंगा डॉल्फिन असफल रहती हैं। गिलनेट्स में फंसकर दुर्घनावश मृत्यु एवं तेल के लिए शिकार गंगा डॉल्फिन के अस्तित्व के लिए दो सबसे बड़े खतरे हैं। चीन की नदी डॉल्फिन बैजी की विलुप्ति का प्रमुख कारण दुर्घटनावश मृत्यु थी।

भोजन की कमी:
अत्याधुनिक गैर-चयनित मछली पकड़ने वाले उपकरणों के व्यापक उपयोग के कारण गंगा डॉल्फिन के लिए भोजन की कमी हो जाती है फलस्वरूप भूख से इनकी मृत्यु हो जाती है।

नदी विखण्डन:
नदी विखण्डन भी गंगा डॉल्फिन की घटती जनसंख्या का एक कारण है। नदी विखण्डन का आशय नदी की कम होती गहरायी से है, जिसमें बलुई ढ़ेर के कारण नदी का विभाजन छोटे खण्डों में हो जाता है। चम्बल नदी में निवास करने वाली गंगा डॉल्फिन जनसंख्या के लिए नदी विखण्डन एक प्रमुख खतरा है।

गंगा डॉल्फिन का संरक्षण:-
बिहार के भागलपुर जिला में स्थित विक्रमशिला गंगा डॉल्फिन अभ्यारण (Vikramshila Gangetic Dolphin Sanctuary) एशिया का एकमात्र सुरक्षित क्षेत्र है जिसे डॉल्फिन की सुरक्षा एवं संरक्षण हेतु स्थापित किया गया है। सुल्तानगंज से कहलगांव तक लगभग 50 किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस अभ्यारण की स्थापना 1991 में की गयी थी। गंगा डॉल्फिन के अधिक घनत्व के अतिरिक्त यह अभ्यारण अन्य वन्य जीवों में भी जैव-विविधता सम्पन्न है जिनमें घड़ियाल, कठोर एवं मुलायम खोल कछुए एवं प्रवासी पक्षियां शामिल हैं।

दुर्भाग्यवश अभ्यारण में संरक्षण हेतु कोई औपचारिक योजना नहीं है और बहुत से स्थानीय निवासी इस अभ्यारण के सुरक्षा स्तर से अनभिज्ञ हैं इसलिए गंगा डॉल्फिन इस अभ्यारण में तमाम खतरों का सामना कर रही हैं। इन खतरों में मनुष्यों एवं डॉल्फिन के बीच भोजन एवं जल संसाधन के लिए प्रतियोगिता, आवास में भौतिक परिवर्तन, आवास विघटन, मांस और तेल जैसे उत्पाद के लिए जानबूझकर डॉल्फिन का शिकार, नदी पर प्रदूषण का बोझ एवं विध्वंसक मछली पकड़ने वाली गतिविधियां (जिनके परिणामस्वरूप डॉल्फिन के लिए भोजन की कमी एवं उनकी दुर्घटनावश मौत हो जाती है) प्रमुख हैं।

चूंकि गंगा डॉल्फिन पृथ्वी पर दुर्लभ जीव हैं और साथ ही ये गंगा की स्वच्छता में सहायक होती हैं अतः इनका संरक्षण आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।

डॉल्फिन संरक्षण हेतु निम्नलिखित रणनीतियों को अपनाये जाने की आवश्यकता है:
1. जल-मल प्रवाह की सफाई के बाद ही उसे नदी में छोड़ा जाना चाहिए।
2. नदियों में मछलियों की पर्याप्त उपस्थिति को सुनिश्चित करना चाहिए जो मनुष्यों एवं डॉल्फिनों की आवश्यकताओं की पूर्ति कर सके।
3. गंगा नदी के किनारों पर वृक्षों का रोपण किया जाना चाहिए जिससे पर्यावरण में सुधार हो सके, कृषि भूमि अपरदन को रोका जा सके और लोगों को भोजन एवं रेशा उपलब्ध कराया जा सके।
4. नदियों में पर्याप्त जल की उपस्थिति को सुनिश्चित किया जाना चाहिए।
5. डॉल्फिन की अधिक जनसंख्या वाले क्षेत्रों में मछली पकड़ने पर पूर्णतः रोक होनी चाहिए।
6. नदी जल को प्रदूषित होने से बचाना चाहिए।
7. डॉल्फिन के शिकार पर प्रभावी रोक लगायी जानी चाहिए।

गंगा डॉल्फिन के संरक्षण हेतु उपर्युक्त रणनीतियों को अपनाये जाने के साथ-साथ एक ठोस कार्रवाई योजना को भी विकसित किये जाने की आवश्यकता है। कार्रवाई योजना में निम्नलिखित को अनिवार्य रूप से शामिल किया जाना चाहिए:-

1. गंगा डॉल्फिन की जनसंख्या एवं उन खतरों का आकलन करना जिसका सामना वर्तमान में गंगा डॉल्फिन कर रही हैं।
2. मनुष्य एवं डॉल्फिन के बीच टकराव को कम करना।
3. सुरक्षित क्षेत्र की स्थापना के साथ-साथ विघटित आवास का पुर्नउत्थान करना।
4. गंगा नदी के किनारे निवास करने वाले समुदायों एवं तीर्थयात्रियों को गंगा डॉल्फिन के विषय में जागरूक करना तथा जनता को मुख्य सहयोगी के तौर पर गंगा डॉल्फिन के संरक्षण में शामिल करना।
5. डॉल्फिन के संरक्षण में समूहों की जागरूकता एवं भागीदारी को सुनिश्चित करना।
6. गंगा डॉल्फिन को स्वस्थ नदियों की पताका प्रजाति के रूप में प्रचारित करना।
7. गंगा डॉल्फिन की अधिकता वाले क्षेत्रों में उनके संरक्षण को सुनिश्चित करना।
8. मछलियों को पकड़ने हेतु चारे के रूप में मछलियों के रद्दी़ से बने तेल को गंगा डॉल्फिन के तेल के विकल्प के रूप में बढ़ावा देना।
9. भारतीय वन्य जीव कानून को दृढ़ता से लागू करना।

उत्तर प्रदेश शासन जन.समुदाय के समर्थन प्राप्ति की प्रत्याशा में गंगा डॉल्फिन के संरक्षण हेतु प्राचीन हिन्दू ग्रन्थों को प्रकाशित कर रहा है। वाल्मीकि रामायण के एक श्लोक ने उस ओज को विशेष रूप से वर्णित किया है जिससे गंगा नदी भगवान् शिव की जटाओं से उत्पन्न हुई तथा इस ओज से विविध कोटि के जीव जैसे पशु, मछली, शिशुमार (गंगा डॉल्फिन) आदि उत्पन्न हुए।

निष्कर्ष:-
गंगा डॉल्फिन की तेजी से घटती जनसंख्या गंभीर चिन्ता का विषय है, क्योंकि ये दुर्लभ जीव नदी की साफ-सफाई में सहायक होते हैं। नदी में इनकी उपस्थिति अधिक जैव-विविधता को सुनिश्चित करती है जिससे पारिस्थितिक संतुलन बना रहता है। गंगा डॉल्फिन के पारिस्थितिक महत्व को देखते हुए आज इनका संरक्षण अति आवश्यक है। ऐसा करके हम न सिर्फ गंगा डॉल्फिन की रक्षा कर सकते हैं अपितु गंगा नदी को स्वच्छ एवं स्वस्थ भी रख सकते हैं।

संक्षेप में कहा जा सकता है कि गंगा डॉल्फिन एवं गंगा नदी एक दूसरे के पूरक हैं और गंगा डॉल्फिन को बचाकर के ही हम गंगा नदी को भी बचा सकते हैं। अतः ‘डॉल्फिन बचाओ गंगा बचाओ’ नारे को अपनाना आज समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
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लेखक परिचय:

डॉ. अरविंद सिंह वनस्पति विज्ञान विषय से एम.एस-सी. और पी-एच.डी. हैं। आपकी विशेषज्ञता का क्षेत्र पारिस्थितिक विज्ञान है। आप एक समर्पित शोधकर्ता हैं और राष्ट्रीय एवं अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की शोध पत्रिकाओं में अब तक आपके 4 दर्जन से अध‍िक शोधपत्र प्रकाशित हो चुके हैं। खनन गतिविधियों से प्रभावित भूमि का पुनरूत्थान आपके शोध का प्रमुख विषय है। इसके अतिरिक्त आपने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय मुख्य परिसर की वनस्पतियों पर भी अनुसंधान किया है। आपके अंग्रेज़ी में लिखे विज्ञान विषयक आलेख 'Science Log' पर पढ़े जा सकते हैं। आपसे निम्न ईमेल आईडी पर संपर्क किया जा सकता है-

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Scientific World: कामोत्‍तेजक दवा और मछली के शिकार में मददगार होने के कारण खतरे में है 'मीठे जल का बाघ' (गंगा डॉल्फिन)।
कामोत्‍तेजक दवा और मछली के शिकार में मददगार होने के कारण खतरे में है 'मीठे जल का बाघ' (गंगा डॉल्फिन)।
गंगा डॉल्फिन के विलुप्ति के खतरों एवं बचाव की संभावनाओं को उद्घाटित करता एक शोधपरक विस्तृत आलेख।
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http://2.bp.blogspot.com/-zzCJFiZjGEs/VO_8aUgzk2I/AAAAAAAAFYk/xgFtexgZ6Vw/s72-c/Dolphin.jpg
Scientific World
http://www.scientificworld.in/2014/10/ganges-dolphin-facts-in-hindi.html
http://www.scientificworld.in/
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