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कैसी होगी भविष्य की दुनिया?

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सम्पादक संतोष चौबे जी स्वागत करते हुए कल की चिन्ता् हर किसी को होती है, फिर चाहे वह आम आदमी ...

सम्पादक संतोष चौबे जी स्वागत करते हुए
कल की चिन्ता् हर किसी को होती है, फिर चाहे वह आम आदमी हो अथवा वैज्ञानिक। फर्क सिर्फ इतना होता है कि जब आम आदमी इसकी चिंता करता है, तो वह ज्योतिषियों के पास जाकर अपने आप को लुटा-पिटा कर चला आता है। लेकिन जब वैज्ञानिक एवं विज्ञान संचारक इसपर चिन्तन करते हैं, तो कुछ तथ्यपरक विचार हमारे सामने आते हैं। ये विचार समाज के लिए आईना का काम करते हैं और व्यतक्ति इनसे प्रेरणा लेकर स्वयं को भविष्य के लिए भलीभांति तैयार करते हैं।

डॉ0 मनोज पटैरिया आधार वक्‍तव्‍य देते हुए
 भविष्य को समझने का एक ऐसा ही प्रयास गत 14 फरवरी को भोपाल में किया गया। ‘इलेक्ट्रानिकी आपके लिए’ के 200वें अंक के अवसर पर स्कोप कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग, होशंगाबाद रोड, भोपाल में आयोजित इस कार्यक्रम में देश भर से आए डेढ़ दर्जन विज्ञान संचारकों ने हिस्सा लिया और अपने विचार रखे।

कार्यक्रम के उद्घाटन एवं लोकार्पण सत्र में राष्ट्रीय विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संचार परिषद, नई दिल्ली के निदेशक डॉ0 मनोज पटैरिया ने आधार वक्तव्य देते हुए कहा कि विज्ञान पत्रकारिता का मुख्‍य उद्देश्य है लोगों को फ्यूचर शॉक से बचाने के लिए तैयार करना। यह बहुत दुष्कर कार्य है, क्योंकि मीडिया सोचता है कि यह काम वैज्ञानिकों का है, जबकि वैज्ञानिक सोचता है कि यह काम मीडिया वालों को करना चाहिए। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों द्वारा इस काम को न किए जाने के चार प्रमुख कारण हैं। पहला कारण यह है कि वह कुशल विज्ञान संचारक नहीं होता है। दूसरा कारण यह है कि वह रिसर्च को वरीयता देता है और स्वायं को विज्ञान संचार से दूर रखता है। तीसरा कारण यह है कि वैज्ञानिक जब कभी इस काम को हाथ में लेते हैं तो वे विषय को सनसनीखेज बनाकर प्रस्तुत करते हैं। इससे अधूरी जानकारी जाने का भय रहता है। इसीलिए संस्थान वैज्ञानिकों को इस काम को करने से रोकते हैं। चौथा कारण यह है कि वैज्ञानिक विज्ञान संचार को हेय दृष्टि से देखते हैं, इसलिए वे इसे सीखना भी नहीं चाहते। 

दूसरी ओर पत्रकारों के सामने भी यही समस्या है। क्योंकि विज्ञान पत्रकार को वह वेटेज नहीं मिलता है, जो वेटेज राजनीति अथवा फिल्म के पत्रकारों को दिया जाता है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि विज्ञान पत्रकार पाठकों को नैनो टेक्नालॉजी के बारे में बता रहा है, तो उसे चाहिए कि वह उसके संभावित खतरों को भी रेखांकित करे।

बाएं से सर्वश्री जीशान हैदर जैदी, रवि रतलामी, जाकिर अली रजनीश, मनीष मोहन गोरे, शुकदेव प्रसाद
माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता संचार विश्वाविद्यालय, भोपाल के पत्रकारिता विभाग के अध्यक्ष पुष्पेन्द्र पाल सिंह ने ‘हिन्दी विज्ञान पत्रकारिता की चुनौतियां’ विषय पर बोलते हुए कहा कि यदि हम युवाओं को इसके प्रति आकर्षित कर पाए, तभी विज्ञान संचार आंदोलन का रूप ले पाएगा। पर युवाओं के सामने पेट का दबाव पहले है, इसलिए वे अंग्रेजी की ओर आकर्षित होते हैं। हमें इस बिन्दु पर मनन करना होगा कि कैसे हम हिन्दी को पेट से भी जोड़ सकें। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिकों और पत्रकारों के बीच एक अविश्वास की खाई सी बनी हुई है, यही कारण कि हमारे संस्थानों में जो महत्वपूर्ण रिसर्च हो रहे हैं, जनता तक उनकी जानकारी नहीं पहुंच पाती है। इस अविश्वास की खाई को पाटे जाने की आवश्यकता है।

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्व विद्यालय के क्षेत्रीय निदेशक डॉ0 के0एस0 तिवारी ने पुष्पेंन्द्र पाल की बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि यह दुर्भाग्य का विषय है कि आज का युवा रिसर्च का काम सिर्फ डिग्री के लिए करता है। यही कारण है कि हमारे यहां होने वाले सिर्फ 10 प्रतिशत शोध काम के होते हैं। उन्होंने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि हर रिसर्च संस्थान में एक सेल ऐसा होना चाहिए जो सरल भाषा में अपनी खोजों को जनता तक लेकर जाए। इस अवसर पर क्षेत्रीय विज्ञान केन्द्र , भोपाल के समन्वयक श्री प्रबल राय, म0प्र0 निजी विश्वमविद्यालय विनिमायक आयोग के अध्यक्ष प्रोफेसर अखिलेश पाण्डेय ने भी अपने विचार रखे। कार्यक्रम की अध्यक्षता डॉ0 सी0वी0 रमन विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ0 ए0एस0 झाड़गांवकर ने की।

कार्यक्रम के दौरान ‘इलेक्ट्रानिकी आपके लिए’ के 200वें अंक का लोकार्पण भी किया गया। यह अंक ‘भविष्य की दुनिया’ पर केन्द्रित है। इस अवसर पत्रिका के सम्पादक संतोष चौबे ने पत्रिका के 23 साल के सफर को श्रोताओं के समक्ष रखा।

स्‍वागत क्रम में डा0 अरविंद मिश्र
इस अवसर पर पत्रिका के लेखकों को स्मृति चिन्ह देकर सम्मानित किया गया। सम्मानित होने वाले रचनाकारों में प्रमुख हैं सर्वश्री अरविंद मिश्र, मनमोहन बाला, पी0के0 मुखर्जी, रवि रतलामी, शुकदेव प्रसाद, जीशान हैदर जैदी, मनीष मोहन गोरे, आभाष मुखर्जी एवं ज़ाकिर अली ‘रजनीश’

भोजन के बाद के द्वितीय सत्र में ‘भविष्य की दुनिया’ विषय पर परिचर्चा आयोजित की गयी। परिचर्चा में आमंत्रित लेखकों एवं विद्यार्थियों ने भाग लिया। इस अवसर पर डॉ0 पी0के0 मुखर्जी ने मानव के सामने मुंह बाए खडी चुनौतियों की चर्चा की। डॉ0 के0के0 सुगंधी ने भविष्य में होने वाले सामाजिक एवं पर्यावरणीय बदलावों के प्रति आगाह रहने की अलख जगायी। जीशान हैदर जैदी ने कहा कि मनुष्य ने आज तक जितने भी आविष्कार किये हैं, उनकी प्रेरणा हमें प्रकृति से मिली है। इसलिए हमें प्रकृति की भाषा को समझने की आवश्यकता है। डॉ0 अरविंद मिश्र ने आज के वैज्ञानिकों द्वारा बनाई जा रही युद्ध प्रणालियों के संदर्भ में कहा कि कहीं यह प्रकृति का कोई षणयंत्र तो नहीं, जो वह हमें नष्ट करने के लिए उसकी भूमिका बना रही हो।

आभाष मुखर्जी ने कहा कि यह प्रकृति से दूर जाने का ही परिणाम है कि आज 15 साल की उम्र में बच्चों को हायपरटेंशन और डायबिटीज हो रहे हैं। मनीष मोहन गोरे ने मनुष्य के स्वार्थ को निशाना बनाते हुए कहा कि यह हमारी मूर्खता है, जो हम प्रकृति के व्याेकरण को गड़बड़ा रहे हैं। यदि हमने प्रकृति के साथ इसी तरह छेड़छाड़ जारी रखी, तो आने वाले दिनों में हमें इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। संतोष चौबे ने कहा कि मनुष्या में एक प्रकार की अंतश्चेूतना पाई जाती है, जो उसे अच्छे-बुरे के बीच भेद करती है। हमें विश्वास है कि यह चेतना ही उसे अंतत: नष्ट होने से बचाएगी।

परिचर्चा कक्ष का विहंगम दृदय
डॉ0 मनोज पटैरिया ने कहा कि हाइपोथिसिस को प्रूव और अनप्रूव करने के लिए जो प्रक्रिया अपनाई जाती है, वही विज्ञान है। आज बड़े देश स्ट्रैटेजिक फ्यूचर डिसाइड करते हैं और उसके अनुसार सारे विश्व पर दबाव बनाते हैं। दुर्भाग्य का विषय यह है कि दुनिया के ये गिने-चुने देश वैज्ञानिक माहौल को अपने नियंत्रण में रखते हैं। क्योंकि हमें कौन सी रिसर्च करनी है और उसके द्वारा कौन से रिजल्ट बताने हैं, यह भी इनके द्वारा अक्सर तय किया जाता है। विज्ञान संचारकों को इस षणयंत्र से भी सजग रहने की आवश्यनकता है।

परिचर्चा की अध्यक्षता डॉ0 ए0एस0 झांड़गांवकर ने की। उन्होंने कहा कि यह दुर्भाग्य का विषय है कि आज मनुष्य मशीनी बनता जा रहा है और मशीन में मानवीयता रोपने की तैयारियां हो रही हैं। यदि यह प्रवृत्ति बढ़ती गयी, तो मानवता को इसके गंभीर परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।

परिचर्चा के समापन पर ‘इलेक्ट्रानिकी आपके लिए’ की सह सम्पादिका विनीता चौबे ने आभार प्रदर्शन किया। उन्होंने संस्थान द्वारा प्रकाशित विज्ञान विषयक पुस्तकों का एक सेट भी सभी अतिथियों को भेंट किया।
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